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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 18"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 18

> तथा विप्रेक्षमाणस्य वनं पुष्पितपादपम् ।  
> विचिन्वतश्च वैदेहीं किंचिच्छेषा निशाभवत् ॥ १ ॥

इस प्रकार फूले हुए वृक्षोंसे सुशोभित उस वनकी शोभा देखते और विदेहनन्दिनीका अनुसंधान करते हुए हनुमान्जीकी वह सारी रात प्रायः बीत चली । केवल एक पहर रात बाकी रही ॥ १ ॥

> षडङ्गवेदविदुषां क्रतुप्रवरयाजिनाम् ।  
> शुश्राव ब्रह्मघोषान् स विरात्रे ब्रह्मरक्षसाम् ॥ २ ॥  
> अथ मङ्गलवादित्रैः शब्दैः श्रोत्रमनोहरैः ।  
> प्राबोध्यत महाबाहुर्दशग्रीवो महाबलः ॥ ३ ॥

रातके उस पिछले पहरमें छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् तथा श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा यजन करनेवाले ब्रह्म-राक्षसोंके घरमें वेदपाठकी ध्वनि होने लगी, जिसे हनुमान्जीने सुना ॥ तदनन्तर मङ्गल वाद्यों तथा श्रवण-सुखद शब्दोंद्वारा महाबली महाबाहु दशमुख रावणको जगाया गया ॥ ३ ॥

> विबुध्य तु महाभागो राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।  
> स्रस्तमाल्याम्बरधरो वैदेहीमन्वचिन्तयत् ॥ ४ ॥

जागनेपर महान् भाग्यशाली एवं प्रतापी राक्षसराज रावणने सबसे पहले विदेहनन्दिनी सीताका चिन्तन किया । उस समय नींदके कारण उसके पुष्पहार और वस्त्र अपने स्थानसे खिसक गये थे ॥ ४ ॥

> भृशं नियुक्तस्तस्यां च मदनेन मदोत्कटः ।  
> न तु तं राक्षसः कामं शशाकात्मनि गूहितुम् ॥ ५ ॥

वह मदमत्त निशाचर कामसे प्रेरित हो सीताके प्रति अत्यन्त आसक्त हो गया था । अतः उस कामभावको अपने भीतर छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गया ॥ ५ ॥

> स सर्वाभरणैर्युक्तो बिभ्रच्छ्रियमनुत्तमाम् ।  
> तां नगैर्विविधैर्जुष्टां सर्वपुष्पफलोपगैः ॥ ६ ॥  
> वृतां पुष्करिणीभिश्च नानापुष्पोपशोभिताम् ।  
> सदा मत्तैश्च विहगैर्विचित्रां परमाद्भुतैः ॥ ७ ॥  
> ईहामृगैश्च विविधैर्वृतां दृष्टिमनोहरैः ।  
> वीथीः सम्प्रेक्षमाणश्च मणिकाञ्चनतोरणाम् ॥ ८ ॥  
> नानामृगगणाकीर्णां फलैः प्रपतितैर्वृताम् ।  
> अशोकवनिकामेव प्राविशत् संततद्रुमाम् ॥ ९ ॥

उसने सब प्रकारके आभूषण धारण किये और परम उत्तम शोभासे सम्पन्न हो उस अशोकवाटिकामें ही प्रवेश किया, जो सब प्रकारके फूल और फल देनेवाले भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे सुशोभित थी । नाना प्रकारके पुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । बहुत-से सरोवरोंद्वारा वह वाटिका घिरी हुई थी । सदा मतवाले रहनेवाले परम अद्भुत पक्षियोंके कारण उसकी विचित्र शोभा होती थी । कितने ही नयनाभिराम क्रीडामृगोंसे भरी हुई वह वाटिका भाँति-भाँतिके मृगसमूहोंसे व्याप्त थी । बहुत-से गिरे हुए फलोंके कारण वहाँकी भूमि ढक गयी थी । पुष्पवाटिकामें मणि और सुवर्णके फाटक लगे थे और उसके भीतर पंक्तिबद्ध वृक्ष बहुत दूरतक फैले हुए थे । वहाँकी गलियोंको देखता हुआ रावण उस वाटिकामें घुसा ॥ ६-९ ॥

> अङ्गनाः शतमात्रं तु तं व्रजन्तमनुव्रजन् ।  
> महेन्द्रमिव पौलस्त्यं देवगन्धर्वयोषितः ॥ १० ॥

जैसे देवताओं और गन्धर्वोंकी स्त्रियाँ देवराज इन्द्रके पीछे चलती हैं, उसी प्रकार अशोकवनमें जाते हुए पुलस्त्यनन्दन रावणके पीछे-पीछे लगभग एक सौ सुन्दरियाँ गयीं ॥ १० ॥

> दीपिकाः काञ्चनीः काश्चिज्जगृहुस्तत्र योषितः ।  
> वालव्यजनहस्ताश्च तालवृन्तानि चापराः ॥ ११ ॥

उन युवतियोंमेंसे किन्हींने सुवर्णमय दीपक ले रक्खे थे । किन्हींके हाथोंमें चँवर थे तो किन्हींके हाथोंमें ताड़के पंखे ॥ ११ ॥

> काञ्चनैश्चैव भृङ्गारैर्जह्नुः सलिलमग्रतः ।  
> मण्डलाग्रा बृसीश्चैव गृह्यान्याः पृष्ठतो ययुः ॥ १२ ॥

कुछ सुन्दरियाँ सोनेकी झारियोंमें जल लिये आगे-आगे चल रही थीं और कई दूसरी स्त्रियाँ गोलाकार बृसी नामक आसन लिये पीछे-पीछे जा रही थीं ॥ १२ ॥

> काचिद् रत्नमयीं पात्रीं पूर्णां पानस्य भ्राजतीम् ।  
> दक्षिणा दक्षिणेनैव तदा जग्राह पाणिना ॥ १३ ॥

कोई चतुर-चालाक युवती दाहिने हाथमें पेयरससे भरी हुई रत्ननिर्मित चमचमाती कलशी लिये हुए थी ॥ १३ ॥

> राजहंसप्रतीकाशं छत्रं पूर्णशशिप्रभम् ।  
> सौवर्णदण्डमपरा गृहीत्वा पृष्ठतो ययौ ॥ १४ ॥

कोई दूसरी स्त्री सोनेके डंडेसे युक्त और पूर्ण चन्द्रमा तथा राजहंसके समान श्वेत छत्र लेकर रावणके पीछे-पीछे चल रही थी ॥ १४ ॥

> निद्रामदपरीताक्ष्यो रावणस्योत्तमस्त्रियः ।  
> अनुजग्मुः पतिं वीरं घनं विद्युल्लता इव ॥ १५ ॥

जैसे बादलके साथ-साथ बिजलियाँ चलती हैं, उसी प्रकार रावणकी सुन्दरी स्त्रियाँ अपने वीर पतिके पीछे-पीछे जा रही थीं । उस समय नींदके नशेमें उनकी आँखें झपी जाती थीं ॥ १५ ॥

> व्याविद्धहारकेयूराः समामृदितवर्णकाः ।  
> समागलितकेशान्ताः सस्वेदवदनास्तथा ॥ १६ ॥

उनके हार और बाजूबंद अपने स्थानसे खिसक गये थे । अङ्गराग मिट गये थे । चोटियाँ खुल गयी थीं और मुखपर पसीनेकी बूँदें छा रही थीं ॥ १६ ॥

> घूर्णन्त्यो मदशेषेण निद्रया च शुभाननाः ।  
> स्वेदक्लिष्टाङ्गकुसुमाः समाल्याकुलमूर्धजाः ॥ १७ ॥

वे सुमुखी स्त्रियाँ अवशेष मद और निद्रासे झूमती हुई-सी चल रही थीं । विभिन्न अङ्गोंमें धारण किये गये पुष्प पसीनेसे भींग गये थे और पुष्पमालाओंसे अलंकृत केश कुछ-कुछ हिल रहे थे ॥ १७ ॥

> प्रयान्तं नैर्ऋतपतिं नार्यो मदिरलोचनाः ।  
> बहुमानाच्च कामाच्च प्रियभार्यास्तमन्वयुः ॥ १८ ॥

जिनकी आँखें मदमत्त बना देनेवाली थीं, वे राक्षसराजकी प्यारी पत्नियाँ अशोकवनमें जाते हुए पतिके साथ बड़े आदरसे और अनुरागपूर्वक जा रही थीं ॥ १८ ॥

> स च कामपराधीनः पतिस्तासां महाबलः ।  
> सीतासक्तमना मन्दो मन्दाञ्चितगतिर्बभौ ॥ १९ ॥

उन सबका पति महाबली मन्दबुद्धि रावण कामके अधीन हो रहा था । वह सीतामें मन लगाये मन्दगतिसे आगे बढ़ता हुआ अद्भुत शोभा पा रहा था ॥ १९ ॥

> ततः काञ्चीनिनादं च नूपुराणां च निःस्वनम् ।  
> शुश्राव परमस्त्रीणां कपिर्मारुतनन्दनः ॥ २० ॥

उस समय वायुनन्दन कपिवर हनुमान्जीने उन परम सुन्दरी रावणपत्नियोंकी करधनीका कलनाद और नूपुरोंकी झनकार सुनी ॥ २० ॥

> तं चाप्रतिमकर्माणमचिन्त्यबलपौरुषम् ।  
> द्वारदेशमनुप्राप्तं ददर्श हनुमान् कपिः ॥ २१ ॥

साथ ही, अनुपम कर्म करनेवाले तथा अचिन्त्य बल-पौरुषसे सम्पन्न रावणको भी कपिवर हनुमान्ने देखा, जो अशोकवाटिकाके द्वारतक आ पहुँचा था ॥ २१ ॥

> दीपिकाभिरनेकाभिः समन्तादवभासितम् ।  
> गन्धतैलावसिक्ताभिर्ध्रियमाणाभिरग्रतः ॥ २२ ॥  
> कामदर्पमदैर्युक्तं जिह्मताम्रायतेक्षणम् ।  
> समक्षमिव कंदर्पमपविद्धशरासनम् ॥२३॥

उसके आगे-आगे सुगन्धित तेलसे भीगी हुई और स्त्रियोंद्वारा हाथोंमें धारण की हुई बहुत-सी मशालें जल रही थीं, जिनके द्वारा वह सब ओरसे प्रकाशित हो रहा था ॥ वह काम, दर्प और मदसे युक्त था । उसकी आँखें टेढ़ी, लाल और बड़ी-बड़ी थीं । वह धनुषरहित साक्षात् कामदेवके समान जान पड़ता था ॥ २३ ॥

> मथितामृतफेनाभमरजोवस्त्रमुत्तमम् ।  
> सपुष्पमवकर्षन्तं विमुक्तं सक्तमङ्गदे ॥ २४ ॥

उसका वस्त्र मथे हुए दूधके फेनकी भाँति श्वेत, निर्मल और उत्तम था । उसमें मोतीके दाने और फूल टँके हुए थे । वह वस्त्र उसके बाजूबंदमें उलझ गया था और रावण उसे खींचकर सुलझा रहा था ॥ २४ ॥

> तं पत्रविटपे लीनः पत्रपुष्पशतावृतः ।  
> समीपमुपसंक्रान्तं विज्ञातुमुपचक्रमे ॥ २५ ॥

अशोक वृक्षके पत्तों और डालियोंमें छिपे हुए हनुमान्जी सैकड़ों पत्रों तथा पुष्पोंसे ढक गये थे । उसी अवस्थामें उन्होंने निकट आये हुए रावणको पहचाननेका प्रयत्न किया ॥ २५ ॥

> अवेक्षमाणस्तु तदा ददर्श कपिकुञ्जरः ।  
> रूपयौवनसम्पन्ना रावणस्य वरस्त्रियः ॥२६॥

उसकी ओर देखते समय कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने रावणकी सुन्दरी स्त्रियोंको भी लक्ष्य किया, जो रूप और यौवनसे सम्पन्न थीं ॥ २६ ॥

> ताभिः परिवृतो राजा सुरूपाभिर्महायशाः ।  
> तन्मृगद्विजसंघुष्टं प्रविष्टः प्रमदावनम् ॥ २७ ॥

उन सुन्दर रूपवाली युवतियोंसे घिरे हुए महायशस्वी राजा रावणने उस प्रमदावनमें प्रवेश किया, जहाँ अनेक प्रकारके पशु-पक्षी अपनी-अपनी बोली बोल रहे थे ॥ २७ ॥

> क्षीबो विचित्राभरणः शङ्कुकर्णो महाबलः ।  
> तेन विश्रवसः पुत्रः स दृष्टो राक्षसाधिपः ॥ २८ ॥

वह मतवाला दिखायी देता था । उसके आभूषण विचित्र थे । उसके कान ऐसे प्रतीत होते थे, मानो वहाँ खूँटे गाड़े गये हैं । इस प्रकार वह विश्रवामुनिका पुत्र महाबली राक्षसराज रावण हनुमान्जीके दृष्टिपथमें आया २८

> वृतः परमनारीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमाः ।  
> तं ददर्श महातेजास्तेजोवन्तं महाकपिः ॥ २९ ॥  
> रावणोऽयं महाबाहुरिति संचिन्त्य वानरः ।  
> सोऽयमेव पुरा शेते पुरमध्ये गृहोत्तमे ।  
> अवप्लुतो महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ३० ॥

ताराओंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति वह परम सुन्दरी युवतियोंसे घिरा हुआ था । महातेजस्वी महाकपि हनुमान्ने उस तेजस्वी राक्षसको देखा और देखकर यह निश्चय किया कि यही महाबाहु रावण है । पहले यही नगरमें उत्तम महलके भीतर सोया हुआ था । ऐसा सोचकर वे वानरवीर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान्जी जिस डालीपर बैठे थे, वहाँसे कुछ नीचे उतर आये ( क्योंकि वे निकटसे रावणकी सारी चेष्टाएँ देखना चाहते थे ) ॥ २९-३० ॥

> स तथाप्युग्रतेजाः स निर्धूतस्तस्य तेजसा ।  
> पत्रे गुह्यान्तरे सक्तो मतिमान् संवृतोऽभवत् ॥ ३१ ॥

यद्यपि मतिमान् हनुमान्जी भी बड़े उग्रतेजस्वी थे, तथापि रावणके तेजसे तिरस्कृत-से होकर सघन पत्तोंमें घुसकर छिप गये ॥ ३१ ॥

> स तामसितकेशान्तां सुश्रोणीं संहतस्तनीम् ।  
> दिदृक्षुरसितापाङ्गीमुपावर्तत रावणः ॥ ३२ ॥

उधर रावण काले केश, कजरारे नेत्र, सुन्दर कटिभाग और परस्पर सटे हुए स्तनवाली सुन्दरी सीताको देखनेके लिये उनके पास गया ॥ ३२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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