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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 13"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 13

> विमानात् तु स संक्रम्य प्राकारं हरियूथपः ।  
> हनूमान् वेगवानासीद् यथा विद्युद् घनान्तरे ॥ १ ॥

वानरयूथपति हनुमान् विमानसे उतरकर महलके परकोटेपर चढ़ आये । वहाँ आकर वे मेघमालाके अङ्कमें चमकती हुई बिजलीके समान बड़े वेगसे इधर-उधर घूमने लगे* ॥ १ ॥

> सम्परिक्रम्य हनुमान् रावणस्य निवेशनान् ।  
> अदृष्ट्वा जानकीं सीतामब्रवीद् वचनं कपिः ॥ २ ॥

रावणके सभी घरोंमें एक बार पुनः चक्कर लगाकर जब कपिवर हनुमान्जीने जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखा, तब वे मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगे—॥ २ ॥

> भूयिष्ठं लोलिता लङ्का रामस्य चरता प्रियम् ।  
> न हि पश्यामि वैदेहीं सीतां सर्वाङ्गशोभनाम् ॥ ३ ॥

‘मैंने श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेके लिये कई बार लङ्काको छान डाला; किंतु सर्वाङ्गसुन्दरी विदेहनन्दिनी सीता मुझे कहीं नहीं दिखायी देती हैं ॥ ३ ॥

> पल्वलानि तटाकानि सरांसि सरितस्तथा ।  
> नद्योऽनूपवनान्ताश्च दुर्गाश्च धरणीधराः ॥ ४ ॥  
> लोलिता वसुधा सर्वा न च पश्यामि जानकीम् ।

‘मैंने यहाँके छोटे तालाब, पोखरे, सरोवर, सरिताएँ, नदियाँ, पानीके आस-पासके जंगल तथा दुर्गम पहाड़—सब देख डाले । इस नगरके आसपासकी सारी भूमि खोज डाली; किंतु कहीं भी मुझे जानकीजीका दर्शन नहीं हुआ ॥ ४½ ॥

> इह सम्पातिना सीता रावणस्य निवेशने ।  
> आख्याता गृध्रराजेन न च सा दृश्यते न किम् ॥ ५ ॥

‘गृध्रराज सम्पातिने तो सीताजीको यहाँ रावणके महलमें ही बताया था । फिर भी न जाने क्यों वे यहाँ दिखायी नहीं देती हैं ॥ ५ ॥

> किं नु सीताथ वैदेही मैथिली जनकात्मजा ।  
> उपतिष्ठेत विवशा रावणेन हृता बलात् ॥ ६ ॥

‘क्या रावणके द्वारा बलपूर्वक हरकर लायी हुई विदेहकुलनन्दिनी मिथिलेशकुमारी जनकदुलारी सीता कभी विवश होकर रावणकी सेवामें उपस्थित हो सकती हैं ( यह असम्भव है ) ॥ ६ ॥

> क्षिप्रमुत्पततो मन्ये सीतामादाय रक्षसः ।  
> बिभ्यतो रामबाणानामन्तरा पतिता भवेत् ॥ ७ ॥

‘मैं तो समझता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे भयभीत हो वह राक्षस जब सीताको लेकर शीघ्रतापूर्वक आकाशमें उछला है, उस समय कहीं बीचमें ही वे छूटकर गिर पड़ी हैं ॥ ७ ॥

> अथवा ह्रियमाणायाः पथि सिद्धनिषेविते ।  
> मन्ये पतितमार्याया हृदयं प्रेक्ष्य सागरम् ॥ ८ ॥

‘अथवा यह भी सम्भव है कि जब आर्या सीता सिद्धसेवित आकाशमार्गसे ले जायी जाती रही हों, उस समय समुद्रको देखकर भयके मारे उनका हृदय ही फटकर नीचे गिर पड़ा हो ॥ ८ ॥

> रावणस्योरुवेगेन भुजाभ्यां पीडितेन च ।  
> तया मन्ये विशालाक्ष्या त्यक्तं जीवितमार्यया ॥ ९ ॥

‘अथवा यह भी मालूम होता है कि रावणके प्रबल वेग और उसकी भुजाओंके दृढ़ बन्धनसे पीड़ित होकर विशाललोचना आर्या सीताने अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया है ॥ ९ ॥

> उपर्युपरि सा नूनं सागरं क्रमतस्तदा ।  
> विचेष्टमाना पतिता समुद्रे जनकात्मजा ॥ १० ॥

‘ऐसा भी हो सकता है कि जिस समय रावण उन्हें समुद्रके ऊपर होकर ला रहा हो, उस समय जनककुमारी सीता छटपटाकर समुद्रमें गिर पड़ी हों । अवश्य ऐसा ही हुआ होगा ॥ १० ॥

> आहो क्षुद्रेण चानेन रक्षन्ती शीलमात्मनः ।  
> अबन्धुर्भक्षिता सीता रावणेन तपस्विनी ॥ ११ ॥  
> अथवा राक्षसेन्द्रस्य पत्नीभिरसितेक्षणा ।  
> अदुष्टा दुष्टभावाभिर्भक्षिता सा भविष्यति ॥ १२ ॥

‘अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि अपने शीलकी रक्षामें तत्पर हुई किसी सहायक बन्धुकी सहायतासे वञ्चित तपस्विनी सीताको इस नीच रावणने ही खा लिया हो अथवा मनमें दुष्ट भावना रखनेवाली राक्षसराज रावणकी पत्नियोंने ही कजरारे नेत्रोंवाली साध्वी सीताको अपना आहार बना लिया होगा ॥ ११-१२ ॥

> सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमं पद्मपत्रनिभेक्षणम् ।  
> रामस्य ध्यायती वक्त्रं पञ्चत्वं कृपणा गता ॥ १३ ॥

‘हाय ! श्रीरामचन्द्रजीके पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर तथा प्रफुल्ल कमलदलके सदृश नेत्रवाले मुखका चिन्तन करती हुई दयनीया सीता इस संसारसे चल बसीं ॥ १३ ॥

> हा राम लक्ष्मणेत्येवं हायोध्ये चेति मैथिली ।  
> विलप्य बहु वैदेही न्यस्तदेहा भविष्यति ॥ १४ ॥

‘हा राम ! हा लक्ष्मण ! हा अयोध्यापुरी ! इस प्रकार पुकार-पुकारकर बहुत विलाप करके मिथिलेशकुमारी विदेहनन्दिनी सीताने अपने शरीरको त्याग दिया होगा ॥ १४ ॥

> अथवा निहिता मन्ये रावणस्य निवेशने ।  
> भृशं लालप्यते बाला पञ्जरस्थेव सारिका ॥ १५ ॥

‘अथवा मेरी समझमें यह आता है कि वे रावणके ही किसी गुप्त गृहमें छिपाकर रक्खी गयी हैं । हाय ! वहाँ वह बाला पींजरेमें बंद हुई मैनाकी तरह बारंबार आर्तनाद करती होगी ॥ १५ ॥

> जनकस्य कुले जाता रामपत्नी सुमध्यमा ।  
> कथमुत्पलपत्राक्षी रावणस्य वशं व्रजेत् ॥ १६ ॥

‘जो जनकके कुलमें उत्पन्न हुई हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी हैं, वे नील कमलके-से नेत्रोंवाली सुमध्यमा सीता रावणके अधीन कैसे हो सकती हैं ! ॥ १६ ॥

> विनष्टा वा प्रणष्टा वा मृता वा जनकात्मजा ।  
> रामस्य प्रियभार्यस्य न निवेदयितुं क्षमम् ॥ १७ ॥

‘जनककिशोरी सीता चाहे गुप्त गृहमें अदृश्य करके रखी गयी हों, चाहे समुद्रमें गिरकर प्राणोंसे हाथ धो बैठी हों अथवा श्रीरामचन्द्रजीके विरहका कष्ट न सह सकनेके कारण उन्होंने मृत्युकी शरण ली हो, किसी भी दशामें श्रीरामचन्द्रजीको इस बातकी सूचना देना उचित न होगा; क्योंकि वे अपनी पत्नीको बहुत प्यार करते हैं ॥ १७ ॥

> निवेद्यमाने दोषः स्याद् दोषः स्यादनिवेदने ।  
> कथं नु खलु कर्तव्यं विषमं प्रतिभाति मे ॥ १८ ॥

‘इस समाचारके बतानेमें भी दोष है और न बतानेमें भी दोषकी सम्भावना है, ऐसी दशामें किस उपायसे काम लेना चाहिये ? मुझे तो बताना और न बताना—दोनों ही दुष्कर प्रतीत होते हैं ॥ १८ ॥

> अस्मिन्नेवंगते कार्ये प्राप्तकालं क्षमं च किम् ।  
> भवेदिति मतिं भूयो हनुमान् प्रविचारयन् ॥ १९ ॥

‘ऐसी दशामें जब कोई भी कार्य करना दुष्कर प्रतीत होता है, तब मेरे लिये इस समयके अनुसार क्या करना उचित होगा ?’ इन्हीं बातोंपर हनुमान्जी बारंबार विचार करने लगे ॥ १९ ॥

> यदि सीतामदृष्ट्वाहं वानरेन्द्रपुरीमितः ।  
> गमिष्यामि ततः को मे पुरुषार्थो भविष्यति ॥ २० ॥

( उन्होंने फिर सोचा—) ‘यदि मैं सीताजीको देखे बिना ही यहाँसे वानरराजकी पुरी किष्किन्धाको लौट जाऊँगा तो मेरा पुरुषार्थ ही क्या रह जायगा ? ॥ २० ॥

> ममेदं लङ्घनं व्यर्थं सागरस्य भविष्यति ।  
> प्रवेशश्चैव लङ्कायां राक्षसानां च दर्शनम् ॥ २१ ॥

‘फिर तो मेरा यह समुद्रलङ्घन, लङ्कामें प्रवेश और राक्षसोंको देखना सब व्यर्थ हो जायगा ॥ २१ ॥

> किं वा वक्ष्यति सुग्रीवो हरयो वापि संगताः ।  
> किष्किन्धामनुसम्प्राप्तं तौ वा दशरथात्मजौ ॥ २२ ॥

‘किष्किन्धामें पहुँचनेपर मुझसे मिलकर सुग्रीव, दूसरे-दूसरे वानर तथा वे दोनों दशरथराजकुमार भी क्या कहेंगे ? ॥ २२ ॥

> गत्वा तु यदि काकुत्स्थं वक्ष्यामि परुषं वचः।  
> न दृष्टेति मया सीता ततस्त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ २३ ॥

‘यदि वहाँ जाकर मैं श्रीरामचन्द्रजीसे यह कठोर बात कह दूँ कि मुझे सीताका दर्शन नहीं हुआ तो वे प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ २३ ॥

> परुषं दारुणं तीक्ष्णं क्रूरमिन्द्रियतापनम्।  
> सीतानिमित्तं दुर्वाक्यं श्रुत्वा स न भविष्यति॥ २४ ॥

‘सीताजीके विषयमें ऐसे रूखे, कठोर, तीखे और इन्द्रियोंको संताप देनेवाले दुर्वचनको सुनकर वे कदापि जीवित नहीं रहेंगे ॥ २४ ॥

> तं तु कृच्छ्रगतं दृष्ट्वा पञ्चत्वगतमानसम्।  
> भृशानुरक्तमेधावी न भविष्यति लक्ष्मणः ॥ २५ ॥

‘उन्हें संकटमें पड़कर प्राणोंके परित्यागका संकल्प करते देख उनके प्रति अत्यन्त अनुराग रखनेवाले बुद्धिमान् लक्ष्मण भी जीवित नहीं रहेंगे ॥ २५ ॥

> विनष्टौ भ्रातरौ श्रुत्वा भरतोऽपि मरिष्यति।  
> भरतं च मृतं दृष्ट्वा शत्रुघ्नो न भविष्यति ॥ २६ ॥

‘अपने इन दो भाइयोंके विनाशका समाचार सुनकर भरत भी प्राण त्याग देंगे और भरतकी मृत्यु देखकर शत्रुघ्न भी जीवित नहीं रह सकेंगे ॥ २६ ॥

> पुत्रान् मृतान् समीक्ष्याथ न भविष्यन्ति मातरः।  
> कौसल्या च सुमित्रा च कैकेयी च न संशयः ॥ २७ ॥

‘इस प्रकार चारों पुत्रोंकी मृत्यु हुई देख कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी—ये तीनों माताएँ भी निस्संदेह प्राण दे देंगी ॥ २७ ॥

> कृतज्ञः सत्यसंधश्च सुग्रीवः प्लवगाधिपः।  
> रामं तथागतं दृष्ट्वा ततस्त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ २८ ॥

‘कृतज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव भी जब श्रीरामचन्द्रजीको ऐसी अवस्थामें देखेंगे तो स्वयं भी प्राणविसर्जन कर देंगे ॥ २८ ॥

> दुर्मना व्यथिता दीना निरानन्दा तपस्विनी।  
> पीडिता भर्तृशोकेन रुमा त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ २९ ॥

‘तत्पश्चात् पतिशोकसे पीड़ित हो दुःखितचित्त, दीन, व्यथित और आनन्दशून्य हुई तपस्विनी रुमा भी जान दे देगी ॥ २९ ॥

> वालिजेन तु दुःखेन पीडिता शोककर्शिता।  
> पञ्चत्वमागता राज्ञी तारापि न भविष्यति ॥ ३० ॥

‘फिर तो रानी तारा भी जीवित नहीं रहेंगी। वे वालीके विरहजनित दुःखसे तो पीड़ित थीं ही, इस नूतन शोकसे कातर हो शीघ्र ही मृत्युको प्राप्त हो जायँगी ॥ ३० ॥

> मातापित्रोर्विनाशेन सुग्रीवव्यसनेन च।  
> कुमारोऽप्यङ्गदस्तस्माद् विजहिष्यति जीवितम्॥ ३१ ॥

‘माता-पिताके विनाश और सुग्रीवके मरणजनित संकटसे पीड़ित हो कुमार अङ्गद भी अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ ३१ ॥

> भर्तृजेन तु दुःखेन अभिभूता वनौकसः।  
> शिरांस्यभिहनिष्यन्ति तलैर्मुष्टिभिरेव च ॥ ३२ ॥  
> सान्त्वेनानुप्रदानेन मानेन च यशस्विना।  
> लालिताः कपिनाथेन प्राणांस्त्यक्ष्यन्ति वानराः ॥ ३३ ॥

‘तदनन्तर स्वामीके दुःखसे पीड़ित हुए सारे वानर अपने हाथों और मुक्कोंसे सिर पीटने लगेंगे। यशस्वी वानरराजने सान्त्वनापूर्ण वचनों और दान-मानसे जिनका लालन-पालन किया था, वे वानर अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ ३२-३३ ॥

> न वनेषु न शैलेषु न निरोधेषु वा पुनः।  
> क्रीडामनुभविष्यन्ति समेत्य कपिकुञ्जराः ॥ ३४ ॥

‘ऐसी अवस्थामें शेष वानर वनों, पर्वतों और गुफाओंमें एकत्र होकर फिर कभी क्रीड़ा-विहारका आनन्द नहीं लेंगे ॥ ३४ ॥

> सपुत्रदाराः सामात्या भर्तृव्यसनपीडिताः।  
> शैलाग्रेभ्यः पतिष्यन्ति समेषु विषमेषु च ॥ ३५ ॥

‘अपने राजाके शोकसे पीड़ित हो सब वानर अपने पुत्र, स्त्री और मन्त्रियोंसहित पर्वतोंके शिखरोंसे नीचे सम अथवा विषम स्थानोंमें गिरकर प्राण दे देंगे ॥ ३५ ॥

> विषमुद्बन्धनं वापि प्रवेशं ज्वलनस्य वा।  
> उपवासमथो शस्त्रं प्रचरिष्यन्ति वानराः ॥ ३६ ॥

‘अथवा सारे विष पी लेंगे या फाँसी लगा लेंगे या जलती आगमें प्रवेश कर जायँगे। उपवास करने लगेंगे अथवा अपने ही शरीरमें छुरा भोंक लेंगे ॥ ३६ ॥

> घोरमारोदनं मन्ये गते मयि भविष्यति।  
> इक्ष्वाकुकुलनाशश्च नाशश्चैव वनौकसाम् ॥ ३७ ॥

‘मेरे वहाँ जानेपर मैं समझता हूँ बड़ा भयंकर आर्तनाद होने लगेगा। इक्ष्वाकुकुलका नाश और वानरोंका भी विनाश हो जायगा ॥ ३७ ॥

> सोऽहं नैव गमिष्यामि किष्किन्धां नगरीमितः।  
> नहि शक्ष्याम्यहं द्रष्टुं सुग्रीवं मैथिलीं विना ॥ ३८ ॥

‘इसलिये मैं यहाँसे किष्किन्धापुरीको तो नहीं जाऊँगा। मिथिलेशकुमारी सीताको देखे बिना मैं सुग्रीवका भी दर्शन नहीं कर सकूँगा ॥ ३८ ॥

> मय्यगच्छति चेहस्थे धर्मात्मानौ महारथौ ।  
> आशया तौ धरिष्येते वानराश्च तरस्विनः ॥ ३९ ॥

‘यदि मैं यहीं रहूँ और वहाँ न जाऊँ तो मेरी आशा लगाये वे दोनों धर्मात्मा महारथी बन्धु प्राण धारण किये रहेंगे और वे वेगशाली वानर भी जीवित रहेंगे ॥ ३९ ॥

> हस्तादानो मुखादानो नियतो वृक्षमूलिकः ।  
> वानप्रस्थो भविष्यामि ह्यदृष्ट्वा जनकात्मजाम् ॥ ४० ॥

‘जानकीजीका दर्शन न मिलनेपर मैं यहाँ वानप्रस्थी हो जाऊँगा । मेरे हाथपर अपने-आप जो फल आदि खाद्य वस्तु प्राप्त हो जायगी, उसीको खाकर रहूँगा । या परेच्छासे मेरे मुँहमें जो फल आदि खाद्य वस्तु पड़ जायगी, उसीसे निर्वाह करूँगा तथा शौच, संतोष आदि नियमोंके पालनपूर्वक वृक्षके नीचे निवास करूँगा ॥ ४० ॥

> सागरानूपजे देशे बहुमूलफलोदके ।  
> चितिं कृत्वा प्रवेक्ष्यामि समिद्धमरणीसुतम् ॥ ४१ ॥

‘अथवा सागरतटवर्ती स्थानमें, जहाँ फल-मूल और जलकी अधिकता होती है, मैं चिता बनाकर जलती हुई आगमें प्रवेश कर जाऊँगा ॥ ४१ ॥

> उपविष्टस्य वा सम्यग् लिङ्गिनं साधयिष्यतः ।  
> शरीरं भक्षयिष्यन्ति वायसाः श्वापदानि च ॥ ४२ ॥

‘अथवा आमरण उपवासके लिये बैठकर लिङ्गशरीरधारी जीवात्माका शरीरसे वियोग करानेके प्रयत्नमें लगे हुए मेरे शरीरको कौवे तथा हिंसक जन्तु अपना आहार बना लेंगे ॥ ४२ ॥

> इदमप्यृषिभिर्दृष्टं निर्याणमिति मे मतिः ।  
> सम्यगापः प्रवेक्ष्यामि न चेत् पश्यामि जानकीम् ॥ ४३ ॥

‘यदि मुझे जानकीजीका दर्शन नहीं हुआ तो मैं खुशी-खुशी जल-समाधि ले लूँगा । मेरे विचारसे इस तरह जल-प्रवेश करके परलोकगमन करना ऋषियोंकी दृष्टिमें भी उत्तम ही है ॥ ४३ ॥

> सुजातमूला सुभगा कीर्तिमाला यशस्विनी ।  
> प्रभग्ना चिररात्राय मम सीतामपश्यतः ॥ ४४ ॥

‘जिसका प्रारम्भ शुभ है, ऐसी सुमगा, यशस्विनी और मेरी कीर्तिमालारूपा यह दीर्घरात्रि भी सीताजीको देखे बिना ही बीत चली ॥ ४४ ॥

> तापसो वा भविष्यामि नियतो वृक्षमूलिकः ।  
> नेतः प्रतिगमिष्यामि तामदृष्ट्वासितेक्षणाम् ॥ ४५ ॥

‘अथवा अब मैं नियमपूर्वक वृक्षके नीचे निवास करनेवाला तपस्वी हो जाऊँगा; किंतु उस असितलोचना सीताको देखे बिना यहाँसे कदापि नहीं लौटूँगा ॥ ४५ ॥

> यदि तु प्रतिगच्छामि सीतामनधिगम्य ताम् ।  
> अङ्गदः सहितः सर्वैर्वानरैर्न भविष्यति ॥ ४६ ॥

‘यदि सीताका पता लगाये बिना ही मैं लौट जाऊँ तो समस्त वानरोंसहित अङ्गद जीवित नहीं रहेंगे ॥ ४६ ॥

> विनाशे बहवो दोषा जीवन् प्राप्नोति भद्रकम् ।  
> तस्मात् प्राणान् धरिष्यामि ध्रुवो जीवति संगमः ॥ ४७ ॥

‘इस जीवनका नाश कर देनेमें बहुत-से दोष हैं । जो पुरुष जीवित रहता है, वह कभी-न-कभी अवश्य कल्याणका भागी होता है; अतः मैं इन प्राणोंको धारण किये रहूँगा । जीवित रहनेपर अभीष्ट वस्तु अथवा सुखकी प्राप्ति अवश्यम्भावी है’ ॥ ४७ ॥

> एवं बहुविधं दुःखं मनसा धारयन् बहु ।  
> नाध्यगच्छत् तदा पारं शोकस्य कपिकुञ्जरः ॥ ४८ ॥

इस तरह मनमें अनेक प्रकारके दुःख धारण किये कपिकुञ्जर हनुमान्जी शोकका पार न पा सके ॥ ४८ ॥

> ततो विक्रममासाद्य धैर्यवान् कपिकुञ्जरः ।  
> रावणं वा वधिष्यामि दशग्रीवं महाबलम् ।  
> काममस्तु हृता सीता प्रत्याचीर्णं भविष्यति ॥ ४९ ॥

तदनन्तर धैर्यवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने पराक्रमका सहारा लेकर सोचा—‘अथवा महाबली दशमुख रावणका ही वध क्यों न कर डालूँ । भले ही सीताका अपहरण हो गया हो, इस रावणको मार डालनेसे उस वैरका भरपूर बदला सब जायगा ॥ ४९ ॥

> अथवैनं समुत्क्षिप्य उपर्युपरि सागरम् ।  
> रामायोपहरिष्यामि पशुं पशुपतेरिव ॥ ५० ॥

‘अथवा इसे उठाकर समुद्रके ऊपर-ऊपरसे ले जाऊँ और जैसे पशुपति ( रुद्र या अग्नि ) को पशु अर्पित किया जाय, उसी प्रकार श्रीरामके हाथमें इसको सौंप दूँ’ ॥ ५० ॥

> इति चिन्तासमापन्नः सीतामनधिगम्य ताम् ।  
> ध्यानशोकपरीतात्मा चिन्तयामास वानरः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार सीताजीको न पाकर वे चिन्तामें निमग्न हो गये । उनका मन सीताके ध्यान और शोकमें डूब गया । फिर वे वानरवीर इस प्रकार विचार करने लगे—॥ ५१ ॥

> यावत् सीतां न पश्यामि रामपत्नीं यशस्विनीम् ।  
> तावदेतां पुरीं लङ्कां विचिनोमि पुनः पुनः ॥ ५२ ॥

‘जबतक मैं यशस्विनी श्रीराम-पत्नी सीताका दर्शन न कर लूँगा, तबतक इस लङ्कापुरीमें बारंबार उनकी खोज करता रहूँगा ॥ ५२ ॥

> सम्पातिवचनाच्चापि रामं यद्यानयाम्यहम् ।  
> अपश्यन् राघवो भार्यां निर्दहेत् सर्ववानरान् ॥ ५३ ॥

‘यदि सम्पातिके कहनेसे भी मैं श्रीरामको यहाँ बुला ले आऊँ तो अपनी पत्नीको यहाँ न देखनेपर श्रीरघुनाथजी समस्त वानरोंको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ ५३ ॥

> इहैव नियताहारो वत्स्यामि नियतेन्द्रियः।  
> न मत्कृते विनश्येयुः सर्वे ते नरवानराः ॥ ५४ ॥

‘अतः यहीं नियमित आहार और इन्द्रियोंके संयमपूर्वक निवास करूँगा । मेरे कारण वे समस्त नर और वानर नष्ट न हों ॥ ५४ ॥

> अशोकवनिका चापि महतीयं महाद्रुमा ।  
> इमामधिगमिष्यामि नहीयं विचिता मया ॥ ५५ ॥

‘इधर यह बहुत बड़ी अशोकवाटिका है, इसके भीतर बड़े-बड़े वृक्ष हैं । इसमें मैंने अभीतक अनुसंधान नहीं किया है, अतः अब इसीमें चलकर ढूँढूँगा ॥ ५५ ॥

> वसून् रुद्रांस्तथा ऽऽदित्यानश्विनौ मरुतो ऽपि च ।  
> नमस्कृत्वा गमिष्यामि रक्षसां शोकवर्धनः ॥ ५६ ॥

‘राक्षसोंके शोकको बढ़ानेवाला मैं यहाँसे वसु, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और मरुद्गणोंको नमस्कार करके अशोकवाटिकामें चलूँगा ॥ ५६ ॥

> जित्वा तु राक्षसान् देवीमिक्ष्वाकुकुलनन्दिनीम् ।  
> सम्प्रदास्यामि रामाय सिद्धीमिव तपस्विने ॥ ५७ ॥

‘वहाँ समस्त राक्षसोंको जीतकर जैसे तपस्वीको सिद्धि प्रदान की जाती है, इसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके हाथमें इक्ष्वाकुकुलको आनन्दित करनेवाली देवी सीताको सौंप दूँगा’ ॥ ५७ ॥

> स मुहूर्तमिव ध्यात्वा चिन्ताविग्रथितेन्द्रियः ।  
> उदतिष्ठन् महाबाहुर्हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ५८ ॥  
> नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय  
> देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै ।  
> नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो  
> नमोऽस्तु चन्द्राग्निमरुद्गणेभ्यः ॥ ५९ ॥

इस प्रकार दो घड़ीतक सोच-विचारकर चिन्तासे शिथिल इन्द्रियवाले महाबाहु पवनकुमार हनुमान् सहसा उठकर खड़े हो गये ( और देवताओंको नमस्कार करते हुए बोले—) ‘लक्ष्मणसहित श्रीरामको नमस्कार है । जनकनन्दिनी सीता देवीको भी नमस्कार है । रुद्र, इन्द्र, यम और वायु देवताको नमस्कार है तथा चन्द्रमा, अग्नि एवं मरुद्गणोंको भी नमस्कार है’ ॥ ५८-५९ ॥

> स तेभ्यस्तु नमस्कृत्वा सुग्रीवाय च मारुतिः ।  
> दिशः सर्वाः समालोक्य सोऽशोकवनिकां प्रति ॥ ६० ॥

इस प्रकार उन सबको तथा सुग्रीवको भी नमस्कार करके पवनकुमार हनुमान्जी सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टिपात करके अशोकवाटिकामें जानेको उद्यत हुए ॥ ६० ॥

> स गत्वा मनसा पूर्वमशोकवनिकां शुभाम् ।  
> उत्तरं चिन्तयामास वानरो मारुतात्मजः ॥ ६१ ॥

उन वानरवीर पवनकुमारने पहले मनके द्वारा ही उस सुन्दर अशोकवाटिकामें जाकर भावी कर्तव्यका इस प्रकार चिन्तन किया—॥ ६१ ॥

> ध्रुवं तु रक्षोबहुला भविष्यति वनाकुला ।  
> अशोकवनिका पुण्या सर्वसंस्कारसंस्कृता ॥ ६२ ॥

‘वह पुण्यमयी अशोकवाटिका सींचने-कोड़ने आदि सब प्रकारके संस्कारोंसे सँवारी गयी है । वह दूसरे-दूसरे वनोंसे भी घिरी हुई है; अतः उसकी रक्षाके लिये वहाँ निश्चय ही बहुत-से राक्षस तैनात किये गये होंगे ॥ ६२ ॥

> रक्षिणश्चात्र विहिता नूनं रक्षन्ति पादपान् ।  
> भगवानपि विश्वात्मा नातिक्षोभं प्रवायाति ॥ ६३ ॥  
> संक्षिप्तोऽयं मयाऽऽत्मा च रामार्थं रावणस्य च ।  
> सिद्धिं दिशन्तु मे सर्वे देवाः सर्षिगणास्त्विह ॥ ६४ ॥

‘राक्षसराजके नियुक्त किये हुए रक्षक अवश्य ही वहाँके वृक्षोंकी रक्षा करते होंगे; इसलिये जगत्के प्राणस्वरूप भगवान् वायुदेव भी वहाँ अधिक वेगसे नहीं बहते होंगे ॥ ‘मैंने श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धि तथा रावणसे अदृश्य रहनेके लिये अपने शरीरको संकुचित करके छोटा बना लिया है । मुझे इस कार्यमें ऋषियोंसहित समस्त देवता सिद्धि-सफलता प्रदान करें ॥ ६४ ॥

> ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् देवाश्चैव तपस्विनः ।  
> सिद्धिमग्निश्च वायुश्च पुरुहूतश्च वज्रभृत् ॥ ६५ ॥

‘स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा, अन्य देवगण, तपोनिष्ठ महर्षि, अग्निदेव, वायु तथा वज्रधारी इन्द्र भी मुझे सफलता प्रदान करें ॥ ६५ ॥

> वरुणः पाशहस्तश्च सोमादित्यौ तथैव च ।  
> अश्विनौ च महात्मानौ मरुतः सर्व एव च ॥ ६६ ॥  
> सिद्धिं सर्वाणि भूतानि भूतानां चैव यः प्रभुः ।  
> दास्यन्ति मम ये चान्येऽप्यदृग्राः पथि गोचराः ॥ ६७ ॥

‘पाशधारी वरुण, सोम, आदित्य, महात्मा अश्विनीकुमार, समस्त मरुद्गण, सम्पूर्ण भूत और भूतोंके अधिपति तथा और भी जो मार्गमें दीखनेवाले एवं न दीखनेवाले देवता हैं, वे सब मुझे सिद्धि प्रदान करेंगे ॥ ६६-६७ ॥

> तदुन्नसं पाण्डुरदन्तमव्रणं  
> शुचिस्मितं पद्मपलाशलोचनम् ।  
> द्रक्ष्ये तदार्यावदनं कदा न्वहं  
> प्रसन्नताराधिपतुल्यवर्चसम् ॥ ६८ ॥  
> क्षुद्रेण हीनेन नृशंसमूर्तिना  
> सुदारुणालंकृतवेषधारिणा ।  
> बलाभिभूता द्यबला तपस्विनी  
> कथं नु मे दृष्टिपथेऽद्य सा भवेत् ॥ ६९ ॥

‘जिसकी नाक ऊँची और दाँत सफेद हैं, जिसमें चेचक आदिके दाग नहीं हैं, जहाँ पवित्र मुसकानकी छटा छायी रहती है, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुशोभित होते हैं तथा जो निष्कलङ्क कलाधरके तुल्य कमनीय कान्तिसे युक्त है, वह आर्या सीताका मुख मुझे कब दिखायी देगा ?॥ ‘इस क्षुद्र, नीच, नृशंसरूपधारी और अत्यन्त दारुण होनेपर भी अलंकारयुक्त विश्वसनीय वेष धारण करनेवाले रावणने उस तपस्विनी अबलाको बलात्कारसे अपने अधीन कर लिया है । अब किस प्रकार वह मेरे दृष्टिपथमें आ सकती हैं ?’ ॥ ६९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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