---
title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 9"
canonical: "https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana/kishkindha-kanda/sarga-9"
lang: "hi"
---

# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 9

> वाली नाम मम भ्राता ज्येष्ठः शत्रुनिषूदनः ।  
> पितुर्बहुमतो नित्यं मम चापि तथा पुरा ॥ १ ॥

‘रघुनन्दन ! वाली मेरे बड़े भाई हैं । उनमें शत्रुओंका संहार करनेकी शक्ति है । मेरे पिता ऋक्षरजा उनको बहुत मानते थे । वैरसे पहले मेरे मनमें भी उनके प्रति आदरका भाव था ॥ १ ॥

> पितर्युपरते तस्मिञ्ज्येष्ठोऽयमिति मन्त्रिभिः ।  
> कपीनामीश्वरो राज्ये कृतः परमसम्मतः ॥ २ ॥

‘पिताकी मृत्युके पश्चात् मन्त्रियोंने उन्हें ज्येष्ठ समझकर वानरोंका राजा बनाया । वे सबको बड़े प्रिय थे, इसीलिये किष्किन्धाके राज्यपर प्रतिष्ठित किये गये थे ॥ २ ॥

> राज्यं प्रशासतस्तस्य पितृपैतामहं महत् ।  
> अहं सर्वेषु कालेषु प्रणतः प्रेष्यवत् स्थितः ॥ ३ ॥

‘वे पिता-पितामहोंके विशाल राज्यका शासन करने लगे और मैं हर समय विनीतभावसे दासकी भाँति उनकी सेवामें रहने लगा ॥ ३ ॥

> मायावी नाम तेजस्वी पूर्वजो दुन्दुभेः सुतः ।  
> तेन तस्य महद्वैरं वालिनः स्त्रीकृतं पुरा ॥ ४ ॥  
> स तु सुप्ते जने रात्रौ किष्किन्धाद्वारमागतः ।  
> नर्दति स्म सुसंरब्धो वालिनं चाह्वयद् रणे ॥ ५ ॥  
> प्रसुप्तस्तु मम भ्राता नर्दतो भैरवस्वनम् ।  
> श्रुत्वा न मम्मृषे वाली निष्पपात जवात् तदा ॥ ६ ॥

‘उन दिनों मायावी नामक एक तेजस्वी दानव रहता था, जो मय दानवका पुत्र और दुन्दुभिका बड़ा भाई था । उसके साथ वालीका स्त्रीके कारण बहुत बड़ा वैर हो गया था ॥ ‘एक दिन आधी रातके समय जब सब लोग सो गये, मायावी किष्किन्धापुरीके दरवाजेपर आया और क्रोधसे भरकर गर्जने तथा वालीको युद्धके लिये ललकारने लगा ॥ ‘उस समय मेरे भाई सो रहे थे । उसका भैरवनाद सुनकर उनकी नींद खुल गयी । उनसे उस राक्षसकी ललकार सही नहीं गयी; अतः वे तत्काल वेगपूर्वक घरसे निकले ॥६॥

> स तु वै निःसृतः क्रोधात् तं हन्तुमसुरोत्तमम् ।  
> वार्यमाणस्ततः स्त्रीभिर्मया च प्रणतात्मना ॥ ७ ॥

‘जब वे क्रोध करके उस श्रेष्ठ असुरको मारनेके लिये निकले, उस समय मैंने तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंने पैरों पड़कर उन्हें जानेसे रोका ॥ ७ ॥

> स तु निर्धूय सर्वान् नो निर्जगाम महाबलः ।  
> ततोऽहमपि सौहार्दान्निःसृतो वालिना सह ॥ ८ ॥

‘परंतु महाबली वाली हम सबको हटाकर निकल पड़े, तब मैं भी स्नेहवश वालीके साथ ही बाहर निकला ॥ ८ ॥

> स तु मे भ्रातरं दृष्ट्वा मां च दूरादवस्थितम् ।  
> असुरो जातसंत्रासः प्रदुद्राव तदा भृशम् ॥ ९ ॥

‘उस असुरने मेरे भाईको देखा तथा कुछ दूरपर खड़े हुए मेरे ऊपर भी उसकी दृष्टि पड़ी; फिर तो वह भयसे थर्रा उठा और बड़े जोरसे भागा ॥ ९ ॥

> तस्मिन् द्रवति संत्रस्ते श्चावां द्रुततरं गतौ ।  
> प्रकाशोऽपि कृतो मार्गश्चन्द्रेणोद्गच्छता तदा ॥ १० ॥  
> स तृणैरावृतं दुर्गं धरण्या विवरं महत् ।  
> प्रविवेशासुरो वेगादावामासाद्य विष्ठितौ ॥ ११ ॥

‘उसके भयभीत होकर भागनेपर हम दोनों भाइयोंने बड़ी तेजीके साथ उसका पीछा किया । उस समय उदित हुए चन्द्रमाने हमारे मार्गको भी प्रकाशित कर दिया था ॥ ‘आगे जानेपर धरतीमें एक बहुत बड़ा बिल था, जो घास-फूससे ढका हुआ था । उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था । वह असुर बड़े वेगसे उस बिलमें जा घुसा । वहाँ पहुँचकर हम दोनों ठहर गये ॥ ११ ॥

> तं प्रविष्टं रिपुं दृष्ट्वा बिलं रोषवशं गतः ।  
> मामुवाच ततो वाली वचनं क्षुभितेन्द्रियः ॥ १२ ॥

‘शत्रुको बिलके अंदर घुसा देख वालीके क्रोधकी सीमा न रही । उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं और वे मुझसे इस प्रकार बोले--॥ १२ ॥

> इह तिष्ठाध सुग्रीव बिलद्वारि समाहितः ।  
> यावदत्र प्रविश्याहं निहन्मि समरे रिपुम् ॥ १३ ॥

‘सुग्रीव ! जबतक मैं इस बिलके भीतर प्रवेश करके युद्धमें शत्रुको मारता हूँ, तबतक तुम आज इसके दरवाजेपर सावधानीसे खड़े रहो’ ॥ १३ ॥

> मया त्वेतद् वचः श्रुत्वा याचितः स परंतपः ।  
> शापयित्वा च मां पद्भ्यां प्रविवेश बिलं ततः ॥ १४ ॥

‘यह बात सुनकर मैंने शत्रुओंको संताप देनेवाले वालीसे स्वयं भी साथ चलनेके लिये प्रार्थना की, किंतु वे अपने चरणोंकी सौगन्ध दिलाकर अकेले ही बिलमें घुसे ॥ १४ ॥

> तस्य प्रविष्टस्य बिलं साग्रः संवत्सरो गतः ।  
> स्थितस्य च बिलद्वारि स कालो व्यत्यवर्तत ॥ १५ ॥

‘बिलके भीतर गये हुए उन्हें एक सालसे अधिक समय बीत गया और बिलके दरवाजेपर खड़े-खड़े मेरा भी उतना ही समय निकल गया ॥ १५ ॥

> अहं तु नष्टं तं ज्ञात्वा स्नेहादागतसम्भ्रमः ।  
> भ्रातरं न प्रपश्यामि पापशङ्कि च मे मनः ॥ १६ ॥

‘जब इतने दिनोंतक मुझे भाईका दर्शन नहीं हुआ, तब मैंने समझा कि मेरे भाई इस गुफामें ही कहीं खो गये । उससमय भ्रातृस्नेहके कारण मेरा हृदय व्याकुल हो उठा । मेरे मनमें उनके मारे जानेकी शङ्का होने लगी ॥ १६ ॥

> अथ दीर्घस्य कालस्य बिलात् तस्माद् विनिःसृतम् ।  
> सफेनं रुधिरं दृष्ट्वा ततोऽहं भृशदुःखितः ॥ १७ ॥

‘तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उस बिलसे सहसा फेनसहित खूनकी धारा निकली । उसे देखकर मैं बहुत दुखी हो गया ॥ १७ ॥

> नर्दतामसुराणां च ध्वनिमैं श्रोत्रमागतः ।  
> न रतस्य च संग्रामे क्रोशतोऽपि स्वनो गुरोः ॥१८॥

‘इतनेहीमें गरजते हुए असुरोंकी आवाज भी मेरे कानोंमें पड़ी । युद्धमें लगे हुए मेरे बड़े भाई भी गरजना कर रहे थे, किंतु उनकी आवाज मैं नहीं सुन सका ॥१८॥

> अहं त्ववगतो बुद्ध्या चिह्नैस्तैर्भ्रातरं हतम् ।  
> पिधाय च बिलद्वारं शिलया गिरिमात्रया ॥ १९ ॥  
> शोकार्तश्चोदकं कृत्वा किष्किन्धामागतः सखे ।  
> गूहमानस्य मे तत् त्वं यत्नतो मन्त्रिभिः श्रुतम् ॥२०॥

‘इन सब चिह्नोंको देखकर बुद्धिद्वारा विचार करनेपर मैं इस निश्चयपर पहुँचा कि मेरे बड़े भाई मारे गये । फिर तो उस गुफाके दरवाजेपर मैंने पर्वतके समान एक पत्थरकी चट्टान रख दी और उसे बंद करके भाईको जलाञ्जलि दे शोकसे व्याकुल हुआ मैं किष्किन्धापुरीमें लौट आया । सखे ! यद्यपि मैं इस यथार्थ बातको छिपा रहा था, तथापि मन्त्रियोंने यत्न करके सुन लिया ॥ १९-२० ॥

> ततोऽहं तैः समागम्य समेतैरभिषेचितः ।  
> राज्यं प्रशासतस्तस्य न्यायतो मम राघव ॥ २१ ॥  
> आजगाम रिपुं हत्वा दानवं स तु वानरः ।  
> अभिषिक्तं तु मां दृष्ट्वा क्रोधात् संरक्तलोचनः ॥ २२ ॥

‘तब उन सबने मिलकर मुझे राज्यपर अभिषिक्त कर दिया । रघुनन्दन ! मैं न्यायपूर्वक राज्यका संचालन करने लगा । इसी समय अपने शत्रुभूत उस दानवको मारकर वानरराज वाली घर लौटे । लौटनेपर मुझे राज्यपर अभिषिक्त हुआ देख उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं ॥२१-२२॥

> मदीयान् मन्त्रिणो बद्ध्वा परुषं वाक्यमब्रवीत् ।  
> निग्रहे च समर्थस्य तं पापं प्रति राघव ॥ २३ ॥  
> न प्रावर्तत मे बुद्धिर्भ्रातृगौरवयन्त्रिता ।

‘मेरे मन्त्रियोंको उन्होंने कैद कर लिया और उन्हें कठोर बातें सुनायीं । रघुवीर ! यद्यपि मैं स्वयं भी उस पापीको कैद करनेमें समर्थ था तो भी भाईके प्रति गुरुभाव होनेके कारण मेरी बुद्धिमें ऐसा विचार नहीं हुआ ॥ २३½ ॥

> हत्वा शत्रुं स मे भ्राता प्रविवेश पुरं तदा ॥ २४ ॥  
> मानयंस्तं महात्मानं यथावच्चाभिवादयम् ।  
> उक्ताश्च नाशिषस्तेन प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ २५ ॥

‘इस प्रकार शत्रुका वध करके मेरे भाईने उस समय नगरमें प्रवेश किया । उन महात्माका सम्मान करते हुए मैंने यथोचित रूपसे उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया तो भी उन्होंने प्रसन्नचित्तसे मुझे आशीर्वाद नहीं दिया ॥ २४-२५ ॥

> नत्वा पादावहं तस्य मुकुटेनास्पृशं प्रभो ।  
> अपि वाली मम क्रोधान्न प्रसादं चकार सः ॥ २६ ॥

‘प्रभो ! मैंने भाईके सामने झुककर अपने मस्तकके मुकुटसे उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया तो भी क्रोधके कारण वाली मुझपर प्रसन्न नहीं हुए’ ॥ २६ ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
