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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 52"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 52

> अथ तानब्रवीत् सर्वान् विश्रान्तान् हरियूथपान् ।  
> इदं वचनमेकाग्रा तापसी धर्मचारिणी ॥ १ ॥

तत्पश्चात् जब सब वानर-यूथपति खा-पीकर विश्राम कर चुके, तब धर्मका आचरण करनेवाली वह एकाग्रहृदया तपस्विनी उन सबसे इस प्रकार बोली—॥ १ ॥

> वानरा यदि वः खेदः प्रणष्टः फलभक्षणात् ।  
> यदि चैतन्मया श्राव्यं श्रोतुमिच्छामि तां कथाम् ॥ २ ॥

‘वानरो ! यदि फल खानेसे तुम्हारी थकावट दूर हो गयी हो और यदि तुम्हारा वृत्तान्त मेरे सुनने योग्य हो तो मैं उसे सुनना चाहती हूँ’ ॥ २ ॥

> तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।  
> आर्जवेन यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ ३ ॥

उसकी यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमान्जी बड़ी सरलताके साथ यथार्थ बात कहने लगे—॥ ३ ॥

> राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः ।  
> रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम् ॥ ४ ॥

‘देवि ! सम्पूर्ण जगत्के राजा दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् राम, जो देवराज इन्द्र और वरुणके समान तेजस्वी हैं, दण्डकारण्यमें पधारे थे ॥ ४ ॥

> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या सह भार्यया ।  
> तस्य भार्या जनस्थानाद् रावणेन हृता बलात् ॥ ५ ॥

‘उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीता भी थीं । जनस्थानमें आकर रावणने उनकी स्त्रीका बलपूर्वक अपहरण कर लिया ॥ ५ ॥

> वीरस्तस्य सखा राज्ञः सुग्रीवो नाम वानरः ।  
> राजा वानरमुख्यानां येन प्रस्थापिता वयम् ॥ ६ ॥  
> अगस्त्यचरितामाशां दक्षिणां यमरक्षिताम् ।  
> सहैभिर्वानरैर्मुख्यैरङ्गदप्रमुखैर्वयम् ॥ ७ ॥

‘श्रेष्ठ वानरोंके राजा वानरजातीय वीरवर सुग्रीव महाराज श्रीरामचन्द्रजीके मित्र हैं, जिन्होंने इन अङ्गद आदि प्रधान वीरोंके साथ हमलोगोंको सीताकी खोज करनेके लिये अगस्त्यसेवित और यमराजद्वारा सुरक्षित दक्षिण दिशामें भेजा है ॥ ६-७ ॥

> रावणं सहिताः सर्वे राक्षसं कामरूपिणम् ।  
> सीतया सह वैदेह्या मार्गध्वमिति चोदिताः ॥ ८ ॥

‘उन्होंने आज्ञा दी थी कि तुम सब लोग एक साथ रहकर विदेहकुमारी सीतासहित उस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसराज रावणका पता लगाना ॥ ८ ॥

> विचित्य तु वनं सर्वं समुद्रं दक्षिणां दिशम् ।  
> वयं बुभुक्षिताः सर्वे वृक्षमूलमुपाश्रिताः ॥ ९ ॥

‘हमने यहाँका सारा जंगल छान डाला । अब दक्षिण दिशामें समुद्रके भीतर उनका अन्वेषण करना है । अबतक सीताका कुछ पता नहीं लगा और हमलोग भूख-प्याससे पीड़ित हो गये । अन्तमें हम सब-के-सब एक वृक्षके नीचे थककर बैठ गये ॥ ९ ॥

> विवर्णवदनाः सर्वे सर्वे ध्यानपरायणाः ।  
> नाधिगच्छामहे पारं मग्नाश्चिन्तामहार्णवे ॥ १० ॥

‘हमारे मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी । हम सभी चिन्तामें मग्न हो गये । चिन्ताके महासागरमें डूबकर हम उसका पार नहीं पा रहे थे ॥ १० ॥

> चारयन्तस्ततश्चक्षुर्दृष्टवन्तो महद् बिलम् ।  
> लतापादपसंछन्नं तिमिरेण समावृतम् ॥ ११ ॥

‘इसी समय चारों ओर दृष्टि दौड़ानेपर हमको यह विशाल गुफा दिखायी पड़ी, जो लता और वृक्षोंसे ढकी हुई तथा अन्धकारसे आच्छन्न थी ॥ ११ ॥

> अस्माद्धंसा जलक्लिन्नाः पक्षैः सलिलरेणुभिः ।  
> कुरराः सारसाश्चैव निष्पतन्ति पतत्रिणः ॥ १२ ॥

‘थोड़ी ही देरमें इस गुफासे हंस, कुरर और सारस आदि पक्षी निकले, जिनके पंख जलसे भीगे थे और उनमें कीचड़ लगी हुई थी ॥ १२ ॥

> साध्वत्र प्रविशामेति मया तूक्तः प्लवङ्गमाः ।  
> तेषामपि हि सर्वेषामनुमानमुपागतम् ॥ १३ ॥

‘तब मैंने वानरोंसे कहा, ‘अच्छा होगा कि हमलोग इसके भीतर प्रवेश करें’ । इन सब वानरोंको भी यह अनुमान हो गया कि गुफाके भीतर पानी है ॥ १३ ॥

> अस्मिन् निपतिताः सर्वेऽप्यथ कार्यत्वरान्विताः ।  
> ततो गाढं निपतिता गृह्य हस्तैः परस्परम् ॥ १४ ॥

‘हम सब लोग अपने कार्यकी सिद्धिके लिये उतावले थे ही, अतः इस गुफामें कूद पड़े । अपने हाथोंसे एक दूसरेको दृढ़तापूर्वक पकड़कर हम गुफामें आगे बढ़ने लगे ॥ १४ ॥

> इदं प्रविष्टाः सहसा बिलं तिमिरसंवृतम् ।  
> पतन्नः कार्यमेतेन कृत्येन वयमागताः ॥ १५ ॥

‘इस तरह सहसा हमलोगोंने इस अँधेरी गुफामें प्रवेश किया । यही हमारा कार्य है और इसी कार्यसे हम इधर आये हैं ॥ १५ ॥

> त्वां चैवोपगताः सर्वे परिद्यूना बुभुक्षिताः ।  
> आतिथ्यधर्मदत्तानि मूलानि च फलानि च ॥ १६ ॥  
> अस्माभिरुपयुक्तानि बुभुक्षापरिपीडितैः ।

‘भूखसे व्याकुल एवं दुर्बल होनेके कारण हम सबने तुम्हारी शरण ली । तुमने आतिथ्य-धर्मके अनुसार हमें फल और मूल अर्पित किये और हमने भी भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन्हें भरपेट खाया ॥ १६½ ॥

> यत् त्वया रक्षिताः सर्वे म्रियमाणा बुभुक्षया ॥ १७ ॥  
> ब्रूहि प्रत्युपकारार्थं किं ते कुर्वन्तु वानराः ।

‘देवि ! हम भूखसे मर रहे थे । तुमने हम सब लोगोंके प्राण बचा लिये । अतः बताओ ये वानर तुम्हारे उपकारका बदला चुकानेके लिये क्या सेवा करें’ ॥ १७½ ॥

> एवमुक्ता तु सर्वज्ञा वानरैस्तैः स्वयंप्रभा ॥ १८ ॥  
> प्रत्युवाच ततः सर्वानिदं वानरयूथपान् ।

स्वयंप्रभा सर्वज्ञ थी । उन वानरोंके ऐसा कहनेपर उसने उन सभी यूथपतियोंको इस प्रकार उत्तर दिया’–॥१८½॥

> सर्वेषां परितुष्टास्मि वानराणां तरस्विनाम् ॥ १९ ॥  
> चरन्त्या मम धर्मेण न कार्यमिह केनचित् ।

‘मैं तुम सभी वेगशाली वानरोंपर यों ही बहुत संतुष्ट हूँ । धर्मानुष्ठानमें लगी रहनेके कारण मुझे किसीसे कोई प्रयोजन नहीं रह गया है’ ॥ १९½ ॥

> एवमुक्तः शुभं वाक्यं तापस्या धर्मसंहितम् ॥ २० ॥  
> उवाच हनुमान् वाक्यं तामनिन्दितलोचनाम् ।

उस तपस्विनीने जब इस प्रकार धर्मयुक्त उत्तम बात कही, तब हनुमान्जीने निर्दोष दृष्टिवाली उस देवीसे यों कहा—॥ २०½ ॥

> शरणं त्वां प्रपन्नाः स्मः सर्वे वै धर्मचारिणीम् ॥ २१ ॥  
> यः कृतः समयोऽस्मासु सुग्रीवेण महात्मना ।  
> स तु कालो व्यतिक्रान्तो बिले च परिवर्तताम् ॥ २२ ॥

‘देवि ! तुम धर्माचरणमें लगी हुई हो । अतः हम सब लोग तुम्हारी शरणमें आये हैं । महात्मा सुग्रीवने हमलोगोंके लौटनेके लिये जो समय निश्चित किया था, वह इस गुफाके भीतर घूमनेमें ही बीत गया ॥ २१-२२ ॥

> सा त्वमस्माद् बिलादस्मानुत्तारयितुमर्हसि ।  
> तस्मात् सुग्रीववचनादतिक्रान्तान् गतायुषः ॥ २३ ॥  
> त्रातुमर्हसि नः सर्वान् सुग्रीवभयशङ्कितान् ।

‘अब तुम कृपा करके हमें इस बिलसे बाहर निकाल दो । सुग्रीवके बताये हुए समयको हम लाँघ चुके हैं, इसलिये अब हमारी आयु पूरी हो चुकी है । हम सब-के-सब सुग्रीवके भयसे डरे हुए हैं, अतः तुम हमारा उद्धार करो ॥ २३½ ॥

> महच्च कार्यमस्माभिः कर्तव्यं धर्मचारिणि ॥ २४ ॥  
> तच्चापि न कृतं कार्यमस्माभिरिह वासिभिः ।

‘धर्मचारिणि ! हमें जो महान् कार्य करना है, उसे भी हम इस गुफामें रहनेके कारण नहीं कर सके हैं’ ॥२४½॥

> एवमुक्ता हनुमता तापसी वाक्यमब्रवीत् ॥ २५ ॥  
> जीवता दुष्करं मन्ये प्रविष्टेन निवर्तितुम् ।  
> तपसः सुप्रभावेण नियमोपार्जितेन च ॥ २६ ॥  
> सर्वानेव बिलादस्मात् तारयिष्यामि वानरान् ।

हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर तापसी बोली—‘मैं समझती हूँ जो एक बार इस गुफामें चला आता है, उसका जीते-जी यहाँसे लौटना बहुत कठिन हो जाता है । तथापि नियमोंके पालन और तपस्याके उत्तम प्रभावसे मैं तुम सभी वानरोंको इस गुफासे बाहर निकाल दूँगी ॥ २५-२६½ ॥

> निमीलयत चक्षूंषि सर्वे वानरपुङ्गवाः ॥ २७ ॥  
> नहि निष्क्रमितुं शक्यमनिमीलितलोचनैः ।

‘श्रेष्ठ वानरो ! तुम सब लोग अपनी-अपनी आँखें बंद कर लो । आँख बंद किये बिना यहाँसे निकलना असम्भव है’ ॥ २७½ ॥

> ततो निमीलिताः सर्वे सुकुमाराङ्गुलैः करैः ॥ २८ ॥  
> सहसा पिदधुर्दृष्टिं हृष्टा गमनकाङ्क्षया ।

यह सुनकर सबने सुकुमार अङ्गुलिवाले हाथोंसे आँखें मूँद लीं । गुफासे बाहर निकलनेकी इच्छासे प्रसन्न होकर उन सबने सहसा नेत्र बंद कर लिये ॥ २८½ ॥

> वानरास्तु महात्मानो हस्तरुद्धमुखास्तदा ॥ २९ ॥  
> निमेषान्तरमात्रेण बिलादुत्तारितास्तया ।

इस प्रकार उस समय हाथोंसे मुँह ढक लेनेके कारण उन महात्मा वानरोंको स्वयंप्रभाने पलक मारते-मारते बिलसे बाहर निकाल दिया ॥ २९½ ॥

> उवाच सर्वांस्तांस्तत्र तापसी धर्मचारिणी ॥ ३० ॥  
> निःसृतान् विषमात् तस्मात् समाश्वास्येदमब्रवीत् ।

तत्पश्चात् वहाँ उस धर्मपरायणा तापसीने उस विषम गुफासे बाहर निकले हुए समस्त वानरोंको आश्वासन देकर इस प्रकार कहा—॥ ३०½ ॥

> एष विन्ध्यो गिरिः श्रीमान् नानाद्रुमलतायुतः ॥ ३१ ॥  
> एष प्रस्रवणः शैलः सागरोऽयं महोदधिः ।  
> स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि भवनं वानरर्षभाः ।  
> इत्युक्त्वा तद् बिलं श्रीमत् प्रविवेश स्वयंप्रभा ॥ ३२ ॥

‘श्रेष्ठ वानरो ! यह रहा नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त शोभाशाली विन्ध्यगिरि । इधर यह प्रस्रवणगिरि है और सामने यह महासागर लहरा रहा है । तुम्हारा कल्याण हो । अब मैं अपने स्थानपर जाती हूँ ।’ ऐसा कहकर स्वयंप्रभा उस सुन्दर गुफामें चली गयी ॥ ३१-३२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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