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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 57"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 57

> शोकाद् भ्रष्टस्वरमपि श्रुत्वा वानरयूथपाः।  
> श्रद्धुनैव तद्वाक्यं कर्मणा तस्य शङ्किताः ॥ १ ॥  
> ते प्रायमुपविष्टास्तु दृष्ट्वा गृध्रं प्लवंगमाः।

शोकके कारण सम्पातिका स्वर विकृत हो गया था। उनकी कही हुई बात सुनकर भी वानर-यूथपतियोंने उसपर विश्वास नहीं किया; क्योंकि वे उनके कर्मसे शङ्कित थे ॥ १ ॥

> चक्षुर्बुद्धि तदा रौद्रां सर्वान् नो भक्षयिष्यति ॥ २ ॥

आमरण उपवासके लिये बैठे हुए उन वानरोंने उस समय गीधको देखकर यह भयंकर बात सोची, ‘यह हम सबको खा तो नहीं जायगा ? ॥ २ ॥

> सर्वथा प्रायमासीनान् यदि नो भक्षयिष्यति ।  
> कृतकृत्या भविष्यामः क्षिप्रं सिद्धिमितो गताः ॥ ३ ॥  
> एतां बुद्धि ततश्चक्रुः सर्वे ते हरियूथपाः ।  
> अवतार्य गिरेः शृङ्गाद् गृध्रमाहाङ्गदस्तदा ॥ ४ ॥

‘अच्छा, हम तो सब प्रकारसे मरणान्त उपवासका व्रत लेकर बैठे ही थे । यदि यह पक्षी हमें खा लेगा तो हमारा काम ही बन जायगा । हमें शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो जायगी’॥ फिर तो उन समस्त वानर-यूथपतियोंने यही निश्चय किया । उस समय गीधको उस पर्वत-शिखरसे उतारकर अङ्गदने कहा-॥ ४ ॥

> बभूवर्क्षरजो नाम वानरेन्द्रः प्रतापवान् ।  
> ममार्यः पार्थिवः पक्षिन् धार्मिकौ तस्य चात्मजौ ॥५॥  
> सुग्रीवश्चैव वाली च पुत्रौ घनबलावुभौ ।  
> लोके विश्रुतकर्माभूद् राजा वाली पिता मम ॥ ६ ॥

‘पक्षिराज ! पहले एक प्रतापी वानरराज हो गये हैं, जिनका नाम था ऋक्षरजा । राजा ऋक्षरजा मेरे पितामह लगते थे । उनके दो धर्मात्मा पुत्र हुए— सुग्रीव और वाली । दोनों ही बड़े बलवान् हुए । उनमेंसे राजा वाली मेरे पिता थे । संसारमें अपने पराक्रमके कारण उनकी बड़ी ख्याति थी ॥५-६ ॥

> राजा कृत्स्नस्य जगत इक्ष्वाकूणां महारथः ।  
> रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम् ॥ ७ ॥  
> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या सह भार्यया ।  
> पितुर्निदेशनिरतो धर्मं पन्थानमाश्रितः ॥ ८ ॥

‘आजसे कुछ वर्ष पहले इक्ष्वाकुवंशके महारथी वीर दशरथकुमार श्रीमान् रामचन्द्रजी, जो सम्पूर्ण जगत्के राजा हैं, पिताकी आज्ञाके पालनमें तत्पर हो धर्म-मार्गका आश्रय ले दण्डकारण्यमें आये थे । उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहकुमारी सीता भी थीं ॥ ७-८ ॥

> तस्य भार्या जनस्थानाद् रावणेन हृता बलात् ।  
> रामस्य तु पितुर्मित्रं जटायुर्नाम गृध्रराट् ॥ ९ ॥  
> ददर्श सीतां वैदेहीं ह्रियमाणां विहायसा ।  
> रावणं विरथं कृत्वा स्थापयित्वा च मैथिलीम् ।  
> परिश्रान्तश्च वृद्धश्च रावणेन हतो रणे ॥ १० ॥

‘जनस्थानमें आनेपर उनकी पत्नी सीताको रावणने बलपूर्वक हर लिया । उस समय गृध्रराज जटायुने, जो उनके पिताके मित्र थे, देखा—रावण आकाशमार्गसे विदेहकुमारीको लिये जा रहा है । देखते ही वे रावणपर टूट पड़े और उसके रथको नष्ट-भ्रष्ट करके उन्होंने मिथिलेशकुमारीको सुरक्षित-रूपसे भूमिपर खड़ा कर दिया । किंतु वे वृद्ध तो थे ही । युद्ध करते-करते थक गये और अन्ततोगत्वा रणक्षेत्रमें रावणके हाथसे मारे गये ॥ ९-१० ॥

> एवं गृध्रो हतस्तेन रावणेन बलीयसा ।  
> संस्कृतश्चापि रामेण जगाम गतिमुत्तमाम् ॥ ११ ॥

‘इस प्रकार महाबली रावणके द्वारा जटायुका वध हुआ । स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने उनका दाह-संस्कार किया और वे उत्तम गति ( साकेतधामको ) प्राप्त हुए ॥११॥

> ततो मम पितृव्येण सुग्रीवेण महात्मना ।  
> चकार राघवः सख्यं सोऽवधीत् पितरं मम ॥ १२ ॥

‘तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने मेरे चाचा महात्मा सुग्रीवसे मित्रता की और उनके कहनेसे उन्होंने मेरे पिताका वध कर दिया ॥ १२ ॥

> मम पित्रा निरुद्धो हि सुग्रीवः सचिवैः सह ।  
> निहत्य वालिनं रामस्ततस्तमभिषेचयत् ॥ १३ ॥

‘मेरे पिताने मन्त्रियोंसहित सुग्रीवको राज्य-सुखसे वञ्चित कर दिया था । इसलिये श्रीरामचन्द्रजीने मेरे पिता वाल्रीको मारकर सुग्रीवका अभिषेक करवाया ॥ १३ ॥

> स राज्ये स्थापितस्तेन सुग्रीवो वानरेश्वरः ।  
> राजा वानरमुख्यानां तेन प्रस्थापिता वयम् ॥ १४ ॥

‘उन्होंने ही सुग्रीवको वालीके राज्यपर स्थापित किया । अब सुग्रीव वानरोंके स्वामी हैं । मुख्य-मुख्य वानरोंके भी राजा हैं । उन्होंने हमें सीताकी खोजके लिये भेजा है ॥१४॥

> एवं रामप्रयुक्तास्तु मार्गमाणास्ततस्ततः ।  
> वैदेहीं नाधिगच्छामो रात्रौ सूर्यप्रभामिव ॥ १५ ॥

‘इस तरह श्रीरामसे प्रेरित होकर हमलोग इधर-उधर विदेहकुमारी सीताको खोजते-फिरते हैं, किंतु अबतक उनका पता नहीं लगा । जैसे रातमें सूर्यकी प्रभाका दर्शन नहीं होता, उसी प्रकार हमें इस वनमें जानकीका दर्शन नहीं हुआ ॥ १५ ॥

> ते वयं दण्डकारण्यं विचित्य सुसमाहिताः ।  
> अज्ञानात् तु प्रविष्टाः स्म धरण्या विवृतं बिलम् ॥ १६ ॥

‘हमलोग अपने मनको एकाग्र करके दण्डकारण्यमें भलीभाँति खोज करते हुए अज्ञानवश पृथ्वीके एक खुले हुए विवरमें घुस गये ॥ १६ ॥

> मयस्य मायाविहितं तद् बिलं च विचिन्वताम् ।  
> व्यतीतस्तत्र नो मासो यो राज्ञा समयः कृतः ॥ १७ ॥

‘वह विवर मयासुरकी मायासे निर्मित हुआ है । उसमें खोजते-खोजते हमारा एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीवने हमारे लौटनेके लिये अवधि निश्चित किया था ॥ १७ ॥

> ते वयं कपिराजस्य सर्वे वचनकारिणः ।  
> कृतां संस्थामतिक्रान्ता भयात् प्रायमुपासिताः ॥ १८ ॥

‘हम सब लोग कपिराज सुग्रीवके आशाकारी हैं, किंतु उनके द्वारा नियत की हुई अवधिको लाँघ गये हैं । अतः उन्हींके भयसे हम यहाँ आमरण उपवास कर रहे हैं ॥१८॥

> क्रुद्धे तस्मिंस्तु काकुत्स्थे सुग्रीवे च सलक्ष्मणे ।  
> गतानामपि सर्वेषां तत्र नो नास्ति जीवितम् ॥ १९ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीव तीनों हमपर कुपित होंगे । उस दशामें वहाँ लौट जानेके बाद भी हम सबके प्राण नहीं बच सकते’ ॥ १९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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