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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 44"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 44

> विशेषेण तु सुग्रीवो हनूमत्यर्थमुक्तवान्।  
> स हि तस्मिन् हरिश्रेष्ठे निश्चितार्थोऽर्थसाधने ॥ १ ॥

सुग्रीवने हनुमान्जीके समक्ष विशेषरूपसे सीताके अन्वेषणरूप प्रयोजनको उपस्थित किया; क्योंकि उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी इस कार्यको सिद्ध कर सकेंगे ॥ १ ॥

> अब्रवीच्च हनूमन्तं विक्रान्तमनिलात्मजम्।  
> सुग्रीवः परमप्रीतः प्रभुः सर्ववनौकसाम् ॥ २ ॥

समस्त वानरोंके स्वामी सुग्रीवने अत्यन्त प्रसन्न होकर परम पराक्रमी वायुपुत्र हनुमान्से इस प्रकार कहा—॥२॥

> न भूमौ नान्तरिक्षे वा नाम्बरे नामरालये।  
> नाप्सु वा गतिसङ्गं ते पश्यामि हरिपुंगव ॥ ३ ॥

‘कपिश्रेष्ठ ! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, आकाश, देवलोक अथवा जलमें भी तुम्हारी गतिका अवरोध मैं कभी नहीं देखता हूँ ॥ ३ ॥

> सासुराः सहगन्धर्वाः सनागनरदेवताः।  
> विदिताः सर्वलोकास्ते ससागरधराधराः ॥ ४ ॥

‘असुर, गन्धर्व, नाग, मनुष्य, देवता, समुद्र तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका तुम्हें ज्ञान है ॥ ४ ॥

> गतिर्वेगश्च तेजश्च लाघवं च महाकपे।  
> पितुस्ते सदृशं वीर मारुतस्य महौजसः ॥ ५ ॥

‘वीर ! महाकपे ! सर्वत्र अबाधित गति, वेग, तेज और फुर्ती—ये सभी सद्गुण तुममें अपने महापराक्रमी पिता वायुके ही समान हैं ॥ ५ ॥

> तेजसा वापि ते भूतं न समं भुवि विद्यते।  
> तद् यथा लभ्यते सीता तत्त्वमेवानुचिन्तय ॥ ६ ॥

‘इस भूमण्डलमें कोई भी प्राणी तुम्हारे तेजकी समानता करनेवाला नहीं है; अतः जिस प्रकार सीताकी उपलब्धि हो सके, वह उपाय तुम्हीं सोचो ॥ ६ ॥

> त्वय्येव हनुमन्नस्ति बलं बुद्धिः पराक्रमः।  
> देशकालानुवृत्तिश्च नयश्च नयपण्डित ॥ ७ ॥

‘हनुमन् ! तुम नीतिशास्त्रके पण्डित हो । एकमात्र तुम्हींमें बल, बुद्धि, पराक्रम, देश-कालका अनुसरण तथा नीतिपूर्ण बर्ताव एक साथ देखे जाते हैं’ ॥ ७ ॥

> ततः कार्यसमासङ्गमवगम्य हनूमति।  
> विदित्वा हनुमन्तं च चिन्तयामास राघवः ॥ ८ ॥

सुग्रीवकी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको यह ज्ञात हुआ कि इस कार्यकी सिद्धिका सम्बन्ध—इसे पूर्ण करनेका सारा भार हनुमान्पर ही है । उन्होंने स्वयं भी यह अनुभव किया कि हनुमान् इस कार्यको सफल करनेमें समर्थ हैं । फिर वे इस प्रकार मन-ही-मन विचार करने लगे—॥ ८ ॥

> सर्वथा निश्चितार्थोऽयं हनूमति हरीश्वरः।  
> निश्चितार्थतरश्चापि हनूमान् कार्यसाधने ॥ ९ ॥

‘वानरराज सुग्रीव सर्वथा हनुमान्पर ही यह भरोसा किये बैठे हैं कि ये ही निश्चितरूपसे हमारे इस प्रयोजनको सिद्ध कर सकते हैं । स्वयं हनुमान् भी अत्यन्त निश्चितरूपसे इस कार्यको सिद्ध करनेका विश्वास रखते हैं ॥ ९ ॥

> तदेवं प्रस्थितस्यास्य परिज्ञातस्य कर्मभिः।  
> भर्त्रा परिगृहीतस्य ध्रुवः कार्यफलोदयः ॥ १० ॥

‘इस प्रकार कार्योंद्वारा जिनकी परीक्षा कर ली गयी है तथा जो सबसे श्रेष्ठ समझे गये हैं, वे हनुमान् अपने स्वामी सुग्रीवके द्वारा सीताकी खोजके लिये भेजे जा रहे हैं । इनके द्वारा इस कार्यके फलका उदय ( सीताका दर्शन ) होना निश्चित है’ ॥ १० ॥

> तं समीक्ष्य महातेजा व्यवसायोत्तरं हरिम्।  
> कृतार्थ इव संहृष्टः प्रहृष्टेन्द्रियमानसः ॥ ११ ॥  
> ददौ तस्य ततः प्रीतः स्वनामाङ्कोपशोभितम्।  
> अङ्गुलीयमभिज्ञानं राजपुत्र्याः परंतपः ॥ १२ ॥

ऐसा विचारकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी कार्यसाधन-के उद्योगमें सर्वश्रेष्ठ हनुमान्जीकी ओर दृष्टिपात करके अपनेको कृतार्थ-सा मानते हुए प्रसन्न हो गये । उनकी सारी इन्द्रियाँ और मन हर्षसे खिल उठे ॥ ११ ॥ तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीरामने प्रसन्नतापूर्वक अपने नामके अक्षरोंसे सुशोभित एक अँगूठी हनुमान्जीके हाथमें दी, जो राजकुमारी सीताको पहचानके रूपमें अर्पण करनेके लिये थी ॥ १२ ॥

> अनेन त्वां हरिश्रेष्ठ चिह्नेन जनकात्मजा।  
> मत्सकाशादनुप्राप्तमनुद्विग्नानुपश्यति ॥ १३ ॥

अँगूठी देकर वे बोले—‘कपिश्रेष्ठ ! इस चिह्नके द्वारा जनककिशोरी सीताको यह विश्वास हो जायगा कि तुम मेरे पाससे ही गये हो । इससे वह भय त्यागकर तुम्हारी ओर देख सकेगी ॥ १३ ॥

> व्यवसायश्च ते वीर सत्त्वयुक्तश्च विक्रमः।  
> सुग्रीवस्य च संदेशः सिद्धिं कथयतीव मे ॥ १४ ॥

‘वीरवर ! तुम्हारा उद्योग, धैर्य, पराक्रम और सुग्रीवका संदेश—ये सब मुझे इस बातकी सूचना-सी दे रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा कार्यकी सिद्धि अवश्य होगी’ ॥ १४ ॥

> स तद् गृह्य हरिश्रेष्ठः कृत्वा मूर्ध्नि कृताञ्जलिः।  
> वन्दित्वा चरणौ चैव प्रस्थितः प्लवगर्षभः ॥ १५ ॥

वानरश्रेष्ठ हनुमान्ने वह अँगूठी लेकर उसे मस्तकपर रक्खा और फिर हाथ जोड़कर श्रीरामके चरणोंमें प्रणाम करके वे वानरशिरोमणि वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ १५ ॥

> स तत् प्रकर्षन् हरिणां महद् बलं  
> बभूव वीरः पवनात्मजः कपिः।  
> गताम्बुदे व्योम्नि विशुद्धमण्डलः  
> शशीव नक्षत्रगणोपशोभितः ॥ १६ ॥

उस समय वीर-वानर पवनकुमार हनुमान् अपने साथ वानरोंकी उस विशाल सेनाको ले जाते हुए उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे मेघरहित आकाशमें विशुद्ध ( निर्मल ) मण्डलसे उपलक्षित चन्द्रमा नक्षत्र-समूहोंके साथ सुशोभित होता है ॥ १६ ॥

> अतिबल बलमाश्रितस्तवाहं  
> हरिवर विक्रम विक्रमैरनल्पैः।  
> पवनसुत यथाधिगम्यते सा  
> जनकसुता हनुमंस्तथा कुरुष्व ॥ १७ ॥

जाते हुए हनुमान्को सम्बोधित करके श्रीरामचन्द्रजीने फिर कहा—‘अत्यन्त बलशाली कपिश्रेष्ठ ! मैंने तुम्हारे बलका आश्रय लिया है । पवनकुमार हनुमान् ! जिस प्रकार भी जनकनन्दिनी सीता प्राप्त हो सके, तुम अपने महान् बल-विक्रमसे वैसा ही प्रयत्न करो । अच्छा, अब जाओ’ ॥ १७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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