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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 47"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 47

> दर्शनार्थं तु वैदेह्याः सर्वतः कपिकुञ्जराः ।  
> व्यादिष्टाः कपिराजेन यथोक्तं जग्मुरञ्जसा ॥ १ ॥

वानरराजके द्वारा समस्त दिशाओंकी ओर जानेकी आज्ञा पाकर वे सभी श्रेष्ठ वानर, जिनके लिये जिस ओर जानेका आदेश मिला था उसी ओर, विदेहकुमारी सीताका पता लगानेके लिये उत्साहपूर्वक चल दिये ॥ १ ॥

> ते सरांसि सरित्कक्षानाकाशं नगराणि च ।  
> नदीदुर्गांस्तथा देशान् विचिन्वन्ति समन्ततः ॥ २ ॥

वे सरोवरों, सरिताओं, लतामण्डपों, खुले स्थानों और नगरोंमें तथा नदियोंके कारण दुर्गम प्रदेशोंमें सब ओर घूम-फिरकर सीताकी खोज करने लगे ॥ २ ॥

> सुग्रीवेण समाख्याताः सर्वे वानरयूथपाः ।  
> तत्र देशान् विचिन्वन्ति सशैलवनकाननान् ॥ ३ ॥

सुग्रीवने जिन्हें आज्ञा दी थी, वे सभी वानर-यूथपति अपनी-अपनी दिशाओंके पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण देशोंकी छानबीन करने लगे ॥ ३ ॥

> विचित्य दिवसं सर्वे सीताधिगमने धृताः ।  
> समायान्ति स्म मेदिन्यां निशाकालेषु वानराः ॥ ४ ॥

सीताजीका पता लगानेकी निश्चित इच्छा मनमें लिये वे सब वानर दिनभर इधर-उधर अन्वेषण करते और रातके समय किसी नियत स्थानपर एकत्र हो जाते थे ॥ ४ ॥

> सर्वर्तुकांश्च देशेषु वानराः सफलद्रुमान् ।  
> आसाद्य रजनीं शय्यां चक्रुः सर्वेष्वहःसु ते ॥ ५ ॥

सारे दिन भिन्न-भिन्न देशोंमें घूम-फिरकर वे वानर सभी ऋतुओंमें फल देनेवाले वृक्षोंके पास जाकर रातको वहीं सोया अथवा विश्राम किया करते थे ॥ ५ ॥

> तदहः प्रथमं कृत्वा मासे प्रस्रवणं गताः।  
> कपिराजेन संगम्य निराशाः कपिकुञ्जराः ॥ ६ ॥

जानेके दिनको पहला दिन मानकर एक मास पूर्ण होनेतक वे श्रेष्ठ वानर निराश हो लौट आये और कपिराज सुग्रीवसे मिलकर प्रस्रवणगिरिपर ठहर गये ॥ ६ ॥

> विचित्य तु दिशं पूर्वां यथोक्तां सचिवैः सह।  
> अद्रष्ट्वा विनतः सीतामाजगाम महाबलः ॥ ७ ॥

महाबली विनत अपने मन्त्रियोंके साथ पहले बताये अनुसार पूर्व दिशामें खोज करके वहाँ सीताको न पाकर किष्किन्धा लौट आये ॥ ७ ॥

> दिशमप्युत्तरां सर्वां विविच्य स महाकपिः।  
> आगतः सह सैन्येन भीतः शतबलिस्तदा ॥ ८ ॥

महाकपि शतबलि सारी उत्तर दिशाकी छानबीन करके भयभीत हो तत्काल सेनासहित किष्किन्धा आ गये ॥ ८ ॥

> सुषेणः पश्चिमामाशां विविच्य सह वानरैः।  
> समेत्य मासे पूर्णे तु सुग्रीवमुपचक्रमे ॥ ९ ॥

वानरोंसहित सुषेण भी पश्चिम दिशाका अनुसंधान करके वहाँ सीताको न पाकर एक मास पूर्ण होनेपर सुग्रीवके पास चले आये ॥ ९ ॥

> तं प्रस्रवणपृष्ठस्थं समासाद्याभिवाद्य च।  
> आसीनं सह रामेण सुग्रीवमिदमब्रुवन् ॥ १० ॥

प्रस्रवणगिरिपर श्रीरामचन्द्रजीके साथ बैठे हुए सुग्रीवके पास आकर सब वानरोंने उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ १० ॥

> विचिताः पर्वताः सर्वे वनानि गहनानि च।  
> निम्नगाः सागरान्ताश्च सर्वे जनपदाश्च ये ॥ ११ ॥  
> गुहाश्च विचिताः सर्वा याश्च ते परिकीर्तिताः।  
> विचिताश्च महागुल्मा लताविततसंतताः ॥ १२ ॥

‘राजन् ! हमने समस्त पर्वत, घने जंगल, समुद्रपर्यन्त नदियाँ, सम्पूर्ण देश, आपकी बतायी हुई सारी गुफाएँ तथा लतावितानसे व्याप्त हुई झाड़ियाँ भी खोज डालीं ॥११-१२॥

> गहनेषु च देशेषु दुर्गेषु विषमेषु च।  
> सत्त्वान्यतिप्रमाणानि विचितानि हतानि च।  
> ये चैव गहना देशा विचितास्ते पुनः पुनः ॥ १३ ॥

‘घने वनों, विभिन्न देशों, दुर्गम स्थानों और ऊँची-ऊँची भूमियोंमें भी ढूँढ़ा है । बड़े-बड़े प्राणियोंकी भी तलाशी ली और उन्हें मार डाला । जो-जो प्रदेश घने और दुर्गम जान पड़े, वहाँ बारंबार खोज की ( किंतु कहीं भी सीताजीका पता न लगा ) ॥ १३ ॥

> उदारसत्त्वाभिजनो हनूमान्  
> स मैथिलीं ज्ञास्यति वानरेन्द्र ।  
> दिशं तु यामेव गता तु सीता  
> तामास्थितो वायुसुतो हनूमान् ॥ १४ ॥

‘वानरराज ! वायुपुत्र हनुमान् परम शक्तिमान् और कुलीन हैं। वे ही मिथिलेशकुमारीका पता लगा सकेंगे; क्योंकि वे उसी दिशामें गये हैं, जिधर सीता गयी हैं’ ॥१४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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