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title: "सुन्दरकाण्ड, Sarga 1"
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# सुन्दरकाण्ड, Sarga 1

> ततो रावणनीतायाः सीतायाः शत्रुकर्षणः ।  
> इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ॥ १ ॥

तदनन्तर शत्रुओंका संहार करनेवाले हनुमान्जीने रावणद्वारा हरी गयी सीताके निवासस्थानका पता लगानेके लिये उस आकाशमार्गसे जानेका विचार किया, जिसपर चारण ( देवजातिविशेष ) विचरा करते हैं ॥ १ ॥

> दुष्करं निष्प्रतिद्वन्द्वं चिकीर्षन् कर्म वानरः ।  
> समुद्रग्रशिरोग्रीवो गवां पतिरिवाबभौ ॥ २ ॥

कपिवर हनुमान्जी ऐसा कर्म करना चाहते थे, जो दूसरोंके लिये दुष्कर था तथा उस कार्यमें उन्हें किसी औरकी सहायता भी नहीं प्राप्त थी। उन्होंने मस्तक और ग्रीवा ऊँची की। उस समय वे हृष्ट-पुष्ट साँड़के समान प्रतीत होने लगे ॥ २ ॥

> अथ वैदूर्यवर्णेषु शाद्वलेषु महाबलः ।  
> धीरः सलिलकल्पेषु विचचार यथासुखम् ॥ ३ ॥

फिर धीर स्वभाववाले वे महाबली पवनकुमार वैदूर्यमणि ( नीलम ) और समुद्रके जलकी भाँति हरी-हरी घासपर सुखपूर्वक विचरने लगे ॥ ३ ॥

> द्विजान् वित्रासयन् धीमानुरसा पादपान् हरन् ।  
> मृगांश्च सुबहून् निघ्नन् प्रवृद्ध इव केसरी ॥ ४ ॥

उस समय बुद्धिमान् हनुमान्जी पक्षियोंको त्रास देते, वृक्षोंको वक्षःस्थलके आघातसे धराशायी करते तथा बहुत-से मृगों ( वन-जन्तुओं ) को कुचलते हुए पराक्रममें बढ़े-चढ़े सिंहके समान शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥

> नीललोहितमाञ्जिष्ठपद्मवर्णैः सिताऽसितैः ।  
> स्वभावसिद्धैर्विमलैर्धातुभिः समलंकृतम् ॥ ५ ॥

उस पर्वतका जो तलप्रदेश था, वह पहाड़ोंमें स्वभावसे ही उत्पन्न होनेवाली नीली, लाल, मजीठ और कमलके-से रंगवाली श्वेत तथा श्याम वर्णवाली निर्मल धातुओंसे अच्छी तरह अलंकृत था ॥ ५ ॥

> कामरूपिभिराविष्टमभीक्ष्णं सपरिच्छदैः ।  
> यक्षकिन्नरगन्धर्वैर्देवकल्पैः सपन्नगैः ॥ ६ ॥

उसपर देवोपम यक्ष, किन्नर, गन्धर्व और नाग, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे, निरन्तर परिवारसहित निवास करते थे ॥ ६ ॥

> स तस्य गिरिवर्यस्य तले नागवरायुते ।  
> तिष्ठन् कपिवरस्तत्र ह्रदे नाग इवाबभौ ॥ ७ ॥

बड़े-बड़े गजराजोंसे भरे हुए उस पर्वतके समतल प्रदेशमें खड़े हुए कपिवर हनुमान्जी वहाँ जलाशयमें स्थित हुए विशालकाय हाथीके समान जान पड़ते थे ॥७॥

> स सूर्याय महेन्द्राय पवनाय स्वयम्भुवे ।  
> भूतेभ्यश्चाञ्जलिं कृत्वा चकार गमने मतिम् ॥ ८ ॥

उन्होंने सूर्य, इन्द्र, पवन, ब्रह्मा और भूतों ( देवयोनि-विशेषों ) को भी हाथ जोड़कर उस पार जानेका विचार किया ॥ ८ ॥

> अञ्जलिं प्राङ्मुखं कुर्वन् पवनायात्मयोनये ।  
> ततो हि ववृधे गन्तुं दक्षिणो दक्षिणां दिशम् ॥ ९ ॥

फिर पूर्वाभिमुख होकर अपने पिता पवनदेवको प्रणाम किया । तत्पश्चात् कार्यकुशल हनुमान्जी दक्षिण दिशामें जानेके लिये बढ़ने लगे ( अपने शरीरको बढ़ाने लगे ) ॥९॥

> प्लवगप्रवरैर्दृष्टः प्लवने कृतनिश्चयः ।  
> ववृधे रामवृद्ध्यर्थं समुद्र इव पर्वसु ॥१०॥

बड़े-बड़े वानरोंने देखा जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्रमें ज्वार आने लगता है, उसी प्रकार, समुद्र-लङ्घनके लिये दृढ़निश्चय करनेवाले हनुमान्जी श्रीरामकी कार्य-सिद्धिके लिये बढ़ने लगे ॥ १० ॥

> निष्प्रमाणशरीरः सँल्लिलङ्घयिषुर्णवम् ।  
> बाहुभ्यां पीडयामास चरणाभ्यां च पर्वतम् ॥ ११ ॥

समुद्रको लाँघनेकी इच्छासे उन्होंने अपने शरीरको वेहद बढ़ा लिया और अपनी दोनों भुजाओं तथा चरणोंसे उस पर्वतको दबाया ॥ ११ ॥

> स चचालाचलश्चाशु मुहूर्तं कपिपीडितः ।  
> तरूणां पुष्पिताग्राणां सर्वं पुष्पमशातयत् ॥ १२ ॥

कपिवर हनुमान्जीके द्वारा दबाये जानेपर तुरंत ही वह पर्वत काँप उठा और दो घड़ीतक डगमगाता रहा । उसके ऊपर जो वृक्ष उगे थे, उनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंसे लदे हुए थे; किंतु उस पर्वतके हिलनेसे उनके वे सारे फूल झड़ गये ॥ १२ ॥

> तेन पादपमुक्तेन पुष्पौघेण सुगन्धिना ।  
> सर्वतः संवृतः शैलो बभौ पुष्पमयो यथा ॥ १३ ॥

वृक्षोंसे झड़ी हुई उस सुगन्धित पुष्पराशिके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हुआ वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था, मानो वह फूलोंका ही बना हुआ हो ॥ १३ ॥

> तेन चोत्तमवीर्येण पीड्यमानः स पर्वतः ।  
> सलिलं सम्प्रस्रुस्राव मदमत्त इव द्विपः ॥ १४ ॥

महापराक्रमी हनुमान्जीके द्वारा दबाया जाता हुआ महेन्द्रपर्वत जलके स्रोत बहाने लगा, मानो कोई मदमत्त गजराज अपने कुम्भस्थलसे मदकी धारा बहा रहा हो ॥१४॥

> पीड्यमानस्तु बलिना महेन्द्रस्तेन पर्वतः ।  
> रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥ १५ ॥

बलवान् पवनकुमारके भारसे दबा हुआ महेन्द्रगिरि सुनहरे, रुपहले और काले रंगके जलस्रोत प्रवाहित करने लगा ॥ १५ ॥

> मुमोच च शिलाः शैलो विशालाः समनःशिलाः ।  
> मध्यमेनार्चिषा जुष्टो धूमराजीरिवानलः ॥ १६ ॥

इतना ही नहीं, जैसे मध्यम ज्वालासे युक्त अग्नि लगातार धुआँ छोड़ रही हो, उसी प्रकार वह पर्वत मैनसिल-सहित बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिराने लगा ॥ १६ ॥

> हरिणा पीड्यमानेन पीड्यमानानि सर्वतः ।  
> गुहाविष्ठानि सत्त्वानि विनेदुर्विकृतैः स्वरैः ॥ १७ ॥

हनुमान्जीके उस पर्वत-पीड़नसे पीड़ित होकर वहाँके समस्त जीव गुफाओंमें घुस गये और बुरी तरहसे चिल्लाने लगे ॥ १७ ॥

> स महान् सत्त्वसंनादः शैलपीडानिमित्तजः ।  
> पृथिवीं पूरयामास दिशश्चोपवनानि च ॥ १८ ॥

इस प्रकार पर्वतको दबानेके कारण उत्पन्न हुआ वह जीव-जन्तुओंका महान् कोलाहल पृथ्वी, उपवन और सम्पूर्ण दिशाओंमें भर गया ॥ १८ ॥

> शिरोभिः पृथुभिर्नागा व्यक्तस्वस्तिकलक्षणैः ।  
> वमन्तः पावकं घोरं दशंशुर्दशनैः शिलाः ॥ १९ ॥

जिनमें स्वस्तिक चिह्न स्पष्ट दिखायी दे रहे थे, उन स्थूल फणोंसे विषकी भयानक आग उगलते हुए बड़े-बड़े सर्प उस पर्वतकी शिलाओंको अपने दाँतोंसे डँसने लगे ॥१९॥

> तास्तदा सविषैर्दष्टाः कुपितैस्तैर्महाशिलाः ।  
> जज्वलुः पावकोद्दीप्ता बिभिदुश्च सहस्रधा ॥ २० ॥

क्रोधसे भरे हुए उन विषैले साँपोंके काटनेपर वे बड़ी-बड़ी शिलाएँ इस प्रकार जल उठीं, मानो उनमें आग लग गयी हो । उस समय उन सबके सहस्रों टुकड़े हो गये ॥ २० ॥

> यानि त्वौषधजालानि तस्मिञ्जातानि पर्वते ।  
> विषघ्नान्यपि नागानां न शेकुः शमितुं विषम् ॥ २१ ॥

उस पर्वतपर जो बहुत-सी ओषधियाँ उगी हुई थीं, वे विषको नष्ट करनेवाली होनेपर भी उन नागोंके विषको शान्त न कर सकीं ॥ २१ ॥

> भिद्यतेऽयं गिरिर्भूतैरिति मत्वा तपस्विनः ।  
> त्रस्ता विद्याधरास्तस्मादुत्पेतुः स्त्रीगणैः सह ॥ २२ ॥

उस समय वहाँ रहनेवाले तपस्वी और विद्याधरोंने समझा कि इस पर्वतको भूतलोग तोड़ रहे हैं, इससे भयभीत होकर वे अपनी स्त्रियोंके साथ वहाँसे ऊपर उठकर अन्तरिक्षमें चले गये ॥ २२ ॥

> पानभूमिगतं हित्वा हैममासवभाजनम् ।  
> पात्राणि च महार्हाणि करकांश्च हिरण्मयान् ॥ २३ ॥  
> लेह्यानुच्चावचान् भक्ष्यान् मांसानि विविधानि च ।  
> आर्षभाणि च चर्माणि खड्गांश्च कनकत्सरून् ॥ २४ ॥  
> कृतकण्ठगुणाः क्षीबा रक्तमाल्यानुलेपनाः ।  
> रक्ताक्षाः पुष्कराक्षाश्च गगनं प्रतिपेदिरे ॥ २५ ॥

मधुपानके स्थानमें रक्खे हुए सुवर्णमय आसव-पात्र, बहुमूल्य बर्तन, सोनेके कलश, भाँति-भाँतिके भक्ष्य पदार्थ चटनी, नाना प्रकारके फलोंके गूदे, बैलोंकी खालकी बनी हुई ढालें और सुवर्णजटित मूठवाली तलवारें छोड़कर कण्ठमें माला धारण किये लाल रंगके फूल और अनुलेपन (चन्दन) लगाये प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर एवं लाल नेत्रवाले वे मतवाले विद्याधरगण भयभीत-से होकर आकाशमें चले गये ॥ २३–२५ ॥

> हारनूपुरकेयूरपारिहार्यधराः स्त्रियः ।  
> विस्मिताः सस्मितास्तस्थुराकाशे रमणैः सह ॥ २६ ॥

उनकी स्त्रियाँ गलेमें हार, पैरोंमें नूपुर, भुजाओंमें बाजूबंद और कलाइयोंमें कंगन धारण किये आकाशमें अपने पतियोंके साथ मन्द-मन्द मुस्कराती हुई चकित-सी खड़ी हो गयीं ॥ २६ ॥

> दर्शयन्तो महाविद्यां विद्याधरमहर्षयः ।  
> सहितास्तस्थुराकाशे वीक्षांचक्रुश्च पर्वतम् ॥ २७ ॥

विद्याधर और महर्षि अपनी महाविद्या ( आकाशमें निराधार खड़े होनेकी शक्ति )का परिचय देते हुए अन्तरिक्षमें एक साथ खड़े हो गये और उस पर्वतकी ओर देखने लगे ॥ २७ ॥

> शुश्रुवुश्च तदा शब्दमृषीणां भावितात्मनाम् ।  
> चारणानां च सिद्धानां स्थितानां विमलेऽम्बरे ॥ २८ ॥

उन्होंने उस समय निर्मल आकाशमें खड़े हुए भावितात्मा ( पवित्र अन्तःकरणवाले ) महर्षियों, चारणों और सिद्धोंकी ये बातें सुनीं—॥ २८ ॥

> एष पर्वतसंकाशो हनुमान् मारुतात्मजः ।  
> तितीर्षति महावेगः समुद्रं वरुणालयम् ॥ २९ ॥

‘अहा ! ये पर्वतके समान विशालकाय महान् वेगशाली पवनपुत्र हनुमान्जी वरुणालय समुद्रको पार करना चाहते हैं ॥ २९ ॥

> रामार्थेवानरार्थे च चिकीर्षन् कर्म दुष्करम् ।  
> समुद्रस्य परं पारं दुष्प्रापं प्राप्तुमिच्छति ॥ ३० ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी और वानरोंके कार्यकी सिद्धिके लिये दुष्कर कर्म करनेकी इच्छा रखनेवाले ये पवनकुमार समुद्रके दूसरे तटपर पहुँचना चाहते हैं, जहाँ जाना अत्यन्त कठिन है’ ॥ ३० ॥

> इति विद्याधरा वाचः श्रुत्वा तेषां तपस्विनाम् ।  
> तमप्रमेयं ददृशुः पर्वते वानरर्षभम् ॥ ३१ ॥

इस प्रकार विद्याधरोंने उन तपस्वी महात्माओंकी कही हुई ये बातें सुनकर पर्वतके ऊपर अतुलित बलशाली वानरशिरोमणि हनुमान्जीको देखा ॥ ३१ ॥

> दुधुवे च स रोमाणि चकम्पे चानलोपमः ।  
> ननाद च महानादं सुमहानिव तोयदः ॥ ३२ ॥

उस समय हनुमान्जी अग्निके समान जान पड़ते थे । उन्होंने अपने शरीरको हिलाया और रोएँ झाड़े तथा महान् मेघके समान बड़े जोर-जोरसे गर्जना की ॥ ३२ ॥

> आनुपूर्व्या च वृत्तं तल्लाङ्गूलं रोमभिश्चितम् ।  
> उत्पतिष्यन् विचिक्षेप पक्षिराज इवोरगम् ॥ ३३ ॥

हनुमान्जी अब ऊपरको उछलना ही चाहते थे । उन्होंने क्रमशः गोलाकार मुड़ी तथा रोमावलियोंसे भरी हुई अपनी पूँछको उसी प्रकार आकाशमें फेंका, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्पको फेंकते हैं ॥ ३३ ॥

> तस्य लाङ्गूलमाविद्धमतिवेगस्य पृष्ठतः ।  
> दद्दशे गरुडेनेव ह्रियमाणो महोरगः ॥ ३४ ॥

अत्यन्त वेगशाली हनुमान्जीके पीछे आकाशमें फैली हुई उनकी कुछ-कुछ मुड़ी हुई पूँछ गरुडके द्वारा ले जाये जाते हुए महान् सर्पके समान दिखायी देती थी ॥३४॥

> बाहू संस्तम्भयामास महापरिघसंनिभौ ।  
> आससाद कपिः कट्यां चरणौ संचुकोच च ॥ ३५ ॥

उन्होंने अपनी विशाल परिघके समान भुजाओंको पर्वतपर जमाया । फिर ऊपरके सब अङ्गोंको इस तरह सिकोड़ लिया कि वे कटिकी सीमामें ही आ गये; साथ ही उन्होंने दोनों पैरोंको भी समेट लिया ॥ ३५ ॥

> संहृत्य च भुजौ श्रीमांस्तथैव च शिरोधराम् ।  
> तेजः सत्त्वं तथा वीर्यमाविवेश स वीर्यवान् ॥ ३६ ॥

तत्पश्चात् तेजस्वी और पराक्रमी हनुमान्जीने अपनी दोनों भुजाओं और गर्दनको भी सिकोड़ लिया । इस समय उनमें तेज, बल और पराक्रम—सभीका आवेश हुआ ॥३६॥

> मार्गमालोकयन् दूरादूर्ध्वप्रणिहितेक्षणः ।  
> रुरोध हृदये प्राणानाकाशमवलोकयन् ॥ ३७ ॥

उन्होंने अपने लंबे मार्गपर दृष्टि दौड़ानेके लिये नेत्रोंको ऊपर उठाया और आकाशकी ओर देखते हुए प्राणोंको हृदयमें रोका ॥ ३७ ॥

> पद्भ्यां दृढमवस्थानं कृत्वा स कपिकुञ्जरः ।  
> निकुच्य कर्णौ हनुमानुत्पतिष्यन् महाबलः ॥ ३८ ॥  
> वानरान् वानरश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ।

इस प्रकार ऊपरको छलाँग मारनेकी तैयारी करते हुए कपिश्रेष्ठ महाबली हनुमान्ने अपने पैरोंको अच्छी तरह जमाया और कानोंको सिकोड़कर उन वानरशिरोमणिने अन्य वानरोंसे इस प्रकार कहा—॥ ३८½ ॥

> यथा राघवनिर्मुक्तः शरः श्वसनविक्रमः ॥ ३९ ॥  
> गच्छेत् तद्वद् गमिष्यामि लङ्कां रावणपालिताम् ।

‘जैसे श्रीरामचन्द्रजीका छोड़ा हुआ बाण वायुवेगसे चलता है, उसी प्रकार मैं रावणद्वारा पालित लङ्कापुरीमें जाऊँगा ॥ ३९½ ॥

> नहि द्रक्ष्यामि यदि तां लङ्कायां जनकात्मजाम् ॥ ४० ॥  
> अनेनैव हि वेगेन गमिष्यामि सुरालयम् ।

‘यदि लङ्कामें जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखूँगा तो इसी वेगसे मैं स्वर्गलोकमें चला जाऊँगा ॥ ४०½ ॥

> यदि वा त्रिदिवे सीतां न द्रक्ष्यामि कृतश्रमः ॥ ४१ ॥  
> बद्ध्वा राक्षसराजानमानयिष्यामि रावणम् ।

‘इस प्रकार परिश्रम करनेपर यदि मुझे स्वर्गमें भी सीताका दर्शन नहीं होगा तो राक्षसराज रावणको बाँधकर लाऊँगा ॥ ४१½ ॥

> सर्वथा कृतकार्योऽहमेष्यामि सह सीतया ॥ ४२ ॥  
> आनयिष्यामि वा लङ्कां समुत्पाट्य सरावणाम् ।

‘सर्वथा कृतकृत्य होकर मैं सीताके साथ लौटूँगा अथवा रावणसहित लङ्कापुरीको ही उखाड़कर लाऊँगा’ ॥ ४२½ ॥

> एवमुक्त्वा तु हनुमान् वानरो वानरोत्तमः ॥ ४३ ॥  
> उत्पपाताथ वेगेन वेगवानविचारयन् ।  
> सुपर्णमिव चात्मानं मेने स कपिकुञ्जरः ॥ ४४ ॥

ऐसा कहकर वेगशाली वानरप्रवर श्रीहनुमान्जीने विघ्न-बाधाओंका कोई विचार न करके बड़े वेगसे ऊपरकी ओर छलाँग मारी । उस समय उन वानरशिरोमणिने अपनेको साक्षात् गरुड़के समान ही समझा ॥ ४३-४४ ॥

> समुत्पतति वेगात् तु वेगात् ते नगरोहिणः ।  
> संहृत्य विटपान् सर्वान् समुत्पेतुः समन्ततः ॥ ४५ ॥

जिस समय वे कूदे, उस समय उनके वेगसे आकृष्ट हो पर्वतपर उगे हुए सब वृक्ष उखड़ गये और अपनी सारी डालियोंको समेटकर उनके साथ ही सब ओरसे वेगपूर्वक उड़ चले ॥ ४५ ॥

> स मत्तकोयष्टिभकान् पादपान् पुष्पशालिनः ।  
> उद्वहन्तुरुवेगेन जगाम विमलेऽम्बरे ॥ ४६ ॥

वे हनुमान्जी मतवाले कोयष्टि आदि पक्षियोंसे युक्त, बहुसंख्यक पुष्पशोभित वृक्षोंको अपने महान् वेगसे ऊपरकी ओर खींचते हुए निर्मल आकाशमें अग्रसर होने लगे ॥ ४६ ॥

> ऊरुवेगोत्थिता वृक्षा मुहूर्तं कपिमन्वयुः ।  
> प्रस्थितं दीर्घमध्वानं स्वबन्धुमिव बान्धवाः ॥ ४७ ॥

उनकी जाँघोंके महान् वेगसे ऊपरको उठे हुए वृक्ष एक मुहूर्ततक उनके पीछे-पीछे इस प्रकार गये, जैसे दूर-देशके पथपर जानेवाले अपने भाई-बन्धुको उसके बन्धु-बान्धव पहुँचाने जाते हैं ॥ ४७ ॥

> तमूरुवेगोन्मथिताः सालाश्चान्ये नगोत्तमाः ।  
> अनुजग्मुर्हनूमन्तं सैन्या इव महीपतिम् ॥ ४८ ॥

हनुमान्जीकी जाँघोंके वेगसे उखड़े हुए साल तथा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष उनके पीछे-पीछे उसी प्रकार चले, जैसे राजाके पीछे उसके सैनिक चलते हैं ॥ ४८ ॥

> सुपुष्पिताग्रैर्बहुभिः पादपैरन्वितः कपिः ।  
> हनूमान् पर्वताकारो बभूवाद्भुतदर्शनः ॥ ४९ ॥

जिनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंसे सुशोभित थे, उन बहुतेरे वृक्षोंसे संयुक्त हुए पर्वताकार हनुमान्जी अद्भुत शोभासे सम्पन्न दिखायी दिये ॥ ४९ ॥

> सारवन्तोऽथ ये वृक्षा न्यमज्जँल्लवणाम्भसि ।  
> भयादिव महेन्द्रस्य पर्वता वरुणालये ॥ ५० ॥

उन वृक्षोंमेंसे जो भारी थे, वे थोड़ी ही देरमें गिरकर क्षारसमुद्रमें डूब गये । ठीक उसी तरह, जैसे कितने ही पंखधारी पर्वत देवराज इन्द्रके भयसे वरुणालयमें निमग्न हो गये थे ॥ ५० ॥

> स नानाकुसुमैः कीर्णः कपिः साङ्कुरकोरकैः ।  
> शुशुभे मेघसंकाशः खद्योतैरिव पर्वतः ॥ ५१ ॥

मेघके समान विशालकाय हनुमान्जी अपने साथ खींचकर आये हुए वृक्षोंके अङ्कुर और कोरसहित फूलोंसे आच्छादित हो जुगुनुओंकी जगमगाहटसे युक्त पर्वतके समान शोभा पाते थे ॥ ५१ ॥

> विमुक्तास्तस्य वेगेन मुक्त्वा पुष्पाणि ते द्रुमाः ।  
> व्यवशीर्यन्त सलिले निवृत्ताः सुहृदो यथा ॥ ५२ ॥

वे वृक्ष जब हनुमान्जीके वेगसे मुक्त हो जाते ( उनके आकर्षणसे छूट जाते ), तब अपने फूल बरसाते हुए इस प्रकार समुद्रके जलमें डूब जाते थे, जैसे सुहृद्वर्गके लोग परदेश जानेवाले अपने किसी बन्धुको दूरतक पहुँचाकर लौट आते हैं ॥ ५२ ॥

> लघुत्वेनोपपन्नं तद् विचित्रं सागरेऽपतत् ।  
> द्रुमाणां विविधं पुष्पं कपिवायुसमीरितम् ।  
> ताराचितमिवाकाशं प्रबभौ स महार्णवः ॥ ५३ ॥

हनुमान्जीके शरीरसे उठी हुई वायुसे प्रेरित हो वृक्षोंके भाँति-भाँतिके पुष्प अत्यन्त हल्के होनेके कारण जब समुद्रमें गिरते थे, तब डूबते नहीं थे । इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी । उन फूलोंके कारण वह महासागर तारोंसे भरे हुए आकाशके समान सुशोभित होता था ॥ ५३ ॥

> पुष्पौघेण सुगन्धेन नानावर्णेन वानरः ।  
> बभौ मेघ इवोद्यन् वै विद्युद्गणविभूषितः ॥ ५४ ॥

अनेक रंगकी सुगन्धित पुष्पराशिसे उपलक्षित वानरवीर हनुमान्जी बिजलीसे सुशोभित होकर उठते हुए मेघके समान जान पड़ते थे ॥ ५४ ॥

> तस्य वेगसमुद्धूतैः पुष्पैस्तोयमदृश्यत ।  
> ताराभिरिव रामाभिरुदिताभिरिवाम्बरम् ॥ ५५ ॥

उनके वेगसे झड़े हुए फूलोंके कारण समुद्रका जल उगे हुए रमणीय तारोंसे खचित आकाशके समान दिखायी देता था ॥ ५५ ॥

> तस्याम्बरगतौ बाहू ददृशाते प्रसारितौ ।  
> पर्वताग्राद् विनिष्क्रान्तौ पञ्चास्याविव पन्नगौ ॥ ५६ ॥

आकाशमें फैलायी गयी उनकी दोनों भुजाएँ ऐसी दिखायी देती थीं, मानो किसी पर्वतके शिखरसे पाँच फनवाले दो सर्प निकले हुए हों ॥ ५६ ॥

> पिबन्निव बभौ चापि सोर्मिजालं महार्णवम् ।  
> पिपासुरिव चाकाशं दद्दशे स महाकपिः ॥ ५७ ॥

उस समय महाकपि हनुमान् ऐसे प्रतीत होते थे, मानो तरङ्गमालाओंसहित महासागरको पी रहे हों । वे ऐसे दिखायी देते थे, मानो आकाशको भी पी जाना चाहते हों ॥ ५७ ॥

> तस्य विद्युत्प्रभाकारे वायुमार्गानुसारिणः ।  
> नयने विप्रकाशेते पर्वतस्थाविवानलौ ॥ ५८ ॥

वायुके मार्गका अनुसरण करनेवाले हनुमान्जीके बिजलीकी-सी चमक पैदा करनेवाले दोनों नेत्र ऐसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो पर्वतपर दो स्थानोंमें लगे हुए दावानल दहक रहे हों ॥ ५८ ॥

> पिङ्गे पिङ्गाक्षमुख्यस्य बृहती परिमण्डले ।  
> चक्षुषी सम्प्रकाशेते चन्द्रसूर्याविव स्थितौ ॥ ५९ ॥

पिंगल नेत्रवाले वानरोंमें श्रेष्ठ हनुमान्जीकी दोनों गोल बड़ी-बड़ी और पीले रंगकी आँखें चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित हो रही थीं ॥ ५९ ॥

> मुखं नासिकया तस्य ताम्रया ताम्रमाबभौ ।  
> संध्यया समभिस्पृष्टं यथास्यात् सूर्यमण्डलम् ॥ ६० ॥

लाल-लाल नासिकाके कारण उनका सारा मुँह लाली लिये हुए था, अतः वह संध्याकालसे संयुक्त सूर्यमण्डलके समान सुशोभित होता था ॥ ६० ॥

> लाङ्गूलं च समाविद्धं प्लवमानस्य शोभते ।  
> अम्बरे वायुपुत्रस्य शक्रध्वज इवोच्छ्रितम् ॥ ६१ ॥  
> लाङ्गूलचक्रो हनुमाञ्शुक्लदंष्ट्रोऽनिलात्मजः ।  
> व्यरोचत महाप्राज्ञः परिवेषीव भास्करः ॥ ६२ ॥

आकाशमें तैरते हुए पवनपुत्र हनुमान्की उठी हुई टेढ़ी पूँछ इन्द्रकी ऊँची ध्वजाके समान जान पड़ती थी ॥ महाबुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमान्जीकी दाढ़ें सफेद थीं और पूँछ गोलाकार मुड़ी हुई थी । इसलिये वे परिधिसे घिरे हुए सूर्यमण्डलके समान जान पड़ते थे ॥ ६२ ॥

> स्फिग्देशेनातिताम्रेण रराज स महाकपिः ।  
> महता दारितेनेव गिरिर्गैरिकधातुना ॥ ६३ ॥

उनकी कमरके नीचेका भाग बहुत लाल था । इससे वे महाकपि हनुमान् फटे हुए गेरूसे युक्त विशाल पर्वतके समान शोभा पाते थे ॥ ६३ ॥

> तस्य वानरसिंहस्य प्लवमानस्य सागरम् ।  
> कक्षान्तरगतो वायुर्जीमूत इव गर्जति ॥ ६४ ॥

ऊपर-ऊपरसे समुद्रको पार करते हुए वानरसिंह हनुमान्की काँखसे होकर निकली हुई वायु बादलके समान गरजती थी ॥ ६४ ॥

> खे यथा निपतत्युल्का उत्तरान्ताद् विनिःसृता ।  
> दृश्यते सानुबन्धा च तथा स कपिकुञ्जरः ॥ ६५ ॥

जैसे ऊपरकी दिशासे प्रकट हुई पुच्छयुक्त उल्का आकाशमें जाती देखी जाती है, उसी प्रकार अपनी पूँछके कारण कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी भी दिखायी देते थे ॥ ६५ ॥

> पतत्पतङ्गसंकाशो व्यायतः शुशुभे कपिः ।  
> प्रवृद्ध इव मातङ्गः कक्ष्यया बध्यमानया ॥ ६६ ॥

चलते हुए सूर्यके समान विशालकाय हनुमान्जी अपनी पूँछके कारण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो कोई बड़ा गजराज अपनी कमरमें बँधी हुई रस्सीसे सुशोभित हो रहा हो ॥ ६६ ॥

> उपरिष्टाच्छरीरेण च्छायया चावगाढया ।  
> सागरे मारुताविष्टा नौरिवासीत् तदा कपिः ॥ ६७ ॥

हनुमान्जीका शरीर समुद्रसे ऊपर-ऊपर चल रहा था और उनकी परछाईं जलमें डूबी हुई-सी दिखायी देती थी । इस प्रकार शरीर और परछाईं दोनोंसे उपलक्षित हुए वे कपिवर हनुमान् समुद्रके जलमें पड़ी हुई उस नौकाके समान प्रतीत होते थे, जिसका ऊपरी भाग ( पाल ) वायुसे परिपूर्ण हो और निम्नभाग समुद्रके जलसे लगा हुआ हो ॥ ६७ ॥

> यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः ।  
> स तु तस्याङ्गवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते ॥ ६८ ॥

वे समुद्रके जिस-जिस भागमें जाते थे, वहाँ-वहाँ उनके अङ्गके वेगसे उत्ताल तरङ्गें उठने लगती थीं । अतः वह भाग उन्मत्त ( विक्षुब्ध )-सा दिखायी देता था ॥ ६८ ॥

> सागरस्योर्मिजालानामुरसा शैलवर्ष्मणाम् ।  
> अभिघ्नंस्तु महावेगः पुप्लुवे स महाकपिः ॥ ६९ ॥

महान् वेगशाली महाकपि हनुमान् पर्वतोंके समान ऊँची महासागरकी तरङ्गमालाओंको अपनी छातीसे चूर-चूर करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ६९ ॥

> कपिवातश्च बलवान् मेघवातश्च निर्गतः ।  
> सागरं भीमनिर्ह्रादं कम्पयामासतुर्भृशम् ॥ ७० ॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान्के शरीरसे उठी हुई तथा मेघोंकी घटामें व्याप्त हुई प्रबल वायुने भीषण गर्जना करनेवाले समुद्रमें भारी हलचल मचा दी ॥ ७० ॥

> विकर्षन्नूर्मिजालानि बृहन्ति लवणाम्भसि ।  
> पुप्लुवे कपिशार्दूलो विकिरन्निव रोदसी ॥ ७१ ॥

वे कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेगसे समुद्रमें बहुत-सी ऊँची-ऊँची तरङ्गोंको आकर्षित करते हुए इस प्रकार उड़े जा रहे थे, मानो पृथ्वी और आकाश दोनोंको विक्षुब्ध कर रहे हैं ॥ ७१ ॥

> मेरुमन्दरसंकाशानुद्गतान् सुमहार्णवे ।  
> अत्यक्रामन्महावेगस्तरङ्गान् गणयन्निव ॥ ७२ ॥

वे महान् वेगशाली वानरवीर उस महासमुद्रमें उठी हुई सुमेरु और मन्दराचलके समान उत्ताल तरङ्गोंकी मानो गणना करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ७२ ॥

> तस्य वेगसमुद्धुष्टं जलं सजलदं तदा ।  
> अम्बरस्थं विबभ्राजे शरदभ्रमिवाततम् ॥ ७३ ॥

उस समय उनके वेगसे ऊँचे उठकर मेघमण्डलके साथ आकाशमें स्थित हुआ समुद्रका जल शरत्कालके फैले हुए मेघोंके समान जान पड़ता था ॥ ७३ ॥

> तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा ।  
> वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥ ७४ ॥

जल हट जानेके कारण समुद्रके भीतर रहनेवाले मगर, नाकें, मछलियाँ और कछुए साफ-साफ दिखायी देते थे । जैसे वस्त्र खींच लेनेपर देहधारियोंके शरीर नंगे दीखने लगते हैं ॥ ७४ ॥

> क्रमप्राणं समीक्ष्याथ भुजगाः सागरंगमाः ।  
> व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्णमिव मेनिरे ॥ ७५ ॥

समुद्रमें विचरनेवाले सर्प आकाशमें जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीको देखकर उन्हें गरुड़के ही समान समझने लगे ॥ ७५ ॥

> दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशद्योजनमायता ।  
> छाया वानरसिंहस्य जवे चारुतराभवत् ॥ ७६ ॥

कपिकेसरी हनुमान्जीकी दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी छाया वेगके कारण अत्यन्त रमणीय जान पड़ती थी ॥ ७६ ॥

> श्वेताभ्रघनराजीव वायुपुत्रानुगामिनी ।  
> तस्य सा शुशुभे छाया पतिता लवणाम्भसि ॥ ७७ ॥

खारे पानीके समुद्रमें पड़ी हुई पवनपुत्र हनुमान्का अनुसरण करनेवाली उनकी वह छाया श्वेत बादलोंकी पंक्तिके समान शोभा पाती थी ॥ ७७ ॥

> शुशुभे स महातेजा महाकायो महाकपिः ।  
> वायुमार्गे निरालम्बे पक्षवानिव पर्वतः ॥ ७८ ॥  
> येनासौ याति बलवान् वेगेन कपिकुञ्जरः ।  
> तेन मार्गेण सहसा द्रोणीकृत इवार्णवः ॥ ७९ ॥

वे परम तेजस्वी महाकाय महाकपि हनुमान् आलम्बन-हीन आकाशमें पंखधारी पर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ वे बलवान् कपिश्रेष्ठ जिस मार्गसे वेगपूर्वक निकल जाते थे, उस मार्गसे संयुक्त समुद्र सहसा कठौते या कड़ाहके समान हो जाता था ( उनके वेगसे उठी हुई वायुके द्वारा वहाँका जल हट जानेसे वह स्थान कठौते आदिके समान गहरा-सा दिखायी पड़ता था ) ॥ ७९ ॥

> आपाते पक्षिसङ्घानां पक्षिराज इव व्रजन् ।  
> हनुमान् मेघजालानि प्रकर्षन् मारुतो यथा ॥ ८० ॥

पक्षी-समूहोंके उड़नेके मार्गमें पक्षिराज गरुड़की भाँति जाते हुए हनुमान् वायुके समान मेघमालाओंको अपनी ओर खींच लेते थे ॥ ८० ॥

> पाण्डुरारुणवर्णानि नीलमञ्जिष्ठकानि च ।  
> कपिनाऽऽकृष्यमाणानि महाभ्राणि चकाशिरे ॥ ८१ ॥

हनुमान्जीके द्वारा खींचे जाते हुए वे श्वेत, अरुण, नील और मजीठके-से रंगवाले बड़े-बड़े मेघ वहाँ बड़ी शोभा पाते थे ॥ ८१ ॥

> प्रविशन्नभ्रजालानि निष्पतंश्च पुनः पुनः ।  
> प्रच्छन्नश्च प्रकाशश्च चन्द्रमा इव दृश्यते ॥ ८२ ॥

वे बारंबार बादलोंके समूहमें घुस जाते और बाहर निकल आते थे । इस तरह छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमाके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ ८२ ॥

> प्लवमानं तु तं दृष्ट्वा प्लवगं त्वरितं तदा ।  
> ववृषुस्तत्र पुष्पाणि देवगन्धर्वचारणाः ॥ ८३ ॥

उस समय तीव्रगतिसे आगे बढ़ते हुए वानरवीर हनुमान्जीको देखकर देवता, गन्धर्व और चारण उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ ८३ ॥

> तताप नहि तं सूर्यः प्लवन्तं वानरेश्वरम् ।  
> सिषेवे च तदा वायू रामकार्यार्थसिद्धये ॥ ८४ ॥

वे श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये जा रहे थे, अतः उस समय वेगसे जाते हुए वानरराज हनुमान्को सूर्यदेवने ताप नहीं पहुँचाया और वायुदेवने भी उनकी सेवा की ॥ ८४ ॥

> ऋषयस्तुष्टुवुश्चैनं प्लवमानं विहायसा ।  
> जगुश्च देवगन्धर्वाः प्रशंसन्तो वनौकसम् ॥ ८५ ॥

आकाशमार्गसे यात्रा करते हुए वानरवीर हनुमान्की ऋषि-मुनि स्तुति करने लगे तथा देवता और गन्धर्व उनकी प्रशंसाके गीत गाने लगे ॥ ८५ ॥

> नागाश्च तुष्टुवुर्यक्षा रक्षांसि विविधानि च ।  
> प्रेक्ष्य सर्वे कपिवरं सहसा विगतक्लमम् ॥ ८६ ॥

उन कपिश्रेष्ठको बिना थकावटके सहसा आगे बढ़ते देख नाग, यक्ष और नाना प्रकारके राक्षस सभी उनकी स्तुति करने लगे ॥ ८६ ॥

> तस्मिन् प्लवगशार्दूले प्लवमाने हनूमति ।  
> इक्ष्वाकुकुलमानार्थी चिन्तयामास सागरः ॥ ८७ ॥

जिस समय कपिकेसरी हनुमान्जी उछलकर समुद्र पार कर रहे थे, उस समय इक्ष्वाकुकुलका सम्मान करनेकी इच्छासे समुद्रने विचार किया—॥ ८७ ॥

> साहाय्यं वानरेन्द्रस्य यदि नाहं हनूमतः ।  
> करिष्यामि भविष्यामि सर्ववाच्यो विवक्षताम् ॥ ८८ ॥

‘यदि मैं वानरराज हनुमान्जीकी सहायता नहीं करूँगा तो बोलनेकी इच्छावाले सभी लोगोंकी दृष्टिमें मैं सर्वथा निन्दनीय हो जाऊँगा ॥ ८८ ॥

> अहमिक्ष्वाकुनाथेन सगरेण विवर्धितः ।  
> इक्ष्वाकुसचिवश्चायं तन्नार्हत्यवसादितुम् ॥ ८९ ॥

‘मुझे इक्ष्वाकुकुलके महाराज सगरने बढ़ाया था । इस समय ये हनुमान्जी भी इक्ष्वाकुवंशी वीर श्रीरघुनाथजीकी सहायता कर रहे हैं, अतः इन्हें इस यात्रामें किसी प्रकारका कष्ट नहीं होना चाहिये ॥ ८९ ॥

> तथा मया विधातव्यं विश्रमेत यथा कपिः ।  
> शेषं च मयि विश्रान्तः सुखी सोऽतितरिष्यति ॥९०॥

‘मुझे ऐसा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे वानरवीर यहाँ कुछ विश्राम कर लें । मेरे आश्रयमें विश्राम कर लेनेपर मेरे शेष भागको ये सुगमतासे पार कर लेंगे’ ॥ ९० ॥

> इति कृत्वा मतिं साध्वीं समुद्रश्छन्नमम्भसि ।  
> हिरण्यनाभं मैनाकमुवाच गिरिसत्तमम् ॥९१॥

यह शुभ विचार करके समुद्रने अपने जलमें छिपे हुए सुवर्णमय गिरिश्रेष्ठ मैनाकसे कहा—॥ ९१ ॥

> त्वमिहासुरसङ्घानां देवराज्ञा महात्मना ।  
> पातालनिलयानां हि परिघः संनिवेशितः ॥९२॥

‘शैलप्रवर ! महामना देवराज इन्द्रने तुम्हें यहाँ पाताल-वासी असुरसमूहोंके निकलनेके मार्गको रोकनेके लिये परिघरूपसे स्थापित किया है ॥ ९२ ॥

> त्वमेषां ज्ञातवीर्याणां पुनरेवोत्पतिष्यताम् ।  
> पातालस्याप्रमेयस्य द्वारमावृत्य तिष्ठसि ॥९३॥

‘इन असुरोंका पराक्रम सर्वत्र प्रसिद्ध है । वे फिर पातालसे ऊपरको आना चाहते हैं, अतः उन्हें रोकनेके लिये तुम अप्रमेय पाताललोकके द्वारको बंद करके खड़े हो ॥ ९३ ॥

> तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव शक्तिस्ते शैल वर्धितुम् ।  
> तस्मात् संचोदयामि त्वामुत्तिष्ठ गिरिसत्तम ।९४॥

‘शैल ! ऊपर-नीचे और अगल-बगलमें सब ओर बढ़नेकी तुममें शक्ति है । गिरिश्रेष्ठ ! इसीलिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम ऊपरकी ओर उठो ॥ ९४ ॥

> स एष कपिशार्दूलस्त्वामुपर्येति वीर्यवान् ।  
> हनूमान् रामकार्यार्थी भीमकर्मा खमाप्लुतः ॥९५॥

‘देखो, ये पराक्रमी कपिकेसरी हनुमान् तुम्हारे ऊपर होकर जा रहे हैं । ये बड़ा भयंकर कर्म करनेवाले हैं, इस समय श्रीरामका कार्य सिद्ध करनेके लिये इन्होंने आकाशमें छलाँग मारी है ॥ ९५ ॥

> अस्य साह्यं मया कार्यमिक्ष्वाकुकुलवर्तिनः ।  
> मम इक्ष्वाकवः पूज्याः परं पूज्यतमास्तव ॥९६॥

‘ये इक्ष्वाकुवंशी रामके सेवक हैं, अतः मुझे इनकी सहायता करनी चाहिये । इक्ष्वाकुवंशके लोग मेरे पूजनीय हैं और तुम्हारे लिये तो वे परम पूजनीय हैं ॥ ९६ ॥

> कुरु साचिव्यमस्माकं न नः कार्यमतिक्रमेत् ।  
> कर्तव्यमकृतं कार्यं सतां मन्युमुदीरयेत् ॥९७॥

‘अतः तुम हमारी सहायता करो । जिससे हमारे कर्तव्य कर्मका ( हनुमान्जीके सत्कार रूपी कार्यका ) अवसर बीत न जाय । यदि कर्तव्यका पालन नहीं किया जाय तो वह सत्पुरुषोंके क्रोधको जगा देता है ॥ ९७ ॥

> सलिलादूर्ध्वमुत्तिष्ठ तिष्ठत्वेष कपिस्त्वयि ।  
> अस्माकमतिथिश्चैव पूज्यश्च प्लवतां वरः ॥९८॥

‘इसलिये तुम पानीसे ऊपर उठो, जिससे ये छलाँग मारनेवालोंमें श्रेष्ठ कपिवर हनुमान् तुम्हारे ऊपर कुछ कालतक ठहरें—विश्राम करें । वे हमारे पूजनीय अतिथि भी हैं ॥ ९८ ॥

> चामीकरमहानाभ देवगन्धर्वसेवित ।  
> हनूमांस्त्वयि विश्रान्तस्ततः शेषं गमिष्यति ॥ ९९ ॥

‘देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा सेवित तथा सुवर्णमय विशाल शिखरवाले मैनाक ! तुम्हारे ऊपर विश्राम करनेके पश्चात् हनुमान्जी शेष मार्गको सुखपूर्वक तय कर लेंगे ॥ ९९ ॥

> काकुत्स्थस्यानृशंस्यं च मैथिल्याश्च विवासनम् ।  
> श्रमं च प्लवगेन्द्रस्य समीक्ष्योत्थातुमर्हसि ॥१००॥

‘ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजीकी दयालुता, मिथिलेशकुमारी सीताका परदेशमें रहनेके लिये विवश होना तथा वानरराज हनुमान्का परिश्रम देखकर तुम्हें अवश्य ऊपर उठना चाहिये’ ॥ १०० ॥

> हिरण्यगर्भो मैनाको निशम्य लवणाम्भसः ।  
> उत्पपात जलात् तूर्णं महाद्रुमलतावृतः ॥१०१॥

यह सुनकर बड़े-बड़े वृक्षों और लताओंसे आवृत सुवर्णमय मैनाक पर्वत तुरंत ही क्षार समुद्रके जलसे ऊपरको उठ गया ॥ १०१ ॥

> स सागरजलं भित्त्वा बभूवात्युच्छ्रितस्तदा ।  
> यथा जलधरं भित्त्वा दीप्तरश्मिर्दिवाकरः ॥१०२॥

जैसे उद्दीप्त किरणोंवाले दिवाकर ( सूर्य ) मेघोंके आवरणको भेदकर उदित होते हैं, उसी प्रकार उस समय महासागरके जलका भेदन करके वह पर्वत बहुत ऊँचा उठ गया ॥ १०२ ॥

> स महात्मा मुहूर्तेन पर्वतः सलिलावृतः ।  
> दर्शयामास शृङ्गाणि सागरेण नियोजितः ॥१०३॥

समुद्रकी आज्ञा पाकर जलमें छिपे रहनेवाले उस विशालकाय पर्वतने दो ही घड़ीमें हनुमान्जीको अपने शिखरोंका दर्शन कराया ॥ १०३ ॥

> शातकुम्भमयैः शृङ्गैः सकिन्नरमहोरगैः ।  
> आदित्योदयसंकाशैरुल्लिखद्भिरिवाम्बरम् ॥१०४॥

उस पर्वतके वे शिखर सुवर्णमय थे । उनपर किन्नर और बड़े बड़े नाग निवास करते थे । सूर्योदयके समान तेजःपुञ्जसे विभूषित वे शिखर इतने ऊँचे थे कि आकाशमें रेखा-सी खींच रहे थे ॥ १०४ ॥

> तस्य जाम्बूनदैः शृङ्गैः पर्वतस्य समुत्थितैः ।  
> आकाशं शस्त्रसंकाशमभवत् काञ्चनप्रभम् ॥१०५॥

उस पर्वतके उठे हुए सुवर्णमय शिखरोंके कारण शस्त्रके समान नील वर्णवाला आकाश सुनहरी प्रभासे उद्भासित होने लगा ॥ १०५ ॥

> जातरूपमयैः शृङ्गैर्भ्राजमानैर्महाप्रभैः ।  
> आदित्यशतसंकाशः सोऽभवद् गिरिसत्तमः ॥ १०६॥

उन परम कान्तिमान् और तेजस्वी सुवर्णमय शिखरोंसे वह गिरिश्रेष्ठ मैनाक सैकड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान हो रहा था ॥ १०६ ॥

> समुत्थितमसङ्गेन हनूमानग्रतः स्थितम् ।  
> मध्ये लवणतोयस्य विघ्नोऽयमिति निश्चितः ॥ १०७॥

क्षार समुद्रके बीचमें अविलम्ब उठकर सामने खड़े हुए मैनाकको देखकर हनुमान्जीने मन-ही-मन निश्चित किया कि यह कोई विघ्न उपस्थित हुआ है ॥ १०७ ॥

> स तमुच्छ्रितमत्यर्थं महावेगो महाकपिः ।  
> उरसा पातयामास जीमूतमिव मारुतः ॥ ॥१०८॥

अतः वायु जैसे बादलको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार महान् वेगशाली महाकपि हनुमान्ने बहुत ऊँचे उठे हुए मैनाक पर्वतके उस उच्चतर शिखरको अपनी छातीके धक्केसे नीचे गिरा दिया ॥ १०८ ॥

> स तदासादितस्तेन कपिना पर्वतोत्तमः ।  
> बुद्ध्वा तस्य हरेर्वेगं जहर्ष च ननाद च ॥१०९॥

इस प्रकार कपिवर हनुमान्जीके द्वारा नीचा देखनेपर उनके उस महान् वेगका अनुभव करके पर्वतश्रेष्ठ मैनाक बड़ा प्रसन्न हुआ और गर्जना करने लगा ॥ १०९ ॥

> तमाकाशगतं वीरमाकाशे समुपस्थितः ।  
> प्रीतो हृष्टमना वाक्यमब्रवीत् पर्वतः कपिम् ॥ ११०॥  
> मानुषं धारयन् रूपमात्मनः शिखरे स्थितः ।

तब आकाशमें स्थित हुए उस पर्वतने आकाशगत वीर वानर हनुमान्जीसे प्रसन्नचित्त होकर कहा । वह मनुष्यरूप धारण करके अपने ही शिखरपर स्थित हो इस प्रकार बोला—॥ ११०½ ॥

> दुष्करं कृतवान् कर्म त्वमिदं वानरोत्तम ॥१११॥  
> निपत्य मम शृङ्गेषु सुखं विश्रम्य गम्यताम् ।

‘वानरशिरोमणे ! आपने यह दुष्कर कर्म किया है । अब उतरकर मेरे इन शिखरोंपर सुखपूर्वक विश्राम कर लीजिये, फिर आगेकी यात्रा कीजियेगा ॥ १११½ ॥

> राघवस्य कुले जातैरुदधिः परिवर्धितः ॥११२॥  
> स त्वां रामहिते युक्तं प्रत्यर्चयति सागरः ।

‘श्रीरघुनाथजीके पूर्वजोंने समुद्रकी वृद्धि की थी, इस समय आप उनका हित करनेमें लगे हैं; अतः समुद्र आपका सत्कार करना चाहता है ॥ ११२½ ॥

> कृते च प्रतिकर्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥११३॥  
> सोऽयं तत्प्रतिकारार्थी त्वत्तः सम्मानमर्हति ।

‘किसीने उपकार किया हो तो बदलेमें उसका भी उपकार किया जाय—यह सनातन धर्म है । इस दृष्टिसे प्रत्युपकार करनेकी इच्छावाला यह सागर आपसे सम्मान पानेके योग्य है ( आप इसका सत्कार ग्रहण करें, इतनेसे ही इसका सम्मान हो जायगा ) ॥ ११३½ ॥

> त्वन्निमित्तमनेनाहं बहुमानात् प्रचोदितः ॥११४॥  
> योजनानां शतं चापि कपिरेष खमाप्लुतः ।  
> तव सानुषु विश्रान्तः शेषं प्रक्रमतामिति ॥११५॥

‘आपके सत्कारके लिये समुद्रने बड़े आदरसे मुझे नियुक्त किया है और कहा है—‘इन कपिवर हनुमान्ने सौ योजन दूर जानेके लिये आकाशमें छलाँग मारी है, अतः कुछ देरतक तुम्हारे शिखरोंपर ये विश्राम कर लें, फिर शेष भागका लङ्घन करेंगे’ ॥ ११४-११५ ॥

> तिष्ठ त्वं हरिशार्दूल मयि विश्रम्य गम्यताम् ।  
> तदिदं गन्धवत् स्वादु कन्दमूलफलं बहु ॥११६॥  
> तदास्वाद्य हरिश्रेष्ठ विश्रान्तोऽथ गमिष्यसि ।

‘अतः कपिश्रेष्ठ ! आप कुछ देरतक मेरे ऊपर विश्राम कर लीजिये, फिर जाइयेगा । इस स्थानपर ये बहुत-से सुगन्धित और सुस्वादु कन्द, मूल तथा फल हैं । वानरशिरोमणे ! इनका आस्वादन करके थोड़ी देरतक सुस्ता लीजिये । उसके बाद आगेकी यात्रा कीजियेगा ॥ ११६½ ॥

> अस्माकमपि सम्बन्धः कपिमुख्य त्वयास्ति वै ।  
> प्रख्यातस्त्रिषु लोकेषु महागुणपरिग्रहः ॥११७॥

‘कपिवर ! आपके साथ हमारा भी कुछ सम्बन्ध है । आप महान् गुणोंका संग्रह करनेवाले और तीनों लोकोंमें विख्यात हैं ॥ ११७ ॥

> वेगवन्तः प्लवन्तो ये प्लवगा मारुतात्मज ।  
> तेषां मुख्यतमं मन्ये त्वामहं कपिकुञ्जर ॥११८॥

‘कपिश्रेष्ठ पवननन्दन ! जो-जो वेगशाली और छलाँग मारनेवाले वानर हैं, उन सबमें मैं आपहीको श्रेष्ठतम मानता हूँ ॥ ११८ ॥

> अतिथिः किल पूजार्हः प्राकृतोऽपि विजानता ।  
> धर्मं जिज्ञासमानेन किं पुनर्यादृशो भवान् ॥११९॥

‘धर्मकी जिज्ञासा रखनेवाले विज्ञ पुरुषके लिये एक साधारण अतिथि भी निश्चय ही पूजाके योग्य माना गया है । फिर आप-जैसे असाधारण शौर्यशाली पुरुष कितने सम्मानके योग्य हैं, इस विषयमें तो कहना क्या है ? ॥११९॥

> त्वं हि देववरिष्ठस्य मारुतस्य महात्मनः ।  
> पुत्रस्तस्यैव वेगेन सदृशः कपिकुञ्जर ॥१२०॥

‘कपिश्रेष्ठ ! आप देवशिरोमणि महात्मा वायुके पुत्र हैं और वेगमें भी उन्हींके समान हैं ॥ १२० ॥

> पूजिते त्वयि धर्मज्ञे पूजां प्राप्नोति मारुतः ।  
> तस्मात् त्वं पूजनीयो मे शृणु चाप्यत्र कारणम् ॥१२१॥

‘आप धर्मके ज्ञाता हैं । आपकी पूजा होनेपर साक्षात् वायुदेवका पूजन हो जायगा । इसलिये आप अवश्य ही मेरे पूजनीय हैं । इसमें एक और भी कारण है, उसे सुनिये ॥ १२१ ॥

> पूर्वं कृतयुगे तात पर्वताः पक्षिणोऽभवन् ।  
> तेऽपि जग्मुर्दिशः सर्वा गरुडा इव वेगिनः ॥ १२२ ॥

‘तात ! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है । उन दिनों पर्वतोंके भी पंख होते थे । वे भी गरुड़के समान वेगशाली होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें उड़ते-फिरते थे ॥ १२२ ॥

> ततस्तेषु प्रयातेषु देवसङ्घाः सहर्षिभिः ।  
> भूतानि च भयं जग्मुस्तेषां पतनशङ्कया ॥ १२३ ॥

‘उनके इस तरह वेगपूर्वक उड़ने और आने-जानेपर देवता, ऋषि और समस्त प्राणियोंको उनके गिरनेकी आशङ्कासे बड़ा भय होने लगा ॥ १२३ ॥

> ततः क्रुद्धः सहस्राक्षः पर्वतानां शतक्रतुः ।  
> पक्षांश्चिच्छेद वज्रेण ततः शतसहस्रशः ॥ १२४ ॥  
> स मामुपगतः क्रुद्धो वज्रमुद्यम्य देवराट् ।  
> ततोऽहं सहसा क्षिप्तः श्वसनेन महात्मना ॥ १२५ ॥

‘इससे सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र कुपित हो उठे और उन्होंने अपने वज्रसे लाखों पर्वतोंके पंख काट डाले ॥ ‘उस समय कुपित हुए देवराज इन्द्र वज्र उठाये मेरी ओर भी आये, किंतु महात्मा वायुने सहसा मुझे इस समुद्रमें गिरा दिया ॥ १२५ ॥

> अस्मिल्लवणतोये च प्रक्षिप्तः प्लवगोत्तम ।  
> गुप्तपक्षः समग्रश्च तव पित्राभिरक्षितः ॥ १२६ ॥

‘वानरश्रेष्ठ ! इस क्षार समुद्रमें गिराकर आपके पिताने मेरे पंखोंकी रक्षा कर ली और मैं अपने सम्पूर्ण अंशसे सुरक्षित बच गया ॥ १२६ ॥

> ततोऽहं मानयामि त्वां मान्योऽसि मम मारुते ।  
> त्वया ममैष सम्बन्धः कपिमुख्य महागुणः ॥ १२७ ॥

‘पवननन्दन ! कपिश्रेष्ठ ! इसीलिये मैं आपका आदर करता हूँ । आप मेरे माननीय हैं । आपके साथ मेरा यह सम्बन्ध महान् गुणोंसे युक्त है ॥ १२७ ॥

> अस्मिन्नेवंगते कार्ये सागरस्य ममैव च ।  
> प्रीतिं प्रीतमनाः कर्तुं त्वमर्हसि महामते ॥ १२८ ॥

‘महामते ! इस प्रकार चिरकालके बाद जो यह प्रत्युपकाररूप कार्य ( आपके पिताके उपकारका बदला चुकानेका अवसर ) प्राप्त हुआ है, इसमें आप प्रसन्नचित्त होकर मेरी और समुद्रकी भी प्रीतिका सम्पादन करें ( हमारा आतिथ्य ग्रहण करके हमें संतुष्ट करें ) ॥ १२८ ॥

> श्रमं मोक्षय पूजां च गृहाण हरिसत्तम ।  
> प्रीतिं च मम मान्यस्य प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात् ॥ १२९ ॥

‘वानरशिरोमणे ! आप यहाँ अपनी थकान उतारिये, हमारी पूजा ग्रहण कीजिये और मेरे प्रेमको भी स्वीकार कीजिये । मैं आप-जैसे माननीय पुरुषके दर्शनसे बहुत प्रसन्न हुआ हूँ’ ॥ १२९ ॥

> एवमुक्तः कपिश्रेष्ठस्तं नगोत्तममब्रवीत् ।  
> प्रीतोऽस्मि कृतमातिथ्यं मन्युरेषोऽपनीयताम् ॥ १३० ॥

मैनाकके ऐसा कहनेपर कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीने उस उत्तम पर्वतसे कहा—‘मैनाक ! मुझे भी आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई है । मेरा आतिथ्य हो गया । अब आप अपने मनसे यह दुःख अथवा चिन्ता निकाल दीजिये कि इन्होंने मेरी पूजा ग्रहण नहीं की ॥ १३० ॥

> त्वरते कार्यकालो मे अहश्चाप्यतिवर्तते ।  
> प्रतिज्ञा च मया दत्ता न स्थातव्यमिहान्तरा ॥ १३१ ॥

‘मेरे कार्यका समय मुझे बहुत जल्दी करनेके लिये प्रेरित कर रहा है । यह दिन भी बीता जा रहा है । मैंने वानरोंके समीप यह प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं यहाँ बीचमें कहीं नहीं ठहर सकता’ ॥ १३१ ॥

> इत्युक्त्वा पाणिना शैलमालभ्य हरिपुङ्गवः ।  
> जगामाकाशमाविश्य वीर्यवान् प्रहसन्निव ॥ १३२ ॥

ऐसा कहकर महाबली वानरशिरोमणि हनुमान्ने हँसते हुए-से वहाँ मैनाकका अपने हाथसे स्पर्श किया और आकाशमें ऊपर उठकर चलने लगे ॥ १३२ ॥

> स पर्वतसमुद्राभ्यां बहुमानादवेक्षितः ।  
> पूजितश्चोपपन्नाभिराशीर्भिरभिनन्दितः ॥ १३३ ॥

उस समय पर्वत और समुद्र दोनोंने ही बड़े आदरसे उनकी ओर देखा, उनका सत्कार किया और यथोचित आशीर्वादोंसे उनका अभिनन्दन किया ॥ १३३ ॥

> अथोर्ध्वं दूरमागत्य हित्वा शैलमहार्णवौ ।  
> पितुः पन्थानमासाद्य जगाम विमलेऽम्बरे ॥ १३४ ॥

फिर पर्वत और समुद्रको छोड़कर उनसे दूर ऊपर उठकर अपने पिताके मार्गका आश्रय ले हनुमान्जी निर्मल आकाशमें चलने लगे ॥ १३४ ॥

> भूयश्चोर्ध्वं गतिं प्राप्य गिरिं तमवलोकयन् ।  
> वायुसूनुर्निरालम्बो जगाम कपिकुञ्जरः ॥ १३५ ॥

तत्पश्चात् और भी ऊँचे उठकर उस पर्वतको देखते हुए कपिश्रेष्ठ पवनपुत्र हनुमान्जी बिना किसी आधारके आगे बढ़ने लगे ॥ १३५ ॥

> तद् द्वितीयं हनुमतो दृष्ट्वा कर्म सुदुष्करम् ।  
> प्रशशंसुः सुराः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ १३६ ॥

हनुमान्जीका यह दूसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देखकर सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और महर्षिगण उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ १३६ ॥

> देवताश्चाभवन् हृष्टास्तत्रस्थास्तस्य कर्मणा ।  
> काञ्चनस्य सुनाभस्य सहस्राक्षश्च वासवः ॥ १३७ ॥

वहाँ आकाशमें ठहरे हुए देवता तथा सहस्र नेत्रधारी इन्द्र उस सुन्दर मध्य भागवाले सुवर्णमय मैनाक पर्वतके उस कार्यसे बहुत प्रसन्न हुए ॥ १३७ ॥

> उवाच वचनं धीमान् परितोषात् सगद्गदम् ।  
> सुनाभं पर्वतश्रेष्ठं स्वयमेव शचीपतिः ॥ १३८॥

उस समय स्वयं बुद्धिमान् शचीपति इन्द्रने अत्यन्त संतुष्ट होकर पर्वतश्रेष्ठ सुनाभ मैनाकसे गद्गद वाणीमें कहा—॥ १३८ ॥

> हिरण्यनाभ शैलेन्द्र परितुष्टोऽस्मि ते भृशम् ।  
> अभयं ते प्रयच्छामि गच्छ सौम्य यथासुखम् ॥ १३९॥

‘सुवर्णमय शैलराज मैनाक ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । सौम्य ! तुम्हें अभय दान देता हूँ । तुम सुखपूर्वक जहाँ चाहो, जाओ ॥ १३९ ॥

> साह्यं कृतं ते सुमहद् विश्रान्तस्य हनूमतः ।  
> क्रमतो योजनशतं निर्भयस्य भये सति ॥ १४०॥

‘सौ योजन समुद्रको लाँघते समय जिनके मनमें कोई भय नहीं रहा है, फिर भी जिनके लिये हमारे हृदयमें यह भय था कि पता नहीं इनका क्या होगा ? उन्हीं हनुमान्जीको विश्रामका अवसर देकर तुमने उनकी बहुत बड़ी सहायता की है ॥ १४० ॥

> रामस्यैष हितायैव याति दाशरथेः कपिः ।  
> सत्क्रियां कुर्वता शक्त्या तोषितोऽस्मि दृढं त्वया॥ १४१॥

‘ये वानरश्रेष्ठ हनुमान् दशरथनन्दन श्रीरामकी सहायताके लिये ही जा रहे हैं । तुमने यथाशक्ति इनका सत्कार करके मुझे पूर्ण संतोष प्रदान किया है’ ॥ १४१ ॥

> स तत् प्रहर्षमलभद् विपुलं पर्वतोत्तमः ।  
> देवतानां पतिं दृष्ट्वा परितुष्टं शतक्रतुम् ॥ १४२॥

देवताओंके स्वामी शतक्रतु इन्द्रको संतुष्ट देखकर पर्वतोंमें श्रेष्ठ मैनाकको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १४२ ॥

> स वै दत्तवरः शैलो बभूवावस्थितस्तदा ।  
> हनूमांश्च मुहूर्तेन व्यतिचक्राम सागरम् ॥ १४३॥

इस प्रकार इन्द्रका दिया हुआ वर पाकर मैनाक उस समय जलमें स्थित हो गया और हनुमान्जी समुद्रके उस प्रदेशको उसी मुहूर्तमें लाँघ गये ॥ १४३ ॥

> ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।  
> अब्रुवन् सूर्यसंकाशां सुरसां नागमातरम् ॥ १४४॥

तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियोंने सूर्यतुल्य तेजस्विनी नागमाता सुरसासे कहा—॥ १४४ ॥

> अयं वातात्मजः श्रीमान् प्लवते सागरोपरि ।  
> हनूमान् नाम तस्य त्वं मुहूर्तं विघ्नमाचर ॥ १४५॥

‘ये पवननन्दन श्रीमान् हनुमान्जी समुद्रके ऊपर होकर जा रहे हैं । तुम दो घड़ीके लिये इनके मार्गमें विघ्न डाल दो ॥ १४५ ॥

> राक्षसं रूपमास्थाय सुघोरं पर्वतोपमम् ।  
> दंष्ट्राकरालं पिङ्गाक्षं वक्त्रं कृत्वा नभःस्पृशम् ॥ १४६॥

‘तुम पर्वतके समान अत्यन्त भयंकर राक्षसीका रूप धारण करो । उसमें विकराल दाढ़ें, पीले नेत्र और आकाशको स्पर्श करनेवाला विकट मुँह बनाओ ॥ १४६ ॥

> बलमिच्छामहे ज्ञातुं भूयश्चास्य पराक्रमम् ।  
> त्वां विजेष्यत्युपायेन विषादं वा गमिष्यति ॥ १४७॥

‘हमलोग पुनः हनुमान्जीके बल और पराक्रमकी परीक्षा लेना चाहते हैं । या तो किसी उपायसे ये तुम्हें जीत लेंगे अथवा विषादमें पड़ जायँगे ( इससे इनके बलाबलका ज्ञान हो जायगा )’ ॥ १४७ ॥

> एवमुक्ता तु सा देवी दैवतैरभिसत्कृता ।  
> समुद्रमध्ये सुरसा बिभ्रती राक्षसं वपुः ॥ १४८॥  
> विकृतं च विरूपं च सर्वस्य च भयावहम् ।  
> प्लवमानं हनूमन्तमावृत्येदमुवाच ह ॥ १४९॥

देवताओंके सत्कारपूर्वक इस प्रकार कहनेपर देवी सुरसाने समुद्रके बीचमें राक्षसीका रूप धारण किया । उसका वह रूप बड़ा ही विकट, बेडौल और सबके लिये भयावना था । वह समुद्रके पार जाते हुए हनुमान्जीको घेरकर उनसे इस प्रकार बोली—॥ १४८-१४९ ॥

> मम भक्ष्यः प्रदिष्टस्त्वमीश्वरैर्वानरर्षभ ।  
> अहं त्वां भक्षयिष्यामि प्रविशेदं ममाननम् ॥ १५०॥

‘कपिश्रेष्ठ ! देवेश्वरोंने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताकर मुझे अर्पित कर दिया है, अतः मैं तुम्हें खाऊँगी । तुम मेरे इस मुँहमें चले आओ ॥ १५० ॥

> वर एष पुरा दत्तो मम धात्रेति सत्वरा ।  
> व्यादाय वक्त्रं विपुलं स्थिता सा मारुतेः पुरः ॥ १५१॥

‘पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मुझे यह वर दिया था ।’ ऐसा कहकर वह तुरंत ही अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान्जीके सामने खड़ी हो गयी ॥ १५१ ॥

> एवमुक्तः सुरसया प्रहृष्टवदनोऽब्रवीत् ।  
> रामो दाशरथिर्नाम प्रविष्टो दण्डकावनम् ।  
> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या चापि भार्यया ॥ १५२॥

सुरसाके ऐसा कहनेपर हनुमान्जीने प्रसन्नमुख होकर कहा—‘देवि ! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और धर्मपत्नी सीताजीके साथ दण्डकारण्यमें आये थे ॥ १५२ ॥

> अन्यकार्यविषक्तस्य बद्धवैरस्य राक्षसैः ।  
> तस्य सीता हृता भार्या रावणेन यशस्विनी ॥ १५३॥

‘वहाँ परहित-साधनमें लगे हुए श्रीरामका राक्षसोंके साथ वैर बँध गया । अतः रावणने उनकी यशस्विनी भार्या सीताको हर लिया ॥ १५३ ॥

> तस्याः सकाशं दूतोऽहं गमिष्ये रामशासनात् ।  
> कर्तुमर्हसि रामस्य साह्यं विषयवासिनि ॥ १५४ ॥

‘मैं श्रीरामकी आज्ञासे उनका दूत बनकर सीताजीके पास जा रहा हूँ । तुम भी श्रीरामके राज्यमें निवास करती हो । अतः तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिये ॥ १५४ ॥

> अथवा मैथिलीं दृष्ट्वा रामं चाक्लिष्टकारिणम् ।  
> आगमिष्यामि ते वक्त्रं सत्यं प्रतिशृणोमि ते ॥ १५५ ॥

‘अथवा ( यदि तुम मुझे खाना ही चाहती हो तो ) मैं सीताजीका दर्शन करके अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीसे जब मिल लूँगा, तब तुम्हारे मुखमें आ जाऊँगा—यह तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ’ ॥१५५॥

> एवमुक्ता हनुमता सुरसा कामरूपिणी ।  
> अब्रवीन्नातिवर्तेन्मां कश्चिदेष वरो मम ॥ १५६ ॥

हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली सुरसा बोली—‘मुझे यह वर मिला है कि कोई भी मुझे लाँघकर आगे नहीं जा सकता’ ॥ १५६ ॥

> तं प्रयान्तं समुद्वीक्ष्य सुरसा वाक्यमब्रवीत् ।  
> बलं जिज्ञासमाना सा नागमाता हनूमतः ॥ १५७ ॥

फिर भी हनुमान्जीको जाते देख उनके बलको जाननेकी इच्छा रखनेवाली नागमाता सुरसाने उनसे कहा—॥१५७॥

> निविश्य वक्त्रं मेऽद्य गन्तव्यं वानरोत्तम ।  
> वर एष पुरा दत्तो मम धात्रेति सत्वरा ॥ १५८ ॥  
> व्यादाय विपुलं वक्त्रं स्थिता सा मारुतेः पुरः ।

‘वानरश्रेष्ठ ! आज मेरे मुखमें प्रवेश करके ही तुम्हें आगे जाना चाहिये । पूर्वकालमें विधाताने मुझे ऐसा ही वर दिया था।’ ऐसा कहकर सुरसा तुरंत अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान्जीके सामने खड़ी हो गयी ॥ १५८½ ॥

> एवमुक्तः सुरसया क्रुद्धो वानरपुंगवः ॥ १५९ ॥  
> अब्रवीत् कुरु वै वक्त्रं येन मां विषहिष्यसि ।  
> इत्युक्त्वा सुरसां क्रुद्धो दशयोजनमायताम् ॥ १६० ॥  
> दशयोजनविस्तारो हनूमानभवत् तदा ।  
> तं दृष्ट्वा मेघसंकाशं दशयोजनमायतम् ।  
> चकार सुरसाप्यास्यं विंशद्योजनमायतम् ॥ १६१ ॥

सुरसाके ऐसा कहनेपर वानरशिरोमणि हनुमान्जी कुपित हो उठे और बोले—‘तुम अपना मुँह इतना बड़ा बना लो जिससे उसमें मेरा भार सह सको’ यों कहकर जब वे मौन हुए, तब सुरसाने अपना मुख दस योजन विस्तृत बना लिया । यह देखकर कुपित हुए हनुमान्जी भी तत्काल दस योजन बड़े हो गये । उन्हें मेघके समान दस योजन विस्तृत शरीरसे युक्त हुआ देख सुरसाने भी अपने मुखको बीस योजन बड़ा बना लिया ॥ १५९–१६१ ॥

> हनूमांस्तु ततः क्रुद्धस्त्रिंशद्योजनमायतः ।  
> चकार सुरसा वक्त्रं चत्वारिंशत् तथोच्छ्रितम् ॥ १६२ ॥

तब हनुमान्जीने क्रुद्ध होकर अपने शरीरको तीस योजन अधिक बढ़ा दिया । फिर तो सुरसाने भी अपने मुँहको चालीस योजन ऊँचा कर लिया ॥ १६२ ॥

> बभूव हनुमान् वीरः पञ्चाशाद् योजनोच्छ्रितः ।  
> चकार सुरसा वक्त्रं षष्टिं योजनमुच्छ्रितम् ॥ १६३ ॥

यह देख वीर हनुमान् पचास योजन ऊँचे हो गये । तब सुरसाने अपना मुँह साठ योजन ऊँचा बना लिया ॥१६३॥

> तदैव हनुमान् वीरः सप्ततिं योजनोच्छ्रितः ।  
> चकार सुरसा वक्त्रमशीतिं योजनोच्छ्रितम् ॥ १६४ ॥  
> हनूमाननलप्रख्यो नवतिं योजनोच्छ्रितः ।  
> चकार सुरसा वक्त्रं शतयोजनमायतम् ॥ १६५ ॥

फिर तो वीर हनुमान् उसी क्षण सत्तर योजन ऊँचे हो गये । अब सुरसाने अस्सी योजन ऊँचा मुँह बना लिया ॥ तदनन्तर अग्निके समान तेजस्वी हनुमान् नब्बे योजन ऊँचे हो गये । यह देख सुरसाने भी अपने मुँहका विस्तार सौ योजनका कर लिया* ॥ १६५ ॥

> तद् दृष्ट्वा व्यादितं त्वास्यं वायुपुत्रः स बुद्धिमान् ।  
> दीर्घजिह्वं सुरसया सुभीमं नरकोपमम् ॥ १६६ ॥  
> स संक्षिप्यात्मनः कायं जीमूत इव मारुतिः ।  
> तस्मिन् मुहूर्ते हनुमान् बभूवाङ्गुष्ठमात्रकः ॥ १६७ ॥

सुरसाके फैलाये हुए उस विशाल जिह्वासे युक्त और नरकके समान अत्यन्त भयंकर मुँहको देखकर बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान्ने मेघकी भाँति अपने शरीरको संकुचित कर लिया। वे उसी क्षण अंगूठेके बराबर छोटे हो गये ॥१६६-१६७॥

> सोऽभिपद्याथ तद्वक्त्रं निष्पत्य च महाबलः ।  
> अन्तरिक्षे स्थितः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥ १६८ ॥

फिर वे महाबली श्रीमान् पवनकुमार सुरसाके उस मुँहमें प्रवेश करके तुरंत निकल आये और आकाशमें खड़े होकर इस प्रकार बोले—॥ १६८ ॥

> प्रविष्टोऽस्मि हि ते वक्त्रं दाक्षायणि नमोऽस्तु ते ।  
> गमिष्ये यत्र वैदेही सत्यश्चासीद् वरस्तव ॥ १६९ ॥

‘दक्षकुमारी ! तुम्हें नमस्कार है। मैं तुम्हारे मुँहमें प्रवेश कर चुका। लो तुम्हारा वर भी सत्य हो गया। अब मैं उस स्थानको जाऊँगा, जहाँ विदेहकुमारी सीता विद्यमान हैं’ ॥ १६९ ॥

> तं दृष्ट्वा वदनान्मुक्तं चन्द्रं राहुमुखादिव ।  
> अब्रवीत् सुरसा देवी स्वेन रूपेण वानरम् ॥ १७० ॥

राहुके मुखसे छूटे हुए चन्द्रमाकी भाँति अपने मुखसे मुक्त हुए हनुमान्जीको देखकर सुरसा देवीने अपने असली रूपमें प्रकट होकर उन वानरवीरसे कहा–॥ १७० ॥

> अर्थसिद्ध्यै हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम् ।  
> समानय च वैदेहीं राघवेण महात्मना ॥ १७१॥

‘कपिश्रेष्ठ ! तुम भगवान् श्रीरामके कार्यकी सिद्धिके लिये सुखपूर्वक जाओ । सौम्य ! विदेहनन्दिनी सीताको महात्मा श्रीरामसे शीघ्र मिलाओ’ ॥ १७१ ॥

> तत् तृतीयं हनुमतो दृष्ट्वा कर्म सुदुष्करम् ।  
> साधुसाध्विति भूतानि प्रशशंसुस्तदा हरिम् ॥ १७२॥  
> स सागरमनाधृष्यमभ्येत्य वरुणालयम् ।  
> जगामाकाशमाविश्य वेगेन गरुडोपमः ॥ १७३॥  
> सेविते वारिधाराभिः पतगैश्च निषेविते ।  
> चरिते कैशिकाचार्यैरावतनिषेविते ॥ १७४॥  
> सिंहकुञ्जरशार्दूलपतगोरगवाहनैः ।  
> विमानैः सम्पतद्भिश्च विमलैः समलंकृते ॥ १७५॥  
> वज्राशनिसमस्पर्शैः पावकैरिव शोभिते ।  
> कृतपुण्यैर्महाभागैः स्वर्गजिद्भिरधिष्ठिते ॥ १७६॥  
> वहता हव्यमत्यन्तं सेविते चित्रभानुना ।  
> ग्रहनक्षत्रचन्द्रार्कतारागणविभूषिते ॥ १७७॥  
> महर्षिगणगन्धर्वनागयक्षसमाकुले ।  
> विविक्ते विमले विश्वे विश्वावसुनिषेविते ॥ १७८॥  
> देवराजगजाक्रान्ते चन्द्रसूर्यपथे शिवे ।  
> विताने जीवलोकस्य वितते ब्रह्मनिर्मिते ॥ १७९॥  
> बहुशः सेविते वीरैर्विद्याधरगणैर्वृते ।  
> जगाम वायुमार्गे च गरुत्मानिव मारुतिः ॥ १८०॥

कपिवर हनुमान्जीका यह तीसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देख सब प्राणी वाह-वाह करके उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ वे वरुणके निवासभूत अलङ्घ्य समुद्रके निकट आकर आकाशका ही आश्रय ले गरुड़के समान वेगसे आगे बढ़ने लगे ॥ जो जलकी धाराओंसे सेवित, पक्षियोंसे संयुक्त, गान-विद्याके आचार्य तुम्बुरु आदि गन्धर्वोंके विचरणका स्थान तथा ऐरावतके आने-जानेका मार्ग है, सिंह, हाथी, बाघ, पक्षी और सर्प आदि वाहनोंसे जुते और उड़ते हुए निर्मल विमान जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जिनका स्पर्श वज्र और अशनिके समान दुःसह तथा तेज अग्निके समान प्रकाशमान है तथा जो स्वर्गलोकपर विजय पा चुके हैं, ऐसे महाभाग पुण्यात्मा पुरुषोंका जो निवासस्थान है, देवताके लिये अधिक मात्रामें हविष्यका भार वहन करनेवाले अग्निदेव जिसका सदा सेवन करते हैं, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और तारे आभूषणकी भाँति जिसे सजाते हैं, महर्षियोंके समुदाय, गन्धर्व, नाग और यक्ष जहाँ भरे रहते हैं, जो जगत्का आश्रय-स्थान, एकान्त और निर्मल है, गन्धर्वराज विश्वावसु जिसमें निवास करते हैं, देवराज इन्द्रका हाथी जहाँ चलता-फिरता है, जो चन्द्रमा और सूर्यका भी मङ्गलमय मार्ग है, इस जीव-जगत्के लिये विमल वितान (चँदोवा) है, साक्षात् परब्रह्म परमात्माने ही जिसकी सृष्टि की है, जो बहुसंख्यक वीरोंसे सेवित और विद्याधरगणोंसे आवृत है, उस वायुपथ आकाशमें पवननन्दन हनुमान्जी गरुड़के समान वेगसे चले ॥ १७४—१८० ॥

> हनुमान् मेघजालानि प्राकर्षन् मारुतो यथा ।  
> कालागुरुसवर्णानि रक्तपीतसितानि च ॥ १८१॥

वायुके समान हनुमान्जी अगरके समान काले तथा लाल, पीले और श्वेत बादलोंको खींचते हुए आगे बढ़ने लगे ॥ १८१ ॥

> कपिना कृष्यमाणानि महाभ्राणि चकाशिरे ।  
> प्रविशन्नभ्रजालानि निष्पतंश्च पुनः पुनः ॥ १८२॥  
> प्रावृषीन्दुरिवाभाति निष्पतन् प्रविशंस्तदा ।

उनके द्वारा खींचे जाते हुए वे बड़े-बड़े बादल अद्भुत शोभा पा रहे थे । वे बारंबार मेघ-समूहोंमें प्रवेश करते और बाहर निकलते थे । उस अवस्थामें बादलोंमें छिपते तथा प्रकट होते हुए वर्षाकालके चन्द्रमाकी भाँति उनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १८२½ ॥

> प्रदृश्यमानः सर्वत्र हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १८३॥  
> भेजेऽम्बरं निरालम्बं पक्षयुक्त इवाद्रिराट् ।

सर्वत्र दिखायी देते हुए पवनकुमार हनुमान्जी पंखधारी गिरिराजके समान निराधार आकाशका आश्रय लेकर आगे बढ़ रहे थे ॥ १८३½ ॥

> प्लवमानं तु तं दृष्ट्वा सिंहिका नाम राक्षसी ॥ १८४॥  
> मनसा चिन्तयामास प्रवृद्धा कामरूपिणी ।

इस तरह जाते हुए हनुमान्जीको इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली विशालकाया सिंहिका नामवाली राक्षसीने देखा । देखकर वह मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी—॥ १८४½ ॥

> अद्य दीर्घस्य कालस्य भविष्याम्यहमाशिता ॥ १८५॥  
> इदं मम महासत्त्वं चिरस्य वशमागतम् ।

‘आज दीर्घकालके बाद यह विशाल जीव मेरे वशमें आया है । इसे खा लेनेपर बहुत दिनोंके लिये मेरा पेट भर जायगा’ ॥ १८५½ ॥

> इति संचिन्त्य मनसा च्छायामस्य समाक्षिपत् ॥ १८६॥  
> छायायां गृह्यमाणायां चिन्तयामास वानरः ।  
> समाक्षिप्तोऽस्मि सहसा पङ्गूकृतपराक्रमः ॥ १८७॥  
> प्रतिलोमेन वातेन महानौरिव सागरे ।

अपने हृदयमें ऐसा सोचकर उस राक्षसीने हनुमान्जीकी छाया पकड़ ली । छाया पकड़ी जानेपर वानरवीर हनुमान्ने सोचा—‘अहो ! सहसा किसने मुझे पकड़ लिया, इस पकड़के सामने मेरा पराक्रम पङ्गु हो गया है । जैसे प्रतिकूल हवा चलनेपर समुद्रमें जहाजकी गति अवरुद्ध हो जाती है, वैसी ही दशा आज मेरी भी हो गयी है’ ॥ १८६-१८७½ ॥

> तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव वीक्षमाणस्तदा कपिः ॥१८८॥  
> ददर्श स महासत्त्वमुत्थितं लवणाम्भसि ।

यही सोचते हुए कपिवर हनुमान्ने उस समय अगल-बगलमें, ऊपर और नीचे दृष्टि डाली । इतनेहीमें उन्हें समुद्रके जलके ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय प्राणी दिखायी दिया ॥ १८८½ ॥

> तद् दृष्ट्वा चिन्तयामास मारुतिर्विकृताननम् ॥ १८९॥  
> कपिराज्ञा यथाख्यातं सत्त्वमद्भुतदर्शनम् ।  
> छायाग्राहि महावीर्यं तदिदं नात्र संशयः ॥१९०॥

उस विकराल मुखवाली राक्षसीको देखकर पवनकुमार हनुमान् सोचने लगे—वानरराज सुग्रीवने जिस महापराक्रमी छायाग्राही अद्भुत जीवकी चर्चा की थी, वह निःसंदेह यही है ॥ १८९-१९० ॥

> सतां बुद्ध्वार्थतत्त्वेन सिंहिकां मतिमान् कपिः।  
> व्यवर्धत महाकायः प्रावृषीव बलाहकः ॥१९१॥

तब बुद्धिमान् कपिवर हनुमान्जीने यह निश्चय करके कि वास्तवमें यही सिंहिका है, वर्षाकालके मेघकी भाँति अपने शरीरको बढ़ाना आरम्भ किया । इस प्रकार वे विशालकाय हो गये ॥ १९१ ॥

> तस्य सा कायमुद्वीक्ष्य वर्धमानं महाकपेः ।  
> वक्त्रं प्रसारयामास पातालाम्बरसंनिभम् ॥१९२॥  
> घनराजीव गर्जन्ती वानरं समभिद्रवत् ।

उन महाकपिके शरीरको बढ़ते देख सिंहिकाने अपना मुँह पाताल और आकाशके मध्यभागके समान फैला लिया और मेघोंकी घटाके समान गर्जना करती हुई उन वानरवीरकी ओर दौड़ी ॥ १९२½ ॥

> स ददर्श ततस्तस्या विकृतं सुमहन्मुखम् ॥१९३॥  
> कायमात्रं च मेधावी मर्माणि च महाकपिः ।

हनुमान्जीने उसका अत्यन्त विकराल और बड़ा हुआ मुँह देखा । उन्हें अपने शरीरके बराबर ही उसका मुँह दिखायी दिया । उस समय बुद्धिमान् महाकपि हनुमान्ने सिंहिकाके मर्मस्थानोंको अपना लक्ष्य बनाया ॥ १९३½ ॥

> स तस्या विकृते वक्त्रे वज्रसंहननः कपिः ॥१९४॥  
> संक्षिप्य मुहुरात्मानं निपपात महाकपिः ।

तदनन्तर वज्रोपम शरीरवाले महाकपि पवनकुमार अपने शरीरको संकुचित करके उसके विकराल मुखमें आ गिरे ॥ १९४½ ॥

> आस्ये तस्या निमज्जन्तं ददृशुः सिद्धचारणाः ॥१९५॥  
> ग्रस्यमानं यथा चन्द्रं पूर्णं पर्वणि राहुणा ।

उस समय सिद्धों और चारणोंने हनुमान्जीको सिंहिकाके मुखमें उसी प्रकार निमग्न होते देखा, जैसे पूर्णिमाकी रातमें पूर्ण चन्द्रमा राहुके ग्रास बन गये हों ॥ १९५½ ॥

> ततस्तस्या नखैस्तीक्ष्णैर्मर्माण्युत्कृत्य वानरः ॥१९६॥  
> उत्पपाताथ वेगेन मनःसम्पातविक्रमः ।

मुखमें प्रवेश करके उन वानरवीरने अपने तीखे नखोंसे उस राक्षसीके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर डाला । इसके पश्चात् वे मनके समान गतिसे उछलकर वेगपूर्वक बाहर निकल आये ॥ १९६½ ॥

> तां तु दिष्ट्या च धृत्या च दाक्षिण्येन निपात्य सः॥१९७॥  
> कपिप्रवीरो वेगेन ववृधे पुनरात्मवान् ।

दैवके अनुग्रह, स्वाभाविक धैर्य तथा कौशलसे उस राक्षसीको मारकर वे मनस्वी वानरवीर पुनः वेगसे बढ़कर बड़े हो गये ॥ १९७½ ॥

> हतहृत्सा हनुमता पपात विधुराम्भसि ।  
> स्वयंभुवैव हनुमान् सृष्टस्तस्या निपातने ॥१९८॥

हनुमान्जीने प्राणोंके आश्रयभूत उसके हृदयस्थलको ही नष्ट कर दिया, अतः वह प्राणशून्य होकर समुद्रके जलमें गिर पड़ी । विधाताने ही उसे मार गिरानेके लिये हनुमान्जीको निमित्त बनाया था ॥ १९८ ॥

> तां हतां वानरेणाशु पतितां वीक्ष्य सिंहिकाम् ।  
> भूतान्याकाशचारीणि तमूचुः प्लवगोत्तमम् ॥१९९॥

उन वानरवीरके द्वारा शीघ्र ही मारी जाकर सिंहिका जलमें गिर पड़ी । यह देख आकाशमें विचरनेवाले प्राणी उन कपिश्रेष्ठसे बोले—॥ १९९ ॥

> भीममद्य कृतं कर्म महत्सत्त्वं त्वया हतम् ।  
> साधयार्थमभिप्रेतमरिष्टं प्लवतां वर ॥२००॥

‘कपिवर ! तुमने यह बड़ा ही भयंकर कर्म किया है, जो इस विशालकाय प्राणीको मार गिराया है । अब तुम बिना किसी विघ्न-बाधाके अपना अभीष्ट कार्य सिद्ध करो ॥ २०० ॥

> यस्य त्वेतानि चत्वारि वानरेन्द्र यथा तव ।  
> धृतिर्दृष्टिर्मतिर्दाक्ष्यं स कर्मसु न सीदति ॥२०१॥

‘वानरेन्द्र ! जिस पुरुषमें तुम्हारे समान धैर्य, सूझ, बुद्धि और कुशलता—ये चार गुण होते हैं, उसे अपने कार्यमें कभी असफलता नहीं होती’ ॥ २०१ ॥

> स तैः सम्पूजितः पूज्यः प्रतिपन्नप्रयोजनैः ।  
> जगामाकाशमाविश्य पन्नगाशनवत् कपिः ॥२०२॥

इस प्रकार अपना प्रयोजन सिद्ध हो जानेसे उन आकाशचारी प्राणियोंने हनुमान्जीका बड़ा सत्कार किया । इसके बाद वे आकाशमें चढ़कर गरुड़के समान वेगसे चलने लगे ॥ २०२ ॥

> प्राप्तभूयिष्ठपारस्तु सर्वतः परिलोकयन् ।  
> योजनानां शतस्यान्ते वनराजीं ददर्श सः ॥२०३॥

सौ योजनके अन्तमें प्रायः समुद्रके पार पहुँचकर जब उन्होंने सब ओर दृष्टि डाली, तब उन्हें एक हरी-भरी वन-श्रेणी दिखायी दी ॥ २०३ ॥

> ददर्श च पतन्नेव विविधद्रुमभूषितम् ।  
> द्वीपं शाखामृगश्रेष्ठो मलयोपवनानि च ॥२०४॥

आकाशमें उड़ते हुए ही शाखामृगोंमें श्रेष्ठ हनुमान्जीने भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे सुशोभित लङ्का नामक द्वीप देखा । उत्तर तटकी भाँति समुद्रके दक्षिण तटपर भी मलय नामक पर्वत और उसके उपवन दिखायी दिये ॥ २०४ ॥

> सागरं सागरानूपान् सागरानूपजान् द्रुमान् ।  
> सागरस्य च पत्नीनां मुखान्यपि विलोकयत् ॥२०५॥

समुद्र, सागरतटवर्ती जलप्राय देश तथा वहाँ उगे हुए वृक्ष एवं सागरपत्नी सरिताओंके मुहानोंको भी उन्होंने देखा ॥ २०५ ॥

> स महामेघसंकाशं समीक्ष्यात्मानमात्मवान् ।  
> निरुन्धन्तमिवाकाशं चकार मतिमान् मतिम् ॥२०६॥

मनको वशमें रखनेवाले बुद्धिमान् हनुमान्जीने अपने शरीरको महान् मेघोंकी घटाके समान विशाल तथा आकाशको अवरुद्ध करता-सा देख मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—॥ २०६ ॥

> कायवृद्धिं प्रवेगं च मम दृष्ट्वैव राक्षसाः ।  
> मयि कौतूहलं कुर्युरिति मेने महामतिः ॥२०७॥

‘अहो ! मेरे शरीरकी विशालता तथा मेरा यह तीव्र वेग देखते ही राक्षसोंके मनमें मेरे प्रति बड़ा कौतूहल होगा—वे मेरा भेद जाननेके लिये उत्सुक हो जायँगे ।’ परम बुद्धिमान् हनुमान्जीके मनमें यह धारणा पक्की हो गयी ॥ २०७ ॥

> ततः शरीरं संक्षिप्य तन्महीधरसंनिभम् ।  
> पुनः प्रकृतिमापेदे वीतमोह इवात्मवान् ॥२०८॥

मनस्वी हनुमान् अपने पर्वताकार शरीरको संकुचित करके पुनः अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो गये । ठीक उसी तरह, जैसे मनको वशमें रखनेवाला मोहरहित पुरुष अपने मूल स्वरूपमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २०८ ॥

> तद्रूपमतिसंक्षिप्य हनूमान् प्रकृतौ स्थितः ।  
> त्रीन् क्रमानिव विक्रम्य बलिवीर्यहरो हरिः ॥२०९॥

जैसे बलिके पराक्रमसम्बन्धी अभिमानको हर लेनेवाले श्रीहरिने विराट्रूपसे तीन पग चलकर तीनों लोकोंको नाप लेनेके पश्चात् अपने उस स्वरूपको समेट लिया था, उसी प्रकार हनुमान्जी समुद्रको लाँघ जानेके बाद अपने उस विशाल रूपको संकुचित करके अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो गये ॥ २०९ ॥

> स चारुनानाविधरूपधारी  
> परं समासाद्य समुद्रतीरम् ।  
> परैरशक्यं प्रतिपन्नरूपः  
> समीक्षितात्मा समवेक्षितार्थः ॥२१०॥

हनुमान्जी बड़े ही सुन्दर और नाना प्रकारके रूप धारण कर लेते थे । उन्होंने समुद्रके दूसरे तटपर, जहाँ दूसरोंका पहुँचना असम्भव था, पहुँचकर अपने विशाल शरीरकी ओर दृष्टिपात किया । फिर अपने कर्तव्यका विचार करके छोटा-सा रूप धारण कर लिया ॥ २१० ॥

> ततः स लम्बस्य गिरेः समृद्धे  
> विचित्रकूटे निपपात कूटे ।  
> सकेतकोद्दालकनारिकेले  
> महाभ्रकूटप्रतिमो महात्मा ॥२११॥

महान् मेघ-समूहके समान शरीरवाले महात्मा हनुमान्जी केवड़े, लसोड़े और नारियलके वृक्षोंसे विभूषित लम्बपर्वतके विचित्र लघु शिखरोंवाले महान् समृद्धिशाली शृङ्गपर कूद पड़े ॥ २११ ॥

> ततस्तु सम्प्राप्य समुद्रतीरं  
> समीक्ष्य लङ्कां गिरिवर्यमूर्ध्नि ।  
> कपिस्तु तस्मिन् निपपात पर्वते  
> विधूय रूपं व्यथयन्मृगद्विजान् ॥२१२॥

तदनन्तर समुद्रके तटपर पहुँचकर वहाँसे उन्होंने एक श्रेष्ठ पर्वतके शिखरपर बसी हुई लङ्काको देखा । देखकर अपने पहले रूपको तिरोहित करके वे वानरवीर वहाँके पशु-पक्षियोंको व्यथित करते हुए उसी पर्वतपर उतर पड़े ॥ २१२ ॥

> स सागरं दानवपन्नगायुतं  
> बलेन विक्रम्य महोर्मिमालिनम् ।  
> निपत्य तीरे च महोदधेस्तदा  
> ददर्श लङ्काममरावतीमिव ॥२१३॥

इस प्रकार दानवों और सर्पोंसे भरे हुए तथा बड़ी-बड़ी उत्ताल तरङ्गमालाओंसे अलंकृत महासागरको बलपूर्वक लाँघकर वे उसके तटपर उतर गये और अमरावतीके समान सुशोभित लङ्कापुरीकी शोभा देखने लगे ॥ २१३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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