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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 60"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 60

> ततः कृतोदकं स्नातं तं गृध्रं हरियूथपाः ।  
> उपविष्टा गिरौ रम्ये परिवार्य समन्ततः ॥ १ ॥

गृध्रराज सम्पाति अपने भाईको जलाञ्जलि देकर जब स्नान कर चुके, तब उस रमणीय पर्वतपर वे समस्त वानरयूथपति उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ १ ॥

> तमङ्गदमुपासीनं तैः सर्वैर्हरिभिर्वृतम् ।  
> जनितप्रत्ययो हर्षात् सम्पातिः पुनरब्रवीत् ॥ २ ॥

उन समस्त वानरोंसे घिरे हुए अङ्गद उनके पास बैठे थे । सम्पातिने सबके हृदयमें अपनी ओरसे विश्वास पैदा कर दिया था । वे हर्षोत्फुल्ल होकर फिर इस प्रकार कहने लगे—॥ २ ॥

> कृत्वा निःशब्दमेकाग्राः शृण्वन्तु हरयो मम ।  
> तथ्यं संकीर्तयिष्यामि यथा जानामि मैथिलीम् ॥ ३ ॥

‘सब वानर एकाग्रचित्त एवं मौन होकर मेरी बात सुनो । मैं मिथिलेशकुमारीको जिस प्रकार जानता हूँ, वह सारा प्रसङ्ग ठीक-ठीक बता रहा हूँ ॥ ३ ॥

> अस्य विन्ध्यस्य शिखरे पतितोऽस्मि पुरानघ ।  
> सूर्यतापपरीताङ्गो निर्दग्धः सूर्यरश्मिभिः ॥ ४ ॥

‘निष्पाप अङ्गद ! प्राचीन कालमें मैं सूर्यकी किरणोंसे झुलसकर इस विन्ध्यपर्वतके शिखरपर गिरा था । उस समय मेरे सारे अङ्ग सूर्यके प्रचण्ड तापसे संतप्त हो रहे थे ॥ ४ ॥

> लब्धसंज्ञस्तु षड्रात्राद् विवशो विह्वलन्निव ।  
> वीक्षमाणो दिशः सर्वा नाभिजानामि किंचन ॥ ५ ॥

‘छः रातें बीतनेपर जब मुझे होश हुआ और मैं विवश एवं विह्वल-सा होकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगा, तब सहसा किसी भी वस्तुको मैं पहचान न सका ॥ ५ ॥

> ततस्तु सागरान् शैलान् नदीः सर्वाः सरांसि च ।  
> वनानि च प्रदेशांश्च निरीक्ष्य मतिरागता ॥ ६ ॥

‘तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्र, पर्वत, समस्त नदी, सरोवर, वन और यहाँके विभिन्न प्रदेशोंपर दृष्टि डाली, तब मेरी स्मरण-शक्ति लौटी ॥ ६ ॥

> हृष्टपक्षिगणाकीर्णः कन्दरोदरकूटवान् ।  
> दक्षिणस्योदधेस्तीरे विन्ध्योऽयमिति निश्चितः ॥ ७ ॥

‘फिर मैंने निश्चय किया कि यह दक्षिण समुद्रके तटपर स्थित विन्ध्यपर्वत है, जो हर्षोत्फुल्ल विहंगमोंके समुदायसे व्याप्त है । यहाँ बहुत-सी कन्दराएँ, गुफाएँ और शिखर हैं ॥ ७ ॥

> आसीच्चात्राश्रमं पुण्यं सुरैरपि सुपूजितम् ।  
> ऋषिर्निशाकरो नाम यस्मिन्नुग्रतपाऽभवत् ॥ ८ ॥

‘पूर्वकालमें यहाँ एक पवित्र आश्रम था, जिसका देवता भी बड़ा सम्मान करते थे । उस आश्रममें निशाकर (चन्द्रमा) नामधारी एक ऋषि रहते थे, जो बड़े ही उग्र तपस्वी थे ॥ ८ ॥

> अष्टौ वर्षसहस्राणि तेनास्मिन्नृषिणा गिरौ ।  
> वसतो मम धर्मज्ञे स्वर्गते तु निशाकरे ॥ ९ ॥

‘वे धर्मज्ञ निशाकर मुनि अब स्वर्गवासी हो चुके हैं । उन महर्षिके बिना इस पर्वतपर रहते हुए मेरे आठ हजार वर्ष बीत गये ॥ ९ ॥

> अवतीर्य च विन्ध्याग्रात् कृच्छ्रेण विषमाच्छनैः ।  
> तीक्ष्णदर्भां वसुमतीं दुःखेन पुनरागतः ॥ १० ॥

‘होशमें आनेके बाद मैं इस पर्वतके नीचे-ऊँचे शिखरसे धीरे-धीरे बड़े कष्टके साथ भूमिपर उतरा, उस समय ऐसे स्थानपर आ पहुँचा, जहाँ तीखे कुश उगे हुए थे । फिर वहाँसे भी कष्ट सहन करता हुआ आगे बढ़ा ॥ १० ॥

> तमृषिं द्रष्टुकामोऽस्मि दुःखेनाभ्यागतो भृशम् ।  
> जटायुषा मया चैव बहुशोऽधिगतो हि सः ॥ ११ ॥

‘मैं उन महर्षिका दर्शन करना चाहता था, इसीलिये अत्यन्त कष्ट उठाकर वहाँ गया था । इसके पहले मैं और जटायु दोनों कई बार उनसे मिल चुके थे ॥ ११ ॥

> तस्याश्रमपदाभ्याशो वबुर्वाताः सुगन्धिनः ।  
> वृक्षो नापुष्पितः कश्चिदफलो वा न दृश्यते ॥ १२ ॥

‘उनके आश्रमके समीप सदा सुगन्धित वायु चलती थी । वहाँका कोई भी वृक्ष फल अथवा फूलसे रहित नहीं देखा जाता था ॥ १२ ॥

> उपेत्य चाश्रमं पुण्यं वृक्षमूलमुपाश्रितः ।  
> द्रष्टुकामः प्रतीक्षे च भगवन्तं निशाकरम् ॥ १३ ॥

‘उस पवित्र आश्रमपर पहुँचकर मैं एक वृक्षके नीचे ठहर गया और भगवान् निशाकरके दर्शनकी इच्छासे उनके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा ॥ १३ ॥

> अथ पश्यामि दूरस्थमृषिं ज्वलिततेजसम् ।  
> कृताभिषेकं दुर्धर्षमुपावृत्तमुदङ्मुखम् ॥ १४ ॥

‘थोड़ी ही देरमें महर्षि मुझे दूरसे आते दिखायी दिये । वे अपने तेजसे दिप रहे थे और स्नान करके उत्तरकी ओर लौटे आ रहे थे । उनका तिरस्कार करना किसीके लिये भी कठिन था ॥ १४ ॥

> तमृक्षाः सृमरा व्याघ्राः सिंहा नानासरीसृपाः ।  
> परिवार्योपगच्छन्ति दातारं प्राणिनो यथा ॥ १५ ॥

‘अनेकानेक रीछ, हरिन, सिंह, बाघ और नाना प्रकारके सर्प उन्हें इस प्रकार घेरे आ रहे थे, जैसे याचना करनेवाले प्राणी दाताको घेरकर चलते हैं ॥ १५ ॥

> ततः प्राप्तमृषिं ज्ञात्वा तानि सत्त्वानि वै ययुः ।  
> प्रविष्टे राजनि यथा सर्वं सामात्यकं बलम् ॥ १६ ॥

‘ऋषिको आश्रमपर आया जान वे सभी प्राणी लौट गये । ठीक उसी तरह, जैसे राजाके अपने महलमें चले जानेपर मन्त्रीसहित सारी सेना अपने-अपने विश्रामस्थानको लौट जाती है ॥ १६ ॥

> ऋषिस्तु दृष्ट्वा मां तुष्टः प्रविष्टश्चाश्रमं पुनः ।  
> मुहूर्तमात्रान्निर्गम्य ततः कार्यमपृच्छत ॥ १७ ॥

‘ऋषि मुझे देखकर बड़े प्रसन्न हुए और अपने आश्रममें प्रवेश करके पुनः दो ही घड़ीमें बाहर निकल आये । फिर पास आकर उन्होंने मेरे आनेका प्रयोजन पूछा—॥ १७ ॥

> सौम्य वैकल्यतां दृष्ट्वा रोम्णां ते नावगम्यते ।  
> अग्निदग्धाविमौ पक्षौ प्राणाश्चापि शरीरके ॥ १८ ॥

‘वे बोले—‘सौम्य ! तुम्हारे रोएँ गिर गये और दोनों पंख जल गये हैं । इसका कारण नहीं जान पड़ता । इतनेपर भी तुम्हारे शरीरमें प्राण टिके हुए हैं ॥ १८ ॥

> गृध्रौ द्वौ दृष्टपूर्वौ मे मातरिश्वसमौ जवे ।  
> गृध्राणां चैव राजानौ भ्रातरौ कामरूपिणौ ॥ १९ ॥

‘मैंने पहले वायुके समान वेगशाली दो गीधोंको देखा है । वे दोनों परस्पर भाई और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे । साथ ही वे गीधोंके राजा भी थे ॥ १९ ॥

> ज्येष्ठोऽवितस्त्वं सम्पाते जटायुरनुजस्तव ।  
> मानुषं रूपमास्थाय गृहीतां चरणौ मम ॥ २० ॥  
> किं ते व्याधिसमुत्थानं पक्षयोः पतनं कथम् ।  
> दण्डो वायं धृतः केन सर्वमाख्याहि पृच्छतः ॥ २१ ॥

‘सम्पाते ! मैं तुम्हें पहचान गया । तुम उन दो भाइयों-मेंसे बड़े हो । जटायु तुम्हारा छोटा भाई था । तुम दोनों मनुष्यरूप धारण करके मेरा चरण-स्पर्श किया करते थे ॥ २० ॥ ‘यह तुम्हें कौन-सा रोग लग गया है । तुम्हारे दोनों ‘यह तुम्हें कौन-सा रोग लग गया है । तुम्हारे दोनों पंख कैसे गिर गये ? किसीने दण्ड तो नहीं दिया है ? मैं जो कुछ पूछता हूँ, वह सब तुम स्पष्टरूपसे कहो’ ॥ २१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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