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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 61"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 61

> ततस्तद् दारुणं कर्म दुष्करं सहसा कृतम् ।  
> आचचक्षे मुनेः सर्वे सूर्यानुगमनं तथा ॥ १ ॥

‘उनके इस प्रकार पूछनेपर मैंने बिना सोचे-समझे सूर्यका अनुगमनरूप जो दुष्कर एवं दारुण कार्य किया था, वह सब उन्हें बताया ॥ १ ॥

> भगवन् व्रणयुक्तत्वाल्लज्जया चाकुलेन्द्रियः ।  
> परिश्रान्तो न शक्नोमि वचनं परिभाषितुम् ॥ २ ॥

‘मैंने कहा—‘भगवन् ! मेरे शरीरमें घाव हो गया है तथा मेरी इन्द्रियाँ लज्जासे व्याकुल हैं, इसलिये अधिक कष्ट पानेके कारण मैं अच्छी तरह बात भी नहीं कर सकता ॥ २ ॥

> अहं चैव जटायुश्च संघर्षाद् गर्वमोहितौ ।  
> आकाशं पतितौ दूराज्जिज्ञासन्तौ पराक्रमम् ॥ ३ ॥

‘मैं और जटायु दोनों ही गर्वसे मोहित हो रहे थे; अतः अपने पराक्रमकी थाह लगानेके लिये हम दोनों दूरतक पहुँचनेके उद्देश्यसे उड़ने लगे ॥ ३ ॥

> कैलासशिखरे बद्ध्वा मुनीनामग्रतः पणम् ।  
> रविः स्यादनुयातव्यो यावदस्तं महागिरिम् ॥ ४ ॥

‘कैलास पर्वतके शिखरपर मुनियोंके सामने हम दोनोंने यह शर्त बदी थी कि सूर्य जबतक अस्ताचलपर जायँ, उसके पहले ही हम दोनोंको उनके पास पहुँच जाना चाहिये ॥ ४ ॥

> अप्यावां युगपत् प्राप्तावपश्याव महीतले ।  
> रथचक्रप्रमाणानि नगराणि पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥

‘यह निश्चय करके हम साथ ही आकाशमें जा पहुँचे । वहाँसे पृथ्वीके भिन्न-भिन्न नगरमें हम रथके पहियेके बराबर दिखायी देते थे ॥ ५ ॥

> कचिद् वादित्रघोषश्च कचिद् भूषणनिःस्वनः ।  
> गायन्तीः स्वाङ्गना बह्वीः पश्यावो रक्तवाससः ॥ ६ ॥

‘ऊपरके लोकोंमें कहीं वाद्योंका मधुर घोष हो रहा था, कहीं आभूषणोंकी झनकारें सुनायी पड़ती थीं और कहीं लाल रंगकी साड़ी पहने बहुत-सी सुन्दरियाँ गीत गा रही थीं, जिन्हें हम दोनोंने अपनी आँखों देखा था ॥ ६ ॥

> तूर्णमुत्पत्य चाकाशमादित्यपदमास्थितौ ।  
> आवामालोकयावस्तद् वनं शाद्वलसंस्थितम् ॥ ७ ॥

‘उससे भी ऊँचे उड़कर हम तुरंत सूर्यके मार्गपर जा पहुँचे । वहाँसे नीचे दृष्टि डालकर जब दोनोंने देखा, तब यहाँके जंगल हरी-हरी घासकी तरह दिखायी देते थे ॥ ७ ॥

> उपलैरिव संछन्ना दृश्यते भूः शिलोच्चयैः ।  
> आपगाभिश्च संवीता सूत्रैरिव वसुंधरा ॥ ८ ॥

‘पर्वतोंके कारण यह भूमि ऐसी जान पड़ती थी, मानो इसपर पत्थर बिछाये गये हों और नदियोंसे ढकी हुई भूमि ऐसी लगती थी, मानो उसमें सूतके धागे लपेटे गये हों ॥८॥

> हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्च सुमहागिरिः ।  
> भूतले सम्प्रकाशन्ते नागा इव जलाशये ॥ ९ ॥  
> तीव्रः स्वेदश्च खेदश्च भयं चासीत् तदावयोः ।  
> समाविशत मोहश्च ततो मूर्च्छा च दारुणा ॥ १० ॥

‘भूतलपर हिमालय, मेरु और विन्ध्य आदि बड़े-बड़े पर्वत तालाबमें खड़े हुए हाथियोंके समान प्रतीत होते थे । उस समय हम दोनों भाइयोंके शरीरसे बहुत पसीना निकलने लगा । हमें बड़ी थकावट मालूम हुई । फिर तो हमारे ऊपर भय, मोह और भयानक मूर्च्छाने अधिकार जमा लिया ॥ ९-१० ॥

> न च दिग् ज्ञायते याम्या न चाग्नेयी न वारुणी ।  
> युगान्ते नियतो लोको हतो दग्ध इवाग्निना ॥ ११ ॥

‘उस समय न दक्षिण दिशाका ज्ञान होता था, न अग्निकोण अथवा पश्चिम आदि दिशाका ही । यद्यपि यह जगत् नियमितरूपसे स्थित था, तथापि उस समय मानो युगान्तकालमें अग्निसे दग्ध हो गया हो, इस प्रकार नष्टप्राय दिखायी देता था ॥ ११ ॥

> मनश्च मे हतं भूयश्चक्षुः प्राप्य तु संशयम् ।  
> यत्नेन महता ह्यस्मिन् मनः संधाय चक्षुषी ॥ १२ ॥  
> यत्नेन महता भूयो भास्करः प्रतिलोकितः ।  
> तुल्यपृथ्वीप्रमाणेन भास्करः प्रतिभाति नौ ॥ १३ ॥

‘मेरा मन नेत्ररूपी आश्रयको पाकर उसके साथ ही हतप्राय हो गया—सूर्यके तेजसे उसकी दर्शन-शक्ति लुप्त हो गयी । तदनन्तर महान् प्रयास करके मैंने पुनः मन और नेत्रोंको सूर्यदेवमें लगाया । इस प्रकार विशेष प्रयत्न करनेपर फिर सूर्यदेवका दर्शन हुआ । वे हमें पृथ्वीके बराबर ही जान पड़ते थे ॥ १२-१३ ॥

> जटायुर्मामनापृच्छ्य निपपात महीं ततः ।  
> तं दृष्ट्वा तूर्णमाकाशादात्मानं मुक्तवानहम् ॥ १४ ॥

‘जटायु मुझसे पूछे बिना ही पृथ्वीपर उतर पड़ा । उसे नीचे जाते देख मैंने भी तुरंत अपने आपको आकाशसे नीचेकी ओर छोड़ दिया ॥ १४ ॥

> पक्षाभ्यां च मया गुप्तो जटायुर्न प्रदह्यत ।  
> प्रमादात् तत्र निर्दग्धः पतन् वायुपथादहम् ॥ १५ ॥  
> आशङ्के तं निपतितं जनस्थाने जटायुषम् ।  
> अहं तु पतितो विन्ध्ये दग्धपक्षो जडीकृतः ॥ १६ ॥

‘मैंने अपने दोनों पंखोंसे जटायुको ढक लिया था, इसलिये वह जल न सका । मैं ही असावधानीके कारण वहाँ जल गया । वायुके पथसे नीचे गिरते समय मुझे ऐसा संदेह हुआ कि जटायु जनस्थानमें गिरा है; परंतु मैं इस विन्ध्यपर्वतपर गिरा था । मेरे दोनों पंख जल गये थे, इसलिये यहाँ जडवत् हो गया ॥ १५-१६ ॥

> राज्याच्च हीनो भ्रात्रा च पक्षाभ्यां विक्रमेण च ।  
> सर्वथा मर्तुमेवेच्छन् पतिष्ये शिखराद् गिरेः ॥ १७ ॥

‘राज्यसे भ्रष्ट हुआ, भाईसे बिछुड़ गया और पंख तथा पराक्रमसे भी हाथ धो बैठा । अब मैं सर्वथा मरनेकी ही इच्छासे इस पर्वतशिखरसे नीचे गिरूँगा’ ॥ १७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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