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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 32"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 32

> ततः शाखान्तरे लीनं दृष्ट्वा चलितमानसा ।  
> वेष्टितार्जुनवस्त्रं तं विद्युत्संघातपिङ्गलम् ॥ १ ॥  
> सा ददर्श कपिं तत्र प्रश्रितं प्रियवादिनम् ।  
> फुल्लाशोकोत्कराभासं तप्तचामीकरेक्षणम् ॥ २ ॥

तब शाखाके भीतर छिपे हुए, विद्युत्पुञ्जके समान अत्यन्त पिङ्गल वर्णवाले और श्वेत वस्त्रधारी हनुमान्जीपर उनकी दृष्टि पड़ी । फिर तो उनका चित्त चञ्चल हो उठा । उन्होंने देखा, फूले हुए अशोकके समान अरुण कान्तिसे प्रकाशित एक विनीत और प्रियवादी वानर डालियोंके बीचमें बैठा है । उसके नेत्र तपाये हुए सुवर्णके समान चमक रहे हैं ॥ १-२ ॥

> साथ दृष्ट्वा हरिश्रेष्ठं विनीतवदवस्थितम् ।  
> मैथिली चिन्तयामास विस्मयं परमं गता ॥ ३ ॥

विनीतभावसे बैठे हुए वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको देखकर मिथिलेशकुमारीको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे मन-ही-मन सोचने लगीं—॥ ३ ॥

> अहो भीममिदं सत्त्वं वानरस्य दुरासदम् ।  
> दुर्निरीक्ष्यमिदं मत्वा पुनरेव सुमोह सा ॥ ४ ॥

‘अहो ! वानरयोनिका यह जीव तो बड़ा ही भयंकर है । इसे पकड़ना बहुत ही कठिन है । इसकी ओर तो आँख उठाकर देखनेका भी साहस नहीं होता ।’ ऐसा विचारकर वे पुनः भयसे मूर्च्छित-सी हो गयीं ॥ ४ ॥

> विललाप भृशं सीता करुणं भयमोहिता ।  
> रामरामेति दुःखार्ता लक्ष्मणेति च भामिनी ॥ ५ ॥

भयसे मोहित हुई भामिनी सीता अत्यन्त करुणाजनक स्वरमें ‘हा राम ! हा राम ! हा लक्ष्मण !’ ऐसा कहकर दुःखसे आतुर हो अत्यन्त विलाप करने लगीं ॥ ५ ॥

> रुरोद सहसा सीता मन्दमन्दस्वरा सती ।  
> साथ दृष्ट्वा हरिवरं विनीतवदुपागतम् ।  
> मैथिली चिन्तयामास स्वप्नोऽयमिति भामिनी ॥ ६ ॥

उस समय सीता मन्द स्वरमें सहसा रो पड़ीं । इतनेहीमें उन्होंने देखा, वह श्रेष्ठ वानर बड़ी विनयके साथ निकट आ बैठा है । तब भामिनी मिथिलेशकुमारीने सोचा—‘यह कोई स्वप्न तो नहीं है’ ॥ ६ ॥

> सा वीक्षमाणा पृथुभुग्नवक्त्रं  
> शाखामृगेन्द्रस्य यथोक्तकारम् ।  
> ददर्श पिङ्गप्रवरं महार्हं  
> वातात्मजं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥ ७ ॥

उधर दृष्टिपात करते हुए उन्होंने वानरराज सुग्रीवके आज्ञापालक विशाल और टेढ़े मुखवाले, परम आदरणीय, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ, वानरप्रवर पवनपुत्र हनुमान्जीको देखा ॥ ७ ॥

> सा तं समीक्ष्यैव भृशं विपन्ना  
> गतासुकल्पेव बभूव सीता ।  
> चिरेण संज्ञां प्रतिलभ्य चैवं  
> विचिन्तयामास विशालनेत्रा ॥ ८ ॥

उन्हें देखते ही सीताजी अत्यन्त व्यथित होकर ऐसी दशाको पहुँच गयीं, मानो उनके प्राण निकल गये हों । फिर बड़ी देरमें चेत होनेपर विशाललोचना विदेहराजकुमारीने इस प्रकार विचार किया—॥ ८ ॥

> स्वप्नो मयायं विकृतोऽद्य दृष्टः  
> शाखामृगः शास्त्रगणैर्निषिद्धः ।  
> स्वस्त्यस्तु रामाय सलक्ष्मणाय  
> तथा पितुर्मे जनकस्य राज्ञः ॥ ९ ॥

‘आज मैंने यह बड़ा बुरा स्वप्न देखा है । सपनेमें वानरको देखना शास्त्रोंने निषिद्ध बताया है । मेरी भगवान्से प्रार्थना है कि श्रीराम, लक्ष्मण और मेरे पिता जनकका मङ्गल हो ( उनपर इस दुःस्वप्नका प्रभाव न पड़े ) ॥ ९ ॥

> स्वप्नो हि नायं नहि मेऽस्ति निद्रा  
> शोकेन दुःखेन च पीडितायाः ।  
> सुखं हि मे नास्ति यतो विहीना  
> तेनेन्दुपूर्णप्रतिमाननेन ॥ १० ॥

‘परंतु यह स्वप्न तो हो नहीं सकता; क्योंकि शोक और दुःखसे पीड़ित रहनेके कारण मुझे कभी नींद आती ही नहीं है ( नींद उसे आती है, जिसे सुख हो ) । मुझे तो उन पूर्णचन्द्रके समान मुखवाले श्रीरघुनाथजीसे बिछुड़ जानेके कारण अब सुख सुलभ ही नहीं है ॥ १० ॥

> रामेति रामेति सदैव बुद्ध्या  
> विचिन्त्य वाचा ब्रुवती तमेव ।  
> तस्यानुरूपं च कथां तदर्था-  
> मेवं प्रपश्यामि तथा शृणोमि ॥ ११ ॥

‘मैं बुद्धिसे सर्वदा ‘राम ! राम !’ ऐसा चिन्तन करके वाणीद्वारा भी राम-नामका ही उच्चारण करती रहती हूँ; अतः उस विचारके अनुरूप वैसे ही अर्थवाली यह कथा देख और सुन रही हूँ ॥ ११ ॥

> अहं हि तस्याद्य मनोभवेन  
> सम्पीडिता तद्गतसर्वभावा ।  
> विचिन्तयन्ती सततं तमेव  
> तथैव पश्यामि तथा शृणोमि ॥ १२ ॥

‘मेरा हृदय सर्वदा श्रीरघुनाथमें ही लगा हुआ है; अतः श्रीराम-दर्शनकी लालसासे अत्यन्त पीड़ित हो सदा उन्हींका चिन्तन करती हुई उन्हींको देखती और उन्हींकी कथा सुनती हूँ ॥ १२ ॥

> मनोरथः स्यादिति चिन्तयामि  
> तथापि बुद्ध्यापि वितर्कयामि ।  
> किं कारणं तस्य हि नास्ति रूपं  
> सुव्यक्तरूपश्च वदत्ययं माम् ॥ १३ ॥

‘सोचती हूँ कि सम्भव है यह मेरे मनकी ही कोई भावना हो तथापि बुद्धिसे भी तर्क-वितर्क करती हूँ कि यह जो कुछ दिखायी देता है, इसका क्या कारण है ? मनोरथ या मनकी भावनाका कोई स्थूल रूप नहीं होता; परंतु इस वानरका रूप तो स्पष्ट दिखायी दे रहा है और यह मुझसे बातचीत भी करता है ॥ १३ ॥

> नमोऽस्तु वाचस्पतये सवज्रिणे  
> स्वयम्भुवे चैव हुताशनाय ।  
> अनेन चोक्तं यदिदं ममाग्रतो  
> वनौकसा तच्च तथास्तु नान्यथा ॥ १४ ॥

‘मैं वाणीके स्वामी बृहस्पतिको, वज्रधारी इन्द्रको, स्वयम्भू ब्रह्माजीको तथा वाणीके अधिष्ठातृ-देवता अग्निको भी नमस्कार करती हूँ । इस वनवासी वानरने मेरे सामने यह जो कुछ कहा है, वह सब सत्य हो, उसमें कुछ भी अन्यथा न हो’ ॥ १४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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