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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 39"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 39

> इति ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो धर्मभृतां वरः ।  
> बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य प्रत्युवाच कृताञ्जलिम्॥ १ ॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने अपनी दोनों भुजाओंसे उनका आलिङ्गन किया और हाथ जोड़कर खड़े हुए उनसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

> यदिन्द्रो वर्षते वर्षं न तच्चित्रं भविष्यति ।  
> आदित्योऽसौ सहस्रांशुः कुर्याद् वितिमिरं नभः ॥२॥  
> चन्द्रमा रजनीं कुर्यात् प्रभया सौम्य निर्मलाम् ।  
> त्वद्विधो वापि मित्राणां प्रीतिं कुर्यात् परंतप ॥३॥

‘सखे ! इन्द्र जो जलकी वर्षा करते हैं, सहस्रों किरणोंसे शोभा पानेवाले सूर्यदेव जो आकाशका अन्धकार दूर कर देते हैं तथा सौम्य ! चन्द्रमा अपनी प्रभासे जो अँधेरी रातको भी उज्ज्वल कर देते हैं, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि यह उनका स्वाभाविक गुण है। शत्रुओंको संताप देनेवाले सुग्रीव ! इसी तरह तुम्हारे समान पुरुष भी यदि अपने मित्रोंका उपकार करके उन्हें प्रसन्न कर दें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिये ॥ २-३ ॥

> एवं त्वयि न तचित्रं भवेद् यत् सौम्य शोभनम् ।  
> जानाम्यहं त्वां सुग्रीव सततं प्रियवादिनम् ॥ ४ ॥

‘सौम्य सुग्रीव ! इसी प्रकार तुममें जो मित्रोंका हित-साधनरूप कल्याणकारी गुण है, वह आश्चर्यका विषय नहीं है; क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम सदा प्रिय बोलनेवाले हो— यह तुम्हारा स्वाभाविक गुण है ॥ ४ ॥

> त्वत्सनाथः सखे संख्ये जेतास्मि सकलानरीन् ।  
> त्वमेव मे सुहृन्मित्रं साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥ ५ ॥

‘सखे ! तुम्हारी सहायतासे सनाथ होकर मैं युद्धमें समस्त शत्रुओंको जीत लूँगा । तुम्हीं मेरे हितैषी मित्र हो और मेरी सहायता कर सकते हो ॥ ५ ॥

> जहारात्मविनाशाय मैथिलीं राक्षसाधमः ।  
> वञ्चयित्वा तु पौलोमीमनुह्लादो यथा शचीम् ॥ ६ ॥

‘राक्षसाधम रावणने अपना नाश करनेके लिये ही मिथिलेशकुमारीको धोखा देकर उसका अपहरण किया है । ठीक उसी तरह, जैसे अनुह्लादने अपने विनाशके लिये ही पुलोमपुत्री शचीको छलपूर्वक हर लिया था * ॥ ६ ॥

> नचिरात् तं वधिष्यामि रावणं निशितैः शरैः ।  
> पौलोम्याः पितरं दृस्तं शतक्रतुरिवारिहा ॥ ७ ॥

‘जैसे शत्रुहन्ता इन्द्रने शचीके घमंडी पिताको मार डाला था, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही अपने तीखे बाणोंसे रावणका वध कर डालूँगा’ ॥ ७ ॥

> एतस्मिन्नन्तरे चैव रजः समभिवर्तत ।  
> उष्णतीव्रां सहस्रांशोश्छादयद् गगने प्रभाम् ॥ ८ ॥

श्रीराम और सुग्रीवमें जब इस प्रकार बातें हो रही थीं, उसी समय बड़े जोरकी धूल उठी, जिसने आकाशमें फैलकर सूर्यकी प्रचण्ड प्रभाको ढक दिया ॥ ८ ॥

> दिशः पर्याकुलाश्चासंस्तमसा तेन दूषिताः ।  
> चचाल च मही सर्वा सशैलवनकानना ॥ ९ ॥

फिर तो उस धूलजनित अन्धकारसे सम्पूर्ण दिशाएँ दूषित एवं व्याप्त हो गयीं तथा पर्वत, वन और काननोंके साथ समूची पृथ्वी डगमग होने लगी ॥ ९ ॥

> ततो नगेन्द्रसंकाशैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाबलैः ।  
> कृत्स्ना संछादिता भूमिरसंख्येयैः प्लवंगमैः ॥ १० ॥

तदनन्तर पर्वतराजके समान शरीर और तीखी दाढ़वाले असंख्य महाबली वानरोंसे वहाँकी सारी भूमि आच्छादित हो गयी ॥ १० ॥

> निमेषान्तरमात्रेण ततस्तैर्हरियूथपैः ।  
> कोटीशतपरीवारैर्वानरैर्हरियूथपैः ॥ ११ ॥

पलक मारते-मारते अरबों वानरोंसे घिरे हुए अनेकानेक यूथपतियोंने वहाँ आकर सारी भूमिको ढक लिया ॥ ११ ॥

> नादेयैः पार्वतेयैश्च सामुद्रैश्च महाबलैः ।  
> हरिभिर्मेघनिर्ह्रादैरन्यैश्च वनवासिभिः ॥ १२ ॥

नदी, पर्वत, वन और समुद्र सभी स्थानोंके निवासी महाबली वानर जुट गये, जो मेघोंकी गर्जनाके समान उच्चस्वरसे सिंहनाद करते थे ॥ १२ ॥

> तरुणादित्यवर्णैश्च शशिगौरैश्च वानरैः ।  
> पद्मकेसरवर्णैश्च श्वेतैर्हेमकृताल्यैः ॥ १३ ॥

कोई बालसूर्यके समान लाल रंगके थे तो कोई चन्द्रमाके समान गौर वर्णके । कितने ही वानर कमलके केसरोंके समान पीले रंगके थे और कितने ही हिमाचलवासी वानर सफेद दिखायी देते थे ॥ १३ ॥

> कोटीसहस्रैर्दशभिः श्रीमान् परिवृतस्तदा ।  
> वीरः शतबलिर्नाम वानरः प्रत्यदृश्यत ॥ १४ ॥

उस समय परम कान्तिमान् शतबलिनामक वीर वानर दस अरब वानरोंके साथ दृष्टिगोचर हुआ ॥ १४ ॥

> ततः काञ्चनशैलाभस्ताराया वीर्यवान् पिता ।  
> अनेकैर्बहुसाहस्रैः कोटिभिः प्रत्यदृश्यत ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् सुवर्णशैलके समान सुन्दर एवं विशाल शरीरवाले ताराके महाबली पिता कई सहस्र कोटि वानरोंके साथ वहाँ उपस्थित देखे गये ॥ १५ ॥

> तथापरेण कोटीनां सहस्रेण समन्वितः ।  
> पिता रुमायाः सम्प्राप्तः सुग्रीवश्वशुरो विभुः ॥ १६ ॥

इसी प्रकार रुमाके पिता और सुग्रीवके श्वशुर, जो बड़े वैभवशाली थे, वहाँ उपस्थित हुए । उनके साथ भी दस अरब वानर थे ॥ १६ ॥

> पद्मकेसरसंकाशस्तरुणार्कनिभाननः ।  
> बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठः सर्ववानरसत्तमः ॥ १७ ॥  
> अनेकैर्बहुसाहस्रैर्वानराणां समन्वितः ।  
> पिता हनुमतः श्रीमान् केसरी प्रत्यदृश्यत ॥ १८ ॥

तदनन्तर हनुमान्जीके पिता कपिश्रेष्ठ श्रीमान् केसरी दिखायी दिये । उनके शरीरका रंग कमलके केसरोंकी भाँति पीला और मुख प्रातःकालके सूर्यके समान लाल था । वे बड़े बुद्धिमान् और समस्त वानरोंमें श्रेष्ठ थे । वे कई सहस्र वानरोंसे घिरे हुए थे ॥ १७-१८ ॥

> गोलाङ्गूलमहाराजो गवाक्षो भीमविक्रमः ।  
> वृतः कोटिसहस्रेण वानराणामदृश्यत ॥ १९ ॥

फिर लंगूर-जातिवाले वानरोंके महाराज भयंकर पराक्रमी गवाक्षका दर्शन हुआ । उनके साथ दस अरब वानरोंकी सेना थी ॥ १९ ॥

> ऋक्षाणां भीमवेगानां धूम्रः शत्रुनिबर्हणः ।  
> वृतः कोटिसहस्राभ्यां द्वाभ्यां समभिवर्तत ॥ २० ॥

शत्रुओंका संहार करनेवाले धूम्र भयंकर वेगशाली बीस अरब रीछोंकी सेना लेकर आये ॥ २० ॥

> महाचलनिभैर्घोरैः पनसो नाम यूथपः ।  
> आजगाम महावीर्यस्तिसृभिः कोटिभिर्वृतः ॥ २१ ॥

महापराक्रमी यूथपति पनस तीन करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित हुए । वे सब-के-सब बड़े भयंकर तथा महान् पर्वताकार दिखायी देते थे ॥ २१ ॥

> नीलाञ्जनचयाकारो नीलो नामैष यूथपः ।  
> अदृश्यत महाकायः कोटिभिर्दशभिर्वृतः ॥ २२ ॥

यूथपति नीलका शरीर भी बड़ा विशाल था । वे नीले कज्जल गिरिके समान नीलवर्णके थे और दस करोड़ कपियों-से घिरे हुए थे ॥ २२ ॥

> ततः काञ्चनशैलाभो गवयो नाम यूथपः ।  
> आजगाम महावीर्यः कोटिभिः पञ्चभिर्वृतः ॥ २३ ॥

तदनन्तर यूथपति गवय, जो सुवर्णमय पर्वत मेरुके समान कान्तिमान् और महापराक्रमी थे, पाँच करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित हुए ॥ २३ ॥

> दरीमुखश्च बलवान् यूथपोऽभ्याययौ तदा ।  
> वृतः कोटिसहस्रेण सुग्रीवं समवस्थितः ॥ २४ ॥

उसी समय वानरोंके बलवान् सरदार दरीमुख भी आ पहुँचे। वे दस अरब वानरोंके साथ सुग्रीवकी सेवामें उपस्थित हुए थे ॥ २४ ॥

> मैन्दश्च द्विविदश्चोभावश्विपुत्रौ महाबलौ ।  
> कोटिकोटिसहस्रेण वानराणामदृश्यताम् ॥ २५ ॥

अश्विनीकुमारोंके महाबली पुत्र मैन्द और द्विविद ये दोनों भाई भी दस-दस अरब वानरोंकी सेनाके साथ वहाँ दिखायी दिये ॥ २५ ॥

> गजश्च बलवान् वीरस्तिसृभिः कोटिभिर्वृतः ।  
> आजगाम महातेजाः सुग्रीवस्य समीपतः ॥ २६ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी बलवान् वीर गज तीन करोड़ वानरोंके साथ सुग्रीवके पास आया ॥ २६ ॥

> ऋक्षराजो महातेजा जाम्बवान्नाम नामतः ।  
> कोटिभिर्दशभिर्व्याप्तः सुग्रीवस्य वशे स्थितः ॥ २७॥

रीछोंके राजा जाम्बवान् बड़े तेजस्वी थे । वे दस करोड़ रीछोंसे घिरे हुए आये और सुग्रीवके अधीन होकर खड़े हुए ॥ २७ ॥

> रुमणो नाम तेजस्वी विक्रान्तैर्वानरैर्वृतः ।  
> आगतो बलवांस्तूर्णं कोटीशतसमावृतः ॥ २८ ॥

रुमण ( रुमण्वान् ) नामक तेजस्वी और बलवान् वानर एक अरब पराक्रमी वानरोंको साथ लिये बड़ी तीव्र गतिसे वहाँ आया ॥ २८ ॥

> ततः कोटिसहस्राणां सहस्रेण शतेन च ।  
> पृष्ठतोऽनुगतः प्राप्तो हरिभिर्गन्धमादनः ॥ २९ ॥

इसके बाद यूथपति गन्धमादन उपस्थित हुए । उनके पीछे एक पद्म वानरोंकी सेना आयी थी ॥ २९ ॥

> ततः पद्मसहस्रेण वृतः शङ्कुशतेन च ।  
> युवराजोऽङ्गदः प्राप्तः पितुस्तुल्यपराक्रमः ॥ ३० ॥

तत्पश्चात् युवराज अङ्गद आये । ये अपने पिताके समान ही पराक्रमी थे । इनके साथ एक सहस्र पद्म और सौ शंकु (एक पद्म) वानरोंकी सेना थी (इनके सैनिकोंकी कुल संख्या दस शंख एक पद्म थी ) ॥ ३० ॥

> ततस्तारायुतिस्तारो हरिभिर्भीमविक्रमैः ।  
> पञ्चभिर्हरिकोटीभिर्दूरतः पर्यदृश्यत ॥ ३१ ॥

तदनन्तर तारोंके समान कान्तिमान् तार नामक वानर पाँच करोड़ भयंकर पराक्रमी वानर वीरोंके साथ दूरसे आता दिखायी दिया ॥ ३१ ॥

> इन्द्रजानुः कविर्वीरो यूथपः प्रत्यदृश्यत ।  
> एकादशानां कोटीनामीश्वरस्तैश्च संवृतः ॥ ३२ ॥

इन्द्रजानु ( इन्द्रभानु ) नामक वीर यूथपति, जो बड़ा ही विद्वान् एवं बुद्धिमान् था, ग्यारह करोड़ वानरोंके साथ उपस्थित देखा गया । वह उन सबका स्वामी था ॥ ३२ ॥

> ततो रम्भस्त्वनुप्राप्तस्तरुणादित्यसंनिभः ।  
> अयुतेन वृतश्चैव सहस्रेण शतेन च ॥ ३३ ॥

इसके बाद रम्भनामक वानर उपस्थित हुआ, जो प्रातःकालके सूर्यकी भाँति लाल रंगका था । उसके साथ ग्यारह हजार एक सौ वानरोंकी सेना थी ॥ ३३ ॥

> ततो यूथपतिर्वीरो दुर्मुखो नाम वानरः ।  
> प्रत्यदृश्यत कोटीभ्यां द्वाभ्यां परिवृतो बली ॥ ३४ ॥

तत्पश्चात् वीर यूथपति दुर्मुख नामक बलवान् वानर उपस्थित देखा गया, जो दो करोड़ वानर सैनिकोंसे घिरा हुआ था ॥ ३४ ॥

> कैलासशिखराकारैर्वानरैर्भीमविक्रमैः ।  
> वृतः कोटिसहस्रेण हनुमान् प्रत्यदृश्यत ॥ ३५ ॥

इसके बाद हनुमान्जीने दर्शन दिया । उनके साथ कैलासशिखरके समान श्वेत शरीरवाले भयंकर पराक्रमी वानर दस अरबकी संख्यामें मौजूद थे ॥ ३५ ॥

> नलश्चापि महावीर्यः संवृतो द्रुमवासिभिः ।  
> कोटीशतेन सम्प्राप्तः सहस्रेण शतेन च ॥ ३६ ॥

फिर महापराक्रमी नल उपस्थित हुए, जो एक अरब एक हजार एक सौ द्रुमवासी वानरोंसे घिरे हुए थे ॥ ३६ ॥

> ततो दधिमुखः श्रीमान् कोटिभिर्दशभिर्वृतः ।  
> सम्प्राप्तोऽभिनदंस्तस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ ३७ ॥  
> शरभः कुमुदो वह्निर्वानरो रंह एव च ।  
> एते चान्ये च बहवो वानराः कामरूपिणः ॥ ३८ ॥  
> आवृत्य पृथिवीं सर्वां पर्वतांश्च वनानि च ।  
> यूथपाः समनुप्राप्ता येषां संख्या न विद्यते ॥ ३९ ॥  
> आगताश्च निविष्टाश्च पृथिव्यां सर्ववानराः ।  
> आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः ।  
> अभ्यवर्तन्त सुग्रीवं सूर्यमभ्रगणा इव ॥ ४० ॥

तदनन्तर श्रीमान् दधिमुख दस करोड़ वानरोंके साथ गर्जना करते हुए किष्किन्धामें महात्मा सुग्रीवके पास आये ॥ इनके सिवा शरभ, कुमुद, वह्नि तथा रंह—ये और दूसरे भी बहुत-से इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानरयूथपति सारी पृथ्वी, पर्वत और वनोंको आवृत करके वहाँ उपस्थित हुए, जिनकी कोई गणना नहीं की जा सकती ॥ वहाँ आये हुए सभी वानर पृथ्वीपर बैठे । वे सब-के-सब उछलते, कूदते और गर्जते हुए वहाँ सुग्रीवके चारों ओर जमा हो गये । जैसे सूर्यको सब ओरसे घेरकर बादलोंके समूह छा रहे हों ॥ ४० ॥

> कुर्वाणा बहुशब्दांश्च प्रकृष्टा बाहुशालिनः ।  
> शिरोभिर्वानरेन्द्राय सुग्रीवाय न्यवेदयन् ॥ ४१ ॥  
> अपरे वानरश्रेष्ठाः संगम्य च यथोचितम् ।  
> सुग्रीवेण समागम्य स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा ॥ ४२ ॥

अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले बहुतेरे श्रेष्ठ वानरोंने ( जो भीड़के कारण सुग्रीवके पासतक न पहुँच सके थे ) अनेक प्रकारकी बोली बोलकर तथा मस्तक झुकाकर वानरराज सुग्रीवको अपने आगमनकी सूचना दी ॥ बहुत-से श्रेष्ठ वानर उनके पास गये और यथोचितरूपसे मिलकर लौटे तथा कितने ही वानर सुग्रीवसे मिलनेके बाद उनके पास ही हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ४२ ॥

> सुग्रीवस्त्वरितो रामे सर्वांस्तान् वानरर्षभान् ।  
> निवेदयित्वा धर्मज्ञः स्थितः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ ४३ ॥

धर्मके ज्ञाता वानरराज सुग्रीवने वहाँ आये हुए उन सब वानरशिरोमणियोंका समाचार निवेदन करके श्रीरामचन्द्रजीको शीघ्रतापूर्वक उनका परिचय दिया, फिर हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये ॥ ४३ ॥

> यथासुखं पर्वतनिर्झरेषु  
> वनेषु सर्वेषु च वानरेन्द्राः ।  
> निवेशयित्वा विधिवद् बलानि  
> बलं बलज्ञः प्रतिपत्तुमीष्टे ॥ ४४ ॥

उन वानर-यूथपतियोंने वहाँके पर्वतीय झरनोंके आस-पास तथा समस्त वनोंमें अपनी सेनाओंको यथोचितरूपसे सुखपूर्वक ठहरा दिया । तत्पश्चात् सब सेनाओंके ज्ञाता सुग्रीव उनका पूर्णतः ज्ञान प्राप्त करनेमें समर्थ हो सके ॥४४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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