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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 31"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 31

> एवं बहुविधां चिन्तां चिन्तयित्वा महामतिः ।  
> संश्रवे मधुरं वाक्यं वैदेह्या व्याजहार ह ॥ १ ॥

इस प्रकार बहुत-सी बातें सोच-विचारकर महामति हनुमान्जीने सीताको सुनाते हुए मधुर वाणीमें इस तरह कहना आरम्भ किया—॥ १ ॥

> राजा दशरथो नाम रथकुञ्जरवाजिमान् ।  
> पुण्यशीलो महाकीर्तिरिक्ष्वाकूणां महायशाः ॥ २ ॥

‘इक्ष्वाकुवंशमें राजा दशरथ नामसे प्रसिद्ध एक पुण्यात्मा राजा हो गये हैं । वे अत्यन्त कीर्तिमान् और महान् यशस्वी थे । उनके यहाँ रथ, हाथी और घोड़े बहुत अधिक थे ॥ २ ॥

> राजर्षीणां गुणश्रेष्ठस्तपसा चर्षिभिः समः ।  
> चक्रवर्तिकुले जातः पुरंदरसमो बले ॥ ३ ॥

‘उन श्रेष्ठ नरेशमें राजर्षियोंके समान गुण थे । तपस्यामें भी वे ऋषियोंकी समानता करते थे । उनका जन्म चक्रवर्ती नरेशोंके कुलमें हुआ था । वे देवराज इन्द्रके समान बलवान् थे ॥ ३ ॥

> अहिंसारतिरक्षुद्रो घृणी सत्यपराक्रमः ।  
> मुख्यस्येक्ष्वाकुवंशस्य लक्ष्मीवाँल्लक्ष्मिवर्धनः ॥ ४ ॥  
> पार्थिवव्यञ्जनैर्युक्तः पृथुश्रीः पार्थिवर्षभः ।  
> पृथिव्यां चतुरन्तायां विश्रुतः सुखदः सुखी ॥ ५ ॥

‘उनके मनमें अहिंसा-धर्मके प्रति बड़ा अनुराग था । उनमें क्षुद्रताका नाम नहीं था । वे दयालु, सत्य-पराक्रमी और श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशकी शोभा बढ़ानेवाले थे । वे लक्ष्मीवान् नरेश राजोचित लक्षणोंसे युक्त, परिपुष्ट शोभासे सम्पन्न और भूपालोंमें श्रेष्ठ थे । चारों समुद्र जिसकी सीमा हैं, उस सम्पूर्ण भूमण्डलमें सब ओर उनकी बड़ी ख्याति थी। वे स्वयं तो सुखी थे ही। दूसरोंको भी सुख देनेवाले थे ॥ ४–५ ॥

> तस्य पुत्रः प्रियो ज्येष्ठस्ताराधिपनिभाननः।  
> रामो नाम विशेषज्ञः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ ६ ॥

‘उनके ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम-नामसे प्रसिद्ध हैं। वे पिताके लाइले, चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले, सम्पूर्ण धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और शस्त्र-विद्याके विशेषज्ञ हैं ॥ ६ ॥

> रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य स्वजनस्यापि रक्षिता।  
> रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य च परंतपः ॥ ७ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम अपने सदाचारके, स्वजनोंके, इस जीव-जगत्के तथा धर्मके भी रक्षक हैं ॥ ७ ॥

> तस्य सत्याभिसंधस्य वृद्धस्य वचनात् पितुः।  
> सभार्यः सह च भ्रात्रा वीरः प्रव्रजितो वनम् ॥ ८ ॥

‘उनके बूढ़े पिता महाराज दशरथ बड़े सत्यप्रतिज्ञ थे। उनकी आज्ञासे वीर श्रीरघुनाथजी अपनी पत्नी और भाई लक्ष्मणके साथ वनमें चले आये ॥ ८ ॥

> तेन तत्र महारण्ये मृगयां परिधावता।  
> राक्षसा निहताः शूरा बहवः कामरूपिणः ॥ ९ ॥

‘वहाँ विशाल वनमें शिकार खेलते हुए श्रीरामने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुत-से शूरवीर राक्षसोंका वध कर डाला ॥ ९ ॥

> जनस्थानवधं श्रुत्वा निहतौ खरदूषणौ।  
> ततस्त्वमर्षापहृता जानकी रावणेन तु ॥ १० ॥

‘उनके द्वारा जनस्थानके विध्वंस और खरदूषणके वधका समाचार सुनकर रावणने अमर्षवश जनकनन्दिनी सीताका अपहरण कर लिया ॥ १० ॥

> वञ्चयित्वा वने रामं मृगरूपेण मायया।  
> स मार्गमाणस्तां देवीं रामः सीतामनिन्दिताम् ॥ ११ ॥  
> आससाद वने मित्रं सुग्रीवं नाम वानरम्।

‘पहले तो उस राक्षसने मायासे मृग बने हुए मारीचके द्वारा वनमें श्रीरामचन्द्रजीको धोखा दिया और स्वयं जानकीजीको हर ले गया। भगवान् श्रीराम परम साध्वी सीतादेवीकी खोज करते हुए मतंग-वनमें आकर सुग्रीव नामक वानरसे मिले और उनके साथ उन्होंने मैत्री स्थापित कर ली ॥ ११ ॥

> ततः स वालिनं हत्वा रामः परपुरंजयः ॥ १२ ॥  
> आयच्छत् कपिराज्यं तु सुग्रीवाय महात्मने।  
> सुग्रीवेणाभिसंदिष्टा हरयः कामरूपिणः ॥ १३ ॥  
> दिक्षु सर्वासु तां देवीं विचिन्वन्तः सहस्रशः।

‘तदनन्तर शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले श्रीरामने वालीका वध करके वानरोंका राज्य महात्मा सुग्रीवको दे दिया ॥ ‘तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हजारों वानर सीतादेवीका पता लगानेके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें निकले हैं ॥ १३½ ॥

> अहं सम्पातिवचनाच्छतयोजनमायतम् ॥ १४ ॥  
> तस्या हेतोर्विशालाक्ष्याः समुद्रं वेगवान् प्लुतः।

‘उन्हींमेंसे एक मैं भी हूँ। मैं सम्पातिके कहनेसे विशाललोचना विदेहनन्दिनीकी खोजके लिये सौ योजन विस्तृत समुद्रको वेगपूर्वक लाँघकर यहाँ आया हूँ ॥ १४½ ॥

> यथारूपां यथावर्णां यथालक्ष्मवतीं च ताम् ॥ १५ ॥  
> अश्रौषं राघवस्याहं सेयमासादिता मया।  
> विररामैवमुक्त्वा स वाचं वानरपुङ्गवः ॥ १६ ॥

‘मैंने श्रीरघुनाथजीके मुखसे जानकीजीका जैसा रूप, जैसा रंग तथा जैसे लक्षण सुने थे, उनके अनुरूप ही इन्हें पाया है।’ इतना ही कहकर वानरशिरोमणि हनुमान्जी चुप हो गये ॥ १५-१६ ॥

> जानकी चापि तच्छ्रुत्वा विस्मयं परमं गता।  
> ततः सा वक्रकेशान्ता सुकेशी केशसंवृतम्।  
> उन्नम्य वदनं भीरुः शिंशपामन्ववैक्षत ॥ १७ ॥

उनकी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीताको बड़ा विस्मय हुआ। उनके केश घुँघराले और बड़े ही सुन्दर थे। भीरु सीताने केशोंसे ढके हुए अपने मुँहको ऊपर उठाकर उस अशोक-वृक्षकी ओर देखा ॥ १७ ॥

> निशम्य सीता वचनं कपेश्च  
> दिशश्च सर्वाः प्रदिशश्च वीक्ष्य।  
> स्वयं प्रहर्षं परमं जगाम  
> सर्वात्मना राममनुस्मरन्ती ॥ १८ ॥

कपिके वचन सुनकर सीताको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सम्पूर्ण वृत्तियोंसे भगवान् श्रीरामका स्मरण करती हुई समस्त दिशाओंमें दृष्टि दौड़ाने लगीं ॥ १८ ॥

> सा तिर्यगूर्ध्वं च तथा ह्यधस्ता-  
> न्निरीक्षमाणा तमचिन्त्यबुद्धिम्।  
> ददर्श पिङ्गाधिपतेरमात्यं  
> वातात्मजं सूर्यमिवोदयस्थम् ॥ १९ ॥

उन्होंने ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर दृष्टिपात करके उन अचिन्त्य बुद्धिवाले पवनपुत्र हनुमान्को, जो वानरराज सुग्रीवके मन्त्री थे, उदयाचलपर विराजमान सूर्यके समान देखा ॥ १९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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