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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 58"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 58

> इत्युक्तः करुणं वाक्यं वानरैस्त्यक्तजीवितैः ।  
> सबाष्पो वानरान् गृध्रः प्रत्युवाच महास्वनः ॥ १ ॥

जीवनकी आशा त्यागकर बैठे हुए वानरोंके मुखसे यह करुणाजनक बात सुनकर सम्पातिके नेत्रोंमें आँसू आ गये । उन्होंने उच्चस्वरसे उत्तर दिया—॥ १ ॥

> यवीयान् स मम भ्राता जटायुर्नाम वानराः ।  
> यमाख्यात हतं युद्धे रावणेन बलीयसा ॥ २ ॥

‘वानरो ! तुम जिसे महाबली रावणके द्वारा युद्धमें मारा गया बता रहे हो, वह जटायु मेरा छोटा भाई था ॥ २ ॥

> वृद्धभावादपक्षत्वाच्छृण्वंस्तदपि मर्षये ।  
> नहि मे शक्तिरस्त्यद्य भ्रातुर्वैरविमोक्षणे ॥ ३ ॥

‘मैं बूढ़ा हुआ । मेरे पंख जल गये । इसलिये अब मुझमें अपने भाईके वैरका बदला लेनेकी शक्ति नहीं रह गयी है । यही कारण है कि यह अप्रिय बात सुनकर भी मैं चुपचाप सहे लेता हूँ ॥ ३ ॥

> पुरा वृत्रवधे वृत्ते स चाहं च जयैषिणौ ।  
> आदित्यमुपयातौ स्वो ज्वलन्तं रश्मिमालिनम् ॥ ४ ॥  
> आवृत्याकाशमार्गेण जवेन स्वर्गतौ भृशम् ।  
> मध्यं प्राप्ते तु सूर्ये तु जटायुरवसीदति ॥ ५ ॥

‘पहलेकी बात है जब इन्द्रके द्वारा वृत्रासुरका वध हो गया, तब इन्द्रको प्रबल जानकर हम दोनों भाई उन्हें जीतनेकी इच्छासे पहले आकाशमार्गके द्वारा बड़े वेगसे स्वर्गलोकमें गये । इन्द्रको जीतकर लौटते समय हम दोनों ही स्वर्गको प्रकाशित करनेवाले अंशुमाली सूर्यके पास आये । हममेंसे जटायु सूर्यके मध्याह्नकालमें उनके तेजसे शिथिल होने लगा ॥ ४-५ ॥

> तमहं भ्रातरं दृष्ट्वा सूर्यरश्मिभिरर्दितम् ।  
> पक्षाभ्यां छादयामास स्नेहात् परमविह्वलम् ॥ ६ ॥

‘भाईको सूर्यकी किरणोंसे पीड़ित और अत्यन्त व्याकुल देख मैंने स्नेहवश अपने दोनों पंखोंसे उसे ढक लिया ॥६॥

> निर्दग्धपक्षः पतितो विन्ध्येऽहं वानरर्षभाः ।  
> अहमस्मिन् वसन् भ्रातुः प्रवृत्तिं नोपलक्षये ॥ ७ ॥

‘वानरशिरोमणियो ! उस समय मेरे दोनों पंख जल गये और मैं इस विन्ध्य पर्वतपर गिर पड़ा । यहाँ रहकर मैं कभी अपने भाईका समाचार न पा सका ( आज पहले-पहल तुम लोगोंके मुखसे उसके मारे जानेकी बात मालूम हुई है)’ ॥७॥

> जटायुषस्त्वेवमुक्तो भ्रात्रा सम्पातिना तदा ।  
> युवराजो महाप्राज्ञः प्रत्युवाचाङ्गदस्तदा ॥ ८ ॥

जटायुके भाई सम्पातिके उस समय ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् युवराज अङ्गदने उनसे इस प्रकार कहा—॥ ८ ॥

> जटायुषो यदि भ्राता श्रुतं ते गदितं मया ।  
> आख्याहि यदि जानासि निलयं तस्य रक्षसः ॥ ९ ॥

‘गृध्रराज ! यदि आप जटायुके भाई हैं, यदि आपने मेरी कही हुई बातें सुनी हैं और यदि आप उस राक्षसका निवासस्थान जानते हैं तो हमें बताइये ॥ ९ ॥

> अदीर्घदर्शिनं तं वै रावणं राक्षसाधमम् ।  
> अन्तिके यदि वा दूरे यदि जानासि शंस नः ॥१०॥

‘वह अदूरदर्शी नीच राक्षस रावण यहाँसे निकट हो या दूर, यदि आप जानते हैं तो हमें उसका पता बता दें’ ॥१०॥

> ततोऽब्रवीन्महातेजा भ्राता ज्येष्ठो जटायुषः ।  
> आत्मानुरूपं वचनं वानरान् सम्प्रहर्षयन् ॥ ११ ॥

तब जटायुके बड़े भाई महातेजस्वी सम्पातिने वानरोंका हर्ष बढ़ाते हुए अपने अनुरूप बात कही—॥ ११ ॥

> निर्दग्धपक्षो गृध्रोऽहं गतवीर्यः प्लवङ्गमाः ।  
> वाङ्मात्रेण तु रामस्य करिष्ये साह्यमुत्तमम् ॥ १२ ॥

‘वानरो ! मेरे पंख जल गये । अब मैं बेपरका गीध हूँ । मेरी शक्ति जाती रही ( अतः मैं शरीरसे तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता, तथापि ) वचनमात्रसे भगवान् श्रीरामकी उत्तम सहायता अवश्य करूँगा ॥ १२ ॥

> जानामि वारुणाँल्लोकान् विष्णोस्त्रैविक्रमानपि ।  
> देवासुरविमर्दांश्च ह्यमृतस्य विमन्थनम् ॥ १३ ॥

‘मैं वरुणके लोकोंको जानता हूँ । वामनावतारके समय भगवान् विष्णुने जहाँ-जहाँ अपने तीन पग रक्खे थे, उन स्थानोंका भी मुझे ज्ञान है । अमृत-मन्थन तथा देवासुरसंग्राम भी मेरी देखी और जानी हुई घटनाएँ हैं ॥ १३ ॥

> रामस्य यदिदं कार्यं कर्तव्यं प्रथमं मया ।  
> जरया च हृतं तेजः प्राणाश्च शिथिला मम ॥ १४ ॥

‘यद्यपि वृद्धावस्थाने मेरा तेज हर लिया है और मेरी प्राणशक्ति शिथिल हो गयी है तथापि श्रीरामचन्द्रजीका यह कार्य मुझे सबसे पहले करना है ॥ १४ ॥

> तरुणी रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता ।  
> ह्रियमाणा मया दृष्टा रावणेन दुरात्मना ॥ १५ ॥

‘एक दिन मैंने भी देखा, दुरात्मा रावण सब प्रकारके गहनोंसे सजी हुई एक रूपवती युवतीको हरकर लिये जा रहा था ॥ १५ ॥

> क्रोशन्ती रामरामेति लक्ष्मणेति च भामिनी ।  
> भूषणान्यपविध्यन्ती गात्राणि च विधुन्वती ॥ १६ ॥

‘वह मानिनी देवी ‘हा राम ! हा राम ! हा लक्ष्मण’ की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती और अपने शरीरके अवयवोंको कम्पित करती हुई छटपटा रही थी ॥ १६ ॥

> सूर्यप्रभेव शैलाग्रे तस्याः कौशेयमुत्तमम् ।  
> असिते राक्षसे भाति यथा वा तडिदम्बुदे ॥ १७ ॥

‘उसका सुन्दर रेशमी पीताम्बर उदयाचलके शिखरपर फैली हुई सूर्यकी प्रभाके समान सुशोभित होता था । वह उस काले राक्षसके समीप बादलोंमें चमकती हुई बिजलीके समान प्रकाशित हो रही थी ॥ १७ ॥

> तां तु सीतामहं मन्ये रामस्य परिकीर्तनात् ।  
> श्रूयतां मे कथयतो निलयं तस्य रक्षसः ॥ १८ ॥

‘श्रीरामका नाम लेनेसे मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी । अब मैं उस राक्षसके घरका पता बताता हूँ, सुनो ॥१८॥

> पुत्रो विश्रवसः साक्षाद् भ्राता वैश्रवणस्य च ।  
> अध्यास्ते नगरीं लङ्कां रावणो नाम राक्षसः ॥ १९ ॥

‘रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवाका पुत्र और साक्षात् कुबेरका भाई है । वह लङ्का नामवाली नगरीमें निवास करता है ॥ १९ ॥

> इतो द्वीपे समुद्रस्य सम्पूर्णे शतयोजने ।  
> तस्मिँल्लङ्का पुरी रम्या निर्मिता विश्वकर्मणा ॥ २० ॥

‘यहाँसे पूरे चार सौ कोसके अन्तरपर समुद्रमें एक द्वीप है, जहाँ विश्वकर्माने अत्यन्त रमणीय लङ्कापुरीका निर्माण किया है ॥ २० ॥

> जाम्बूनदमयैर्द्वारैश्चित्रैः काञ्चनवेदिकैः ।  
> प्रासादैर्हेमवर्णैश्च महद्भिः सुसमाकृता ॥ २१ ॥

‘उसके विचित्र दरवाजे और बड़े-बड़े महल सुवर्णके बने हुए हैं । उनके भीतर सोनेके चबूतरे या वेदियाँ हैं ॥ २१ ॥

> प्राकारेणार्कवर्णेन महता च समन्विता ।  
> तस्यां वसति वैदेही दीना कौशेयवासिनी ॥ २२ ॥

‘उस नगरीकी चहारदीवारी बहुत बड़ी है और सूर्यकी भाँति चमकती रहती है । उसीके भीतर पीले रंगकी रेशमी साड़ी पहने विदेहकुमारी सीता बड़े दुःखसे निवास करती हैं ॥ २२ ॥

> रावणान्तःपुरे रुद्धा राक्षसीभिः सुरक्षिता ।  
> जनकस्यात्मजां राजस्तस्यां द्रक्ष्यथ मैथिलीम् ॥ २३ ॥

‘रावणके अन्तःपुरमें नजरबंद हैं । बहुत-सी राक्षसियाँ उनके पहरेपर तैनात हैं । वहाँ पहुँचनेपर तुमलोग राजा जनककी कन्या मैथिली सीताको देख सकोगे ॥ २३ ॥

> लङ्कायामथ गुप्तायां सागरेण समन्ततः ।  
> सम्प्राप्य सागरस्यान्तं सम्पूर्णं शतयोजनम् ॥ २४ ॥  
> आसाद्य दक्षिणं तीरं ततो द्रक्ष्यथ रावणम् ।  
> तत्रैव त्वरिताः क्षिप्रं विक्रमध्वं प्लवङ्गमाः ॥ २५ ॥

‘लङ्का चारों ओरसे समुद्रके द्वारा सुरक्षित है । पूरे सौ योजन समुद्रको पार करके उसके दक्षिण तटपर पहुँचनेपर तुमलोग रावणको देख सकोगे । अतः वानरो ! समुद्रको पार करनेमें ही तुरंत शीघ्रतापूर्वक अपने पराक्रमका परिचय दो ॥ २४-२५ ॥

> ज्ञानेन खलु पश्यामि दृष्ट्वा प्रत्यागमिष्यथ ।  
> आद्यः पन्थाः कुलिङ्गानां ये चान्ये धान्यजीविनः ॥ २६ ॥

‘निश्चय ही मैं ज्ञानदृष्टिसे देखता हूँ । तुमलोग सीताका दर्शन करके लौट आओगे । आकाशका पहला मार्ग गौरैयों तथा अन्न खानेवाले कबूतर आदि पक्षियोंका है ॥ २६ ॥

> द्वितीयो बलिभोजानां ये च वृक्षफलाशनाः ।  
> भासास्तृतीयं गच्छन्ति क्रौञ्चाश्च कुररैः सह ॥ २७ ॥

‘उससे ऊपरका दूसरा मार्ग कौओं तथा वृक्षोंके फल खाकर रहनेवाले दूसरे-दूसरे पक्षियोंका है । उससे भी ऊँचा जो आकाशका तीसरा मार्ग है, उससे चील, क्रौञ्च और कुरर आदि पक्षी जाते हैं ॥ २७ ॥

> श्येनाश्चतुर्थं गच्छन्ति गृध्रा गच्छन्ति पञ्चमम् ।  
> बलवीर्योपपन्नानां रूपयौवनशालिनाम् ॥ २८ ॥  
> षष्ठस्तु पन्था हंसानां वैनतेयगतिः परा ।  
> वैनतेयाच्च नो जन्म सर्वेषां वानरर्षभाः ॥ २९ ॥

‘बाज चौथे और गीध पाँचवें मार्गसे उड़ते हैं । रूप, बल और पराक्रमसे सम्पन्न तथा यौवनसे सुशोभित होनेवाले हंसोंका छठा मार्ग है। उनसे भी ऊँची उड़ान गरुड़की है । वानरशिरोमणियो ! हम सबका जन्म गरुड़से ही हुआ है ॥ २८-२९ ॥

> गर्हितं तु कृतं कर्म येन स्म पिशिताशिनः ।  
> प्रतिकार्यं च मे तस्य वैरं भ्रातृकृतं भवेत् ॥ ३० ॥

‘परंतु पूर्वजन्ममें हमसे कोई निन्दित कर्म बन गया था, जिससे इस समय हमें मांसाहारी होना पड़ा है । तुमलोगोंकी सहायता करके मुझे रावणसे अपने भाईके वैरका बदला लेना है ॥ ३० ॥

> इहस्थोऽहं प्रपश्यामि रावणं जानकीं तथा ।  
> अस्माकमपि सौपर्णं दिव्यं चक्षुर्बलं तथा ॥ ३१ ॥  
> तस्मादाहारवीर्येण निसर्गेण च वानराः ।  
> आयोजनशतात् साग्राद् वयं पश्याम नित्यशः ॥ ३२ ॥

‘मैं यहींसे रावण और जानकीको देखता हूँ । हम लोगोंमें भी गरुड़की भाँति दूरतक देखनेकी दिव्य शक्ति है ॥ ‘इसलिये वानरो ! हम भोजनजनित बलसे तथा स्वाभाविक शक्तिसे भी सदा सौ योजन और उससे आगेतक भी देख सकते हैं ॥ ३२ ॥

> अस्माकं विहिता वृत्तिर्निसर्गेण च दूरतः ।  
> विहिता वृक्षमूले तु वृत्तिश्चरणयोधिनाम् ॥ ३३ ॥

‘जातीय स्वभावके अनुसार हमलोगोंकी जीविका-वृत्ति दूरसे देखे गये दूरस्थ भक्ष्यविशेषके द्वारा नियत की गयी है तथा जो कुक्कुट आदि पक्षी हैं, उनकी जीवन-वृत्ति वृक्षकी जड़तक ही सीमित है—वे वहींतक उपलब्ध होनेवाली वस्तुसे जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ ३३ ॥

> उपायो दृश्यतां कश्चिल्लङ्घने लवणाम्भसः ।  
> अभिगम्य तु वैदेहीं समृद्धार्था गमिष्यथ ॥ ३४ ॥

‘अब तुम इस खारे पानीके समुद्रको लाँघनेका कोई उपाय सोचो । विदेहकुमारी सीताके पास जा सफलमनोरथ होकर किष्किन्धापुरीको लौटोगे ॥ ३४ ॥

> समुद्रं नेतुमिच्छामि भवद्भिर्वरुणालयम् ।  
> प्रदास्याम्युदकं भ्रातुः स्वर्गतस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥

‘अब मैं तुम्हारी सहायतासे समुद्रके किनारे चलना चाहता हूँ । वहाँ अपने स्वर्गवासी भाई महात्मा जटायुको जलाञ्जलि प्रदान करूँगा’ ॥ ३५ ॥

> ततो नीत्वा तु तं देशं तीरे नदनदीपतेः ।  
> निर्दग्धपक्षं सम्पातिं वानराः सुमहौजसः ॥ ३६ ॥  
> तं पुनः प्रापयित्वा च तं देशं पतगेश्वरम् ।  
> बभूवुर्वानरा हृष्टाः प्रवृत्तिमुपलभ्य ते ॥ ३७ ॥

यह सुनकर महापराक्रमी वानरोंने जले पंखवाले पक्षिराज सम्पातिको उठाकर समुद्रके किनारे पहुँचा दिया और जलाञ्जलि देनेके पश्चात् वे पुनः उनको वहाँसे उठाकर उनके रहनेके स्थानपर ले आये । उनके मुखसे सीताका समाचार जानकर उन सभी वानरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३६-३७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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