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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 33"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 33

> सोऽवतीर्य द्रुमात् तस्माद् विद्रुमप्रतिमाननः ।  
> विनीतवेषः कृपणः प्रणिपत्योपसृत्य च ॥ १ ॥  
> तामब्रवीन्महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ।  
> शिरस्यञ्जलिमाधाय सीतां मधुरया गिरा ॥ २ ॥

उधर मूँगेके समान लाल मुखवाले महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान्जीने उस अशोक-वृक्षसे नीचे उतरकर माथेपर अञ्जलि बाँध ली और विनीतभावसे दीनतापूर्वक निकट आकर प्रणाम करनेके अनन्तर सीताजीसे मधुर वाणीमें कहा—॥ १-२ ॥

> का नु पद्मपलाशाक्षि क्लिष्टकौशेयवासिनि ।  
> द्रुमस्य शाखामालम्ब्य तिष्ठसि त्वमनिन्दिते ॥ ३ ॥  
> किमर्थं तव नेत्राभ्यां वारि स्रवति शोकजम् ।  
> पुण्डरीकपलाशाभ्यां विप्रकीर्णमिवोदकम् ॥ ४ ॥

‘प्रफुल्लकमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली देवि ! यह मलिन रेशमी पीताम्बर धारण किये आप कौन हैं ? अनिन्दिते ! इस वृक्षकी शाखाका सहारा लिये आप यहाँ क्यों खड़ी हैं ? कमलके पत्तोंसे झरते हुए जल-बिन्दुओंके समान आपकी आँखोंसे ये शोकके आँसू क्यों गिर रहे हैं ? ॥ ३-४ ॥

> सुराणामसुराणां च नागगन्धर्वरक्षसाम् ।  
> यक्षाणां किंनराणां च का त्वं भवसि शोभने ॥ ५ ॥  
> का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा वरानने ।  
> वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे ॥ ६ ॥

‘शोभने ! आप देवता, असुर, नाग, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, किन्नर, रुद्र, मरुद्गण अथवा वसुओंमेंसे कौन हैं ? इनमेंसे किसकी कन्या अथवा पत्नी हैं ? सुमुखि ! वरारोहे ! मुझे तो आप कोई देवता-सी जान पड़ती हैं ॥ ५-६ ॥

> किं नु चन्द्रमसा हीना पतिता विबुधालयात् ।  
> रोहिणी ज्योतिषां श्रेष्ठा श्रेष्ठा सर्वगुणाधिका ॥ ७ ॥  
> कोपाद् वा यदि वा मोहाद् भर्तारमसितेक्षणे ।  
> वसिष्ठं कोपयित्वा त्वं वासि कल्याण्यरुन्धती ॥ ८ ॥

‘क्या आप चन्द्रमासे बिछुड़कर देवलोकसे गिरी हुई नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ और गुणोंमें सबसे बढ़ी-चढ़ी रोहिणी देवी हैं ? ॥ ‘अथवा कजरारे नेत्रोंवाली देवि ! आप कोप या मोहसे अपने पति वसिष्ठजीको कुपित करके यहाँ आयी हुई कल्याणस्वरूपा सतीशिरोमणि अरुन्धती तो नहीं हैं ॥८॥

> को नु पुत्रः पिता भ्राता भर्ता वा ते सुमध्यमे ।  
> अस्माल्लोकादमुं लोकं गतं त्वमनुशोचसि ॥ ९ ॥

‘सुमध्यमे ! आपका पुत्र, पिता, भाई अथवा पति कौन इस लोकसे चलकर परलोकवासी हो गया है, जिसके लिये आप शोक करती हैं ॥ ९ ॥

> रोदनादतिनिःश्वासाद् भूमिसंस्पर्शनादपि ।  
> न त्वां देवीमहं मन्ये राज्ञः संज्ञावधारणात् ॥ १० ॥  
> व्यञ्जनानि हि ते यानि लक्षणानि च लक्षये ।  
> महिषी भूमिपालस्य राजकन्या च मे मता ॥ ११ ॥

‘रोने, लंबी साँस खींचने तथा पृथ्वीका स्पर्श करनेके कारण मैं आपको देवी नहीं मानता । आप बारंबार किसी राजाका नाम ले रही हैं तथा आपके चिह्न और लक्षण जैसे दिखायी देते हैं, उन सबपर दृष्टिपात करनेसे यही अनुमान होता है कि आप किसी राजाकी महारानी तथा किसी नरेशकी कन्या हैं ॥ १०-११ ॥

> रावणेन जनस्थानाद् बलात् प्रमथिता यदि ।  
> सीता त्वमसि भद्रं ते तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥१२॥

‘रावण जनस्थानसे जिन्हें बलपूर्वक हर लाया था, वे सीताजी ही यदि आप हों तो आपका कल्याण हो । आप ठीक-ठीक मुझे बताइये । मैं आपके विषयमें जानना चाहता हूँ ॥ १२ ॥

> यथा हि तव वै दैन्यं रूपं चाप्यतिमानुषम् ।  
> तपसा चान्वितो वेषस्त्वं राममहिषी ध्रुवम् ॥ १३ ॥

‘दुःखके कारण आपमें जैसी दीनता आ गयी है, जैसा आपका अलौकिक रूप है तथा जैसा तपस्विनीका-सा वेष है, इन सबके द्वारा निश्चय ही आप श्रीरामचन्द्रजीकी महारानी जान पड़ती हैं’ ॥ १३ ॥

> सा तस्य वचनं श्रुत्वा रामकीर्तनहर्षिता ।  
> उवाच वाक्यं वैदेही हनूमन्तं द्रुमाश्रितम् ॥ १४ ॥

हनुमान्जीकी बात सुनकर विदेहनन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चासे बहुत प्रसन्न थीं; अतः वृक्षका सहारा लिये खड़े हुए उन पवनकुमारसे इस प्रकार बोलीं—॥ १४ ॥

> पृथिव्यां राजसिंहानां मुख्यस्य विदितात्मनः ।  
> स्नुषा दशरथस्याहं शत्रुसैन्यप्रणाशिनः ॥ १५ ॥  
> दुहिता जनकस्याहं वैदेहस्य महात्मनः ।  
> सीतेति नाम्ना चोक्ताहं भार्या रामस्य धीमतः ॥ १६ ॥

‘कपिवर ! जो भूमण्डलके श्रेष्ठ राजाओंमें प्रधान थे, जिनकी सर्वत्र प्रसिद्धि थी तथा जो शत्रुओंकी सेनाका संहार करनेमें समर्थ थे, उन महाराज दशरथकी मैं पुत्रवधू हूँ, विदेहराज महात्मा जनककी पुत्री हूँ और परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामकी धर्मपत्नी हूँ । मेरा नाम सीता है॥१५-१६॥

> समा द्वादश तत्राहं राघवस्य निवेशने ।  
> भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी॥ १७ ॥

‘अयोध्यामें श्रीरघुनाथजीके अन्तःपुरमें बारह वर्षोंतक मैं सब प्रकारके मानवीय भोग भोगती रही और मेरी सारी अभिलाषाएँ सदैव पूर्ण होती रहीं ॥ १७ ॥

> ततस्त्रयोदशे वर्षे राज्ये चेक्ष्वाकुनन्दनम् ।  
> अभिषेचयितुं राजा सोपाध्यायः प्रचक्रमे ॥ १८ ॥

‘तदनन्तर तेरहवें वर्षमें महाराज दशरथने राजगुरु वसिष्ठजीके साथ इक्ष्वाकुकुलभूषण भगवान् श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी आरम्भ की ॥ १८ ॥

> तस्मिन् सम्भ्रियमाणे तु राघवस्याभिषेचने ।  
> कैकेयी नाम भर्तारमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १९ ॥

‘जब वे श्रीरघुनाथजीके अभिषेकके लिये आवश्यक सामग्रीका संग्रह कर रहे थे, उस समय उनकी कैकेयी नामवाली भार्याने पतिसे इस प्रकार कहा—॥ १९ ॥

> न पिबेयं न खादेयं प्रत्यहं मम भोजनम् ।  
> एष मे जीवितस्यान्तो रामो यद्यभिषिच्यते ॥ २० ॥

‘अब न तो मैं जलपान करूँगी और न प्रतिदिनका भोजन ही ग्रहण करूँगी । यदि श्रीरामका राज्याभिषेक हुआ तो यही मेरे जीवनका अन्त होगा ॥ २० ॥

> यत् तदुक्तं त्वया वाक्यं प्रीत्या नृपतिसत्तम ।  
> तच्चेन्न वितथं कार्यं वनं गच्छतु राघवः ॥ २१ ॥

‘नृपश्रेष्ठ ! आपने प्रसन्नतापूर्वक मुझे जो वचन दिया है, उसे यदि असत्य नहीं करना है तो श्रीराम वनको चले जायँ’ ॥ २१ ॥

> स राजा सत्यवाग् देव्या वरदानमनुस्मरन् ।  
> मुमोह वचनं श्रुत्वा कैकेय्याः क्रूरमप्रियम् ॥ २२ ॥

‘महाराज दशरथ बड़े सत्यवादी थे । उन्होंने कैकेयी-देवीको दो वर देनेके लिये कहा था । उस वरदानका स्मरण करके कैकेयीके क्रूर एवं अप्रिय वचनको सुनकर वे मूर्छित हो गये ॥ २२ ॥

> ततस्तं स्थविरो राजा सत्यधर्मे व्यवस्थितः ।  
> ज्येष्ठं यशस्विनं पुत्रं रुदन् राज्यमयाचत ॥ २३ ॥

‘तदनन्तर सत्यधर्ममें स्थित हुए बूढ़े महाराजने अपने यशस्वी ज्येष्ठ पुत्र श्रीरघुनाथजीसे भरतके लिये राज्य माँगा ॥ २३ ॥

> स पितुर्वचनं श्रीमानभिषेकात् परं प्रियम् ।  
> मनसा पूर्वमासाद्य वाचा प्रतिगृहीतवान् ॥ २४ ॥

‘श्रीमान् रामको पिताके वचन राज्याभिषेकसे भी बढ़कर प्रिय थे । इसलिये उन्होंने पहले उन वचनोंको मनसे ग्रहण किया, फिर वाणीसे भी स्वीकार कर लिया ॥ २४ ॥

> दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम् ।  
> अपि जीवितहेतोर्हि रामः सत्यपराक्रमः ॥ २५ ॥

‘सत्य-पराक्रमी भगवान् श्रीराम केवल देते हैं, लेते नहीं । वे सदा सत्य बोलते हैं, अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये भी कभी झूठ नहीं बोल सकते ॥ २५ ॥

> स विहायोत्तरीयाणि महार्हाणि महायशाः ।  
> विसृज्य मनसा राज्यं जनन्यै मां समादिशत्॥ २६ ॥

‘उन महायशस्वी श्रीरघुनाथजीने बहुमूल्य उत्तरीय वस्त्र उतार दिये और मनसे राज्यका त्याग करके मुझे अपनी माताके हवाले कर दिया ॥ २६ ॥

> साहं तस्याग्रतस्तूर्णं प्रस्थिता वनचारिणी ।  
> नहि मे तेन हीनाया वासः स्वर्गेऽपि रोचते ॥ २७ ॥

‘किंतु मैं तुरंत ही उनके आगे-आगे वनकी ओर चल दी; क्योंकि उनके बिना मुझे स्वर्गमें भी रहना अच्छा नहीं लगता ॥ २७ ॥

> प्रागेव तु महाभागः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ।  
> पूर्वजस्यानुयात्रार्थे कुशचीरैरलंकृतः ॥ २८ ॥

‘अपने सुहृदोंको आनन्द देनेवाले सुमित्राकुमार महाभाग लक्ष्मण भी अपने बड़े भाईका अनुसरण करनेके लिये उनसे भी पहले कुश तथा चीर-वस्त्र धारण करके तैयार हो गये ॥ २८ ॥

> ते वयं भर्तुरादेशं बहुमान्य दृढव्रताः ।  
> प्रविष्टाः स्म पुराद्दृष्टं वनं गम्भीरदर्शनम् ॥ २९ ॥

‘इस प्रकार हम तीनोंने अपने स्वामी महाराज दशरथकी आज्ञाको अधिक आदर देकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करते हुए उस सघन वनमें प्रवेश किया, जिसे पहले कभी नहीं देखा था ॥ २९ ॥

> वसतो दण्डकारण्ये तस्याहममितौजसः ।  
> रक्षसापहृता भार्या रावणेन दुरात्मना ॥ ३० ॥

‘वहाँ दण्डकारण्यमें रहते समय उन अमिततेजस्वी भगवान् श्रीरामकी भार्या मुझ सीताको दुरात्मा राक्षस रावण यहाँ हर लाया है ॥ ३० ॥

> द्वौ मासौ तेन मे कालो जीवितानुग्रहः कृतः ।  
> ऊर्ध्वं द्वाभ्यां तु मासाभ्यां ततस्त्यक्ष्यामि जीवितम् ॥

‘उसने अनुग्रहपूर्वक मेरे जीवन-धारणके लिये दो मासकी अवधि निश्चित कर दी है । उन दो महीनोंके बाद मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा’ ॥ ३१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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