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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 2"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 2

> स सागरमनाधृष्यमतिक्रम्य महाबलः ।  
> त्रिकूटस्य तटे लङ्कां स्थितः स्वस्थो ददर्श ह ॥ १ ॥

महाबली हनुमान्जी अलङ्घनीय समुद्रको पार करके त्रिकूट ( लम्ब ) नामक पर्वतके शिखरपर स्वस्थ भावसे खड़े हो लङ्कापुरीकी शोभा देखने लगे ॥ १ ॥

> ततः पादपमुकेन पुष्पवर्षेण वीर्यवान् ।  
> अभिवृष्टस्ततस्तत्र बभौ पुष्पमयो हरिः ॥ २ ॥

उस समय उनके ऊपर वहाँ वृक्षोंसे झड़े हुए फूलोंकी वर्षा होने लगी । इससे वहाँ बैठे हुए पराक्रमी हनुमान् फूलके बने हुए वानरके समान प्रतीत होने लगे ॥ २ ॥

> योजनानां शतं श्रीमांस्तीर्त्वाप्युत्तमविक्रमः ।  
> अनिःश्वसन् कपिस्तत्र न ग्लानिमधिगच्छति ॥ ३ ॥

उत्तम पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लंबी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानिका ही अनुभव करते थे ॥ ३ ॥

> शतान्यहं योजनानां क्रमेयं सुबहून्यपि ।  
> किं पुनः सागरस्यान्तं संख्यातं शतयोजनम् ॥ ४ ॥

उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ-सौ योजनोंके बहुत-से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने-गिनाये सौ योजन समुद्रको पार करना कौन बड़ी बात है ? ॥ ४ ॥

> स तु वीर्यवतां श्रेष्ठः प्लवतामपि चोत्तमः ।  
> जगाम वेगवाॅंल्लङ्कां लङ्घयित्वा महोदधिम् ॥ ५ ॥

बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा वानरोंमें उत्तम वे वेगवान् पवनकुमार महासागरको लाँघकर शीघ्र ही लङ्कामें जा पहुँचे ॥५॥

> शाद्वलानि च नीलानि गन्धवन्ति वनानि च ।  
> मधुमन्ति च मध्येन जगाम नगवन्ति च ॥ ६ ॥

रास्तेमें हरी-हरी दूब और वृक्षोंसे भरे हुए मकरन्द-पूर्ण सुगन्धित वन देखते हुए वे मध्यमार्गसे जा रहे थे ॥६॥

> शैलांश्च तरुसंछन्नान् वनराजीश्च पुष्पिताः ।  
> अभिचक्राम तेजस्वी हनूमान् प्लवगर्षभः ॥ ७ ॥

तेजस्वी वानरशिरोमणि हनुमान् वृक्षोंसे आच्छादित पर्वतों और फूलोंसे भरी हुई वन-श्रेणियोंमें विचरने लगे ॥ ७ ॥

> स तस्मिन्नचले तिष्ठन् वनान्युपवनानि च ।  
> स नगाग्रे स्थितां लङ्कां ददर्श पवनात्मजः ॥ ८ ॥

उस पर्वतपर स्थित हो पवनपुत्र हनुमान्ने बहुत-से वन और उपवन देखे तथा उस पर्वतके अग्रभागमें बसी हुई लङ्काका भी अवलोकन किया ॥ ८ ॥

> सरलान् कर्णिकारांश्च खर्जूरांश्च सुपुष्पितान् ।  
> प्रियालान् मुचुलिन्दांश्च कुटजान् केतकानपि ॥ ९ ॥  
> प्रियङ्गून् गन्धपूर्णांश्च नीपान् सप्तच्छदांस्तथा ।  
> असनान् कोविदारांश्च करवीरांश्च पुष्पितान् ॥ १० ॥  
> पुष्पभारनिबद्धांश्च तथा मुकुलितानपि ।  
> पादपान् विहगाकीर्णान् पवनाधूतमस्तकान् ॥ ११ ॥

उन कपिश्रेष्ठने वहाँ सरल ( चीड़ ), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल ( चिरौंजी), मुचुलिन्द ( जम्बीरी नीबू ), कुटज, केतक ( केवड़े ), सुगन्धपूर्ण प्रियङ्गु ( पिप्पली ), नीप ( कदम्ब या अशोक ), छितवन, असन, कोविदार तथा खिले हुए करवीर भी देखे । फूलोंके भारसे लदे हुए तथा मुकुलित ( अधखिले ) बहुत-से वृक्ष उन्हें दृष्टिगोचर हुए, जिनमें पक्षी भरे हुए थे और हवाके झोंकेसे जिनकी डालियाँ झूम रही थीं ॥ ९—११ ॥

> हंसकारण्डवाकीर्णा वापीः पद्मोत्पलावृताः ।  
> आक्रीडान् विविधान् रम्यान् विविधांश्च जलाशयान् ॥

हंसों और कारण्डवोंसे व्याप्त तथा कमल और उत्पलसे आच्छादित हुई बहुत-सी बावड़ियाँ, भाँति-भाँतिके रमणीय क्रीड़ास्थान तथा नाना प्रकारके जलाशय उनके दृष्टिपथमें आये ॥ १२ ॥

> संततान् विविधैर्वृक्षैः सर्वर्तुफलपुष्पितैः ।  
> उद्यानानि च रम्याणि ददर्श कपिकुञ्जरः ॥ १३ ॥

उन जलाशयोंके चारो ओर सभी ऋतुओंमें फल-फूल देनेवाले अनेक प्रकारके वृक्ष फैले हुए थे । उन वानरशिरोमणिने वहाँ बहुत-से रमणीय उद्यान भी देखे ॥ १३ ॥

> समासाद्य च लक्ष्मीवाँल्लङ्कां रावणपालिताम् ।  
> परिखाभिः सपद्माभिः सोत्पलाभिरलंकृताम् ॥ १४ ॥  
> सीतापहरणात् तेन रावणेन सुरक्षिताम् ।  
> समन्ताद् विचरद्भिश्च राक्षसैरुग्रधन्वभिः ॥ १५ ॥

अद्भुत शोभासे सम्पन्न हनुमान्जी धीरे-धीरे रावण पालित लङ्कापुरीके पास पहुँचे । उसके चारों ओर खुदी हुई खाइयाँ उस नगरीकी शोभा बढ़ा रही थीं । उनमें उत्पल और पद्म आदि कई जातियोंके कमल खिले थे । सीताको हर लानेके कारण रावणने लङ्कापुरीकी रक्षाका विशेष प्रबन्ध कर रक्खा था । उसके चारों ओर भयंकर धनुष धारण करनेवाले राक्षस घूमते रहते थे ॥ १४-१५ ॥

> काञ्चनेनावृतां रम्यां प्राकारेण महापुरीम् ।  
> गृहैश्च गिरिसंकाशैः शारदाम्बुदसंनिभैः ॥ १६ ॥

वह महापुरी सोनेकी चहारदीवारीसे घिरी हुई थी तथा पर्वतके समान ऊँचे और शरद्-ऋतुके बादलोंके समान श्वेत भवनोंसे भरी हुई थी ॥ १६ ॥

> पाण्डुराभिः प्रतोलीभिरुच्चाभिरभिसंवृताम् ।  
> अट्टालकशताकीर्णां पताकाध्वजशोभिताम् ॥ १७ ॥

श्वेत रंगकी ऊँची-ऊँची सड़कें उस पुरीको सब ओरसे घेरे हुए थीं । सैकड़ों अट्टालिकाएँ वहाँ शोभा पा रही थीं तथा फहराती हुई ध्वजा-पताकाएँ उस नगरीकी शोभा बढ़ा रही थीं ॥ १७ ॥

> तोरणैः काञ्चनैर्दिव्यैर्लतापङ्क्तिविराजितैः ।  
> ददर्श हनुमाँल्लङ्कां देवो देवपुरीमिव ॥ १८ ॥

उसके बाहरी फाटक सोनेके बने हुए थे और उनकी दीवारें लता-बेलोंके चित्रसे सुशोभित थीं । हनुमान्जीने उन फाटकोंसे सुशोभित लङ्काको उसी प्रकार देखा, जैसे कोई देवता देवपुरीका निरीक्षण कर रहा हो ॥ १८ ॥

> गिरिमूर्ध्नि स्थितां लङ्कां पाण्डुरैर्भवनैः शुभैः ।  
> ददर्श स कपिः श्रीमान् पुरीमाकाशगामिव ॥ १९ ॥

तेजस्वी कपि हनुमान्ने सुन्दर शुभ्र सदनोंसे सुशोभित और पर्वतके शिखरपर स्थित लङ्काको इस तरह देखा, मानो वह आकाशमें विचरनेवाली नगरी हो ॥ १९ ॥

> पालितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां विश्वकर्मणा ।  
> प्लवमानामिवाकाशे ददर्श हनुमान् कपिः ॥ २० ॥

कपिवर हनुमान्ने विश्वकर्माद्वारा निर्मित तथा राक्षसराज रावणद्वारा सुरक्षित उस पुरीको आकाशमें तैरती-सी देखा ॥ २० ॥

> वप्रप्राकारजघनां विपुलाम्बुवनाम्बराम् ।  
> शतघ्नीशूलकेशान्तामट्टालकावतंसकाम् ॥ २१ ॥  
> मनसेव कृतां लङ्कां निर्मितां विश्वकर्मणा ।

विश्वकर्माकी बनायी हुई लङ्का मानो उनके मानसिक संकल्पसे रची गयी एक सुन्दरी स्त्री थी । चहारदीवारी और उसके भीतरकी वेदी उसकी जघनस्थली जान पड़ती थीं, समुद्रका विशाल जलराशि और वन उसके वस्त्र थे, शतघ्नी और शूल नामक अस्त्र ही उसके केश थे और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ उसके लिये कर्णभूषण-सी प्रतीत हो रही थीं ॥ २१½ ॥

> द्वारमुत्तरमासाद्य चिन्तयामास वानरः ॥ २२ ॥  
> कैलासनिलयप्रख्यमालिखन्तमिवाम्बरम् ।  
> ध्रियमाणमिवाकाशमुच्छ्रितैर्भवनोत्तमैः ॥ २३ ॥

उस पुरीके उत्तर द्वारपर पहुँचकर वानरवीर हनुमान्जी चिन्तामें पड़ गये । वह द्वार कैलास पर्वतपर बसी हुई अलकापुरीके बहिर्द्वारके समान ऊँचा था और आकाशमें रेखा-सी खींचता जान पड़ता था । ऐसा जान पड़ता था मानो अपने ऊँचे-ऊँचे प्रासादोंपर आकाशको उठा रक्खा है ॥ २२-२३ ॥

> सम्पूर्णां राक्षसैर्घोरैर्नागैर्भोगवतीमिव ।  
> अचिन्त्यां सुकृतां स्पष्टां कुबेराध्युषितां पुरा ॥ २४ ॥  
> दंष्ट्राभिर्बहुभिः शूरैः शूलपट्टिशपाणिभिः ।  
> रक्षितां राक्षसैर्घोरैर्गुहामाशीविषैरिव ॥ २५ ॥

लङ्कापुरी भयानक राक्षसोंसे उसी तरह भरी थी, जैसे पातालकी भोगवतीपुरी नागोंसे भरी रहती है । उसकी निर्माणकला अचिन्त्य थी । उसकी रचना सुन्दर ढंगसे की गयी थी । वह हनुमान्जीको स्पष्ट दिखायी देती थी । पूर्वकालमें साक्षात् कुबेर वहाँ निवास करते थे । हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले बहुत-से शूरवीर घोर राक्षस लङ्कापुरीकी उसी प्रकार रक्षा करते थे, जैसे विषधर सर्प अपनी पुरीकी करते हैं ॥ २४-२५ ॥

> तस्याश्च महतीं गुप्तिं सागरं च निरीक्ष्य सः ।  
> रावणं च रिपुं घोरं चिन्तयामास वानरः ॥ २६ ॥

उस नगरकी बड़ी भारी चौकसी, उसके चारों ओर समुद्रकी खाई तथा रावण-जैसे भयंकर शत्रुको देखकर हनुमान्जी इस प्रकार विचारने लगे—॥ २६ ॥

> आगत्यापीह हरयो भविष्यन्ति निरर्थकाः ।  
> नहि युद्धेन वै लङ्का शक्या जेतुं सुरैरपि ॥ २७ ॥

‘यदि वानर यहाँतक आ जायँ तो भी वे व्यर्थ ही सिद्ध होंगे; क्योंकि युद्धके द्वारा देवता भी लङ्कापर विजय नहीं पा सकते ॥ २७ ॥

> इमां त्वविषमां लङ्कां दुर्गां रावणपालिताम् ।  
> प्राप्यापि सुमहाबाहुः किं करिष्यति राघवः ॥ २८ ॥

‘जिससे बढ़कर विषम ( संकटपूर्ण ) स्थान और कोई नहीं है, उस रावणपालित इस दुर्गम लङ्कामें आकर महाबाहु श्रीरघुनाथजी भी क्या करेंगे ? ॥ २८ ॥

> अवकाशो न साम्नस्तु राक्षसेष्वभिगम्यते ।  
> न दानस्य न भेदस्य नैव युद्धस्य दृश्यते ॥ २९ ॥

‘राक्षसोंपर सामनीतिके प्रयोगके लिये तो कोई गुंजाइश ही नहीं है । इनपर दान, भेद और युद्ध ( दण्ड ) नीतिका प्रयोग भी सफल होता नहीं दिखायी देता ॥ २९ ॥

> चतुर्णामेव हि गतिर्वानराणां तरस्विनाम् ।  
> वालिपुत्रस्य नीलस्य मम राज्ञश्च धीमतः ॥ ३० ॥

‘यहाँ चार ही वेगशाली वानरोंकी पहुँच हो सकती है—वालिपुत्र अङ्गदकी, नीलकी, मेरी और बुद्धिमान् राजा सुग्रीवकी ॥ ३० ॥

> यावज्ज्ञानामि वैदेहीं यदि जीवति वा न वा ।  
> तत्रैव चिन्तयिष्यामि दृष्ट्वा तां जनकात्मजाम् ॥ ३१ ॥

‘अच्छा, पहले यह तो पता लगाऊँ कि विदेहकुमारी सीता जीवित हैं या नहीं । जनककिशोरीका दर्शन करनेके पश्चात् ही मैं इस विषयमें कोई विचार करूँगा’ ॥ ३१ ॥

> ततः स चिन्तयामास मुहूर्तं कपिकुञ्जरः ।  
> गिरेः शृङ्गे स्थितस्तस्मिन् रामस्याभ्युदयं ततः ॥ ३२ ॥

तदनन्तर उस पर्वतशिखरपर खड़े हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदयके लिये सीताजीका पता लगानेके उपायपर दो घड़ीतक विचार करते रहे ॥ ३२ ॥

> अनेन रूपेण मया न शक्या रक्षसां पुरी ।  
> प्रवेष्टुं राक्षसैर्गुप्ता क्रूरैर्बलसमन्वितैः ॥ ३३ ॥

उन्होंने सोचा—‘मैं इस रूपसे राक्षसोंकी इस नगरीमें प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि बहुत-से क्रूर और बलवान् राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं ॥ ३३ ॥

> महौजसो महावीर्या बलवन्तश्च राक्षसाः ।  
> वञ्चनीया मया सर्वे जानकीं परिमार्गता ॥ ३४ ॥

‘जानकीकी खोज करते समय मुझे अपनेको छिपानेके लिये यहाँके सभी महातेजस्वी महापराक्रमी और बलवान् राक्षसोंसे आँख बचानी होगी ॥ ३४ ॥

> लक्ष्यालक्ष्येण रूपेण रात्रौ लङ्कापुरी मया ।  
> प्राप्तकालं प्रवेष्टुं मे कृत्यं साधयितुं महत् ॥ ३५ ॥

‘अतः मुझे रात्रिके समय ही नगरमें प्रवेश करना चाहिये और सीताका अन्वेषणरूप यह महान् समयोचित कार्य सिद्ध करनेके लिये ऐसे रूपका आश्रय लेना चाहिये, जो आँखसे देखा न जा सके । केवल कार्यसे यह अनुमान हो कि कोई आया था’ ॥ ३५ ॥

> तां पुरीं तादृशीं दृष्ट्वा दुराधर्षां सुरासुरैः ।  
> हनूमांश्चिन्तयामास विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः ॥ ३६ ॥

देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय वैसी लङ्कापुरीको देखकर हनुमान्जी बारंबार लंबी साँस खींचते हुए यों विचार करने लगे—॥ ३६ ॥

> केनोपायेन पश्येयं मैथिलीं जनकात्मजाम् ।  
> अदृष्टो राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ॥ ३७ ॥

‘किस उपायसे काम लूँ, जिससे दुरात्मा राक्षसराज रावणकी दृष्टिसे ओझल रहकर मैं मिथिलेशनन्दिनी जनककिशोरी सीताका दर्शन प्राप्त कर सकूँ ॥ ३७ ॥

> न विनश्येत् कथं कार्यं रामस्य विदितात्मनः ।  
> एकामेकस्तु पश्येयं रहिते जनकात्मजाम् ॥ ३८ ॥

‘किस रीतिसे कार्य किया जाय, जिससे जगद्विख्यात श्रीरामचन्द्रजीका काम भी न बिगड़े और मैं एकान्तमें अकेली जानकीजीसे भेंट भी कर लूँ ॥ ३८ ॥

> भूताश्चार्था विनश्यन्ति देशकालविरोधिताः ।  
> विक्लवं दूतमासाद्य तमः सूर्योदये यथा ॥ ३९ ॥

‘कई बार कातर अथवा अविवेकपूर्ण कार्य करनेवाले दूतके हाथमें पड़कर देश और कालके विपरीत व्यवहार होनेके कारण बने-बनाये काम भी उसी तरह बिगड़ जाते हैं, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है ॥ ३९ ॥

> अर्थानर्थान्तरे बुद्धिर्निश्चितापि न शोभते ।  
> घातयन्तीह कार्याणि दूताः पण्डितमानिनः ॥ ४० ॥

‘राजा और मन्त्रियोंके द्वारा निश्चित किया हुआ कर्तव्याकर्तव्यविषयक विचार भी किसी अविवेकी दूतका आश्रय लेनेसे शोभा ( सफलता ) नहीं पाता है । अपनेको पण्डित माननेवाले अविवेकी दूत सारा काम ही चौपट कर देते हैं ॥ ४० ॥

> न विनश्येत् कथं कार्यं वैक्लव्यं न कथं भवेत् ।  
> लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न भवेद् वृथा ॥ ४१ ॥

‘अच्छा तो किस उपायका अवलम्बन करनेसे स्वामीका कार्य नहीं बिगड़ेगा, मुझे घबराहट या अविवेक नहीं होगा और मेरा यह समुद्रका लाँघना भी व्यर्थ नहीं होने पायेगा ॥ ४१ ॥

> मयि दृष्टे तु रक्षोभी रामस्य विदितात्मनः ।  
> भवेद् व्यर्थमिदं कार्यं रावणानर्थमिच्छतः ॥ ४२ ॥

‘यदि राक्षसोंने मुझे देख लिया तो रावणका अनर्थ चाहनेवाले उन विख्यातनामा भगवान् श्रीरामका यह कार्य सफल न हो सकेगा ॥ ४२ ॥

> नहि शक्यं क्वचित् स्थातुमविज्ञातेन राक्षसैः ।  
> अपि राक्षसरूपेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ४३ ॥

‘यहाँ दूसरे किसी रूपकी तो बात ही क्या है, राक्षसका रूप धारण करके भी राक्षसोंसे अज्ञात रहकर कहीं ठहरना असम्भव है ॥ ४३ ॥

> वायुरप्यत्र नाज्ञातश्चरेदिति मतिर्मम ।  
> नह्यत्राविदितं किंचिद् रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥ ४४ ॥

‘मेरा तो ऐसा विश्वास है कि राक्षसोंसे छिपे रहकर वायुदेव भी इस पुरीमें विचरण नहीं कर सकते । यहाँ कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जो इन भयंकर कर्म करनेवाले राक्षसोंको ज्ञात न हो ॥ ४४ ॥

> इहाहं यदि तिष्ठामि स्वेन रूपेण संवृतः ।  
> विनाशमुपयास्यामि भर्तुरर्थश्च हास्यति ॥ ४५ ॥

‘यदि यहाँ मैं अपने इस रूपसे छिपकर भी रहूँगा तो मारा जाऊँगा और मेरे स्वामीके कार्यमें भी हानि पहुँचेगी ॥ ४५ ॥

> तदहं स्वेन रूपेण रजन्यां ह्रस्वतां गतः ।  
> लङ्कामभिपतिष्यामि राघवस्यार्थसिद्धये ॥ ४६ ॥

‘अतः मैं श्रीरघुनाथजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये रातमें अपने इसी रूपसे छोटा-सा शरीर धारण करके लङ्कामें प्रवेश करूँगा ॥ ४६ ॥

> रावणस्य पुरीं रात्रौ प्रविश्य सुदुरासदाम् ।  
> प्रविश्य भवनं सर्वं द्रक्ष्यामि जनकात्मजाम् ॥ ४७ ॥

‘यद्यपि रावणकी इस पुरीमें जाना बहुत ही कठिन है तथापि रातको इसके भीतर प्रवेश करके सभी घरोंमें घुसकर मैं जानकीजीकी खोज करूँगा’ ॥ ४७ ॥

> इति निश्चित्य हनुमान् सूर्यस्यास्तमयं कपिः ।  
> आचकाङ्क्ष तदा वीरो वैदेह्या दर्शनोत्सुकः ॥ ४८ ॥

ऐसा निश्चय करके वीर वानर हनुमान् विदेहनन्दिनीके दर्शनके लिये उत्सुक हो उस समय सूर्यास्तकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ ४८ ॥

> सूर्ये चास्तं गते रात्रौ देहं संक्षिप्य मारुतिः ।  
> वृषदंशकमात्रोऽथ बभूवाद्भुतदर्शनः ॥ ४९ ॥

सूर्यास्त हो जानेपर रातके समय उन पवनकुमारने अपने शरीरको छोटा बना लिया । वे बिल्लीके बराबर होकर अत्यन्त अद्भुत दिखायी देने लगे ॥ ४९ ॥

> प्रदोषकाले हनुमांस्तूर्णमुत्पत्य वीर्यवान् ।  
> प्रविवेश पुरीं रम्यां प्रविभक्तमहापथाम् ॥ ५० ॥

प्रदोषकालमें पराक्रमी हनुमान् तुरंत ही उछलकर उस रमणीय पुरीमें घुस गये । वह नगरी पृथक्-पृथक् बने हुए चौड़े और विशाल राजमार्गोंसे सुशोभित थी ॥ ५० ॥

> प्रासादमालाविततां स्तम्भैः काञ्चनसंनिभैः ।  
> शातकुम्भनिभैर्जालैर्गन्धर्वनगरोपमाम् ॥ ५१ ॥  
> सप्तभौमाष्टभौमैश्च स ददर्श महापुरीम् ।  
> तलैः स्फाटिकसंकीर्णैः कार्तस्वरविभूषितैः ॥ ५२ ॥  
> वैदूर्यमणिचित्रैश्च मुक्ताजालविभूषितैः ।  
> तैस्तैः शुशुभिरे तानि भवनान्यत्र रक्षसाम् ॥ ५३ ॥

उसमें प्रासादोंकी लंबी पंक्तियाँ दूरतक फैली हुई थीं । सुनहरे रंगके खम्भों और सोनेकी जालियोंसे विभूषित वह नगरी गन्धर्वनगरके समान रमणीय प्रतीत होती थी ॥ हनुमान्जीने उस विशाल पुरीको सतमहले, अठमहले मकानों और सुवर्णजटित स्फटिक मणिकी फर्शोंसे सुशोभित देखा । उनमें वैदूर्य ( नीलम ) भी जड़े गये थे, जिससे उनकी विचित्र शोभा होती थी । मोतियोंकी जालियाँ भी उन महलोंकी शोभा बढ़ाती थीं । उन सबके कारण राक्षसोंके वे भवन बड़ी सुन्दर शोभासे सम्पन्न हो रहे थे ॥ ५२-५३ ॥

> काञ्चनानि विचित्राणि तोरणानि च रक्षसाम् ।  
> लङ्कामुद्योतयामासुः सर्वतः समलंकृताम् ॥ ५४ ॥

सोनेके बने हुए विचित्र फाटक सब ओरसे सजी हुई राक्षसोंकी उस लङ्काको और भी उद्दीप्त कर रहे थे ॥ ५४ ॥

> अचिन्त्यामद्भुताकारां दृष्ट्वा लङ्कां महाकपिः ।  
> आसीद् विषण्णो हृष्टश्च वैदेह्या दर्शनोत्सुकः ॥५५॥

ऐसी अचिन्त्य और अद्भुत आकारवाली लङ्काको देखकर महाकपि हनुमान् विषादमें पड़ गये; परंतु जानकीजीके दर्शनके लिये उनके मनमें बड़ी उत्कण्ठा थी, इसलिये उनका हर्ष और उत्साह भी कम नहीं हुआ ॥ ५५ ॥

> स पाण्डुराविद्धविमानमालिनीं  
> महार्हजाम्बूनदजालतोरणाम् ।  
> यशस्विनीं रावणबाहुपालितां  
> क्षपाचरैर्भीमबलैः सुपालिताम् ॥ ५६ ॥

परस्पर सटे हुए श्वेतवर्णके सतमंजिले महलोंकी पंक्तियाँ लङ्कापुरीकी शोभा बढ़ा रही थीं । बहुमूल्य जाम्बूनद नामक सुवर्णकी जालियों और वन्दनवारोंसे वहाँके घरोंको सजाया गया था । भयंकर बलशाली निशाचर उस पुरीकी अच्छी तरह रक्षा करते थे । रावणके बाहुबलसे भी वह सुरक्षित थी । उसके यशकी ख्याति सुदूरतक फैली हुई थी । ऐसी लङ्कापुरीमें हनुमान्जीने प्रवेश किया ॥ ५६ ॥

> चन्द्रोऽपि साचिव्यमिवास्य कुर्वं-  
> स्तारागणैर्मध्यगतो विराजन् ।  
> ज्योत्स्नावितानेन वितत्य लोका-  
> नुत्तिष्ठतेऽनेकसहस्ररश्मिः ॥ ५७ ॥

उस समय तारागणोंके साथ उनके बीचमें विराजमान अनेक सहस्र किरणोंवाले चन्द्रदेव भी हनुमान्जीकी सहायता-सी करते हुए समस्त लोकोंपर अपनी चाँदनीका चँदोवा-सा तानकर उदित हो गये ॥ ५७ ॥

> शङ्खप्रभं क्षीरमृणालवर्ण-  
> मुद्गच्छमानं व्यवभासमानम् ।  
> ददर्श चन्द्रं स कपिप्रवीरः  
> पोप्लूयमानं सरसीव हंसम् ॥ ५८ ॥

वानरोंके प्रमुख वीर श्रीहनुमान्जीने शङ्खकी-सी कान्ति तथा दूध और मृणालके-से वर्णवाले चन्द्रमाको आकाशमें इस प्रकार उदित एवं प्रकाशित होते देखा, मानो किसी सरोवरमें कोई हंस तैर रहा हो ॥ ५८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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