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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 28"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 28

> सा राक्षसेन्द्रस्य वचो निशम्य  
> तद् रावणस्य प्रियमप्रियार्ता ।  
> सीता वितत्रास यथा वनान्ते  
> सिंहाभिपन्ना गजराजकन्या ॥ १ ॥

पतिके विरहके दुःखसे व्याकुल हुई सीता राक्षसराज रावणके उन अप्रिय वचनोंको याद करके उसी तरह भयभीत हो गयीं, जैसे वनमें सिंहके पंजेमें पड़ी हुई कोई गजराजकी बच्ची ॥ १ ॥

> सा राक्षसीमध्यगता च भीरु-  
> र्वाग्भिर्भृशं रावणतर्जिता च ।  
> कान्तारमध्ये विजने विसृष्टा  
> बालेव कन्या विललाप सीता ॥ २ ॥

राक्षसियोंके बीचमें बैठकर उनके कठोर वचनोंसे बारंबार धमकायी और रावणद्वारा फटकारी गयी भीरु स्वभाववाली सीता निर्जन एवं बीहड़ वनमें अकेली छूटी हुई अल्पवयस्का बालिकाके समान विलाप करने लगीं ॥२॥

> सत्यं बतेदं प्रवदन्ति लोके  
> नाकालमृत्युर्भवतीति सन्तः ।  
> यत्राहमेवं परिभर्त्स्यमाना  
> जीवामि यस्मात् क्षणमप्यपुण्या ॥ ३ ॥

वे बोलीं—‘संतजन लोकमें यह बात ठीक ही कहते हैं कि बिना समय आये किसीकी मृत्यु नहीं होती, तभी तो इस प्रकार धमकायी जानेपर भी मैं पुण्यहीना नारी क्षणभर भी जीवित रह पाती हूँ ॥ ३ ॥

> सुखाद् विहीनं बहुदुःखपूर्ण-  
> मिदं तु नूनं हृदयं स्थिरं मे।  
> विदीर्यते यत्र सहस्रधाद्य  
> वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य ॥ ४ ॥

‘मेरा यह हृदय सुखसे रहित और अनेक प्रकारके दुःखोंसे भरा होनेपर भी निश्चय ही अत्यन्त दृढ़ है। इसीलिये वज्रके मारे हुए पर्वतशिखरकी भाँति आज इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ ४ ॥

> नैवास्ति नूनं मम दोषमत्र  
> वध्याहमस्याप्रियदर्शनस्य ।  
> भावं न चास्याहमनुप्रदातु-  
> मलं द्विजो मन्त्रमिवाद्विजाय ॥ ५ ॥

‘मैं इस दुष्ट रावणके हाथसे मारी जानेवाली हूँ, इसलिये यहाँ आत्मघात करनेसे भी मुझे कोई दोष नहीं लग सकता । कुछ भी हो, जैसे द्विज किसी शूद्रको वेदमन्त्रका उपदेश नहीं देता, उसी प्रकार मैं भी इस निशाचरको अपने हृदयका अनुराग नहीं दे सकती ॥ ५ ॥

> तस्मिन्ननागच्छति लोकनाथे  
> गर्भस्थजन्तोरिव शल्यकृन्तः ।  
> नूनं ममाङ्गान्यचिरादनार्यः  
> शस्त्रैः शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्रः ॥ ६ ॥

‘हाय ! लोकनाथ भगवान् श्रीरामके आनेसे पहले ही यह दुष्ट राक्षसराज निश्चय ही अपने तीखे शस्त्रोंसे मेरे अङ्गोंके शीघ्र ही टुकड़े-टुकड़े कर डालेगा । ठीक वैसे ही, जैसे शल्यचिकित्सक किसी विशेष अवस्थामें गर्भस्थ शिशुके टूक-टूक कर देता है ( अथवा जैसे इन्द्रने दितिके गर्भमें स्थित शिशुके उनचास टुकड़े कर डाले थे ) ॥ ६ ॥

> दुःखं बतेदं ननु दुःखिताया  
> मासौ चिरायाभिगमिष्यतो द्वौ ।  
> बद्धस्य वध्यस्य यथा निशान्ते  
> राजोपरोधादिव तस्करस्य ॥ ७ ॥

‘मैं बड़ी दुखिया हूँ । दुःखकी बात है कि मेरी अवधिके ये दो महीने भी जल्दी ही समाप्त हो जायँगे । राजाके कारागारमें कैद हुए और रात्रिके अन्तमें फाँसीकी सजा पानेवाले अपराधी चोरकी जो दशा होती है, वही मेरी भी है ॥ ७ ॥

> हा राम हा लक्ष्मण हा सुमित्रे  
> हा राममातः सह मे जनन्यः ।  
> एषा विपद्याम्यहमल्पभाग्या  
> महार्णवे नौरिव मूढवाता ॥ ८ ॥

‘हा राम ! हा लक्ष्मण ! हा सुमित्रे ! हा श्रीरामजननी कौसल्ये ! और हा मेरी माताओ ! जिस प्रकार बवंडरमें पड़ी हुई नौका महासागरमें डूब जाती है,उसी प्रकार आज मैं मन्दभागिनी सीता प्राणसङ्कटकी दशामें पड़ी हुई हूँ ॥ ८ ॥

> तरस्विनौ धारयता मृगस्य  
> सत्त्वेन रूपं मनुजेन्द्रपुत्रौ ।  
> नूनं विशस्तौ मम कारणात् तौ  
> सिंहर्षभौ द्वाविव वैद्युतेन ॥ ९ ॥

‘निश्चय ही उस मृगरूपधारी जीवने मेरे कारण उन दोनों वेगशाली राजकुमारोंको मार डाला होगा । जैसे दो श्रेष्ठ सिंह बिजलीसे मार दिये जायँ, वही दशा उन दोनों भाइयोंकी हुई होगी ॥ ९ ॥

> नूनं स कालो मृगरूपधारी  
> मामल्पभाग्यां लुलुभे तदानीम् ।  
> यत्रार्यपुत्रौ विससर्ज मूढा  
> रामानुजं लक्ष्मणपूर्वजं च ॥ १० ॥

‘अवश्य ही उस समय कालने ही मृगका रूप धारण करके मुझ मन्दभागिनीको लुभाया था, जिससे प्रभावित हो मुझ मूढ़ नारीने उन दोनों आर्यपुत्रों—श्रीराम और लक्ष्मणको उसके पीछे भेज दिया था ॥ १० ॥

> हा राम सत्यव्रत दीर्घबाहो  
> हा पूर्णचन्द्रप्रतिमानवक्त्र ।  
> हा जीवलोकस्य हितः प्रियश्च  
> वध्यां न मां वेत्सि हि राक्षसानाम् ॥११॥

‘हा सत्यव्रतधारी महाबाहु श्रीराम ! हा पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले रघुनन्दन ! हा जीवजगत्के हितैषी और प्रियतम ! आपको पता नहीं है कि मैं राक्षसोंके हाथसे मारी जानेवाली हूँ ॥ ११ ॥

> अनन्यदेवत्वमियं क्षमा च  
> भूमौ च शय्या नियमश्च धर्मे ।  
> पतिव्रतात्वं विफलं ममेदं  
> कृतं कृतघ्नेष्विव मानुषाणाम् ॥ १२ ॥

‘मेरी यह अनन्योपासना, क्षमा, भूमिशयन, धर्मसम्बन्धी नियमोंका पालन और पतिव्रतपरायणता—ये सब-के-सब कृतघ्नोंके प्रति किये गये मनुष्योंके उपकारकी भाँति निष्फल हो गये ॥ १२ ॥

> मोघो हि धर्मश्चरितो ममायं  
> तथैकपत्नीत्वमिदं निरर्थकम् ।  
> या त्वां न पश्यामि कृशा विवर्णा  
> हीना त्वया सङ्गमने निराशा ॥ १३ ॥

‘प्रभो ! यदि मैं अत्यन्त कृश और कान्तिहीन होकर आपसे बिछुड़ी ही रह गयी तथा आपसे मिलनेकी आशा खो बैठी, तब तो मैंने जिसका जीवनभर आचरण किया है, वह धर्म मेरे लिये व्यर्थ हो गया और यह एकपत्नीव्रत भी किसी काम नहीं आया ॥ १३ ॥

> पितुर्निदेशं नियमेन कृत्वा  
> वनान्निवृत्तश्चरितव्रतश्च ।  
> स्त्रीभिस्तु मन्ये विपुलेक्षणाभिः  
> संरंस्यसे वीतभयः कृतार्थः॥१४॥

‘मैं तो समझती हूँ आप नियमानुसार पिताकी आज्ञाका पालन करके अपने व्रतको पूर्ण करनेके पश्चात् जब वनसे लौटेंगे, तब निर्भय एवं सफलमनोरथ हो विशाल नेत्रोंवाली बहुत-सी सुन्दरियोंके साथ विवाह करके उनके साथ रमण करेंगे ॥ १४ ॥

> अहं तु राम त्वयि जातकामा  
> चिरं विनाशाय निबद्धभावा।  
> मोघं चरित्वाथ तपो व्रतं च  
> त्यक्ष्यामि धिग्जीवितमल्पभाग्याम् ॥ १५ ॥

‘किंतु श्रीराम ! मैं तो केवल आपमें ही अनुराग रखती हूँ । मेरा हृदय चिरकालतक आपसे ही बँधा रहेगा । मैं अपने विनाशके लिये ही आपसे प्रेम करती हूँ । अबतक मैंने तप और व्रत आदि जो कुछ भी किया है, वह मेरे लिये व्यर्थ सिद्ध हुआ है । उस अभीष्ट फलको न देनेवाले धर्मका आचरण करके अब मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा । अतः मुझ मन्दभागिनीको धिक्कार है ॥ १५ ॥

> संजीवितं क्षिप्रमहं त्यजेयं  
> विषेण शस्त्रेण शितेन वापि ।  
> विषस्य दाता न तु मेऽस्ति कश्चि-  
> च्छत्रस्य वा वेश्मनि राक्षसस्य ॥ १६ ॥

‘मैं शीघ्र ही किसी तीखे शस्त्र अथवा विषसे अपने प्राण त्याग दूँगी; परंतु इस राक्षसके यहाँ मुझे कोई विष या शस्त्र देनेवाला भी नहीं है’ ॥ १६ ॥

> शोकाभितप्ता बहुधा विचिन्त्य  
> सीताथ वेणीग्रथनं गृहीत्वा ।  
> उद्बद्ध्य वेण्युद्ग्रथनेन शीघ्र-  
> महं गमिष्यामि यमस्य मूलम् ॥ १७ ॥

शोकसे संतप्त हुई सीताने इसी प्रकार बहुत कुछ विचार करके अपनी चोटीको पकड़कर निश्चय किया कि मैं शीघ्र ही इस चोटीसे फाँसी लगाकर यमलोकमें पहुँच जाऊँगी ॥ १७ ॥

> उपस्थिता सा मृदुसर्वगात्री  
> शाखां गृहीत्वा च नगस्य तस्य।  
> तस्यास्तु रामं परिचिन्तयन्त्या  
> रामानुजं स्वं च कुलं शुभाङ्ग्याः॥ १८ ॥  
> तस्या विशोकानि तदा बहूनि  
> धैर्यार्जितानि प्रवराणि लोके ।  
> प्रादुर्निमित्तानि तदा बभूवुः  
> पुरापि सिद्धान्युपलक्षितानि ॥ १९ ॥

सीताजीके सभी अङ्ग बड़े कोमल थे । वे उस अशोक वृक्षके निकट उसकी शाखा पकड़कर खड़ी हो गयीं । इस प्रकार प्राण-त्यागके लिये उद्यत हो जब वे श्रीराम, लक्ष्मण और अपने कुलके विषयमें विचार करने लगीं, उस समय शुभाङ्गी सीताके समक्ष ऐसे बहुत-से लोकप्रसिद्ध श्रेष्ठ शकुन प्रकट हुए, जो शोककी निवृत्ति करनेवाले और उन्हें ढाढ़स बँधानेवाले थे । उन शकुनोंका दर्शन और उनके शुभ फलोंका अनुभव उन्हें पहले भी हो चुका था ॥ १८-१९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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