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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 20"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 20

> स तां परिवृतां दीनां निरानन्दां तपस्विनीम् ।  
> साकारैर्मधुरैर्वाक्यैर्न्यदर्शयत रावणः ॥ १ ॥

राक्षसियोंसे घिरी हुई दीन और आनन्दशून्य तपस्विनी सीताको सम्बोधित करके रावण अभिप्राययुक्त मधुर वचनोंद्वारा अपने मनका भाव प्रकट करने लगा—॥ १ ॥

> मां दृष्ट्वा नागनासोरु गूहमाना स्तनोदरम् ।  
> अदर्शनमिवात्मानं भयान्नेतुं त्वमिच्छसि ॥ २ ॥

‘हाथीकी सूँढके समान सुन्दर जाँघोंवाली सीते ! मुझे देखते ही तुम अपने स्तन और उदरको इस प्रकार छिपाने लगी हो, मानो डरके मारे अपनेको अदृश्य कर देना चाहती हो ॥ २ ॥

> कामये त्वां विशालाक्षि बहु मन्यस्व मां प्रिये ।  
> सर्वाङ्गगुणसम्पन्ने सर्वलोकमनोहरे ॥ ३ ॥

‘किंतु विशाललोचने ! मैं तो तुम्हें चाहता हूँ—तुमसे प्रेम करता हूँ । समस्त संसारका मन मोहनेवाली सर्वाङ्गसुन्दरी प्रिये ! तुम भी मुझे विशेष आदर दो—मेरी प्रार्थना स्वीकार करो ॥ ३ ॥

> नेह किंचिन्मनुष्या वा राक्षसाः कामरूपिणः ।  
> व्यपसर्पतु ते सीते भयं मत्तः समुत्थितम् ॥ ४ ॥

‘यहाँ तुम्हारे लिये कोई भय नहीं है । इस स्थानमें न तो मनुष्य आ सकते हैं, न इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले दूसरे राक्षस ही, केवल मैं आ सकता हूँ । परंतु सीते ! मुझसे जो तुम्हें भय हो रहा है, वह तो दूर हो ही जाना चाहिये ॥ ४ ॥

> स्वधर्मो रक्षसां भीरु सर्वदैव न संशयः ।  
> गमनं वा परस्त्रीणां हरणं सम्प्रमथ्य वा ॥ ५ ॥

‘भीरु ! (तुम यह न समझो कि मैंने कोई अधर्म किया है ) परायी स्त्रियोंके पास जाना अथवा बलात्कारपूर्वक उन्हें हर लाना यह राक्षसोंका सदा ही अपना धर्म रहा है— इसमें संदेह नहीं है ॥ ५ ॥

> एवं चैवमकामां त्वां न च स्प्रक्ष्यामि मैथिलि ।  
> कामं कामः शरीरे मे यथाकामं प्रवर्तताम् ॥ ६ ॥

‘मिथिलेशनन्दिनि ! ऐसी अवस्थामें भी जबतक तुम मुझे न चाहोगी, तबतक मैं तुम्हारा स्पर्श नहीं करूँगा । भले ही कामदेव मेरे शरीरपर इच्छानुसार अत्याचार करे ॥ ६ ॥

> देवि नेह भयं कार्यं मयि विश्वसिहि प्रिये ।  
> प्रणयस्व च तत्त्वेन मैवं भूः शोकलालसा ॥ ७ ॥

‘देवि ! इस विषयमें तुम्हें भय नहीं करना चाहिये । प्रिये ! मुझपर विश्वास करो और यथार्थरूपसे प्रेमदान दो । इस तरह शोकसे व्याकुल न हो जाओ ॥ ७ ॥

> एकवेणी अधःशय्या ध्यानं मलिनमम्बरम् ।  
> अस्थानेऽप्युपवासश्च नैतान्यौपयिकानि ते ॥ ८ ॥

‘एक वेणी धारण करना, नीचे पृथ्वीपर सोना, चिन्तामग्न रहना, मैले वस्त्र पहनना और बिना अवसरके उपवास करना—ये सब बातें तुम्हारे योग्य नहीं हैं ॥ ८ ॥

> विचित्राणि च माल्यानि चन्दनान्यगुरूणि च ।  
> विविधानि च वासांसि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ९ ॥  
> महार्हाणि च पानानि शयनान्यासनानि च ।  
> गीतं नृत्यं च वाद्यं च लभ मां प्राप्य मैथिलि ॥ १० ॥

‘मिथिलेशकुमारी ! मुझे पाकर तुम विचित्र पुष्प-माला, चन्दन, अगुरु, नाना प्रकारके वस्त्र, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य पेय, शय्या, आसन, नाच, गान और वाद्यका सुख भोगो ॥ ९-१० ॥

> स्त्रीरत्नमसि मैवं भूः कुरु गात्रेषु भूषणम् ।  
> मां प्राप्य हि कथं वा स्यास्त्वमनर्हा सुविग्रहे ॥ ११ ॥

‘तुम स्त्रियोंमें रत्न हो । इस तरह मलिन वेषमें न रहो । अपने अङ्गोंमें आभूषण धारण करो । सुन्दरि ! मुझे पाकर भी तुम भूषण आदिसे असम्मानित कैसे रहोगी ? ॥ ११ ॥

> इदं ते चारु संजातं यौवनं ह्यतिवर्तते ।  
> यदतीतं पुनर्नैति स्रोतः स्रोतस्विनामिव ॥ १२ ॥

‘यह तुम्हारा नवोदित सुन्दर यौवन बीता जा रहा है । जो बीत जाता है, वह नदियोंके प्रवाहकी भाँति फिर लौटकर नहीं आता ॥ १२ ॥

> त्वां कृत्वोपरतो मन्ये रूपकर्ता स विश्वकृत् ।  
> नहि रूपोपमा ह्यन्या तवास्ति शुभदर्शने ॥ १३ ॥

‘शुभदर्शने ! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि रूपकी रचना करनेवाला लोकस्रष्टा विधाता तुम्हें बनाकर फिर उस कार्यसे विरत हो गया; क्योंकि तुम्हारे रूपकी समता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है ॥ १३ ॥

> त्वां समासाद्य वैदेहि रूपयौवनशालिनीम् ।  
> कः पुनर्नातिवर्तेत साक्षादपि पितामहः ॥ १४ ॥

‘विदेहनन्दिनि ! रूप और यौवनसे सुशोभित होनेवाली तुमको पाकर कौन ऐसा पुरुष है, जो धैर्यसे विचलित न होगा । भले ही वह साक्षात् ब्रह्मा क्यों न हो ॥ १४ ॥

> यद् यत् पश्यामि ते गात्रं शीतांशुसदृशानने ।  
> तस्मिंस्तस्मिन् पृथुश्रोणि चक्षुर्मम निबध्यते ॥ १५ ॥  
> भव मैथिलि भार्या मे मोहमेतं विसर्जय ।  
> बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां ममाग्रमहिषी भव ॥ १६ ॥

‘चन्द्रमाके समान मुखवाली सुमध्यमे ! मैं तुम्हारे जिस-जिस अङ्गको देखता हूँ, उसी-उसीमें मेरे नेत्र उलझ जाते हैं ॥ ‘मिथिलेशकुमारी ! तुम मेरी भार्या बन जाओ । पातिव्रत्यके इस मोहको छोड़ो । मेरे यहाँ बहुत-सी सुन्दरी रानियाँ हैं । तुम उन सबमें श्रेष्ठ पटरानी बनो ॥ १६ ॥

> लोकेभ्यो यानि रत्नानि सम्प्रमथ्याहृतानि मे ।  
> तानि ते भीरु सर्वाणि राज्यं चैव ददामि ते ॥ १७ ॥

‘भीरु ! मैं अनेक लोकोंसे उन्हें मथकर जो-जो रत्न लाया हूँ, वे सब तुम्हारे ही होंगे और यह राज्य भी मैं तुम्हींको समर्पित कर दूँगा ॥ १७ ॥

> विजित्य पृथिवीं सर्वां नानानगरमालिनीम् ।  
> जनकाय प्रदास्यामि तव हेतोर्विलासिनि ॥ १८ ॥

‘विलासिनि ! तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मैं विभिन्न नगरोंकी मालाओंसे अलंकृत इस सारी पृथ्वीको जीतकर राजा जनकके हाथमें सौंप दूँगा ॥ १८ ॥

> नेह पश्यामि लोकेऽन्यं यो मे प्रतिबलो भवेत् ।  
> पश्य मे सुमहद्वीर्यमप्रतिद्वन्द्वमाहवे ॥ १९ ॥  
> असकृत् संयुगे भग्ना मया विमृदितध्वजाः ।  
> अशक्Tाः प्रत्यनीकेषु स्थातुं मम सुरासुराः ॥ २० ॥

‘इस संसारमें मैं किसी दूसरे ऐसे पुरुषको नहीं देखता, जो मेरा सामना कर सके । तुम युद्धमें मेरा वह महान् पराक्रम देखना, जिसके सामने कोई प्रतिद्वन्द्वी टिक नहीं पाता ॥ ‘मैंने युद्धस्थलमें जिनकी ध्वजाएँ तोड़ डाली थीं, वे देवता और असुर मेरे सामने ठहरनेमें असमर्थ होनेके कारण कई बार पीठ दिखा चुके हैं ॥ २० ॥

> इच्छ मां क्रियतामद्य प्रतिकर्म तवोत्तमम् ।  
> सुप्रभाण्यवसज्जन्तां तवाङ्गे भूषणानि हि ॥ २१ ॥

‘तुम मुझे स्वीकार करो । आज तुम्हारा उत्तम शृङ्गार किया जाय और तुम्हारे अङ्गोंमें चमकीले आभूषण पहनाये जायँ ॥ २१ ॥

> साधु पश्यामि ते रूपं सुयुक्तं प्रतिकर्मणा ।  
> प्रतिकर्माभिसंयुक्ता दाक्षिण्येन वरानने ॥ २२ ॥

‘सुमुखि ! आज मैं शृङ्गारसे सुसज्जित हुए तुम्हारे सुन्दर रूपको देख रहा हूँ*। तुम उदारतावश मुझपर कृपा करके शृङ्गारसे सम्पन्न हो जाओ ॥ २२ ॥

> भुङ्क्ष्व भोगान् यथाकामं पिब भीरु रमस्व च ।  
> यथेष्टं च प्रयच्छ त्वं पृथिवीं वा धनानि च ॥ २३ ॥

‘भीरु ! फिर इच्छानुसार भाँति-भाँतिके भोग भोगो, दिव्य रसका पान करो, विहरो तथा पृथ्वी या धनका यथेष्टरूपसे दान करो ॥ २३ ॥

> लल्स्व मयि विस्रब्धा धृष्टमाज्ञापयस्व च ।  
> मत्प्रासादाल्लल्न्त्याश्च ललतां बान्धवस्तव ॥ २४ ॥

‘तुम मुझपर विश्वास करके भोग भोगनेकी इच्छा करो और निर्भय होकर मुझे अपनी सेवाके लिये आज्ञा दो । मुझपर कृपा करके इच्छानुसार भोग भोगती हुई तुम-जैसी पटरानीके भाई-बन्धु भी मनमाने भोग भोग सकते हैं ॥२४॥

> ऋद्धिं ममानुपश्य त्वं श्रियं भद्रे यशस्विनि ।  
> किं करिष्यसि रामेण सुभगे चीरवासिना ॥ २५ ॥

‘भद्रे ! यशस्विनि ! तुम मेरी समृद्धि और धन-सम्पत्तिकी ओर तो देखो । सुभगे ! चीर-वस्त्र धारण करनेवाले रामको लेकर क्या करोगी ? ॥ २५ ॥

> निक्षिप्तविजयो रामो गतश्रीर्वनगोचरः ।  
> व्रती स्थण्डिलशायी च शङ्के जीवति वा न वा ॥ २६ ॥

‘रामने विजयकी आशा त्याग दी है । वे श्रीहीन होकर वन-वनमें विचर रहे हैं, व्रतका पालन करते हैं और मिट्टी-की वेदीपर सोते हैं । अब तो मुझे यह भी संदेह होने लगा है कि वे जीवित भी हैं या नहीं ॥ २६ ॥

> नहि वैदेहि रामस्त्वां द्रष्टुं वाप्युपलभ्यते ।  
> पुरोबलाकैरसितैर्मेघैर्ज्योत्स्नामिवावृताम् ॥ २७ ॥

‘विदेहनन्दिनि ! जिनके आगे बगुलोंकी पंक्तियाँ चलती हैं, उन काले बादलोंसे छिपी हुई चन्द्रिकाके समान तुमको अब राम पाना तो दूर रहा, देख भी नहीं सकते हैं ॥ २७ ॥

> न चापि मम हस्तात् त्वां प्राप्तुमर्हति राघवः ।  
> हिरण्यकशिपुः कीर्तिमिन्द्रहस्तगतामिव ॥ २८ ॥  
> चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि ।  
> मनो हरसि मे भीरु सुपर्णः पन्नगं यथा ॥ २९ ॥

‘जैसे हिरण्यकशिपु इन्द्रके हाथमें गयी हुई कीर्तिको न पा सका, उसी प्रकार राम भी मेरे हाथसे तुम्हें नहीं पा सकते॥ ‘मनोहर मुस्कान, सुन्दर दन्तावलि तथा रमणीय नेत्रोंवाली विलासिनि ! भीरु ! जैसे गरुड़ सर्पको उठा ले जाते हैं, उसी प्रकार तुम मेरे मनको हर लेती हो ॥ २९ ॥

> क्लिष्टकौशेयवसनां तन्वीमप्यनलंकृताम् ।  
> त्वां दृष्ट्वा स्वेषु दारेषु रतिं नोपलभाम्यहम् ॥ ३० ॥

‘तुम्हारा रेशमी पीताम्बर मैला हो गया है । तुम बहुत दुबली-पतली हो गयी हो और तुम्हारे अङ्गोंमें आभूषण भी नहीं हैं तो भी तुम्हें देखकर अपनी दूसरी स्त्रियोंमें मेरा मन नहीं लगता ॥ ३० ॥

> अन्तःपुरनिवासिन्यः स्त्रियः सर्वगुणान्विताः ।  
> यावत्यो मम सर्वासामैश्वर्यं कुरु जानकि ॥ ३१ ॥

‘जनकनन्दिनि ! मेरे अन्तःपुरमें निवास करनेवाली जितनी भी सर्वगुणसम्पन्न रानियाँ हैं, उन सबकी तुम स्वामिनी बन जाओ ॥ ३१ ॥

> मम ह्यसितकेशान्ते त्रैलोक्यप्रवरस्त्रियः ।  
> तास्त्वां परिचरिष्यन्ति श्रियमप्सरसो यथा ॥ ३२ ॥

‘काले केशोंवाली सुन्दरी ! जैसे अप्सराएँ लक्ष्मीकी सेवा करती हैं, उसी प्रकार त्रिभुवनकी श्रेष्ठ सुन्दरियाँ यहाँ तुम्हारी परिचर्या करेंगी ॥ ३२ ॥

> यानि वैश्रवणे सुभ्रु रत्नानि च धनानि च ।  
> तानि लोकांश्च सुश्रोणि मया भुङ्क्ष्व यथासुखम् ।३३।

‘सुभ्रु ! सुश्रोणि ! कुबेरके यहाँ जितने भी अच्छे रत्न और धन हैं, उन सबका तथा सम्पूर्ण लोकोंका तुम मेरे साथ सुखपूर्वक उपभोग करो ॥ ३३ ॥

> न रामस्तपसा देवि न बलेन च विक्रमैः ।  
> न धनेन मया तुल्यस्तेजसा यशसापि वा ॥ ३४ ॥

‘देवि ! राम तो न तपसे, न बलसे, न पराक्रमसे, न धनसे और न तेज अथवा यशके द्वारा ही मेरी समानता कर सकते हैं ॥ ३४ ॥

> पिब विहर रमस्व भुङ्क्ष्व भोगान्  
> धननिचयं प्रदिशामि मेदिनीं च ।  
> मयि लल ललने यथासुखं त्वं  
> त्वयि च समेत्य ललन्तु बान्धवास्ते ॥३५॥

‘तुम दिव्य रसका पान, विहार एवं रमण करो तथा अभीष्ट भोग भोगो । मैं तुम्हें धनकी राशि और सारी पृथ्वी भी समर्पित किये देता हूँ । ललने ! तुम मेरे पास रहकर मौजसे मनचाही वस्तुएँ ग्रहण करो और तुम्हारे निकट आकर तुम्हारे भाई-बन्धु भी सुखपूर्वक इच्छानुसार भोग आदि प्राप्त करें ॥ ३५ ॥

> कुसुमिततरुजालसंततानि  
> भ्रमरयुतानि समुद्रतीरजानि ।  
> कनकविमलहारभूषिताङ्गी  
> विहर मया सह भीरु काननानि ॥ ३६ ॥

‘भीरु ! तुम सोनेके निर्मल हारोंसे अपने अङ्गको विभूषित करके मेरे साथ समुद्र-तटवर्ती उन काननोंमें विहार करो, जिनमें खिले हुए वृक्षोंके समुदाय सब ओर फैले हुए हैं और उनपर भ्रमर मँड़रा रहे हैं’ ॥ ३६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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