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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 29"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 29

> समीक्ष्य विमलं व्योम गतविद्युद्बलाहकम् ।  
> सारसाकुलसंघुष्टं रम्यज्योत्स्नानुलेपनम् ॥ १ ॥  
> समृद्धार्थं च सुग्रीवं मन्दधर्मार्थसंग्रहम् ।  
> अत्यर्थं चासतां मार्गमेकान्तगतमानसम् ॥ २ ॥  
> निवृत्तकार्यं सिद्धार्थं प्रमदाभिरतं सदा ।  
> प्राप्तवन्तमभिप्रेतान् सर्वानेव मनोरथान् ॥ ३ ॥  
> स्वां च पत्नीमभिप्रेतां तारां चापि समीप्सिताम् ।  
> विहरन्तमहोरात्रं कृतार्थं विगतज्वरम् ॥ ४ ॥  
> क्रीडन्तमिव देवेशं गन्धर्वाप्सरसां गणैः ।  
> मन्त्रिषु न्यस्तकार्यं च मन्त्रिणामनवेक्षकम् ॥ ५ ॥  
> उच्छिन्नराज्यसंदेहं कामवृत्तमिव स्थितम् ।  
> निश्चितार्थोऽर्थतत्त्वज्ञः कालधर्मविशेषवित् ॥ ६ ॥  
> प्रसाद्य वाक्यैर्विविधैर्हेतुमद्भिर्मनोरमैः ।  
> वाक्यविद् वाक्यतत्त्वज्ञं हरीशं मारुतात्मजः ॥ ७ ॥  
> हितं तथ्यं च पथ्यं च सामधर्मार्थनीतिमत् ।  
> प्रणयप्रीतिसंयुक्तं विश्वासकृतनिश्चयम् ॥ ८ ॥  
> हरीश्वरमुपागम्य हनूमान् वाक्यमब्रवीत् ।

पवनकुमार हनुमान् शास्त्रके निश्चित सिद्धान्तको जाननेवाले थे । क्या करना चाहिये और क्या नहीं—इन सभी बातोंका उन्हें यथार्थ ज्ञान था । किस समय किस विशेष धर्मका पालन करना चाहिये—इसको भी वे ठीक-ठीक समझते थे । उन्हें बातचीत करनेकी कलाका भी अच्छा ज्ञान था । उन्होंने देखा, आकाश निर्मल हो गया है । अब उसमें न तो बिजली चमकती है और न बादल ही दिखायी देते हैं । अन्तरिक्षमें सब ओर सारस उड़ रहे हैं और उनकी बोली सुनायी देती है । ( चन्द्रोदय होनेपर ) आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उसपर श्वेत चन्दनसदृश रमणीय चाँदनीका लेप चढ़ा दिया गया हो । सुग्रीवका प्रयोजन सिद्ध हो जानेके कारण अब वे धर्म और अर्थके संग्रहमें शिथिलता दिखाने लगे हैं । असाधु पुरुषोंके मार्ग ( कामसेवन ) का ही अधिक आश्रय ले रहे हैं । एकान्तमें ही ( जहाँ स्त्रियोंके सङ्गमें कोई बाधा न पड़े ) उनका मन लगता है । उनका काम पूरा हो गया है । उनके अभीष्ट प्रयोजनकी सिद्धि हो चुकी है । अब वे सदा युवती स्त्रियोंके साथ क्रीडा-विलासमें ही लगे रहते हैं । उन्होंने अपने सारे अभिलषित मनोरथोंको प्राप्त कर लिया है । अपनी मनोवाञ्छित पत्नी रुमा तथा अभीष्ट सुन्दरी ताराको भी प्राप्त करके अब वे कृतकृत्य एवं निश्चिन्त होकर दिन-रात भोग-विलासमें लगे रहते हैं । जैसे देवराज इन्द्र गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदायके साथ क्रीडामें तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार सुग्रीव भी अपने मन्त्रियोंपर राजकार्यका भार रखकर क्रीडा-विहारमें तत्पर हैं । मन्त्रियोंके कार्योंकी देखभाल वे कभी नहीं करते हैं । मन्त्रियोंकी सज्जनताके कारण यद्यपि राज्यको किसी प्रकारकी हानि पहुँचनेका संदेह नहीं है, तथापि स्वयं सुग्रीव ही स्वेच्छाचारी-से हो रहे हैं । यह सब सोचकर हनुमान्जी वानरराज सुग्रीवके पास गये और उन्हें युक्तियुक्त विविध एवं मनोरम वचनोंके द्वारा प्रसन्न करके बातचीतका मर्म समझनेवाले उन सुग्रीवसे हितकर, सत्य, लाभदायक, साम, धर्म और अर्थ-नीतिसे युक्त, शास्त्रविश्वासी पुरुषोंके सुदृढ निश्चयसे सम्पन्न तथा प्रेम और प्रसन्नतासे भरे वचन बोले—॥१—८½॥

> राज्यं प्राप्तं यशश्चैव कौली श्रीरभिवर्धिता ॥ ९ ॥  
> मित्राणां संग्रहः शेषस्तद् भवान् कर्तुमर्हति ।

‘राजन् ! आपने राज्य और यश प्राप्त कर लिया तथा कुलपरम्परासे आयी हुई लक्ष्मीको भी बढ़ाया; किंतु अभी मित्रोंको अपनानेका कार्य शेष रह गया है, उसे आपको इस समय पूर्ण करना चाहिये ॥ ९½ ॥

> यो हि मित्रेषु कालज्ञः सततं साधु वर्तते ॥ १० ॥  
> तस्य राज्यं च कीर्तिश्च प्रतापश्चापि वर्धते ।

‘जो राजा ‘कब प्रत्युपकार करना चाहिये’ इस बातको जानकर मित्रोंके प्रति सदा साधुतापूर्ण बर्ताव करता है, उसके राज्य, यश और प्रतापकी वृद्धि होती है ॥ १०½ ॥

> यस्य कोशश्च दण्डश्च मित्राण्यात्मा च भूमिप ।  
> समान्येतानि सर्वाणि स राज्यं महदश्नुते ॥ ११ ॥

‘पृथ्वीनाथ ! जिस राजाका कोश, दण्ड ( सेना ), मित्र और अपना शरीर—ये सब-के-सब समान रूपसे उसके वशमें रहते हैं, वह विशाल राज्यका पालन एवं उपभोग करता है ॥ ११ ॥

> तद् भवान् वृत्तसम्पन्नः स्थितः पथि निरत्यये ।  
> मित्रार्थमभिनीतार्थं यथावत् कर्तुमर्हति ॥ १२ ॥

‘आप सदाचारसे सम्पन्न और नित्य सनातन धर्मके मार्गपर स्थित हैं; अतः मित्रके कार्यको सफल बनानेके लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसे यथोचितरूपसे पूर्ण कीजिये ॥१२॥

> संत्यज्य सर्वकर्माणि मित्रार्थं यो न वर्तते ।  
> सम्भ्रमाद् विकृतोत्साहः सोऽर्थेनावरुध्यते ॥ १३ ॥

‘जो अपने सब कार्योंको छोड़कर मित्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये विशेष उत्साहपूर्वक शीघ्रताके साथ नहीं लग जाता है, उसे अनर्थका भागी होना पड़ता है ॥ १३ ॥

> यो हि कालव्यतीतेषु मित्रकार्येषु वर्तते ।  
> स कृत्वा महतोऽप्यर्थान्न मित्रार्थेन युज्यते ॥ १४ ॥

‘कार्यसाधनका उपयुक्त अवसर बीत जानेके बाद जो मित्रके कार्योंमें लगता है, वह बड़े-से-बड़े कार्योंको सिद्ध करके भी मित्रके प्रयोजनको सिद्ध करनेवाला नहीं माना जाता ॥ १४ ॥

> तदिदं मित्रकार्यं नः कालातीतमरिंदम ।  
> क्रियतां राघवस्यैतद् वैदेह्याः परिमार्गणम् ॥ १५ ॥

‘शत्रुदमन ! भगवान् श्रीराम हमारे परम सुहृद् हैं । उनके इस कार्यका समय बीता जा रहा है; अतः विदेहकुमारी सीताकी खोज आरम्भ कर देनी चाहिये ॥ १५ ॥

> न च कालमतीतं ते निवेदयति कालवित् ।  
> त्वरमाणोऽपि स प्राज्ञस्तव राजन् वशानुगः ॥ १६ ॥

‘राजन् ! परम बुद्धिमान् श्रीराम समयका ज्ञान रखते हैं और उन्हें अपने कार्यकी सिद्धिके लिये जल्दी लगी हुई है, तो भी वे आपके अधीन बने हुए हैं । संकोचवश आपसे नहीं कहते कि मेरे कार्यका समय बीत रहा है ॥ १६ ॥

> कुलस्य हेतुः स्फीतस्य दीर्घबन्धुश्च राघवः ।  
> अप्रमेयप्रभावश्च स्वयं चाप्रतिमो गुणैः ॥ १७ ॥  
> तस्य त्वं कुरु वै कार्यं पूर्वं तेन कृतं तव ।  
> हरीश्वर कपिश्रेष्ठानाज्ञापयितुमर्हसि ॥ १८ ॥

‘वानरराज ! भगवान् श्रीराम चिरकालतक मित्रता निभानेवाले हैं । वे आपके समृद्धिशाली कुलके अभ्युदयके हेतु हैं । उनका प्रभाव अतुलनीय है । वे गुणोंमें अपना शानी नहीं रखते हैं । अब आप उनका कार्य सिद्ध कीजिये; क्योंकि उन्होंने आपका काम पहले ही सिद्ध कर दिया है । आप प्रधान-प्रधान वानरोंको इस कार्यके लिये आज्ञा दीजिये ॥ १७-१८ ॥

> नहि तावद् भवेत् कालो व्यतीतश्चोदनादृते ।  
> चोदितस्य हि कार्यस्य भवेत् कालव्यतिक्रमः ॥ १९ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके कहनेके पहले ही यदि हमलोग कार्य प्रारम्भ कर दें तो समय बीता हुआ नहीं माना जायगा; किंतु यदि उन्हें इसके लिये प्रेरणा करनी पड़ी तो यही समझा जायगा कि हमने समय बिता दिया है—उनके कार्यमें बहुत विलम्ब कर दिया है ॥ १९ ॥

> अकर्तुरपि कार्यस्य भवान् कर्ता हरीश्वर ।  
> किं पुनः प्रतिकर्तुस्ते राज्येन च वधेन च ॥ २० ॥

‘वानरराज ! जिसने आपका कोई उपकार नहीं किया हो, उसका कार्य भी आप सिद्ध करनेवाले हैं । फिर जिन्होंने वालीका वध तथा राज्य प्रदान करके आपका उपकार किया है, उनका कार्य आप शीघ्र सिद्ध करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ २० ॥

> शक्तिमानतिविक्रान्तो वानरर्क्षगणेश्वर ।  
> कर्तुं दाशरथेः प्रीतिमाज्ञायां किं नु सज्जसे ॥ २१ ॥

‘वानर और भालू-समुदायके स्वामी सुग्रीव ! आप शक्तिमान् और अत्यन्त पराक्रमी हैं; फिर भी दशरथनन्दन श्रीरामका प्रिय कार्य करनेके लिये वानरोंको आज्ञा देनेमें क्यों विलम्ब करते हैं ? ॥ २१ ॥

> कामं खलु शरैः शक्तः सुरासुरमहोरगान् ।  
> वशे दाशरथिः कर्तुं त्वत्प्रतिज्ञामवेक्षते ॥ २२ ॥

‘इसमें संदेह नहीं कि दशरथकुमार भगवान् श्रीराम अपने बाणोंसे समस्त देवताओं, असुरों और बड़े-बड़े नागोंको भी अपने वशमें कर सकते हैं, तथापि आपने जो उनके कार्यको सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा की है, उसीकी वे राह देख रहे हैं ॥ २२ ॥

> प्राणत्यागाविशङ्केन कृतं तेन महत् प्रियम् ।  
> तस्य मार्गाम वैदेहीं पृथिव्यामपि चाम्बरे ॥ २३ ॥

‘उन्हें आपके लिये वालीके प्राणतक लेनेमें हिचक नहीं हुई । वे आपका बहुत बड़ा प्रिय कार्य कर चुके हैं; अतः अब हमलोग उनकी पत्नी विदेहकुमारी सीताका इस भूतलपर और आकाशमें भी पता लगावें ॥ २३ ॥

> देवदानवगन्धर्वा असुराः समरुद्गणाः ।  
> न च यक्षा भयं तस्य कुर्युः किमिव राक्षसाः ॥ २४ ॥

‘देवता, दानव, गन्धर्व, असुर, मरुद्गण तथा यक्ष भी श्रीरामको भय नहीं पहुँचा सकते; फिर राक्षसोंकी तो विसात ही क्या है ॥ २४ ॥

> तदेवं शक्तियुक्तस्य पूर्वं प्रतिकृतस्तथा ।  
> रामस्यार्हसि पिङ्गेश कर्तुं सर्वात्मना प्रियम् ॥ २५ ॥

‘वानरराज ! ऐसे शक्तिशाली तथा पहले ही उपकार करनेवाले भगवान् श्रीरामका प्रिय कार्य आपको अपनी सारी शक्ति लगाकर करना चाहिये ॥ २५ ॥

> नाधस्तादवनौ नाप्सु गतिर्नोपरि चाम्बरे ।  
> कस्यचित् सज्जतेऽस्माकं कपीश्वर तवाज्ञया ॥ २६ ॥

‘कपीश्वर ! आपकी आज्ञा हो जाय तो जलमें, थलमें, नीचे ( पातालमें ) तथा ऊपर ( आकाशमें )— कहीं भी हम लोगोंकी गति रुक नहीं सकती ॥ २६ ॥

> तदाज्ञापय कः किं ते कुतो वापि व्यवस्यतु ।  
> हरयो ह्यप्रधृष्यास्ते सन्ति कोटिव्यग्रतोऽनघ ॥ २७ ॥

‘निष्पाप कपिराज ! अतः आप आज्ञा दीजिये कि कौन कहाँसे आपकी किस आज्ञाका पालन करनेके लिये उद्योग करे । आपके अधीन करोड़ोंसे भी अधिक ऐसे वानर मौजूद हैं, जिन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता’ ॥ २७ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा काले साधु निरूपितम् ।  
> सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नश्चकार मतिमुत्तमाम् ॥ २८ ॥

सुग्रीव सत्त्वगुणसे सम्पन्न थे । उन्होंने हनुमान्जीके द्वारा ठीक समयपर अच्छे ढंगसे कही हुई उपर्युक्त बातें सुनकर भगवान् श्रीरामका कार्य सिद्ध करनेके लिये अत्यन्त उत्तम निश्चय किया ॥ २८ ॥

> संदिदेशातिमतिमान् नीलं नित्यकृतोद्यमम् ।  
> दिक्षु सर्वासु सर्वेषां सैन्यानामुपसंग्रहे ॥ २९ ॥  
> यथा सेना समग्रा मे यूथपालाश्च सर्वशः ।  
> समागच्छन्त्यसङ्गेन सेनाग्रेण तथा कुरु ॥ ३० ॥

वे परम बुद्धिमान् थे । अतः नित्य उद्यमशील नील नामक वानरको उन्होंने समस्त दिशाओंसे सम्पूर्ण वानर-सेनाओंको एकत्र करनेके लिये आज्ञा दी और कहा—‘तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे मेरी सारी सेना यहाँ इकट्ठी हो जाय और सभी यूथपति अपनी सेना एवं सेनापतियोंके साथ अविलम्ब उपस्थित हो जायँ ॥ २९-३० ॥

> ये त्वन्तपालाः प्लवगाः शीघ्रगा व्यवसायिनः ।  
> समानयन्तु ते शीघ्रं त्वरिताः शासनान्मम ।  
> स्वयं चानन्तरं कार्यं भवानेवानुपश्यतु ॥ ३१ ॥

‘राज्य-सीमाकी रक्षा करनेवाले जो-जो उद्योगी और शीघ्रगामी वानर हैं, वे सब मेरी आज्ञासे शीघ्र यहाँ आ जायँ । उसके बाद जो कुछ कर्तव्य हो, उसपर तुम स्वयं ही ध्यान दो ॥ ३१ ॥

> त्रिपञ्चरात्रादूर्ध्वं यः प्राप्नुयादिह वानरः ।  
> तस्य प्राणान्तिको दण्डो नात्र कार्या विचारणा ॥ ३२ ॥

‘जो वानर पंद्रह दिनोंके बाद यहाँ पहुँचेगा, उसे प्राणान्त दण्ड दिया जायगा । इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३२ ॥

> हरींश्च वृद्धानुपयातु साङ्गदो  
> भवान् ममाज्ञामधिकृत्य निश्चितम् ।  
> इति व्यवस्थां हरिपुंगवेश्वरो  
> विधाय वेश्म प्रविवेश वीर्यवान् ॥ ३३ ॥

‘यह मेरी निश्चित आज्ञा है। इसके अनुसार इस व्यवस्थाका अधिकार लेकर अङ्गदके साथ तुम स्वयं बड़े-बूढ़े वानरोंके पास जाओ ।’ ऐसा प्रबन्ध करके महाबली वानरराज सुग्रीव अपने महलमें चले गये ॥ ३३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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