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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 22"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 22

> सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं राक्षसेश्वरः ।  
> प्रत्युवाच ततः सीतां विप्रियं प्रियदर्शनाम् ॥ १ ॥

सीताके ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावणने उन प्रियदर्शना सीताको यह अप्रिय उत्तर दिया—॥ १ ॥

> यथा यथा सान्त्वयिता वश्यः स्त्रीणां तथा तथा ।  
> यथा यथा प्रियं वक्ता परिभूतस्तथा तथा ॥ २ ॥

‘लोकमें पुरुष जैसे-जैसे स्त्रियोंसे अनुनय-विनय करता है, वैसे-वैसे वह उनका प्रिय होता जाता है; परंतु मैं तुमसे ज्यों-ज्यों मीठे वचन बोलता हूँ, त्यों ही-त्यों तुम मेरा तिरस्कार करती जा रही हो ॥ २ ॥

> संनियच्छति मे क्रोधं त्वयि कामः समुत्थितः ।  
> द्रवतो मार्गमासाद्य हयानिव सुसारथिः ॥ ३ ॥

‘किंतु जैसे अच्छा सारथि कुमार्गमें दौड़ते हुए घोड़ोंको रोकता है, वैसे ही तुम्हारे प्रति जो मेरा प्रेम उत्पन्न हो गया है, वही मेरे क्रोधको रोक रहा है ॥ ३ ॥

> वामः कामो मनुष्याणां यस्मिन् किल निबध्यते ।  
> जने तस्मिंस्त्वनुक्रोशः स्नेहश्च किल जायते ॥ ४ ॥

‘मनुष्योंमें यह काम ( प्रेम ) बड़ा टेढ़ा है । वह जिसके प्रति बँध जाता है, उसीके प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है ॥ ४ ॥

> एतस्मात् कारणान्न त्वां घातयामि वरानने ।  
> वधार्हामवमानार्हां मिथ्या प्रव्रजने रताम् ॥ ५ ॥

‘सुमुखि ! यही कारण है कि झूठे वैराग्यमें तत्पर तथा वध और तिरस्कारके योग्य होनेपर भी तुम्हारा मैं वध नहीं कर रहा हूँ ॥ ५ ॥

> परुषाणि हि वाक्यानि यानि यानि ब्रवीषि माम् ।  
> तेषु तेषु वधो युक्तस्तव मैथिलि दारुणः ॥ ६ ॥

‘मिथिलेशकुमारी ! तुम मुझसे जैसी-जैसी कठोर बातें कह रही हो, उनके बदले तो तुम्हें कठोर प्राणदण्ड देना ही उचित है’ ॥ ६ ॥

> एवमुक्त्वा तु वैदेहीं रावणो राक्षसाधिपः ।  
> क्रोधसंरम्भसंयुक्तः सीतामुत्तरमब्रवीत् ॥ ७ ॥

विदेहराजकुमारी सीतासे ऐसा कहकर क्रोधके आवेशमें भरे हुए राक्षसराज रावणने उन्हें फिर इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ७ ॥

> द्वौ मासौ रक्षितव्यौ मे योऽवधिस्ते मया कृतः ।  
> ततः शयनमारोह मम त्वं वरवर्णिनि ॥ ८ ॥

‘सुन्दरि ! मैंने तुम्हारे लिये जो अवधि नियुक्त की है, उसके अनुसार मुझे दो महीने और प्रतीक्षा करनी है । तत्पश्चात् तुम्हें मेरी शय्यापर आना होगा ॥ ८ ॥

> द्वाभ्यामूर्ध्वं तु मासाभ्यां भर्तारं मामनिच्छतीम् ।  
> मम त्वां प्रातराशार्थं सूदाश्छेत्स्यन्ति खण्डशः ॥ ९ ॥

‘अतः याद रक्खो—यदि दो महीनेके बाद तुम मुझे अपना पति बनाना स्वीकार नहीं करोगी तो रसोइये मेरे कलेवेके लिये तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे’ ॥ ९ ॥

> तां भर्त्स्यमानां सम्प्रेक्ष्य राक्षसेन्द्रेण जानकीम् ।  
> देवगन्धर्वकन्यास्ता विषेदुर्विकृतेक्षणाः ॥ १० ॥

राक्षसराज रावणके द्वारा जनकनन्दिनी सीताको इस प्रकार घमकायी जाती देख देवताओंऔर गन्धर्वोकी कन्याओंको बड़ा विषाद हुआ । उनकी आँखें विकृत हो गयीं॥१०॥

> ओष्ठप्रकारैरपरा नेत्रैर्वक्त्रैस्तथापराः ।  
> सीतामाश्वासयामासुस्तर्जितां तेन रक्षसा ॥ ११ ॥

तब उनमेंसे किसीने ओठोंसे, किसीने नेत्रोंसे तथा किसीने मुँहके संकेतसे उस राक्षसद्वारा डाँटी जाती हुई सीताको धैर्य बँधाया ॥ ११ ॥

> ताभिराश्वासिता सीता रावणं राक्षसाधिपम् ।  
> उवाचात्महितं वाक्यं वृत्तशौटीर्यगर्वितम् ॥ १२ ॥

उनके धैर्य बँधानेपर सीताने राक्षसराज रावणसे अपने सदाचार ( पातिव्रत्य ) और पतिके शौर्यके अभिमानसे पूर्ण हितकर वचन कहा—॥ १२ ॥

> नूनं न ते जनः कश्चिदस्मिन्निःश्रेयसि स्थितः ।  
> निवारयति यो न त्वां कर्मणोऽस्माद् विगर्हितात् ॥ १३ ॥

‘निश्चय ही इस नगरमें कोई भी पुरुष तेरा भला चाहनेवाला नहीं है, जो तुझे इस निन्दित कर्मसे रोके ॥१३॥

> मां हि धर्मात्मनः पत्नीं शचीमिव शचीपतेः ।  
> त्वदन्यस्त्रिषु लोकेषु प्रार्थयेन्मनसापि कः ॥ १४ ॥

‘जैसे शची इन्द्रकी धर्मपत्नी हैं, उसी प्रकार मैं धर्मात्मा भगवान् श्रीरामकी पत्नी हूँ । त्रिलोकीमें तेरे सिवा दूसरा कौन है, जो मनसे भी मुझे प्राप्त करनेकी इच्छा करे ॥१४॥

> राक्षसाधम रामस्य भार्यामममिततेजसः ।  
> उक्तवानसि यत् पापं क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे ॥ १५ ॥

‘नीच राक्षस ! तूने अमित तेजस्वी श्रीरामकी भार्यासे जो पापकी बात कही है, उसके फलस्वरूप दण्डसे तू कहाँ जाकर छुटकारा पायेगा ? ॥ १५ ॥

> यथा दसश्च मातङ्गः शशाश्च सहितौ वने ।  
> तथा द्विरदवद् रामस्त्वं नीच शशवत् स्मृतः ॥ १६ ॥

‘जिस प्रकार वनमें कोई मतवाला हाथी और कोई खरगोश दैववश एक दूसरेके साथ युद्धके लिये तुल जायँ, वैसे ही भगवान् श्रीराम और तू है । नीच निशाचर ! भगवान् राम तो गजराजके समान हैं और तू खरगोशके तुल्य है ॥१६॥

> स त्वमिक्ष्वाकुनाथं वै क्षिपन्निह न लज्जसे ।  
> चक्षुषो विषये तस्य न यावदुपगच्छसि ॥ १७ ॥

‘अरे ! इक्ष्वाकुनाथ श्रीरामका तिरस्कार करते तुझे लज्जा नहीं आती । तू जबतक उनकी आँखोंके सामने नहीं जाता, तबतक जो चाहे कह ले ॥ १७ ॥

> इमे ते नयने क्रूरे विकृते कृष्णपिङ्गले ।  
> क्षितौ न पतिते कस्मान्मामनार्य निरीक्षतः ॥ १८ ॥

‘अनार्य ! मेरी ओर दृष्टि डालते समय तेरी ये क्रूर और विकारयुक्त काली-पीली आँखें पृथ्वीपर क्यों नहीं गिर पड़ीं ? ॥ १८ ॥

> तस्य धर्मात्मनः पत्नीं स्नुषां दशरथस्य च ।  
> कथं व्याहरतो मां ते न जिह्वा पाप शीर्यति ॥ १९ ॥

‘मैं धर्मात्मा श्रीरामकी धर्मपत्नी और महाराज दशरथकी पुत्रवधू हूँ । पापी ! मुझसे पापकी बातें करते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गल जाती है ? ॥ १९ ॥

> असंदेशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् ।  
> न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥ २० ॥

‘दशमुख रावण ! मेरा तेज ही तुझे भस्म कर डालनेके लिये पर्याप्त है । केवल श्रीरामकी आज्ञा न होनेसे और अपनी तपस्याको सुरक्षित रखनेके विचारसे मैं तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ ॥ २० ॥

> नापहर्तुमहं शक्या तस्य रामस्य धीमतः ।  
> विधिस्तव वधार्थाय विहितो नात्र संशयः ॥ २१ ॥

‘मैं मतिमान् श्रीरामकी भार्या हूँ, मुझे हर ले आनेकी शक्ति तेरे अंदर नहीं थी । निःसंदेह तेरे वधके लिये ही विधाताने यह विधान रच दिया है ॥ २१ ॥

> शूरेण धनदभ्रात्रा बलैः समुदितेन च ।  
> अपोह्य रामं कस्माच्चिद् दारचौर्यं त्वया कृतम् ॥ २२ ॥

‘तू तो बड़ा शूरवीर बनता है, कुबेरका भाई है और तेरे पास सेनाएँ भी बहुत हैं, फिर श्रीरामको छलसे दूर हटाकर क्यों तूने उनकी स्त्रीकी चोरी की है ?’ ॥ २२ ॥

> सीताया वचनं श्रुत्वा रावणो राक्षसाधिपः ।  
> विवृत्य नयने क्रूरे जानकीमन्ववैक्षत ॥ २३ ॥

सीताकी ये बातें सुनकर राक्षसराज रावणने उन जनक-दुलारीकी ओर आँखें तरेरकर देखा । उसकी दृष्टिसे क्रूरता टपक रही थी ॥ २३ ॥

> नीलजीमूतसंकाशो महाभुजशिरोधरः ।  
> सिंहसत्त्वगतिः श्रीमान् दीप्तजिह्वोग्रलोचनः ॥ २४ ॥

वह नीलमेघके समान काला और विशालकाय था । उसकी भुजाएँ और ग्रीवा बड़ी थीं । वह गति और पराक्रममें सिंहके समान था और तेजस्वी दिखायी देता था । उसकी जीभ आगकी लपटके समान लपलपा रही थी तथा नेत्र बड़े भयंकर प्रतीत होते थे ॥ २४ ॥

> चलाग्रमुकुटप्रांशुश्चित्रमाल्यानुलेपनः ।  
> रक्तमाल्याम्बरधरस्तप्ताङ्गदविभूषणः ॥ २५ ॥  
> श्रोणीसूत्रेण महता मेचकेन सुसंवृतः ।  
> अमृतोत्पादने नद्धो भुजङ्गेनेव मन्दरः ॥ २६ ॥

क्रोधके कारण उसके मुकुटका अग्रभाग हिल रहा था, जिससे वह बहुत ऊँचा जान पड़ता था । उसने तरह-तरहके हार और अनुलेपन धारण कर रक्खे थे तथा पक्के सोनेके बने हुए बाजूबंद उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह लाल रंगके फूलोंकी माला और लाल वस्त्र पहने हुए था । उसकी कमरके चारों ओर काले रंगका लंबा कटिसूत्र बँधा हुआ था, जिससे वह अमृत-मन्थनके समय वासुकिसे लिपटे हुए मन्दराचलके समान जान पड़ता था ॥ २५-२६॥

> ताभ्यां स परिपूर्णाभ्यां भुजाभ्यां राक्षसेश्वरः ।  
> शुशुभेऽचलसंकाशः शृङ्गाभ्यामिव मन्दरः ॥ २७ ॥  
> तरुणादित्यवर्णाभ्यां कुण्डलाभ्यां विभूषितः ।  
> रक्तपल्लवपुष्पाभ्यामशोकाभ्यामिवाचलः ॥ २८ ॥

पर्वतके समान विशालकाय राक्षसराज रावण अपनी दोनों परिपुष्ट भुजाओंसे उसी प्रकार शोभा पा रहा था, मानो दो शिखरोंसे मन्दराचल सुशोभित हो रहा हो ।२७। प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण-पीत कान्तिवाले दो कुण्डल उसके कानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे, मानो लाल पल्लवों और फूलोंसे युक्त दो अशोक वृक्ष किसी पर्वतको सुशोभित कर रहे हों ॥ २८ ॥

> स कल्पवृक्षप्रतिमो वसन्त इव मूर्तिमान् ।  
> श्मशानचैत्यप्रतिमो भूषितोऽपि भयंकरः ॥ २९ ॥

वह अभिनव शोभासे सम्पन्न होकर कल्पवृक्ष एवं मूर्तिमान् वसन्तके समान जान पड़ता था । आभूषणोंसे विभूषित होनेपर भी श्मशानचैत्य ( मरघटमें बने हुए देवालय ) की भाँति भयंकर प्रतीत होता था ॥ २९ ॥

> अवेक्षमाणो वैदेहीं कोपसंरक्तलोचनः ।  
> उवाच रावणः सीतां भुजङ्ग इव निःश्वसन् ॥ ३० ॥

रावणने क्रोधसे लाल आँखें करके विदेहकुमारी सीताकी ओर देखा और फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँसें खींचकर कहा—॥ ३० ॥

> अनयेनाभिसम्पन्नमर्थहीनमनुव्रते ।  
> नाशयाम्यहमद्य त्वां सूर्यः संध्यामिवौजसा ॥ ३१ ॥

‘अन्यायी और निर्धन मनुष्यका अनुसरण करनेवाली नारी ! जैसे सूर्यदेव अपने तेजसे प्रातःकालिक संध्याके अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार आज मैं तेरा विनाश किये देता हूँ’ ॥ ३१ ॥

> इत्युक्त्वा मैथिलीं राजा रावणः शत्रुरावणः ।  
> संददर्श ततः सर्वा राक्षसीर्घोरदर्शनाः ॥ ३२ ॥

मिथिलेशकुमारीसे ऐसा कहकर शत्रुओंको रुलानेवाले राजा रावणने भयंकर दिखायी देनेवाली समस्त राक्षसियोंकी ओर देखा ॥ ३२ ॥

> एकाक्षीमेककर्णां च कर्णप्रावरणां तथा ।  
> गोकर्णीं हस्तिकर्णीं च लम्बकर्णीमकर्णिकाम् ॥ ३३ ॥  
> हस्तिपद्यश्वपद्यौ च गोपदीं पादचूलिकाम् ।  
> एकाक्षीमेकपादीं च पृथुपादीमपादिकाम् ॥ ३४ ॥  
> अतिमात्रशिरोग्रीवामतिमात्रकुचोदरीम् ।  
> अतिमात्रास्यनेत्रां च दीर्घजिह्वानखामपि ॥ ३५ ॥  
> अनासिकां सिंहमुखीं गोमुखीं सूकरीमुखीम् ।  
> यथा मद्वशगा सीता क्षिप्रं भवति जानकी ॥ ३६ ॥  
> तथा कुरुत राक्षस्यः सर्वाः क्षिप्रं समेत्य वा ।  
> प्रतिलोमानुलोमैश्च सामदानादिभेदनैः ॥ ३७ ॥  
> आवर्जयत वैदेहीं दण्डस्योद्यमनेन च ।

उसने एकाक्षी ( एक आँखवाली ), एककर्णा ( एक कानवाली ), कर्णप्रावरणा ( लंबे कानोंसे अपने शरीरको ढक लेनेवाली ), गोकर्णी ( गौके-से कानोंवाली ), हस्तिकर्णी ( हाथीके समान कानोंवाली ), लंबकर्णी ( लंबे कानवाली), अकर्णिका ( बिना कानकी ), हस्तिपदी ( हाथीके-से पैरों-वाली ), अश्वपदी ( घोड़ेके समान पैरवाली ), गोपदी ( गायके समान पैरवाली ), पादचूलिका ( केशयुक्त पैरों-वाली ), एकाक्षी, एकपादी ( एक पैरवाली ), पृथुपादी ( मोटे पैरवाली ), अपादिका ( बिना पैरोंकी ), अतिमात्र-शिरोग्रीवा ( विशाल सिर और गर्दनवाली ), अतिमात्र-कुचोदरी ( बहुत बड़े-बड़े स्तन और पेटवाली ), अतिमात्रा-स्यनेत्रा ( विशाल मुख और नेत्रवाली ), दीर्घजिह्वानखा ( लंबी जीभ और नखोंवाली ), अनासिका ( बिना नाक-की ), सिंहमुखी ( सिंहके समान मुखवाली ), गोमुखी (गौके समान मुखवाली ) तथा सूकरीमुखी ( सूकरीके समान मुखवाली )—इन सब राक्षसियोंसे कहा—‘निशाचरियो ! तुम सब लोग मिलकर अथवा अलग-अलग शीघ्र ही ऐसा प्रयत्न करो, जिससे जनककिशोरी सीता बहुत जल्द मेरे वशमें आ जाय । अनुकूल-प्रतिकूल उपायोंसे, साम, दान और भेदनीतिसे तथा दण्डका भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीताको वशमें लानेकी चेष्टा करो’ ॥ ३३–३७½ ॥

> इति प्रतिसमादिश्य राक्षसेन्द्रः पुनः पुनः ॥ ३८ ॥  
> काममन्युपरीतात्मा जानकीं प्रति गर्जत ।

राक्षसियोंको इस प्रकार बारंबार आज्ञा देकर काम और क्रोधसे व्याकुल हुआ राक्षसराज रावण जानकीजीकी ओर देखकर गर्जना करने लगा ॥ ३८½ ॥

> उपगम्य ततः क्षिप्रं राक्षसी धान्यमालिनी ॥ ३९ ॥  
> परिष्वज्य दशग्रीवमिदं वचनमब्रवीत् ।

तदनन्तर राक्षसियोंकी स्वामिनी मन्दोदरी तथा धान्यमालिनी नामवाली राक्षस-कन्या शीघ्र रावणके पास आयीं और उसका आलिङ्गन करके बोली—॥ ३९½ ॥

> मया क्रीड महाराज सीतया किं तवानया ॥ ४० ॥  
> विवर्णया कृपणया मानुष्या राक्षसेश्वर ।

‘महाराज राक्षसराज ! आप मेरे साथ क्रीडा कीजिये । इस कान्तिहीन और दीन मानव-कन्या सीतासे आपको क्या प्रयोजन है ? ॥ ४०½ ॥

> नूनमस्यां महाराज न देवा भोगसत्तमान् ॥ ४१ ॥  
> विदधत्यमरश्रेष्ठास्तव बाहुबलार्जितान् ।

‘महाराज ! निश्चय ही देवश्रेष्ठ ब्रह्माजीने इसके भाग्यमें आपके बाहुबलसे उपार्जित दिव्य एवं उत्तम भोग नहीं लिखे हैं ॥ ४१½॥

> अकामां कामयानस्य शरीरमुपतप्यते ॥ ४२ ॥  
> इच्छतीं कामयानस्य प्रीतिर्भवति शोभना ।

‘प्राणनाथ ! जो स्त्री अपनेसे प्रेम नहीं करती, उसकी कामना करनेवाले पुरुषके शरीरमें केवल ताप ही होता है और अपने प्रति अनुराग रखनेवाली स्त्रीकी कामना करनेवालेको उत्तम प्रसन्नता प्राप्त होती है’ ॥ ४२½ ॥

> एवमुक्तस्तु राक्षस्या समुत्क्षिप्तस्ततो बली ।  
> प्रहसन् मेघसंकाशो राक्षसः स न्यवर्तत ॥ ४३ ॥

जब राक्षसीने ऐसा कहा और उसे दूसरी ओर वह हटा ले गयी, तब मेघके समान काला और बलवान् राक्षस रावण जोर-जोरसे हँसता हुआ महलकी ओर लौट पड़ा ॥ ४३ ॥

> प्रस्थितः स दशग्रीवः कम्पयन्निव मेदिनीम् ।  
> ज्वलद्भास्करसंकाशं प्रविवेश निवेशनम् ॥ ४४ ॥

अशोकवाटिकासे प्रस्थित होकर पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए दशग्रीवने उद्दीप्त सूर्यके सदृश प्रकाशित होनेवाले अपने भवनमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥

> देवगन्धर्वकन्याश्च नागकन्याश्च तास्ततः ।  
> परिवार्य दशग्रीवं प्रविशुस्ता गृहोत्तमम् ॥ ४५ ॥

तदनन्तर देवता, गन्धर्व और नागोंकी कन्याएँ भी रावणको सब ओरसे घेरकर उसके साथ ही उस उत्तम राजभवनमें चली गयीं ॥ ४५ ॥

> स मैथिलीं धर्मपरामवस्थितां  
> प्रवेपमानां परिभर्त्स्य रावणः ।  
> विहाय सीतां मदनेन मोहितः  
> स्वमेव वेश्म प्रविवेश रावणः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार अपने धर्ममें तत्पर, स्थिरचित्त और भयसे काँपती हुई मिथिलेशकुमारी सीताको धमकाकर काममोहित रावण अपने ही महलमें चला गया ॥ ४६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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