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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 31"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 31

> स कामिनं दीनमदीनसत्त्वं  
> शोकाभिपन्नं समुदीर्णकोपम् ।  
> नरेन्द्रसूनुर्नरदेवपुत्रं  
> रामानुजः पूर्वजमित्युवाच ॥ १ ॥

श्रीरामके छोटे भाई नरेन्द्रकुमार लक्ष्मणने उस समय सीताकी कामनासे युक्त, दुखी, उदारहृदय, शोकग्रस्त तथा बढ़े हुए रोषवाले ज्येष्ठ भ्राता महाराजपुत्र श्रीरामसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

> न वानरः स्थास्यति साधुवृत्ते  
> न मन्यते कर्मफलानुषङ्गान् ।  
> न भोक्ष्यते वानरराज्यलक्ष्मीं  
> तथा हि नातिक्रमतेऽस्य बुद्धिः॥ २ ॥

‘आर्य ! सुग्रीव वानर है, वह श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये उचित सदाचारपर स्थिर नहीं रह सकेगा। सुग्रीव इस बातको भी नहीं मानता है कि अग्निको साक्षी देकर श्रीरघुनाथजीके साथ मित्रता-स्थापनरूप जो सत्-कर्म किया गया है, उसीके फलसे मुझे निष्कण्टक राज्यभोग प्राप्त हुए हैं। अतः वह वानरोंकी राज्य-लक्ष्मीका पालन एवं उपभोग नहीं कर सकेगा; क्योंकि उसकी बुद्धि मित्रधर्मके पालनके लिये अधिक आगे नहीं बढ़ रही है ॥ २ ॥

> मतिक्षयाद् ग्राम्यसुखेषु सक्त-  
> स्तव प्रसादात् प्रतिकारबुद्धिः ।  
> हतोऽग्रजं पश्यतु वीरवालिनं  
> न राज्यमेवं विगुणस्य देयम् ॥ ३ ॥

‘सुग्रीवकी बुद्धि मारी गयी है, इसलिये वह विषयभोगों-में आसक्त हो गया है। आपकी कृपासे जो उसे राज्य आदिका लाभ हुआ है, उस उपकारका बदला चुकानेकी उसकी नीयत नहीं है। अतः अब वह भी मारा जाकर अपने बड़े भाई वीरवर वालीका दर्शन करे। ऐसे गुणहीन पुरुषको राज्य नहीं देना चाहिये ॥ ३ ॥

> न धारये कोपमुदीर्णवेगं  
> निहन्मि सुग्रीवमसत्यमद्य ।  
> हरिप्रवीरैः सह वालिपुत्रो  
> नरेन्द्रपुत्र्या विचयं करोतु ॥ ४ ॥

‘मेरे क्रोधका वेग बढ़ा हुआ है। मैं इसे रोक नहीं सकता। असत्यवादी सुग्रीवको आज ही मारे डालता हूँ। अब वालिकुमार अङ्गद ही राजा होकर प्रधान वानर वीरोंके साथ राजकुमारी सीताकी खोज करे’ ॥ ४ ॥

> तमात्तबाणासनमुत्पतन्तं  
> निवेदितार्थं रणचण्डकोपम् ।  
> उवाच रामः परवीरहन्ता  
> स्ववीक्षितं सानुनयं च वाक्यम्॥ ५ ॥

यों कहकर लक्ष्मण धनुष-बाण हाथमें ले बड़े वेगसे चल पड़े। उन्होंने अपने जानेका प्रयोजन स्पष्ट शब्दोंमें निवेदन कर दिया था। युद्धके लिये उनका प्रचण्ड कोप बढ़ा हुआ था तथा वे क्या करने जा रहे हैं, इसपर उन्होंने अच्छी तरह विचार नहीं किया था। उस समय विपक्षी वीरोंका संहार करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें शान्त करनेके लिये यह अनुनययुक्त बात कही—॥ ५ ॥

> नहि वै त्वद्विधो लोके पापमेवं समाचरेत् ।  
> कोपमार्येण यो हन्ति स वीरः पुरुषोत्तमः ॥ ६ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! तुम-जैसे श्रेष्ठ पुरुषको संसारमें ऐसा ( मित्रवधरूप ) निषिद्ध आचरण नहीं करना चाहिये । जो उत्तम विवेकके द्वारा अपने क्रोधको मार देता है, वह वीर समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ है ॥ ६ ॥

> नेदमत्र त्वया ग्राह्यं साधुवृत्तेन लक्ष्मण ।  
> तां प्रीतिमनुवर्तस्व पूर्ववृत्तं च संगतम् ॥ ७ ॥

‘लक्ष्मण ! तुम सदाचारी हो । तुम्हें इस प्रकार सुग्रीवके मारनेका निश्चय नहीं करना चाहिये । उसके प्रति जो तुम्हारा प्रेम था, उसीका अनुसरण करो और उसके साथ पहले जो मित्रताकी गयी है, उसे निबाहो ॥ ७ ॥

> सामोपहितया वाचा रूक्षाणि परिवर्जयन् ।  
> वक्तुमर्हसि सुग्रीवं व्यतीतं कालपर्यये ॥ ८ ॥

‘तुम्हें सान्त्वनापूर्ण वाणीद्वारा कटु वचनोंका परित्याग करते हुए सुग्रीवसे इतना ही कहना चाहिये कि तुमने सीताकी खोजके लिये जो समय नियत किया था, वह बीत गया ( फिर भी चुप क्यों बैठे हो’ ) ॥ ८ ॥

> सोऽग्रजेनानुशिष्टार्थो यथावत् पुरुषर्षभः ।  
> प्रविवेश पुरीं वीरो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ ९ ॥

अपने बड़े भाईके इस प्रकार यथोचित रूपसे समझानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पुरुषप्रवर वीर लक्ष्मणने किष्किन्धापुरीमें प्रवेश ( करनेका विचार ) किया ॥ ९ ॥

> ततः शुभमतिः प्राज्ञो भ्रातुः प्रियहिते रतः ।  
> लक्ष्मणः प्रतिसंरब्धो जगाम भवनं कपेः ॥ १० ॥

भाईके प्रिय और हितमें तत्पर रहनेवाले शुभ बुद्धिसे युक्त बुद्धिमान् लक्ष्मण रोषमें भरे हुए ही वानरराज सुग्रीवके भवनकी ओर चले ॥ १० ॥

> शक्रबाणासनप्रख्यं धनुः कालान्तकोपमम् ।  
> प्रगृह्य गिरिशृङ्गाभं मन्दरः सानुमानिव ॥ ११ ॥

उस समय वे इन्द्र-धनुषके समान तेजस्वी, काल और अन्तकके समान भयंकर तथा पर्वत-शिखरके समान विशाल धनुषको हाथमें लेकर शृङ्गसहित मन्दराचलके समान जान पड़ते थे ॥ ११ ॥

> यथोक्तकारी वचनमुत्तरं चैव सोत्तरम् ।  
> बृहस्पतिसमो बुद्ध्या मत्वा रामानुजस्तदा ॥ १२ ॥

श्रीरामके अनुज लक्ष्मण अपने बड़े भाईकी आज्ञाका यथोक्तरूपसे पालन करनेवाले तथा बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे । वे सुग्रीवसे जो बात कहते, सुग्रीव उसका जो कुछ उत्तर देते और उस उत्तरका भी ये जो कुछ उत्तर देते, उन सबको अच्छी तरह समझ-बूझकर वहाँसे प्रस्थित हुए थे ॥ १२ ॥

> कामक्रोधसमुत्थेन भ्रातुः क्रोधाग्निना वृतः ।  
> प्रभञ्जन इवाप्रीतः प्रययौ लक्ष्मणस्ततः ॥ १३ ॥

सीताकी खोजविषयक जो श्रीरामकी कामना थी और सुग्रीवकी असावधानीके कारण उसमें बाधा पड़नेसे जो उन्हें क्रोध हुआ था, उन दोनोंके कारण लक्ष्मणकी भी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी । उस क्रोधाग्निसे घिरे हुए लक्ष्मण सुग्रीवके प्रति प्रसन्न नहीं थे । वे उसी अवस्थामें वायुके समान वेगसे चले ॥ १३ ॥

> सालतालाश्वकर्णांश्च तरसा पातयन् बलात् ।  
> पर्यस्यन् गिरिकूटानि द्रुमानन्यांश्च वेगितः ॥ १४ ॥

उनका वेग ऐसा बढ़ा हुआ था कि वे मार्गमें मिलनेवाले साल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षोंको उसी वेगसे बलपूर्वक गिराते तथा पर्वतशिखरों एवं अन्य वृक्षोंको उठा-उठाकर दूर फेंकते जाते थे ॥ १४ ॥

> शिलाश्च शकलीकुर्वन् पद्भ्यां गज इवाशुगः ।  
> दूरमेकपदं त्यक्त्वा ययौ कार्यवशाद् द्रुतम् ॥ १५ ॥

शीघ्रगामी हाथीके समान अपने पैरोंकी ठोकरसे शिलाओंको चूर-चूर करते और लंबी-लंबी डगें भरते हुए वे कार्यवश बड़ी तेजीके साथ चले ॥ १५ ॥

> तामपश्यद् बलाकीर्णां हरिराजमहापुरीम् ।  
> दुर्गामिक्ष्वाकुशार्दूलः किष्किन्धां गिरिसंकटे ॥ १६ ॥

इक्ष्वाकुकुलके सिंह लक्ष्मणने निकट जाकर वानरराज सुग्रीवकी विशाल पुरी किष्किन्धा देखी, जो पहाड़ोंके बीचमें बसी हुई थी । वानरसेनासे व्याप्त होनेके कारण वह पुरी दूसरोंके लिये दुर्गम थी ॥ १६ ॥

> रोषात् प्रस्फुरमाणोष्ठः सुग्रीवं प्रति लक्ष्मणः ।  
> ददर्श वानरान् भीमान् किष्किन्धायां बहिश्चरान् ॥ १७ ॥

उस समय लक्ष्मणके ओष्ठ सुग्रीवके प्रति रोषसे फड़क रहे थे । उन्होंने किष्किन्धाके पास बहुतेरे भयंकर वानरोंको देखा, जो नगरके बाहर विचर रहे थे ॥ १७ ॥

> तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे लक्ष्मणं पुरुषर्षभम् ।  
> शैलशृङ्गाणि शतशः प्रवृद्धांश्च महीरुहान् ।  
> जगृहुः कुञ्जरप्रख्या वानराः पर्वतान्तरे ॥ १८ ॥  
> तान् गृहीतप्रहरणान् सर्वान् दृष्ट्वा तु लक्ष्मणः ।  
> बभूव द्विगुणं क्रुद्धो बह्विन्धन इवानलः ॥ १९ ॥

उन वानरोंके शरीर हाथियोंके समान विशाल थे । उन समस्त वानरोंने पुरुषप्रवर लक्ष्मणको देखते ही पर्वतके अंदर विद्यमान सैकड़ों शैल-शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठा लिये ॥ उन सबको हथियार उठाते देख लक्ष्मण दूने क्रोधसे जल उठे, मानो जलती आगमें बहुत-सी सूखी लकड़ियाँ डाल दी गयी हों ॥ १९ ॥

> तं ते भयपरीताङ्गाः क्षुब्धं दृष्ट्वा प्लवंगमाः ।  
> कालमृत्युयुगान्ताभं शतशो विद्रुता दिशः ॥ २० ॥

क्षुब्ध हुए लक्ष्मण काल, मृत्यु तथा प्रलयकालीन अग्निके समान भयंकर दिखायी देने लगे । उन्हें देखकर उन वानरोंके शरीर भयसे काँपने लगे और वे सैकड़ोंकी संख्यामें चारों दिशाओंमें भाग गये ॥ २० ॥

> ततः सुग्रीवभवनं प्रविश्य हरिपुंगवाः ।  
> क्रोधमागमनं चैव लक्ष्मणस्य न्यवेदयन् ॥ २१ ॥

तदनन्तर कई श्रेष्ठ वानरोंने सुग्रीवके महलमें जाकर लक्ष्मणके आगमन और क्रोधका समाचार निवेदन किया ॥ २१ ॥

> तारया सहितः कामी सक्तः कपिवृषस्तदा ।  
> न तेषां कपिसिंहानां शुश्राव वचनं तदा ॥ २२ ॥

उस समय कामके अधीन हुए वानरराज सुग्रीव भोगासक्त हो ताराके साथ थे । इसलिये उन्होंने उन श्रेष्ठ वानरोंकी बातें नहीं सुनीं ॥ २२ ॥

> ततः सचिवसंदिष्टा हरयो रोमहर्षणाः ।  
> गिरिकुञ्जरमेघाभा नगरान्निर्ययुस्तदा ॥ २३ ॥

तब सचिवकी आज्ञासे पर्वत, हाथी और मेघके समान विशालकाय वानर, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाले थे, नगरसे बाहर निकले ॥ २३ ॥

> नखदंष्ट्रायुधाः सर्वे वीरा विकृतदर्शनाः ।  
> सर्वे शार्दूलदंष्ट्राश्च सर्वे विवृतदर्शनाः ॥ २४ ॥

वे सब-के-सब वीर थे । नख और दाँत ही उनके आयुध थे । वे बड़े विकराल दिखायी देते थे । उन सबकी दाढ़ें व्याघ्रोंकी दाढ़ोंके समान थीं और सबके नेत्र खुले हुए थे ( अथवा उन सबका वहाँ स्पष्ट दर्शन होता था—कोई छिपे नहीं थे ) ॥ २४ ॥

> दशनागबलाः केचित् केचिद् दशगुणोत्तराः ।  
> केचिन्नागसहस्रस्य बभूवुस्तुल्यवर्चसः ॥ २५ ॥

किन्हींमें दस हाथियोंके बराबर बल था तो कोई सौ हाथियोंके समान बलशाली थे तथा किन्हीं-किन्हींका तेज ( बल और पराक्रम ) एक हजार हाथियोंके तुल्य था ॥२५॥

> ततस्तैः कपिभिर्व्याप्तां द्रुमहस्तैर्महाबलैः ।  
> अपश्यल्लक्ष्मणः क्रुद्धः किष्किन्धां तां दुरासदाम् ॥२६॥

हाथमें वृक्ष लिये उन महाबली वानरोंसे व्याप्त हुई किष्किन्धापुरी अत्यन्त दुर्जय दिखायी देती थी । लक्ष्मणने कुपित होकर उस पुरीकी ओर देखा ॥ २६ ॥

> ततस्ते हरयः सर्वे प्राकारपरिखान्तरात् ।  
> निष्क्रम्योदग्रसत्त्वास्तु तस्थुराविष्कृतं तदा ॥ २७ ॥

तदनन्तर वे सभी महाबली वानर पुरीकी चहारदिवारी और खाईके भीतरसे निकलकर प्रकटरूपसे सामने आकर खड़े हो गये ॥ २७ ॥

> सुग्रीवस्य प्रमादं च पूर्वजस्यार्थमात्मवान् ।  
> दृष्ट्वा क्रोधवशं वीरः पुनरेव जगाम सः ॥ २८ ॥

आत्मसंयमी वीर लक्ष्मण सुग्रीवके प्रमाद तथा अपने बड़े भाईके महत्त्वपूर्ण कार्यपर दृष्टिपात करके पुनः वानरराजके प्रति क्रोधके वशीभूत हो गये ॥ २८ ॥

> स दीर्घोष्णमहोच्छ्वासः कोपसंरक्तलोचनः ।  
> बभूव नरशार्दूलः सधूम इव पावकः ॥ २९ ॥

वे अधिक गरम और लंबी साँस खींचने लगे । उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । उस समय पुरुषसिंह लक्ष्मण धूमयुक्त अग्निके समान प्रतीत हो रहे थे ॥ २९ ॥

> बाणशल्यस्फुरज्जिह्वः सायकासनभोगवान् ।  
> स्वतेजोविषसम्भूतः पञ्चास्य इव पन्नगः ॥ ३० ॥

इतना ही नहीं, वे पाँच मुखवाले सर्पके समान दिखायी देने लगे । बाणका फल ही उस सर्पकी लपलपाती हुई जिह्वा जान पड़ता था, धनुष ही उसका विशाल शरीर था तथा वे सर्परूपी लक्ष्मण अपने तेजोमय विषसे व्याप्त हो रहे थे ॥ ३० ॥

> तं दीप्तमिव कालाग्निं नागेन्द्रमिव कोपितम् ।  
> समासाद्याङ्गदस्त्रासाद् विषादमगमत् परम् ॥ ३१ ॥

उस अवसरपर कुमार अङ्गद प्रज्वलित प्रलयाग्नि तथा क्रोधमें भरे हुए नागराज शेषकी भाँति दृष्टिगोचर होनेवाले लक्ष्मणके पास डरते-डरते गये । वे अत्यन्त विषादमें पड़ गये थे ॥ ३१ ॥

> सोऽङ्गदं रोषताम्राक्षः संदिदेश महायशाः ।  
> सुग्रीवः कथ्यतां वत्स ममागमनमित्युत ॥ ३२ ॥  
> एष रामानुजः प्राप्तस्त्वत्सकाशमरिंदम ।  
> भ्रातुर्व्यसनसंतप्तो द्वारि तिष्ठति लक्ष्मणः ॥ ३३ ॥  
> तस्य वाक्यं यदि रुचिः क्रियतां साधु वानर ।  
> इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ वत्स वाक्यमरिंदम ॥ ३४ ॥

महायशस्वी लक्ष्मणने क्रोधसे लाल आँखें करके अङ्गदको आदेश दिया—‘बेटा ! सुग्रीवको मेरे आनेकी सूचना दो । उनसे कहना—शत्रुदमन वीर ! श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मण अपने भ्राताके दुःखसे दुखी होकर आपके पास आये हैं और नगर-द्वारपर खड़े हैं । वानरराज ! यदि आपकी इच्छा हो तो उनकी आज्ञाका अच्छी तरह पालन कीजिये । शत्रुदमन वत्स अङ्गद ! बस, इतना ही कहकर तुम शीघ्र मेरे पास लौट आओ’ ॥ ३२–३४ ॥

> लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा शोकाविष्टोऽङ्गदोऽब्रवीत् ।  
> पितुः समीपमागम्य सौमित्रिरयमागतः ॥ ३५ ॥

लक्ष्मणकी बात सुनकर शोकाकुल अङ्गदने पिता सुग्रीवके समीप आकर कहा—‘तात ! ये सुमित्रानन्दन लक्ष्मण यहाँ पधारे हैं’ ॥ ३५ ॥

> अथाङ्गदस्तस्य सुतीव्रवाचा  
> सम्भ्रान्तभावः परिदीनवक्त्रः ।  
> निर्गत्य पूर्वं नृपतेस्तरस्वी  
> ततो रुमायाश्चरणौ ववन्दे ॥ ३६ ॥

( अब इसी बातको कुछ विस्तारके साथ कहते हैं—) लक्ष्मणकी कठोर वाणीसे अङ्गदके मनमें बड़ी घबराहट हुई । उनके मुखपर अत्यन्त दीनता छा गयी । उन वेगशाली कुमारने वहाँसे निकलकर पहले वानरराज सुग्रीवके फिर तारा तथा रुमाके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ३६ ॥

> संगृह्य पादौ पितुरुग्रतेजा  
> जग्राह मातुः पुनरेव पादौ ।  
> पादौ रुमायाश्च निपीडयित्वा  
> निवेदयामास ततस्तदर्थम् ॥ ३७ ॥

उग्र तेजवाले अङ्गदने पहले तो पिताके दोनों पैर पकड़े । फिर अपनी माता ताराके दोनों चरणोंका स्पर्श किया । तदनन्तर रुमाके दोनों पैर दबाये । इसके बाद पूर्वोक्त बात कही ॥ ३७ ॥

> स निद्राक्लान्तसंवीतो वानरो न विबुद्धवान् ।  
> बभूव मदमत्तश्च मदनेन च मोहितः ॥ ३८ ॥

किंतु सुग्रीव मदमत्त एवं कामसे मोहित होकर पड़े थे । निद्राने उनके ऊपर पूरा अधिकार जमा लिया था । इसलिये वे जाग न सके ॥ ३८ ॥

> ततः किलकिलां चक्रुर्लक्ष्मणं प्रेक्ष्य वानराः ।  
> प्रसादयन्तस्तं क्रुद्धं भयमोहितचेतसः ॥ ३९ ॥

इतनेमें बाहर क्रोधमें भरे हुए लक्ष्मणको देखकर भयसे मोहितचित्त हुए वानर उन्हें प्रसन्न करनेके लिये दीनतासूचक वाणीमें किलकिलाने लगे ॥ ३९ ॥

> ते महौघनिभं दृष्ट्वा वज्राशनिसमस्वनम् ।  
> सिंहनादं समं चक्रुर्लक्ष्मणस्य समीपतः ॥ ४० ॥

लक्ष्मणपर दृष्टि पड़ते ही उन वानरोंने सुग्रीवके निकटवर्ती स्थानमें एक साथ ही महान् जलप्रवाह तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जोर-जोरसे सिंहनाद किया ( जिससे सुग्रीव जाग उठें ) ॥ ४० ॥

> तेन शब्देन महता प्रत्यबुध्यत वानरः ।  
> मदविह्वलताम्राक्षो व्याकुलः स्रग्विभूषणः ॥ ४१ ॥

वानरोंकी उस भयंकर गर्जनासे कपिराज सुग्रीवकी नींद खुल गयी । उस समय उनके नेत्र मदसे चञ्चल और लाल हो रहे थे । मन भी स्वस्थ नहीं था । उनके गलेमें सुन्दर पुष्पमाला शोभा दे रही थी ॥ ४१ ॥

> अथाङ्गदवचः श्रुत्वा तेनैव च समागतौ ।  
> मन्त्रिणौ वानरेन्द्रस्य सम्मतोदारदर्शनौ ॥ ४२ ॥  
> प्लक्षश्चैव प्रभावश्च मन्त्रिणावर्थधर्मयोः ।  
> वक्तुमुच्चावचं प्राप्तं लक्ष्मणं तौ शशंसतुः ॥ ४३ ॥

अङ्गदकी पूर्वोक्त बात सुनकर उन्हींके साथ आये हुए दो मन्त्री प्लक्ष और प्रभावने भी, जो वानरराजके सम्मानपात्र और उदार दृष्टिवाले थे तथा राजाको अर्थ और धर्मके विषयमें ऊँच-नीच समझानेके लिये नियुक्त थे, लक्ष्मणके आगमनकी सूचना दी ॥ ४२-४३ ॥

> प्रसादयित्वा सुग्रीवं वचनैः सार्थनिश्चितैः ।  
> आसीनं पर्युपासीनौ यथा शक्रं मरुत्पतिम् ॥ ४४ ॥  
> सत्यसंधौ महाभागौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।  
> मनुष्यभावं सम्प्राप्तौ राज्यार्हौ राज्यदायिनौ ॥ ४५ ॥

राजाके निकट खड़े हुए उन दोनों मन्त्रियोंने देवराज इन्द्रके समान बैठे हुए सुग्रीवको खूब सोच-विचार कर निश्चित किये हुए सार्थक वचनोंद्वारा प्रसन्न किया और इस प्रकार कहा—‘राजन् ! महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण— दोनों भाई सत्यप्रतिज्ञ हैं । ( वे वास्तवमें भगवत्स्वरूप हैं ) उन्होंने स्वेच्छासे मनुष्य-शरीर धारण किया है । वे दोनों समस्त त्रिलोकीका राज्य चलानेके योग्य हैं । वे ही आपके राज्यदाता हैं ॥ ४४-४५ ॥

> तयोरेको धनुष्पाणिर्द्वारि तिष्ठति लक्ष्मणः ।  
> यस्य भीताः प्रवेपन्तो नादान् मुञ्चन्ति वानराः ॥ ४६ ॥

‘उनमेंसे एक वीर लक्ष्मण हाथमें धनुष लिये किष्किन्धाके दरवाजेपर खड़े हैं, जिनके भयसे काँपते हुए वानर जोर-जोरसे चीख रहे हैं ॥ ४६ ॥

> स एष राघवभ्राता लक्ष्मणो वाक्यसारथिः ।  
> व्यवसायरथः प्राप्तस्तस्य रामस्य शासनात् ॥ ४७ ॥

‘श्रीरामका आदेशवाक्य ही जिनका सारथि और कर्तव्यका निश्चय ही जिनका रथ है, वे लक्ष्मण श्रीरामकी आज्ञासे यहाँ पधारे हैं ॥ ४७ ॥

> अयं च तनयो राजंस्ताराया दयितोऽङ्गदः ।  
> लक्ष्मणेन सकाशं ते प्रेषितस्त्वरयानघ ॥ ४८ ॥

‘राजन् ! निष्पाप वानरराज ! लक्ष्मणने तारादेवीके इन प्रिय पुत्र अङ्गदको आपके निकट बड़ी उतावलीके साथ भेजा है ॥ ४८ ॥

> सोऽयं रोषपरीताक्षो द्वारि तिष्ठति वीर्यवान् ।  
> वानरान् वानरपते चक्षुषा निर्दहन्निव ॥ ४९ ॥

‘वानरपते ! पराक्रमी लक्ष्मण क्रोधसे लाल आँखें किये नगरद्वारपर उपस्थित हैं और वानरोंकी ओर इस तरह देख रहे हैं, मानो वे अपनी नेत्राग्निसे उन्हें दग्ध कर डालेंगे ॥ ४९ ॥

> तस्य मूर्ध्ना प्रणामं त्वं सपुत्रः सहबान्धवः ।  
> गच्छ शीघ्रं महाराज रोषो ह्यद्योपशाम्यताम् ॥ ५० ॥

‘महाराज ! आप शीघ्र चलें तथा पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके साथ उनके चरणोंमें मस्तक नवावें और इस प्रकार आज उनका रोष शान्त करें ॥ ५० ॥

> यथा हि रामो धर्मात्मा तत्कुरुष्व समाहितः ।  
> राजंस्तिष्ठ स्वसमये भव सत्यप्रतिश्रवः ॥ ५१ ॥

‘राजन् ! धर्मात्मा श्रीराम जैसा कहते हैं, सावधानीके साथ उसका पालन कीजिये । आप अपनी दी हुई बातपर अटल रहिये और सत्यप्रतिज्ञ बनिये’ ॥ ५१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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