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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 43"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 43

> ततः स किंकरान् हत्वा हनुमान् ध्यानमास्थितः।  
> वनं भग्नं मया चैत्यप्रासादो न विनाशितः ॥ १ ॥

इधर किंकरोंका वध करके हनुमान्जी यह सोचने लगे कि ‘मैंने वनको तो उजाड़ दिया, परंतु इस चैत्यप्रासादको नष्ट नहीं किया है ॥ १ ॥

> तस्मात् प्रासादमचैवमिमं विध्वंसयाम्यहम् ।  
> इति संचिन्त्य हनुमान् मनसादर्शयन् बलम् ॥ २ ॥  
> चैत्यप्रासादमुत्प्लुत्य मेरुशृङ्गमिवोन्नतम् ।  
> आरुरोह हरिश्रेष्ठो हनुमान् मारुतात्मजः ॥ ३ ॥

‘अतः आज इस चैत्यप्रासादका भी विध्वंस किये देता हूँ। मन-ही-मन ऐसा विचारकर पवनपुत्र वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी अपने बलका प्रदर्शन करते हुए मेरुपर्वतके शिखरकी भाँति ऊँचे उस चैत्यप्रासादपर उछलकर चढ़ गये ॥ २-३ ॥

> आरुह्य गिरिसंकाशं प्रासादं हरियूथपः।  
> बभौ स सुमहातेजाः प्रतिसूर्य इवोदितः ॥ ४ ॥

उस पर्वताकार प्रासादपर चढ़कर महातेजस्वी वानरयूथपति हनुमान् तुरंतके उगे हुए दूसरे सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ ४ ॥

> सम्प्रधृष्य तु दुर्धर्षश्चैत्यप्रासादमुन्नतम् ।  
> हनूमान् प्रज्वलँल्लक्ष्म्या पारियात्रोपमोऽभवत् ॥ ५ ॥

उस ऊँचे प्रासादपर आक्रमण करके दुर्धर्ष वीर हनुमान्जी अपनी सहज शोभासे उद्भासित होते हुए पारियात्र पर्वतके समान प्रतीत होने लगे ॥ ५ ॥

> स भूत्वा सुमहाकायः प्रभावान् मारुतात्मजः।  
> धृष्टमास्फोटयामास लङ्कां शब्देन पूरयन् ॥ ६ ॥

वे तेजस्वी पवनकुमार विशाल शरीर धारण करके लङ्काको प्रतिध्वनित करते हुए धृष्टतापूर्वक उस प्रासादको तोड़ने-फोड़ने लगे ॥ ६ ॥

> तस्यास्फोटितशब्देन महता श्रोत्रघातिना।  
> पेतुर्विहंगमास्तत्र चैत्यपालाश्च मोहिताः ॥ ७ ॥

जोर-जोरसे होनेवाला वह तोड़-फोड़का शब्द कानोंसे टकराकर उन्हें बहरा किये देता था। इससे मूर्छित हो वहाँके पक्षी और प्रासादरक्षक भी पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ७ ॥

> अस्त्रविज्ययतां रामो लक्ष्मणश्च महाबलः।  
> राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ॥ ८ ॥  
> दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।  
> हनूमाञ्शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः ॥ ९ ॥  
> न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत् ।  
> शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः ॥ १० ॥  
> धर्षयित्वा पुरीं लङ्कामभिवाद्य च मैथिलीम् ।  
> समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम् ॥ ११ ॥

उस समय हनुमान्जीने पुनः यह घोषणा की—‘अस्त्रवेत्ता भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणकी जय हो। श्रीरघुनाथजीके द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीवकी भी जय हो । मैं अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजीका दास हूँ । मेरा नाम हनुमान् है । मैं वायुका पुत्र तथा शत्रुसेनाका संहार करनेवाला हूँ । जब मैं हजारों वृक्षों और पत्थरोंसे प्रहार करने लगूँगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्धमें मेरे बलकी समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते । मैं लङ्कापुरीको तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीताको प्रणाम करनेके अनन्तर सब राक्षसोंके देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा’॥८-११

> एवमुक्त्वा महाकायश्चैत्यस्थो हरियूथपः।  
> ननाद भीमनिर्ह्रादो रक्षसां जनयन् भयम् ॥ १२ ॥

ऐसा कहकर चैत्यप्रासादपर खड़े हुए विशालकाय वानरयूथपति हनुमान् राक्षसोंके मनमें भय उत्पन्न करते हुए भयानक आवाजमें गर्जना करने लगे ॥ १२ ॥

> तेन नादेन महता चैत्यपालाः शतं ययुः।  
> गृहीत्वा विविधानस्त्रान् प्रासान् खड्गान् परश्वधान् १३

उस भीषण गर्जनासे प्रभावित हो सैकड़ों प्रासादरक्षक नाना प्रकारके प्रास, खड्ग और फरसे लिये वहाँ आये ॥१३॥

> विसृजन्तो महाकाया मारुतिं पर्यवारयन् ।  
> ते गदाभिर्विचित्राभिः परिघैः काञ्चनाङ्गदैः ॥ १४ ॥  
> आजग्मुर्वानरश्रेष्ठं बाणैश्चादित्यसंनिभैः ।

उन विशालकाय राक्षसोंने उन सब अस्त्रोंका प्रहार करते हुए वहाँ पवनकुमार हनुमान्जीको घेर लिया । विचित्र गदाओं, सोनेके पत्र जड़े हुए परिघों और सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंसे सुसज्जित हो वे सब-के-सब उन वानरश्रेष्ठ हनुमान्पर चढ़ आये ॥ १४½ ॥

> आवर्त इव गङ्गायास्तोयस्य विपुलो महान् ॥ १५ ॥  
> परिक्षिप्य हरिश्रेष्ठं स बभौ रक्षसां गणः।

वानरश्रेष्ठ हनुमान्को चारों ओरसे घेरकर खड़ा हुआ राक्षसोंका वह महान् समुदाय गङ्गाजीके जलमें उठी हुई बड़ी भारी भँवरके समान जान पड़ता था ॥ १५½ ॥

> ततो वातात्मजः क्रुद्धो भीमरूपं समास्थितः ॥ १६ ॥  
> प्रासादस्य महांस्तस्य स्तम्भं हेमपरिष्कृतम् ।  
> उत्पाटयित्वा वेगेन हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १७ ॥  
> ततस्तं भ्रामयामास शतधारं महाबलः।  
> तत्र चाग्निः समभवत् प्रासादश्चाप्यदह्यत ॥ १८ ॥  
> दह्यमानं ततो दृष्ट्वा प्रासादं हरियूथपः ।  
> स राक्षसशतं हत्वा वज्रेणेन्द्र इवासुरान् ॥ १९ ॥  
> अन्तरिक्षस्थितः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत् ।

तब राक्षसोंको इस प्रकार आक्रमण करते देख पवनकुमार हनुमान्ने कुपित हो बड़ा भयंकर रूप धारण किया । उन महावीरने उस प्रासादके एक सुवर्णभूषित खंभेको, जिसमें सौ धारें थीं, बड़े वेगसे उखाड़ लिया । उखाड़कर उन महाबली वीरने उसे घुमाना आरम्भ किया । घुमानेपर उससे आग प्रकट हो गयी, जिससे वह प्रासाद जलने लगा ।१६-१८। प्रासादको जलते देख वानरयूथपति हनुमान्ने वज्रसे असुरोंका संहार करनेवाले इन्द्रकी भाँति उन सैकड़ों राक्षसोंको उस खंभेसे ही मार डाला और आकाशमें खड़े होकर उन तेजस्वी वीरने इस प्रकार कहा—॥ १९½ ॥

> मादृशानां सहस्राणि विसृष्टानि महात्मनाम् ॥ २० ॥  
> बलिनां वानरेन्द्राणां सुग्रीववशवर्तिनाम् ।

‘राक्षसो ! सुग्रीवके वशमें रहनेवाले मेरे-जैसे सहस्रों विशालकाय बलवान् वानरश्रेष्ठ सब ओर भेजे गये हैं ॥२०½॥

> अटन्ति वसुधां कृत्स्नां वयमन्ये च वानराः ॥ २१ ॥  
> दशनागबलाः केचित् केचिद् दशगुणोत्तराः ।  
> केचिन्नागसहस्रस्य बभूवुस्तुल्यविक्रमाः ॥ २२ ॥

‘हम तथा दूसरे सभी वानर समूची पृथ्वीपर घूम रहे हैं । किन्हींमें दस हाथियोंका बल है तो किन्हींमें सौ हाथियोंका । कितने ही वानर एक सहस्र हाथियोंके समान बल-विक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ २१-२२ ॥

> सन्ति चौघबलाः केचित् सन्ति वायुबलोपमाः ।  
> अप्रमेयबलाः केचित् तत्रासन् हरियूथपाः ॥ २३ ॥

‘किन्हींका बल जलके महान् प्रवाहकी भाँति असह्य है । कितने ही वायुके समान बलवान् हैं और कितने ही वानरयूथपति अपने भीतर असीम बल धारण करते हैं ॥ २३ ॥

> ईदृग्विधैस्तु हरिभिर्वृतो दन्तनखायुधैः ।  
> शतैः शतसहस्रैश्च कोटिभिश्चायुतैरपि ॥ २४ ॥  
> आगमिष्यति सुग्रीवः सर्वेषां वो निषूदनः ।

‘दाँत और नख ही जिनके आयुध हैं ऐसे अनन्त बलशाली सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों वानरोंसे घिरे हुए वानरराज सुग्रीव यहाँ पधारेंगे, जो तुम सब निशाचरोंका संहार करनेमें समर्थ हैं ॥ २४½ ॥

> नेयमस्ति पुरी लङ्का न यूयं न च रावणः ।  
> यस्य त्विक्ष्वाकुवीरेण बद्धं वैरं महात्मना ॥ २५ ॥

‘अब न तो यह लङ्कापुरी रहेगी, न तुमलोग रहोगे और न वह रावण ही रह सकेगा, जिसने इक्ष्वाकुवंशी वीर महात्मा श्रीरामके साथ वैर बाँध रक्खा है’ ॥ २५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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