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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 35"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 35

> तथा ब्रुवाणं सौमित्रिं प्रदीप्तमिव तेजसा ।  
> अब्रवील्लक्ष्मणं तारा ताराधिपनिभानना ॥ १ ॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मण अपने तेजके कारण प्रज्वलित-से हो रहे थे । वे जब उपर्युक्त बात कह चुके, तब चन्द्रमुखी तारा उनसे बोली—॥ १ ॥

> नैवं लक्ष्मण वक्तव्यो नायं परुषमर्हति ।  
> हरीणामीश्वरः श्रोतुं तव वक्त्राद् विशेषतः ॥ २ ॥

‘कुमार लक्ष्मण ! आपको सुग्रीवसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये । ये वानरोंके राजा हैं; अतः इनके प्रति कठोर वचन बोलना उचित नहीं है । विशेषतः आप-जैसे सुहृद्के मुखसे तो ये कदापि कटु वचन सुननेके अधिकारी नहीं हैं ॥ २ ॥

> नैवाकृतज्ञः सुग्रीवो न शठो नापि दारुणः ।  
> नैवानृतकथो वीर न जिह्मश्च कपीश्वरः ॥ ३ ॥

‘वीर ! कपिराज सुग्रीव न कृतघ्न हैं, न शठ हैं, न क्रूर हैं, न असत्यवादी हैं और न कुटिल ही हैं ॥ ३ ॥

> उपकारं कृतं वीरो नाप्ययं विस्मृतः कपिः ।  
> रामेण वीर सुग्रीवो यदन्यैर्दुष्करं रणे ॥ ४ ॥

‘वीर लक्ष्मण ! श्रीरामचन्द्रजीने इनका जो उपकार किया है, वह युद्धमें दूसरोंके लिये दुष्कर है । उसे इन वीर कपिराजने कभी भुलाया नहीं है ॥ ४ ॥

> रामप्रसादात् कीर्तिं च कपिराज्यं च शाश्वतम् ।  
> प्राप्तवानिह सुग्रीवो रुमां मां च परंतप ॥ ५ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले सुमित्रानन्दन ! श्रीरामचन्द्रजीके कृपा-प्रसादसे ही सुग्रीवने वानरोंके अक्षय राज्यको, यशको, रुमाको तथा मुझको भी प्राप्त किया है ॥ ५ ॥

> सुदुःखशयितः पूर्वं प्राप्येदं सुखमुत्तमम् ।  
> प्राप्तकालं न जानीते विश्वामित्रो यथा मुनिः ॥ ६ ॥

‘पहले इन्होंने बड़ा दुःख उठाया है । अब इस उत्तम सुखको पाकर ये इसमें ऐसे रम गये कि इन्हें प्राप्त हुए समयका ज्ञान ही नहीं रहा । ठीक उसी तरह, जैसे विश्वामित्र मुनिको मेनकामें आसक्त हो जानेके कारण समयकी सुध-बुध नहीं रह गयी थी* ॥ ६ ॥

> घृताच्यां किल संसक्तो दश वर्षाणि लक्ष्मण ।  
> अहोऽमन्यत धर्मात्मा विश्वामित्रो महामुनिः ॥ ७ ॥

‘लक्ष्मण ! कहते हैं, धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्रने घृताची ( मेनका ) नामक अप्सरामें आसक्त होनेके कारण दस वर्षके समयको एक दिन ही माना था ॥ ७ ॥

> स हि प्राप्तं न जानीते कालं कालविदां वरः ।  
> विश्वामित्रो महातेजाः किं पुनर्यः पृथग्जनः ॥ ८ ॥

‘कालका ज्ञान रखनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी विश्वामित्रको भी जब भोगासक्त होनेपर कालका ज्ञान नहीं रह गया, तब फिर दूसरे साधारण प्राणीको कैसे रह सकता है ! ॥८॥

> देहधर्मगतस्यास्य परिश्रान्तस्य लक्ष्मण ।  
> अवितृप्तस्य कामेषु रामः क्षन्तुमिहार्हति ॥ ९ ॥

‘कुमार लक्ष्मण ! आहार, निद्रा और मैथुन आदि जो देहके धर्म हैं, ( जो पशुओंमें भी समानरूपसे पाये जाते हैं ) उनमें स्थित हुए ये सुग्रीव पहले तो चिरकालतक दुःख भोगनेके कारण थके-माँदे एवं खिन्न थे । अब भगवान् श्रीरामकी कृपासे इन्हें जो काम-भोग प्राप्त हुए हैं, उनसे अभीतक इनकी तृप्ति नहीं हुई ( इसीलिये इनसे कुछ असावधानी हो गयी ); अतः परम कृपालु श्रीरघुनाथजीको यहाँ इनका अपराध क्षमा करना चाहिये ॥ ९ ॥

> न च रोषवशं तात गन्तुमर्हसि लक्ष्मण ।  
> निश्चयार्थमविज्ञाय सहसा प्राकृतो यथा ॥ १० ॥

‘तात लक्ष्मण ! आपको यथार्थ बात जाने बिना साधारण मनुष्यकी भाँति सहसा क्रोधके अधीन नहीं होना चाहिये॥१०॥

> सायुक्ता हि पुरुषास्त्वद्विधाः पुरुषर्षभ ।  
> अविमृश्य न रोषस्य सहसा यान्ति वश्यताम् ॥ ११ ॥

‘पुरुषप्रवर ! आप-जैसे सत्त्वगुणसम्पन्न पुरुष विचार किये बिना ही सहसा रोषके वशीभूत नहीं होते हैं ॥ ११ ॥

> प्रसादये त्वां धर्मज्ञ सुग्रीवार्थं समाहिता ।  
> महान् रोषसमुत्पन्नः संरम्भस्त्यज्यतामयम् ॥ १२ ॥

‘धर्मज्ञ ! मैं एकाग्र हृदयसे सुग्रीवके लिये आपसे कृपा-की याचना करती हूँ । आप क्रोधसे उत्पन्न हुए इस महान् क्षोभका परित्याग कीजिये ॥ १२ ॥

> रुमां मां चाङ्गदं राज्यं धनधान्यपशूनि च ।  
> रामप्रियार्थं सुग्रीवस्त्यजेदिति मतिर्मम ॥ १३ ॥

‘मेरा तो ऐसा विश्वास है कि सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेके लिये रुमाका, मेरा, कुमार अङ्गदका तथा धन-धान्य और पशुओंसहित सम्पूर्ण राज्यका भी परित्याग कर सकते हैं ॥ १३ ॥

> समानेष्यति सुग्रीवः सीतया सह राघवम् ।  
> शशाङ्कमिव रोहिण्या हत्वा तं राक्षसाधमम् ॥ १४ ॥

‘सुग्रीव उस अधम राक्षसका वध करके श्रीरामको सीतासे उसी तरह मिलायेंगे, जैसे चन्द्रमाका रोहिणीके साथ संयोग हुआ हो ॥ १४ ॥

> शतकोटिसहस्राणि लङ्कायां किल रक्षसाम् ।  
> अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च ॥ १५ ॥

‘कहते हैं कि लङ्कामें सौ हजार करोड़, छत्तीस अयुत, छत्तीस हजार और छत्तीस सौ राक्षस रहते हैं * ॥ १५ ॥

> अहत्वा तांश्च दुर्धर्षान् राक्षसान् कामरूपिणः ।  
> न शक्यो रावणो हन्तुं येन सा मैथिली हृता ॥ १६ ॥

‘वे सब-के-सब राक्षस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले तथा दुर्जय हैं । उन सबका संहार किये बिना रावणका, जिसने मिथिलेशकुमारी सीताका अपहरण किया है, वध नहीं हो सकता ॥ १६ ॥

> ते न शक्या रणे हन्तुमसहायेन लक्ष्मण ।  
> रावणः क्रूरकर्मा च सुग्रीवेण विशेषतः ॥ १७ ॥

‘लक्ष्मण ! किसीकी सहायता लिये बिना अकेले किसी वीरके द्वारा न तो उन राक्षसोंका संग्राममें वध किया जा सकता है और न क्रूरकर्मा रावणका ही । इसलिये सुग्रीवसे सहायता लेनेकी विशेष आवश्यकता है ॥ १७ ॥

> एवमाख्यातवान् वाली स ह्यभिज्ञो हरीश्वरः ।  
> आगमस्तु न मे व्यक्तः श्रवात् तस्य ब्रवीम्यहम् ॥ १८ ॥

‘वानरराज वाली लङ्काके राक्षसोंकी इस संख्यासे परिचित थे, उन्हींने मुझे उनकी इस तरह गणना बतायी थी । रावणने इतनी सेनाका संग्रह कैसे किया ? यह तो मुझे नहीं मालूम है । किंतु इस संख्याको मैंने उनके मुँहसे सुना था । वह इस समय मैं आपको बता रही हूँ ॥ १८ ॥

> त्वत्सहायनिमित्तं हि प्रेषिता हरिपुङ्गवाः ।  
> आनेतुं वानरान् युद्धे सुबहून् हरिपुङ्गवान् ॥ १९ ॥

‘आपकी सहायताके लिये सुग्रीवने बहुतेरे श्रेष्ठ वानरोंको युद्धके निमित्त असंख्य वानर वीरोंकी सेना एकत्र करनेके लिये भेज रक्खा है ॥ १९ ॥

> तांश्च प्रतीक्षमाणोऽयं विक्रान्तान् सुमहाबलान् ।  
> राघवस्यार्थसिद्ध्यर्थं न निर्याति हरीश्वरः ॥ २० ॥

‘वानरराज सुग्रीव उन महाबली और पराक्रमी वीरोंके आनेकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । अतएव भगवान् श्रीरामका कार्य सिद्ध करनेके लिये अभी नगरसे बाहर नहीं निकल सके हैं ॥ २० ॥

> कृता सुसंस्था सौमित्रे सुग्रीवेण पुरा यथा ।  
> अद्य तैर्वानरैः सर्वैरागन्तव्यं महाबलैः ॥ २१ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! सुग्रीवने उन सबके एकत्र होनेके लिये पहलेसे ही जो अवधि निश्चित कर रक्खी है, उसके अनुसार उन समस्त महाबली वानरोंको आज ही यहाँ उपस्थित हो जाना चाहिये ॥ २१ ॥

> ऋक्षकोटिसहस्राणि गोलाङ्गूलशतानि च ।  
> अद्य त्वामुपयास्यन्ति जहि कोपमरिंदम ।  
> कोट्योऽनेकास्तु काकुत्स्थ कपीनां दीप्ततेजसाम्॥२२॥

‘शत्रुदमन लक्ष्मण ! आज आपकी सेवामें कोटि सहस्र ( दस अरब ) रीछ, सौ करोड़ ( एक अरब ) लंगूर तथा और भी बड़े हुए तेजवाले कई करोड़ वानर उपस्थित होंगे । इसलिये आप क्रोधको त्याग दीजिये ॥ २२ ॥

> तव हि मुखमिदं निरीक्ष्य कोपात्  
> क्षतजसमे नयने निरीक्षमाणाः ।  
> हरिवरवनिता न यान्ति शान्तिं  
> प्रथमभयस्य हि शङ्किताः स्म सर्वाः ॥२३॥

‘आपका मुख क्रोधसे तमतमा उठा है और आँखें रोषसे लाल हो गयी हैं । यह सब देखकर हम वानरराजकी स्त्रियोंको शान्ति नहीं मिल रही है । हम सबको प्रथम भय ( वालि-वध ) के समान ही किसी अनिष्टकी आशङ्का हो रही है’॥२३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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