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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 45"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 45

> सर्वांश्चाहूय सुग्रीवः प्लवगान् प्लवगर्षभः।  
> समस्तांश्चाब्रवीद् राजा रामकार्यार्थसिद्धये ॥ १ ॥

तदनन्तर वानरशिरोमणि राजा सुग्रीव अन्य समस्त वानरोंको बुलाकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये उन सबसे बोले—॥ १ ॥

> एवमेतद् विचेतव्यं भवद्भिर्वानरोत्तमैः।  
> तदुग्रशासनं भर्तुर्विज्ञाय हरिपुंगवाः ॥ २ ॥  
> शलभा इव संछाद्य मेदिनीं सम्प्रतस्थिरे ।

‘कपिवरो ! जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार तुम सभी श्रेष्ठ वानरोंको इस जगत्में सीताकी खोज करनी चाहिये ।‘ स्वामीकी उस कठोर आज्ञाको भलीभाँति समझकर वे सम्पूर्ण श्रेष्ठ वानर टिड्डियोंके दलकी भाँति पृथ्वीको आच्छादित करके वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २½ ॥

> रामः प्रस्रवणे तस्मिन् न्यवसत् सहलक्ष्मणः ॥ ३ ॥  
> प्रतीक्षमाणस्तं मासं सीताधिगमने कृतः ।

श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ उस प्रस्रवणगिरिपर ही ठहरे रहे और सीताका समाचार लानेके लिये जो एक मासकी अवधि निश्चित की गयी थी, उसकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ ३½ ॥

> उत्तरां तु दिशं रम्यां गिरिराजसमावृताम् ॥ ४ ॥  
> प्रतस्थे सहसा वीरो हरिः शतबलिस्तदा ।

उस समय वीर वानर शतबलिने गिरिराज हिमालयसे घिरी हुई रमणीय उत्तर दिशाकी ओर शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया ॥ ४½ ॥

> पूर्वां दिशं प्रतिययौ विनतो हरियूथपः ॥ ५ ॥  
> ताराङ्गदादिसहितः प्लवगः पवनात्मजः ।  
> अगस्त्याचरितामाशां दक्षिणां हरियूथपः ॥ ६ ॥  
> पश्चिमां च दिशं घोरां सुषेणः प्लवगेश्वरः ।  
> प्रतस्थे हरिशार्दूलो दिशं वरुणपालिताम् ॥ ७ ॥

वानर-यूथपति विनत पूर्व दिशाकी ओर गये । कपिगणोंके अधिपति पवनकुमार वानर हनुमान्जी तार और अङ्गद आदिके साथ अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेणने वरुणद्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशाकी यात्रा की ॥ ५–७ ॥

> ततः सर्वा दिशो राजा चोदयित्वा यथातथम् ।  
> कपिसेनापतिर्वीरो मुमोद सुखितः सुखम् ॥ ८ ॥

वानर-सेनाके स्वामी वीर राजा सुग्रीव सम्पूर्ण दिशाओंमें यथायोग्य वानरोंको भेजकर बहुत सुखी हुए और मन-ही-मन हर्षका अनुभव करने लगे ॥ ८ ॥

> एवं संचोदिताः सर्वे राज्ञा वानरयूथपाः ।  
> स्वां स्वां दिशमभिप्रेत्य त्वरिताः सम्प्रतस्थिरे ॥ ९ ॥

इस तरह राजाकी आज्ञा पाकर समस्त वानर-यूथपति बड़ी उतावलीके साथ अपनी-अपनी दिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ९ ॥

> नदन्तश्चोन्नदन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः ।  
> क्ष्वेडन्तो धावमानाश्च विनदन्तो महाबलाः ॥ १० ॥  
> एवं संचोदिताः सर्वे राज्ञा वानरयूथपाः ।  
> आनयिष्यामहे सीतां हनिष्यामश्च रावणम् ॥ ११ ॥  
> अहमेको वधिष्यामि प्राप्तं रावणमाहवे ।  
> ततश्चोन्मथ्य सहसा हरिष्ये जनकात्मजाम् ॥ १२ ॥  
> वेपमानां श्रमेणाद्य भवद्भिः स्थीयतामिति ।  
> एक एवाहरिष्यामि पातालादपि जानकीम् ॥ १३ ॥  
> विधमिष्याम्यहं वृक्षान् दारयिष्याम्यहं गिरीन् ।  
> धरणीं दारयिष्यामि क्षोभयिष्यामि सागरान् ॥ १४ ॥  
> अहं योजनसंख्यायाः प्लवेयं नात्र संशयः ।  
> शतयोजनसंख्यायाः शतं समधिकं ह्यहम् ॥ १५ ॥  
> भूतले सागरे वापि शैलेषु च वनेषु च ।  
> पातालस्यापि वा मध्ये न ममाच्छिद्यते गतिः ॥ १६ ॥

वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजाके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँतिके शब्द करते, उच्च स्वरसे गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे—‘राजन् ! हम सीताको साथ लायेंगे और रावणका वध कर डालेंगे। युद्धमें यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा । तत्पश्चात् उसकी सारी सेनाको मथकर कष्ट एवं भयसे काँपती हुई जानकीजीको सहसा यहाँ उठा लाऊँगा । आपलोग यहीं ठहरें । मैं अकेला ही पातालसे भी जनककिशोरीको निकाल लाऊँगा, वृक्षोंको उखाड़ फेकूँगा, पर्वतोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रोंको भी विक्षुब्ध कर डालूँगा । मैं सौ योजनतक कूद सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं सौ योजनसे भी अधिक दूरतक जा सकता हूँ । पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वन और पातालमें भी मेरी गति नहीं रुकती‘ ॥ १०–१६ ॥

> इत्येकैकस्तदा तत्र वानरा बलदर्पिताः ।  
> ऊचुश्च वचनं तस्य हरिराजस्य संनिधौ ॥ १७ ॥

इस तरह वहाँ वानरराज सुग्रीवके समीप बलके घमंडमें भरे हुए वानर उस समय एक-एक करके आते और उनके सामने उपर्युक्त बातें कहते थे ॥ १७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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