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title: "उत्तरकाण्ड, Sarga 1"
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# उत्तरकाण्ड, Sarga 1

> प्राप्तराज्यस्य रामस्य राक्षसानां वधे कृते ।  
> आजग्मुर्मुनयः सर्वे राघवं प्रतिनन्दितुम् ॥ १ ॥  
> कौशिकोऽथ यवक्रीतो गार्ग्यो गालव एव च ।  
> कण्वो मेधातिथेः पुत्रः पूर्वस्यां दिशि ये श्रिताः ॥ २ ॥

राक्षसोंका संहार करनेके अनन्तर जब भगवान् श्रीरामने अपना राज्य प्राप्त कर लिया, तब सम्पूर्ण ऋषि-महर्षि श्रीरघुनाथजीका अभिनन्दन करनेके लिये अयोध्यापुरीमें आये॥ जो मुख्यतः पूर्व दिशामें निवास करते हैं, वे कौशिक, यवक्रीत, गार्ग्य, गालव और मेधातिथिके पुत्र कण्व वहाँ पधारे ॥ २ ॥

> स्वस्त्यात्रेयश्च भगवान् नमुचिः प्रमुचिस्तथा ।  
> अगस्त्योऽत्रिश्च भगवान् सुमुखो विमुखस्तथा ॥ ३ ॥  
> आजग्मुस्ते सहागस्त्या ये श्रिता दक्षिणां दिशम् ।

स्वस्त्यात्रेय, भगवान् नमुचि, प्रमुचि, अगस्त्य, भगवान् अत्रि, सुमुख और विमुख—ये दक्षिण दिशामें रहनेवाले महर्षि अगस्त्यजीके साथ वहाँ आये ॥ ३½ ॥

> नृषः कवषो धौम्यः कौशेयश्च महानृषिः ॥ ४ ॥  
> तेऽप्याजग्मुः सशिष्या वै ये श्रिताः पश्चिमां दिशम् ।

जो प्रायः पश्चिम दिशाका आश्रय लेकर रहते हैं, वे नृषङ्गु, कवष, धौम्य और महर्षि कौशेय भी अपने शिष्योंके साथ वहाँ आये ॥ ४½ ॥

> वसिष्ठः कश्यपोऽथात्रिर्विश्वामित्रः सगौतमः ॥ ५ ॥  
> जमदग्निर्भरद्वाजस्तेऽपि सप्तर्षयस्तथा ।  
> उदीच्यां दिशि सप्तैते नित्यमेव निवासिनः ॥ ६ ॥

इसी तरह उत्तर दिशाके नित्य-निवासी वसिष्ठ,* कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज—ये सात ऋषि जो सप्तर्षि कहलाते हैं, अयोध्यापुरीमें पधारे ॥ ५-६ ॥

> सम्प्राप्यैते महात्मानो राघवस्य निवेशनम् ।  
> विष्ठिताः प्रतिहारार्थं हुताशनसमप्रभाः ॥ ७ ॥  
> वेदवेदाङ्गविदुषो नानाशास्त्रविशारदाः ।

ये सभी अग्निके समान तेजस्वी, वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान् तथा नाना प्रकारके शास्त्रोंका विचार करनेमें प्रवीण थे । वे महात्मा मुनि श्रीरघुनाथजीके राजभवनके पास पहुँचकर अपने आगमनकी सूचना देनेके लिये ड्योढ़ीपर खड़े हो गये ॥७½॥

> द्वाःस्थं प्रोवाच धर्मात्मा अगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥  
> निवेद्यतां दाशरथेर्ऋषयो वयमागताः ।

उस समय धर्मपरायण मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने द्वारपालसे कहा--‘तुम दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामको जाकर सूचना दो कि हम अनेक ऋषि-मुनि आपसे मिलनेके लिये आये हैं’ ८½

> प्रतीहारस्ततस्तूर्णमगस्त्यवचनाद् द्रुतम् ॥ ९ ॥  
> समीपं राघवस्याशु प्रविवेश महात्मनः ।  
> नयेङ्गितज्ञः सद्वृत्तो दक्षो धैर्यसमन्वितः ॥ १० ॥

महर्षि अगस्त्यकी आज्ञा पाकर द्वारपाल तुरंत महात्मा श्रीरघुनाथजीके समीप गया । वह नीतिज्ञ, इङ्गारेसे बातको समझनेवाला, सदाचारी, चतुर और धैर्यवान् था ॥ ९-१० ॥

> स रामं दृश्य सहसा पूर्णचन्द्रसमद्युतिम् ।  
> अगस्त्यं कथयामास सम्प्राप्तमृषिसत्तमम् ॥ ११ ॥

पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् श्रीरामका दर्शन करके उसने सहसा बताया—‘प्रभो ! मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य अनेक ऋषियोंके साथ पधारे हुए हैं’ ॥ ११ ॥

> श्रुत्वा प्राप्तान् मुनींस्तांस्तु बालसूर्यसमप्रभान् ।  
> प्रत्युवाच ततो द्वाःस्थं प्रवेशय यथासुखम् ॥ १२ ॥

प्रातःकालके सूर्यकी भाँति दिव्य तेजसे प्रकाशित होनेवाले उन मुनीश्वरोंके पदार्पणका समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने द्वारपालसे कहा—‘तुम जाकर उन सब लोगोंको यहाँ सुखपूर्वक ले आओ’ ॥ १२ ॥

> दृष्ट्वा प्राप्तान् मुनींस्तांस्तु प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः ।  
> पाद्यार्घ्यादिभिरानर्च्य गां निवेद्य च सादरम् ॥ १३ ॥

(आज्ञा पाकर द्वारपाल गया और सबको साथ ले आया।) उन मुनीश्वरोंको उपस्थित देख श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये । फिर पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा उनका आदरपूर्वक पूजन किया । पूजनसे पहले उन सबके लिये एक-एक गाय भेंट की ॥ १३ ॥

> रामोऽभिवाद्य प्रयत आसनान्यादिदेश ह ।  
> तेषु काञ्चनचित्रेषु महत्सु च वरेषु च ॥ १४ ॥  
> कुशान्तर्धानदत्तेषु मृगचर्मयुतेषु च ।  
> यथार्हमुपविष्टास्ते आसनेष्वृषिपुङ्गवाः ॥ १५ ॥

श्रीरामने शुद्धभावसे उन सबको प्रणाम करके उन्हें बैठनेके लिये आसन दिये । वे आसन सोनेके बने हुए और विचित्र आकार-प्रकारवाले थे । सुन्दर होनेके साथ ही वे विशाल और विस्तृत भी थे । उनपर कुशके आसन रखकर ऊपरसे मृगचर्म बिछाये गये थे । उन आसनोंपर वे श्रेष्ठ मुनि यथायोग्य बैठ गये ॥ १४-१५ ॥

> रामेण कुशलं पृष्ठाः सशिष्याः सपुरोगमाः ।  
> महर्षयो वेदविदो रामं वचनमब्रुवन् ।

तब श्रीरामने शिष्यों और गुरुजनोंसहित उन सबका कुशल-समाचार पूछा । उनके पूछनेपर वे वेदवेत्ता महर्षि इस प्रकार बोले——॥ १५½ ॥

> कुशलं नो महाबाहो सर्वत्र रघुनन्दन ॥ १६ ॥  
> त्वां तु दिष्ट्या कुशलिनं पश्यामो हतशात्रवम् ।  
> दिष्ट्या त्वया हतो राजन् रावणो लोकरावणः ॥ १७ ॥

‘महाबाहु रघुनन्दन ! हमारे लिये तो सर्वत्र कुशल-ही-कुशल है । सौभाग्यकी बात है कि हम आपको सकुशल देख रहे हैं और आपके सारे शत्रु मारे जा चुके हैं । राजन् ! आपने सम्पूर्ण लोकोंको रुलानेवाले रावणका वध किया, यह सबके लिये बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ १६-१७ ॥

> नहि भारः स ते राम रावणः पुत्रपौत्रवान् ।  
> सधनुस्त्वं हि लोकांस्त्रीन् विजयेथा न संशयः ॥ १८ ॥

‘श्रीराम ! पुत्र-पौत्रोंसहित रावण आपके लिये कोई भार नहीं था । आप धनुष लेकर खड़े हो जायँ तो तीनों लोकोंपर विजय पा सकते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ १८ ॥

> दिष्ट्या त्वया हतो राम रावणो राक्षसेश्वरः ।  
> दिष्ट्या विजयिनं त्वाद्य पश्यामः सह सीतया ॥ १९ ॥

‘रघुनन्दन राम ! आपने राक्षसराज रावणका वध कर दिया और सीताके साथ आप विजयी वीरोंको आज हम सकुशल देख रहे हैं, यह कितने आनन्दकी बात है ॥ १९ ॥

> लक्ष्मणेन च धर्मात्मन् भ्रात्रा त्वद्धितकारिणा ।  
> मातृभिर्भ्रातृसहितं पश्यामोऽद्य वयं नृप ॥ २० ॥

‘धर्मात्मा नरेश ! आपके भाई लक्ष्मण सदा आपके हितमें लगे रहनेवाले हैं । आप इनके, भरत-शत्रुघ्नके तथा माताओंके साथ अब यहाँ सानन्द विराज रहे हैं और इस रूपमें हमें आपका दर्शन हो रहा है, यह हमारा अहोभाग्य है ॥२०॥

> दिष्ट्या प्रहस्तो विकटो विरूपाक्षो महोदरः ।  
> अकम्पनश्च दुर्धर्षो निहतास्ते निशाचराः ॥ २१ ॥

‘प्रहस्त, विकट, विरूपाक्ष, महोदर तथा दुर्धर्ष अकम्पन-जैसे निशाचर आपलोगोंके हाथसे मारे गये, यह बड़े आनन्दकी बात है ॥ २१ ॥

> यस्य प्रमाणाद् विपुलं प्रमाणं नेह विद्यते ।  
> दिष्ट्या ते समरे राम कुम्भकर्णो निपातितः ॥ २२ ॥

‘श्रीराम ! शरीरकी ऊँचाई और स्थूलतामें जिससे बढ़कर दूसरा कोई है ही नहीं, उस कुम्भकर्णको भी आपने समराङ्गणमें मार गिराया, यह हमारे लिये परम सौभाग्यकी बात है ॥ २२ ॥

> त्रिशिराश्चातिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ ।  
> दिष्ट्या ते निहता राम महावीर्या निशाचराः ॥ २३ ॥

‘श्रीराम ! त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक तथा नरान्तक—ये महापराक्रमी निशाचर भी हमारे सौभाग्यसे ही आपके हाथों मारे गये ॥ २३ ॥

> कुम्भश्चैव निकुम्भश्च राक्षसौ भीमदर्शनौ ।  
> दिष्ट्या तौ निहतौ राम कुम्भकर्णसुतौ मृधे ॥ २४ ॥

‘रघुवीर ! जो देखनेमें भी बड़े भयंकर थे, वे कुम्भकर्णके दोनों पुत्र कुम्भ और निकुम्भ नामक राक्षस भी भाग्यवश युद्धमें मारे गये ॥ २४ ॥

> युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च कालान्तकयमोपमौ ।  
> यज्ञकोपश्च बलवान् धूम्राक्षो नाम राक्षसः ॥ २५ ॥

‘प्रलयकालके संहारकारी यमराजकी भाँति भयानक युद्धोन्मत्त और मत्त भी कालके गालमें चले गये । बलवान् यज्ञकोप और धूम्राक्ष नामक राक्षस भी यमलोकके अतिथि हो गये ॥ २५ ॥

> कुर्वन्तः कदनं घोरमेते शस्त्रास्त्रपारगाः ।  
> अन्तकप्रतिमैर्बाणैर्दिष्ट्या विनिहतास्त्वया ॥ २६ ॥

‘ये समस्त निशाचर अस्त्र-शस्त्रोंके पारंगत विद्वान् थे । इन्होंने जगत्में भयंकर संहार मचा रक्खा था; परंतु आपने अन्तकतुल्य बाणोंद्वारा इन सबको मौतके घाट उतार दिया; यह कितने हर्षकी बात है ॥ २६ ॥

> दिष्ट्या त्वं राक्षसेन्द्रेण द्वन्द्वयुद्धमुपागतः ।  
> देवतानामवध्येन विजयं प्राप्तवानसि ॥ २७ ॥

‘राक्षसराज रावण देवताओंके लिये भी अवध्य था, उसके साथ आप द्वन्द्वयुद्धमें उतर आये और विजय भी आपको ही मिली; यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ २७ ॥

> संख्ये तस्य न किंचित् तु रावणस्य पराभवः ।  
> द्वन्द्वयुद्धमनुप्राप्तो दिष्ट्या ते रावणिर्हतः ॥ २८ ॥

‘युद्धमें आपके द्वारा जो रावणका पराभव (संहार) हुआ, वह कोई बड़ी बात नहीं है; परंतु द्वन्द्वयुद्धमें लक्ष्मणके द्वारा जो रावणपुत्र इन्द्रजित्का वध हुआ है, वही सबसे बढ़कर आश्चर्यकी बात है ॥ २८ ॥

> दिष्ट्या तस्य महाबाहो कालस्येवाभिधावतः ।  
> मुक्तः सुररिपोर्वीर प्राप्तश्च विजयस्त्वया ॥ २९ ॥

‘महाबाहु वीर ! कालके समान आक्रमण करनेवाले उस देवद्रोही राक्षसके नागपाशसे मुक्त होकर आपने विजय प्राप्त की, यह महान् सौभाग्यकी बात है ॥ २९ ॥

> अभिनन्दाम ते सर्वे संश्रुत्येन्द्रजितो वधम् ।  
> अवध्यः सर्वभूतानां महामायाधरो युधि ॥ ३० ॥  
> विस्रयस्त्वेष चास्माकं तं श्रुत्वेन्द्रजितं हतम् ।

‘इन्द्रजित्के वधका समाचार सुनकर हम सब लोग बहुत प्रसन्न हुए हैं और इसके लिये आपका अभिनन्दन करते हैं । वह महामायावी राक्षस युद्धमें सभी प्राणियोंके लिये अवध्य था । वह इन्द्रजित् भी मारा गया, यह सुनकर हमें अधिक आश्चर्य हुआ है ॥ ३०½ ॥

> एते चान्ये च बहवो राक्षसाः कामरूपिणः ॥ ३१ ॥  
> दिष्ट्या त्वया हता वीरा रघूणां कुलवर्धन ।

‘रघुकुलकी वृद्धि करनेवाले श्रीराम ! ये तथा और भी बहुत-से इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वीर राक्षस आपके द्वारा मारे गये, यह बड़े आनन्दकी बात है ॥ ३१½ ॥

> दिष्ट्या पुण्यामिमां वीर सौम्यामभयदक्षिणाम् ॥ ३२ ॥  
> दिष्ट्या वर्धसि काकुत्स्थ जयेनामित्रकर्शन ।

‘वीर ! ककुत्स्थकुलभूषण ! शत्रुसूदन श्रीराम ! आप संसारको वह परम पुण्यमय सौम्य अभयदान देकर अपनी विजयके कारण बधाईके पात्र हो गये हैं—निरन्तर बढ़ रहे हैं, यह कितने हर्षकी बात है !’ ॥ ३२½ ॥

> श्रुत्वा तु वचनं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ३३ ॥  
> विस्मयं परमं गत्वा रामः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।

उन पवित्रात्मा मुनियोंकी वह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे हाथ जोड़कर पूछने लगे—॥ ३३½ ॥

> भगवन्तः कुम्भकर्णं रावणं च निशाचरम् ॥ ३४ ॥  
> अतिक्रम्य महावीर्यौ किं प्रशंसथ रावणिम् ।

‘पूज्यपाद महर्षियो ! निशाचर रावण तथा कुम्भकर्ण दोनों ही महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे । उन दोनोंको लाँघकर आप रावणपुत्र इन्द्रजित्की ही प्रशंसा क्यों करते हैं ! ॥ ३४½ ॥

> महोदरं प्रहस्तं च विरूपाक्षं च राक्षसम् ॥ ३५ ॥  
> मत्तोन्मत्तौ च दुर्धर्षौ देवान्तकनरान्तकौ ।  
> अतिक्रम्य महावीरान् किं प्रशंसथ रावणिम् ॥ ३६ ॥

‘महोदर, प्रहस्त, विरूपाक्ष, मत्त, उन्मत्त तथा दुर्धर्ष वीर देवान्तक और नरान्तक—इन महान् वीरोंका उल्लङ्घन करके आपलोग रावणकुमार इन्द्रजित्की ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं ! ॥ ३५-३६ ॥

> अतिकायं त्रिशिरसं धूम्राक्षं च निशाचरम् ।  
> अतिक्रम्य महावीर्यान् किं प्रशंसथ रावणिम् ॥ ३७ ॥

‘अतिकाय, त्रिशिरा तथा निशाचर धूम्राक्ष—इन महापराक्रमी वीरोंका अतिक्रमण करके आप रावणपुत्र इन्द्रजित्की ही प्रशंसा क्यों करते हैं ! ॥ ३७ ॥

> कीदृशो वै प्रभावोऽस्य किं बलं कः पराक्रमः ।  
> केन वा कारणेनैष रावणादतिरिच्यते ॥ ३८ ॥

‘उसका प्रभाव कैसा था ? उसमें कौन-सा बल और पराक्रम था ? अथवा किस कारणसे यह रावणसे भी बढ़कर सिद्ध होता है ॥ ३८ ॥

> शक्यं यदि मया श्रोतुं न खल्वाज्ञापयामि वः ।  
> यदि गुह्यं न चेद् वक्तुं श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् ॥

‘यदि यह मेरे सुनने योग्य हो, गोपनीय न हो तो मैं इसे सुनना चाहता हूँ । आपलोग बतानेकी कृपा करें । वह मेरा विनम्र अनुरोध है । मैं आपलोगोंको आज्ञा नहीं दे रहा हूँ ॥ ३९ ॥

> शक्रोऽपि विजितस्तेन कथं लब्धवरश्च सः ।  
> कथं च बलवान् पुत्रो न पिता तस्य रावणः ॥ ४० ॥

‘उस रावणपुत्रने इन्द्रको भी किस तरह जीत लिया ? कैसे वरदान प्राप्त किया ? पुत्र किस प्रकार महाबलवान् हो गया और उसका पिता रावण क्यों वैसा बलवान् नहीं हुआ ? ४०

> कथं पितुश्चाप्यधिको महाहवे  
> शक्रस्य जेता हि कथं स राक्षसः ।  
> वराश्च लब्धाः कथयस्व मेऽद्य  
> पाप्रच्छतश्चास्य मुनीन्द्र सर्वम् ॥ ४१ ॥

‘मुनीश्वर ! वह राक्षस इन्द्रजित् महासमरमें किस तरह पितासे भी अधिक शक्तिशाली एवं इन्द्रपर भी विजय पानेवाला हो गया ? तथा किस तरह उसने बहुत-से वर प्राप्त कर लिये ? इन सब बातोंको मैं जानना चाहता हूँ; इसलिये बारंबार पूछता हूँ । आज आप ये सारी बातें मुझे बताइये’ ॥ ४१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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