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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 57"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 57

> आप्लुत्य च महावेगः पक्षवानिव पर्वतः ।  
> भुजङ्गयक्षगन्धर्वप्रबुद्धकमलोत्पलम् ॥ १ ॥  
> स चन्द्रकुमुदं रम्यं सार्ककारण्डवं शुभम् ।  
> तिष्यश्रवणकादम्बमभ्रशैवलशाद्वलम् ॥ २ ॥  
> पुनर्वसुमहामीनं लोहिताङ्गमहाग्रहम् ।  
> ऐरावतमहाद्वीपं स्वातीहंसविलासितम् ॥ ३ ॥  
> वातसंघातजालोर्मिचन्द्रांशुशिशिराम्बुमत् ।  
> हनूमानपरिश्रान्तः प्लुप्लुवे गगनार्णवम् ॥ ४ ॥

पङ्खधारी पर्वतके समान महान् वेगशाली हनुमान्जी बिना थके-माँदे उस सुन्दर एवं रमणीय आकाशरूपी समुद्रको पार करने लगे, जिसमें नाग, यक्ष और गन्धर्व खिले हुए कमल और उत्पलके समान थे। चन्द्रमा कुमुद और सूर्य जलकुक्कुटके समान थे। पुष्य और श्रवण नक्षत्र कलहंस तथा बादल सेवार और घासके तुल्य थे। पुनर्वसु विशाल मत्स्य और मंगल बड़े भारी ग्राहके सदृश थे। ऐरावत हाथी वहाँ महान् द्वीप-सा प्रतीत होता था। वह आकाशरूपी समुद्र स्वातीरूपी हंसके विलाससे सुशोभित था तथा वायु-समूहरूप तरङ्गों और चन्द्रमाकी किरणरूप शीतल जलसे भरा हुआ था ॥ १-४ ॥

> ग्रसमान इवाकाशं ताराधिपमिवोल्लिखन् ।  
> हरन्निव सनक्षत्रं गगनं सार्कमण्डलम् ॥ ५ ॥  
> अपारमपरिश्रान्तश्चाम्बुधिं समगाहत ।  
> हनूमान् मेघजालानि विकर्षन्निव गच्छति ॥ ६ ॥

हनुमान्जी आकाशको अपना ग्रास बनाते हुए, चन्द्र-मण्डलको नखोंसे खरोंचते हुए, नक्षत्रों तथा सूर्यमण्डलसहित अन्तरिक्षको समेटते हुए और बादलोंके समूहको खींचते हुए-से अनायास ही अपार महासागरके पार चले जा रहे थे ॥ ५-६ ॥

> पाण्डुरारुणवर्णानि नीलमाञ्जिष्ठकानि च ।  
> हरितारुणवर्णानि महाभ्राणि चकाशिरे ॥ ७ ॥

उस समय आसमानमें सफेद, लाल, नीले, मंजीठके रंगके, हरे और अरुण वर्णके बड़े-बड़े मेघ शोभा पा रहे थे ॥ ७ ॥

> प्रविशन्नभ्रजालानि निष्क्रमंश्च पुनः पुनः ।  
> प्रकाशश्चाप्रकाशश्च चन्द्रमा इव दृश्यते ॥ ८ ॥

वे कभी उन मेघ-समूहोंमें प्रवेश करते और कभी बाहर निकलते थे । बारंबार ऐसा करते हुए हनुमान्जी छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमाके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ८ ॥

> विविधाभ्रघनापन्नगोचरो धवलाम्बरः ।  
> दृश्यादृश्यतनुर्वीरस्तथा चन्द्रायतेऽम्बरे ॥ ९ ॥

नाना प्रकारके मेघोंकी घटाओंके भीतर होकर जाते हुए धवलाम्बरधारी वीरवर हनुमान्जीका शरीर कभी दीखता था और कभी अदृश्य हो जाता था; अतः वे आकाशमें बादलोंकी आड़में छिपते और प्रकाशित होते चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे ॥ ९ ॥

> तार्क्ष्यायमाणो गगने स बभौ वायुनन्दनः ।  
> दारयन् मेघवृन्दानि निष्पतंश्च पुनः पुनः ॥ १० ॥

बारंबार मेघ-समूहोंको विदीर्ण करने और उनमें होकर निकलनेके कारण वे पवनकुमार हनुमान् आकाशमें गरुड़के समान प्रतीत होते थे ॥ १० ॥

> नदन् नादेन महता मेघस्वनमहास्वनः ।  
> प्रवरान् राक्षसान् हत्वा नाम विश्राव्य चात्मनः ॥ ११ ॥  
> आकुलां नगरीं कृत्वा व्यथयित्वा च रावणम् ।  
> अर्दयित्वा महावीरान् वैदेहीमभिवाद्य च ॥ १२ ॥  
> आजगाम महातेजाः पुनर्मध्येन सागरम् ।

इस प्रकार महातेजस्वी हनुमान् अपने महान् सिंहनादसे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाको भी मात करते हुए आगे बढ़ रहे थे । वे प्रमुख राक्षसोंको मारकर अपना नाम प्रसिद्ध कर चुके थे । बड़े-बड़े वीरोंको रौंदकर उन्होंने लङ्कानगरीको व्याकुल तथा रावणको व्यथित कर दिया था । तत्पश्चात् विदेहनन्दिनी सीताको नमस्कार करके वे चले और तीव्र गतिसे पुनः समुद्रके मध्यभागमें आ पहुँचे ॥११-१२½॥

> पर्वतेन्द्रं सुनाभं च समुपस्पृश्य वीर्यवान् ॥ १३ ॥  
> ज्यामुक्त इव नाराचो महावेगोऽभ्युपागमत् ।

वहाँ पर्वतराज सुनाभ ( मैनाक ) का स्पर्श करके वे पराक्रमी एवं महान् वेगशाली वानर-वीर धनुषसे छूटे हुए बाणकी भाँति आगे बढ़ गये ॥ १३½ ॥

> स किंचिदारात् सम्प्राप्तः समालोक्य महागिरिम् ॥ १४ ॥  
> महेन्द्रं मेघसंकाशं ननाद स महाकपिः ।

उत्तर तटके कुछ निकट पहुँचनेपर महागिरि महेन्द्रपर दृष्टि पड़ते ही उन महाकपिने मेघके समान बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १४½ ॥

> स पूरयामास कपिर्दिशो दश समन्ततः ॥ १५ ॥  
> नदन् नादेन महता मेघस्वनमहास्वनः ।

उस समय मेघकी भाँति गम्भीर स्वरसे बड़ी भारी गर्जना करके उन वानरवीरने सब ओरसे दसों दिशाओंको कोलाहलपूर्ण कर दिया ॥ १५½ ॥

> स तं देशमनुप्राप्तः सुहृद्दर्शनलालसः ॥ १६ ॥  
> ननाद सुमहानादं लाङ्गूलं चाप्यकम्पयत् ।

फिर वे अपने मित्रोंको देखनेके लिये उत्सुक होकर उनके विश्रामस्थानकी ओर बढ़े और पूँछ हिलाने एवं जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ १६½ ॥

> तस्य नानद्यमानस्य सुपर्णाचरिते पथि ॥ १७ ॥  
> फलतीवास्य घोषेण गगनं सार्कमण्डलम् ।

जहाँ गरुड़ चलते हैं, उसी मार्गपर बारंबार सिंहनाद करते हुए हनुमान्जीके गम्भीर घोषसे सूर्यमण्डलसहित आकाश मानो फटा जा रहा था ॥ १७½ ॥

> ये तु तत्रोत्तरे कूले समुद्रस्य महाबलाः ॥ १८ ॥  
> पूर्वं संविष्ठिताः शूरा वायुपुत्रदिदृक्षवः ।  
> महतो वायुनुन्नस्य तोयदस्येव निःस्वनम् ।  
> शुश्रुवुस्ते तदा घोषमूरुवेगं हनूमतः ॥ १९ ॥

उस समय वायुपुत्र हनुमान्के दर्शनकी इच्छासे जो शूरवीर महाबली वानर समुद्रके उत्तर तटपर पहलेसे ही बैठे थे, उन्होंने वायुसे टकराये हुए महान् मेघकी गर्जनाके समान हनुमान्जीका जोर-जोरसे सिंहनाद सुना ॥ १८-१९ ॥

> ते दीनमनसः सर्वे शुश्रुवुः काननौकसः ।  
> वानरेन्द्रस्य निर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् ॥ २० ॥

अनिष्टकी आशङ्कासे जिनके मनमें दीनता छा गयी थी, उन समस्त वनवासी वानरोंने उन वानरश्रेष्ठ हनुमान्का मेघ-गर्जनाके समान सिंहनाद सुना ॥ २० ॥

> निशम्य नदतो नादं वानरास्ते समन्ततः ।  
> बभूवुरुत्सुकाः सर्वे सुहृद्दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ २१ ॥

गर्जते हुए पवनकुमारका वह सिंहनाद सुनकर सब ओर बैठे हुए वे समस्त वानर अपने सुहृद् हनुमान्जीको देखनेकी अभिलाषासे उत्कण्ठित हो गये ॥ २१ ॥

> जाम्बवान् स हरिश्रेष्ठः प्रीतिसंहृष्टमानसः ।  
> उपामन्त्र्य हरीन् सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥

वानर-भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान्के मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई । वे हर्षसे खिल उठे और सब वानरोंको निकट बुलाकर इस प्रकार बोले—॥ २२ ॥

> सर्वथा कृतकार्योऽसौ हनुमान् नात्र संशयः ।  
> न ह्यस्याकृतकार्यस्य नाद एवंविधो भवेत् ॥ २३ ॥

‘इसमें संदेह नहीं कि हनुमान्जी सब प्रकारसे अपना कार्य सिद्ध करके आ रहे हैं । कृतकार्य हुए बिना इनकी ऐसी गर्जना नहीं हो सकती ॥ २३ ॥

> तस्य बाहूरुवेगं च निनादं च महात्मनः ।  
> निशम्य हरयो हृष्टाः समुत्पेतुर्यतस्ततः ॥ २४ ॥

महात्मा हनुमान्जीकी भुजाओं और जाँघोंका महान् वेग देख तथा उनका सिंहनाद सुन सभी वानर हर्षमें भरकर इधर-उधर उछलने-कूदने लगे ॥ २४ ॥

> ते नगाग्रान्नगाग्राणि शिखराच्छिखराणि च ।  
> प्रहृष्टाः समपद्यन्त हनूमन्तं दिदृक्षवः ॥ २५ ॥  
> ते प्रीताः पादपाग्रेषु गृह्य शाखामवस्थिताः ।  
> वासांसि च प्रकाशानि समाविध्यन्त वानराः ॥ २६ ॥

हनुमान्जीको देखनेकी इच्छासे वे प्रसन्नतापूर्वक एक वृक्षसे दूसरे वृक्षोंपर तथा एक शिखरसे दूसरे शिखरोंपर चढ़ने लगे ॥ वृक्षोंकी सबसे ऊँची शाखापर खड़े होकर वे प्रीतियुक्त वानर अपने स्पष्ट दिखायी देनेवाले वस्त्र हिलाने लगे ॥ २६ ॥

> गिरिगह्वरसंलीनो यथा गर्जति मारुतः ।  
> एवं जगर्ज बलवान् हनूमान् मारुतात्मजः ॥ २७ ॥

जैसे पर्वतकी गुफाओंमें अवरुद्ध हुई वायु बड़े जोरसे शब्द करती है, उसी प्रकार बलवान् पवनकुमार हनुमान्ने गर्जना की ॥ २७ ॥

> तमभ्रघनसंकाशमापतन्तं महाकपिम् ।  
> दृष्ट्वा ते वानराः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ २८ ॥

मेघोंकी घटाके समान पास आते हुए महाकपि हनुमान्को देखकर वे सब वानर उस समय हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ २८ ॥

> ततस्तु वेगवान् वीरो गिरेर्गिरिनिभः कपिः ।  
> निपपात गिरेस्तस्य शिखरे पादपाकुले ॥ २९ ॥

तत्पश्चात् पर्वतके समान विशाल शरीरवाले वेगशाली वीरवानर हनुमान् जो अरिष्ट पर्वतसे उछलकर चले थे, वृक्षोंसे भरे हुए महेन्द्र गिरिके शिखरपर कूद पड़े ॥ २९ ॥

> हर्षेणापूर्यमाणोऽसौ रम्ये पर्वतनिर्झरे ।  
> छिन्नपक्ष इवाकाशात् पपात धरणीधरः ॥ ३० ॥

हर्षसे भरे हुए हनुमान्जी पर्वतके रमणीय झरनेके निकट पंख कटे हुए पर्वतके समान आकाशसे नीचे आ गये ॥ ३० ॥

> ततस्ते प्रीतमनसः सर्वे वानरपुङ्गवाः ।  
> हनूमन्तं महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ॥ ३१ ॥

उस समय वे सभी श्रेष्ठ वानर प्रसन्नचित्त हो महात्मा हनुमान्जीको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ३१ ॥

> परिवार्य च ते सर्वे परां प्रीतिमुपागताः ।  
> प्रहृष्टवदनाः सर्वे तमागतमुपागमन् ॥ ३२ ॥  
> उपायनानि चादाय मूलानि च फलानि च ।  
> प्रत्यर्चयन् हरिश्रेष्ठं हरयो मारुतात्मजम् ॥ ३३ ॥

उन्हें घेरकर खड़े होनेसे उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे सब वानर प्रसन्नमुख होकर तुरंतके आये हुए पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान्के पास भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री तथा फल-मूल लेकर आये और उनका स्वागत-सत्कार करने लगे ॥ ३२-३३ ॥

> विनेदुर्मुदिताः केचित् केचित् किलकिलां तथा ।  
> हृष्टाः पादपशाखाश्च आनिन्युर्वानरर्षभाः ॥ ३४ ॥

कोई आनन्दमग्न होकर गर्जने लगे, कोई किलकारियाँ भरने लगे और कितने ही श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर हनुमान्जीके बैठनेके लिये वृक्षोंकी शाखाएँ तोड़ लाये ॥ ३४ ॥

> हनूमांस्तु गुरून् वृद्धाञ्जाम्बवत्प्रमुखांस्तदा ।  
> कुमारमङ्गदं चैव सोऽवन्दत महाकपिः ॥ ३५ ॥

महाकपि हनुमान्जीने जाम्बवान् आदि वृद्ध गुरुजनों तथा कुमार अङ्गदको प्रणाम किया ॥ ३५ ॥

> स ताभ्यां पूजितः पूज्यः कपिभिश्च प्रसादितः ।  
> दृष्टा देवीति विक्रान्तः संक्षेपेण न्यवेदयत् ॥ ३६ ॥

फिर जाम्बवान् और अङ्गदने भी आदरणीय हनुमान्जीका आदर-सत्कार किया तथा दूसरे-दूसरे वानरोंने भी उनका सम्मान करके उनको संतुष्ट किया । तत्पश्चात् उन पराक्रमी वानरवीरने संक्षेपमें निवेदन किया—‘मुझे सीतादेवीका दर्शन हो गया‘ ॥ ३६ ॥

> निषसाद च हस्तेन गृहीत्वा वालिनः सुतम् ।  
> रमणीये वनोद्देशे महेन्द्रस्य गिरेस्तदा ॥ ३७ ॥  
> हनूमानब्रवीत् पृष्टस्तदा तान् वानरर्षभान् ।  
> अशोकवनिकासंस्था दृष्टा सा जनकात्मजा ॥ ३८ ॥

तदनन्तर वालिकुमार अङ्गदका हाथ अपने हाथमें लेकर हनुमान्जी महेन्द्रगिरिके रमणीय वनप्रान्तमें जा बैठे और सबके पूछनेपर उन वानरशिरोमणियोंसे इस प्रकार बोले— ‘जनकनन्दिनी सीता लङ्काके अशोकवनमें निवास करती हैं । वहीं मैंने उनका दर्शन किया है ॥ ३७-३८ ॥

> रक्ष्यमाणा सुघोराभी राक्षसीभिरनिन्दिता ।  
> एकवेणीधरा बाला रामदर्शनलालसा ॥ ३९ ॥  
> उपवासपरिश्रान्ता मलिना जटिला कृशा ।

‘अत्यन्त भयंकर आकारवाली राक्षसियाँ उनकी रखवाली करती हैं । साध्वी सीता बड़ी भोली-भाली हैं । वे एक वेणी धारण किये वहाँ रहती हैं और श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये बहुत ही उत्सुक हैं । उपवासके कारण बहुत थक गयी हैं, दुर्बल और मलिन हो रही हैं तथा उनके केश जटाके रूपमें परिणत हो गये हैं‘ ॥ ३९½ ॥

> ततो दृष्टेति वचनं महार्थममृतोपमम् ॥ ४० ॥  
> निशम्य मारुतेः सर्वे मुदिता वानराभवन् ।

उस समय ‘सीताका दर्शन हो गया’ यह वचन वानरोंको अमृतके समान प्रतीत हुआ । यह उनके महान् प्रयोजनकी सिद्धिका सूचक था । हनुमान्जीके मुखसे यह शुभ संवाद सुनकर सब वानर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४०½ ॥

> क्ष्वेडन्त्यन्ये नदन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये महाबलाः ॥ ४१ ॥  
> चक्रुः किलकिलामन्ये प्रतिगर्जन्ति चापरे ।

कोई हर्षनाद और कोई सिंहनाद करने लगे । दूसरे महाबली वानर गर्जने लगे । कितने ही किलकारियाँ भरने लगे और दूसरे वानर एककी गर्जनाके उत्तरमें स्वयं भी गर्जना करने लगे ॥ ४१½ ॥

> केचिदुच्छ्रितलाङ्गूलाः प्रहृष्टाः कपिकुञ्जराः ॥ ४२ ॥  
> आयताञ्चितदीर्घाणि लाङ्गूलानि प्रविव्यधुः ।

बहुत-से कपिकुञ्जर हर्षसे उल्लसित हो अपनी पूँछ ऊपर उठाकर नाचने लगे । कितने ही अपनी लंबी और मोटी पूँछें घुमाने या हिलाने लगे ॥ ४२½ ॥

> अपरे तु हनूमन्तं श्रीमन्तं वानरोत्तमम् ॥ ४३ ॥  
> आप्लुत्य गिरिशृङ्गेषु संस्पृशन्ति स्म हर्षिताः ।

कितने ही वानर हर्षोल्लाससे भरकर छलाँगे भरते हुए पर्वतशिखरोंपर वानरशिरोमणि श्रीमान् हनुमान्को छूने लगे ॥ ४३½ ॥

> उक्तवाक्यं हनूमन्तमङ्गदस्तु तदाब्रवीत् ॥ ४४ ॥  
> सर्वेषां हरिवीराणां मध्ये वाचमनुत्तमाम् ।

हनुमान्जीकी उपर्युक्त बात सुनकर अङ्गदने उस समय समस्त वानरवीरोंके बीचमें यह परम उत्तम बात कही—॥४४½॥

> सत्त्वे वीर्ये न ते कश्चित् समो वानर विद्यते ॥ ४५ ॥  
> यदवप्लुत्य विस्तीर्णं सागरं पुनरागतः ।

‘वानरश्रेष्ठ ! बल और पराक्रममें तुम्हारे समान कोई नहीं है; क्योंकि तुम इस विशाल समुद्रको लाँघकर फिर इस पार लौट आये ॥ ४५½ ॥

> जीवितस्य प्रदाता नस्त्वमेको वानरोत्तम ॥ ४६ ॥  
> त्वत्प्रसादात् समेष्यामः सिद्धार्था राघवेण ह ।

‘कपिशिरोमणे ! एकमात्र तुम्हीं हमलोगोंके जीवनदाता हो । तुम्हारे प्रसादसे ही हम सब लोग सफलमनोरथ होकर श्रीरामचन्द्रजीसे मिलेंगे ॥ ४६½ ॥

> अहो स्वामिनि ते भक्तिरहो वीर्यमहो धृतिः ॥ ४७ ॥  
> दिष्ट्या दृष्टा त्वया देवी रामपत्नी यशस्विनी ।  
> दिष्ट्या त्यक्ष्यति काकुत्स्थः शोकं सीतावियोगजम्॥४८॥

‘अपने स्वामी श्रीरघुनाथजीके प्रति तुम्हारी भक्ति अद्भुत है । तुम्हारा पराक्रम और धैर्य भी आश्चर्यजनक है । बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी पत्नी सीतादेवीका दर्शन कर आये, अब भगवान् श्रीराम सीताके वियोगसे उत्पन्न हुए शोकको त्याग देंगे, यह भी सौभाग्यका ही विषय है’ ॥ ४७-४८ ॥

> ततोऽङ्गदं हनूमन्तं जाम्बवन्तं च वानराः ।  
> परिवार्य प्रमुदिता भेजिरे विपुलाः शिलाः ॥ ४९ ॥  
> उपविष्टा गिरेस्तस्य शिलासु विपुलासु ते ।  
> श्रोतुकामाः समुद्रस्य लङ्घनं वानरोत्तमाः ॥ ५० ॥  
> दर्शनं चापि लङ्कायाः सीताया रावणस्य च ।  
> तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे हनूमद्वदनोन्मुखाः ॥ ५१ ॥

तत्पश्चात् सभी श्रेष्ठ वानर समुद्रलङ्घन, लङ्का, रावण एवं सीताके दर्शनका समाचार सुननेके लिये एकत्र हुए तथा अङ्गद, हनुमान् और जाम्बवान्को चारों ओरसे घेरकर पर्वतकी बड़ी-बड़ी शिलाओंपर आनन्दपूर्वक बैठ गये । वे सब-के-सब हाथ जोड़े हुए थे और उन सबकी आँखें हनुमान्जीके मुखपर लगी थीं ॥ ४९-५१ ॥

> तस्थौ तत्राङ्गदः श्रीमान् वानरैर्बहुभिर्वृतः ।  
> उपास्यमानो विबुधैर्दिवि देवपतिर्यथा ॥ ५२ ॥

जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें देवताओंद्वारा सेवित होकर बैठते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे वानरोंसे घिरे हुए श्रीमान् अङ्गद वहाँ बीचमें विराजमान हुए ॥ ५२ ॥

> हनूमता कीर्तिमता यशस्विना  
> तथाङ्गदेनाङ्गदनद्धबाहुना ।  
> मुदा तदाध्यासितमुन्नतं मह-  
> न्महीधराग्रं ज्वलितं श्रियाभवत् ॥ ५३ ॥

कीर्तिमान् एवं यशस्वी हनुमान्जी तथा बाँहोंमें भुजबंद धारण किये अङ्गदके प्रसन्नतापूर्वक बैठनेसे वह ऊँचा एवं महान् पर्वतशिखर दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो उठा ॥५३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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