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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 49"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 49

> अथाङ्गदस्तदा सर्वान् वानरानिदमब्रवीत् ।  
> परिश्रान्तो महाप्राज्ञः समाश्वास्य शनैर्वचः ॥ १ ॥

तदनन्तर परिश्रमसे थके हुए महाबुद्धिमान् अङ्गद सम्पूर्ण वानरोंको आश्वासन देकर धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगे—॥ १ ॥

> वनानि गिरयो नद्यो दुर्गाणि गहनानि च ।  
> दरी गिरिगुहाश्चैव विचिताः सर्वमन्ततः ॥ २ ॥  
> तत्र तत्र सहास्माभिर्जानकी न च दृश्यते ।  
> तथा रक्षोऽपहर्ता च सीतायाश्चैव दुष्कृती ॥ ३ ॥

‘हमलोगोंने वन, पर्वत, नदियाँ, दुर्गम स्थान, घने जंगल, कन्दरा और गुफाएँ भीतर प्रवेश करके अच्छी तरह देख डालीं; परंतु उन स्थानोंमें हमें न तो जानकीके दर्शन हुए और न उनका अपहरण करनेवाला वह पापी राक्षस ही मिला ॥ २-३ ॥

> कालश्च नो महान् यातः सुग्रीवश्चोग्रशासनः ।  
> तस्माद् भवन्तः सहिता विचिन्वन्तु समन्ततः ॥ ४ ॥

‘हमारा समय भी बहुत बीत गया । राजा सुग्रीवका शासन बड़ा भयंकर है । अतः आपलोग मिलकर पुनः सब ओर सीताकी खोज आरम्भ करें ॥ ४ ॥

> विहाय तन्द्रीं शोकं च निद्रां चैव समुत्थिताम् ।  
> विचिनुध्वं तथा सीतां पश्यामो जनकात्मजाम् ॥ ५ ॥

‘आलस्य, शोक और आयी हुई निद्राका परित्याग करके इस प्रकार ढूँढ़ें, जिससे हमें जनककुमारी सीताका दर्शन हो सके ॥ ५ ॥

> अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्चापराजयम् ।  
> कार्यसिद्धिकराण्याहुस्तस्मादेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ६ ॥

‘उत्साह, सामर्थ्य और मनमें हिम्मत न हारना—ये कार्यकी सिद्धि करानेवाले सद्गुण कहे गये हैं; इसीलिये मैं आपलोगोंसे यह बात कह रहा हूँ ॥ ६ ॥

> अद्यापीदं वनं दुर्गं विचिन्वन्तु वनौकसः ।  
> खेदं त्यक्त्वा पुनः सर्वं वनमेव विचिन्वताम् ॥ ७ ॥

‘आज भी सारे वानर खेद छोड़कर इस दुर्गम वनमें खोज आरम्भ करें और सारे वनको ही छान डालें ॥ ७ ॥

> अवश्यं कुर्वतां तस्य दृश्यते कर्मणः फलम् ।  
> परं निर्वेदमागम्य नहि नोन्मीलनं क्षमम् ॥ ८ ॥

‘कर्ममें लगे रहनेवाले लोगोंको उस कर्मका फल अवश्य होता दिखायी देता है; अतः अत्यन्त खिन्न होकर उद्योगको छोड़ बैठना कदापि उचित नहीं है ॥ ८ ॥

> सुग्रीवः क्रोधनो राजा तीक्ष्णदण्डश्च वानराः ।  
> भेतव्यं तस्य सततं रामस्य च महात्मनः ॥ ९ ॥

‘सुग्रीव क्रोधी राजा हैं । उनका दण्ड भी बड़ा कठोर होता है । वानरो ! उनसे तथा महात्मा श्रीरामसे आपलोगोंको सदा डरते रहना चाहिये ॥ ९ ॥

> हितार्थमेतदुक्तं वः क्रियतां यदि रोचते ।  
> उच्यतां हि क्षमं यत्तत् सर्वेषामेव वानराः ॥ १० ॥

‘आपलोगोंकी भलाईके लिये ही मैंने ये बातें कही हैं । यदि अच्छी लगें तो आप इन्हें स्वीकार करें । अथवा वानरो ! जो सबके लिये उचित हो, वह कार्य आप ही लोग बतावें’ ॥ १० ॥

> अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा वचनं गन्धमादनः ।  
> उवाच व्यक्तया वाचा पिपासाश्रमखिन्नया ॥ ११ ॥

अङ्गदकी यह बात सुनकर गन्धमादनने प्यास और थकावटसे शिथिल हुई स्पष्ट वाणीमें कहा—॥ ११ ॥

> सदृशं खलु वो वाक्यमङ्गदो यदुवाच ह ।  
> हितं चैवानुकूलं च क्रियतामस्य भाषितम् ॥ १२ ॥

‘वानरो ! युवराज अङ्गदने जो बात कही है, वह आप लोगोंके योग्य, हितकर और अनुकूल है; अतः सब लोग इनके कथनानुसार कार्य करें ॥ १२ ॥

> पुनर्मार्गामहे शैलान् कन्दरांश्च शिलास्तथा ।  
> काननानि च शून्यानि गिरिप्रस्रवणानि च ॥ १३ ॥

‘हमलोग पुनः पर्वतों, कन्दराओं, शिलाओं, निर्जन वनों और पर्वतीय झरनोंकी खोज करें ॥ १३ ॥

> यथोद्दिष्टानि सर्वाणि सुग्रीवेण महात्मना ।  
> विचिन्वन्तु वनं सर्वे गिरिदुर्गाणि संगताः ॥ १४ ॥

‘महात्मा सुग्रीवने जिन स्थानोंकी चर्चा की थी, उन सबमें वन और पर्वतीय दुर्गम प्रदेशोंमें सब वानर एक साथ होकर खोज आरम्भ करें’ ॥ १४ ॥

> ततः समुत्थाय पुनर्वानरास्ते महाबलाः ।  
> विन्ध्यकाननसंकीर्णां विचेरुर्दक्षिणां दिशम् ॥ १५ ॥

यह सुनकर वे महाबली वानर उठकर खड़े हो गये और विन्ध्य पर्वतके काननोंसे व्याप्त दक्षिण दिशामें विचरने लगे ॥ १५ ॥

> ते शारदाभ्रप्रतिमं श्रीमद्रजतपर्वतम् ।  
> शृङ्गवन्तं दरीवन्तमधिरुह्य च वानराः ॥ १६ ॥

सामने शरद्-ऋतुके बादलोंके समान शोभाशाली रजत पर्वत दिखायी दिया, जिसमें अनेक शिखर और कन्दराएँ थीं । वे सब वानर उसपर चढ़कर खोजने लगे ॥ १६ ॥

> तत्र लोध्रवनं रम्यं सप्तपर्णवनानि च ।  
> विचिन्वन्तो हरिवराः सीतादर्शनकाङ्क्षिणः ॥ १७ ॥

सीताके दर्शनकी इच्छा रखनेवाले वे सभी श्रेष्ठ वानर वहाँके रमणीय लोध्रवनमें और सप्तपर्ण ( छितवन ) के जंगलोंमें उनकी खोज करने लगे ॥ १७ ॥

> तस्याग्रमधिरूढास्ते श्रान्ता विपुलविक्रमाः ।  
> न पश्यन्ति स्म वैदेहीं रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥ १८ ॥

उस पर्वतके शिखरपर चढ़े हुए वे महापराक्रमी वानर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गये, परंतु श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी रानी सीताका दर्शन न पा सके ॥ १८ ॥

> ते तु दृष्टिगतं दृष्ट्वा तं शैलं बहुकन्दरम् ।  
> अध्यारोहन्त हरयो वीक्षमाणाः समन्ततः ॥ १९ ॥

अनेक कन्दराओंवाले उस पर्वतका अच्छी तरह निरीक्षण करके सब ओर दृष्टिपात करनेवाले वे वानर उससे नीचे उतर गये ॥ १९ ॥

> अवरुह्य ततो भूमिं श्रान्ता विगतचेतसः ।  
> स्थिता मुहूर्तं तत्राथ वृक्षमूलमुपाश्रिताः ॥ २० ॥

पृथ्वीपर उतरकर अधिक थक जानेके कारण अचेत हुए वे सभी वानर वहाँ एक वृक्षके नीचे गये और दो घड़ीतक वहाँ बैठे रहे ॥ २० ॥

> ते मुहूर्तं समाश्वस्ताः किंचिद्भ्रष्टपरिश्रमाः ।  
> पुनरेवोद्यताः कृत्स्नां मार्गितुं दक्षिणां दिशम् ॥ २१ ॥

एक मुहूर्ततक सुस्ता लेनेपर जब उनकी थकावट कुछ कम हो गयी, तब वे पुनः सम्पूर्ण दक्षिण दिशामें खोजके लिये उद्यत हो गये ॥ २१ ॥

> हनुमत्प्रमुखास्तावत् प्रस्थिताः प्लवगर्षभाः ।  
> विन्ध्यमेवादितः कृत्वा विचेरुश्च समन्ततः ॥ २२ ॥

हनुमान् आदि सभी श्रेष्ठ वानर सीताके अन्वेषणके लिये प्रस्थित हो पहले विन्ध्य पर्वतके ही चारों ओर विचरने लगे ॥ २२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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