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title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 25"
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# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 25

> स सुग्रीवं च तारां च साङ्गदां सहलक्ष्मणः।  
> समानशोकः काकुत्स्थः सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥

लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव आदिके शोकसे उनके समान ही दुखी थे । उन्होंने सुग्रीव, अङ्गद और ताराको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

> न शोकपरितापेन श्रेयसा युज्यते मृतः।  
> यदत्रानन्तरं कार्यं तत् समाधातुमर्हथ ॥ २ ॥

‘शोक-संताप करनेसे मरे हुए जीवकी कोई भलाई नहीं होती । अतः अब आगे जो कुछ कर्तव्य है, उसको तुम्हें विधिपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये ॥ २ ॥

> लोकवृत्तमनुष्ठेयं कृतं वो बाष्पमोक्षणम् ।  
> न कालादुत्तरं किंचित् कर्म शक्यमुपासितुम् ॥ ३ ॥

‘तुम सब लोग बहुत आँसू बहा चुके । अब उसकी आवश्यकता नहीं है । लोकाचारका भी पालन होना चाहिये । समय बिताकर कोई भी विहित कर्म नहीं किया जा सकता ( क्योंकि उचित समयपर न किया जाय तो उस कर्मका कोई फल नहीं होता )॥ ३ ॥

> नियतिः कारणं लोके नियतिः कर्मसाधनम् ।  
> नियतिः सर्वभूतानां नियोगेष्विह कारणम् ॥ ४ ॥

‘जगत्में नियति ( काल ) ही सबका कारण है । वही समस्त कर्मोंका साधन है और काल ही समस्त प्राणियोंको विभिन्न कर्मोंमें नियुक्त करनेका कारण है ( क्योंकि वही सबका प्रवर्तक है ) ॥ ४ ॥

> न कर्ता कस्यचित् कश्चिन्नियोगे नापि चेश्वरः।  
> स्वभावे वर्तते लोकस्तस्य कालः परायणम् ॥ ५ ॥

‘कोई भी पुरुष न तो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी कामको कर सकता है और न किसी दूसरेको ही उसमें लगानेकी शक्ति रखता है । सारा जगत् स्वभावके अधीन है और स्वभावका आधार काल है ॥ ५ ॥

> न कालः कालमत्येति न कालः परिहीयते।  
> स्वभावं च समासाद्य न कश्चिदतिवर्तते ॥ ६ ॥

‘काल भी कालका ( अपनी की हुई व्यवस्थाका ) उल्लङ्घन नहीं कर सकता । वह काल कभी क्षीण नहीं होता । स्वभाव ( प्रारब्धकर्म ) को पाकर कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं करता ॥ ६ ॥

> न कालस्यास्ति बन्धुत्वं न हेतुर्न पराक्रमः।  
> न मित्रज्ञातिसम्बन्धः कारणं नात्मनो वशः ॥ ७ ॥

‘कालका किसीके साथ भाई-चारेका, मित्रताका अथवा जाति-बिरादरीका सम्बन्ध नहीं है । उसको वशमें करनेका कोई उपाय नहीं है तथा उसपर किसीका पराक्रम नहीं चल सकता । कारणस्वरूप भगवान् काल जीवके भी वशमें नहीं है ॥ ७ ॥

> किं तु कालपरीणामो द्रष्टव्यः साधु पश्यता।  
> धर्मश्चार्थश्च कामश्च कालक्रमसमाहिताः ॥ ८ ॥

‘अतः साधुदर्शी विवेकी पुरुषको सब कुछ कालका ही परिणाम समझना चाहिये । धर्म, अर्थ और काम भी कालक्रमसे ही प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥

> इतः स्वां प्रकृतिं वाली गतः प्राप्तः क्रियाफलम् ।  
> सामदानार्थसंयोगैः पवित्रं प्लवगेश्वरः ॥ ९ ॥

‘( मेरे द्वारा मारे जानेके कारण ) वानरराज वाली शरीरसे मुक्त हो अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए हैं । नीतिशास्त्रके अनुकूल साम, दान और अर्थके समुचित प्रयोगसे मिलनेवाले जो पवित्र कर्म हैं, वे सभी उन्हें प्राप्त हो गये ॥ ९ ॥

> स्वधर्मस्य च संयोगाज्जितस्तेन महात्मना।  
> स्वर्गः परिगृहीतश्च प्राणानपरिरक्षता ॥ १० ॥

‘महात्मा वालीने पहले अपने धर्मके संयोगसे जिसपर विजय पायी थी, उसी स्वर्गको इस समय युद्धमें प्राणोंकी रक्षा न करके उन्होंने अपने हाथमें कर लिया है ॥ १० ॥

> एषा वै नियतिः श्रेष्ठा यां गतो हरियूथपः।  
> तदलं परितापेन प्राप्तकालमुपास्यताम् ॥ ११ ॥

‘यही सर्वश्रेष्ठ गति है, जिसे वानरोंके सरदार वालीने प्राप्त किया है । अतः अब उनके लिये शोक करना व्यर्थ है । इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य उपस्थित है, उसे पूरा करो’ ॥ ११ ॥

> वचनान्ते तु रामस्य लक्ष्मणः परवीरहा ।  
> अवदत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं गतचेतसम् ॥ १२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी बात समाप्त होनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने, जिनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी थी, उन सुग्रीवसे नम्रतापूर्वक इस प्रकार कहा—॥ १२ ॥

> कुरु त्वमस्य सुग्रीव प्रेतकार्यमनन्तरम् ।  
> ताराङ्गदाभ्यां सहितो वालिनो दहनं प्रति ॥ १३ ॥

‘सुग्रीव ! अब तुम अङ्गद और तारांके साथ रहकर वालीके दाह-संस्कार-सम्बन्धी प्रेतकार्य करो ॥ १३ ॥

> समाज्ञापय काष्ठानि शुष्काणि च बहूनि च ।  
> चन्दनानि च दिव्यानि वालिसंस्कारकारणात् ॥ १४ ॥

‘सेवकोंको आज्ञा दो–वे वालीके दाह-संस्कारके निमित्त प्रचुर मात्रामें सूखी लकड़ियाँ और दिव्य चन्दन ले आवें ॥ १४ ॥

> समाश्वासय दीनं त्वमङ्गदं दीनचेतसम् ।  
> मा भूर्बालिशबुद्धिस्त्वं त्वदधीनमिदं पुरम् ॥ १५ ॥

‘अङ्गदका चित्त बहुत दुखी हो गया है । इन्हें धैर्य बँधाओ । तुम अपने मनमें मूढ़ता न लाओ–किंकर्तव्यविमूढ़ न बनो; क्योंकि यह सारा नगर तुम्हारे ही अधीन है ॥१५॥

> अङ्गदस्त्वानयेन्माल्यं वस्त्राणि विविधानि च ।  
> घृतं तैलमथो गन्धान् यच्चात्र समनन्तरम् ॥ १६ ॥

‘अङ्गद पुष्पमाला, नाना प्रकारके वस्त्र, घी, तेल, सुगन्धित पदार्थ तथा अन्य सामान, जिनकी अभी आवश्यकता है, स्वयं ले आवें ॥ १६ ॥

> त्वं तार शिबिकां शीघ्रमादायागच्छ सम्भ्रमात् ।  
> त्वरा गुणवती युक्ता ह्यस्मिन् काले विशेषतः ॥ १७ ॥

‘तार ! तुम शीघ्र जाकर वेगपूर्वक एक पालकी ले आओ; क्योंकि इस समय अधिक स्फूर्ति दिखानी चाहिये । ऐसे अवसरपर वही लाभदायक होती है ॥ १७ ॥

> सज्जीभवन्तु प्लवगाः शिबिकावाहनोचिताः ।  
> समर्था बलिनश्चैव निर्हरिष्यन्ति वालिनम् ॥ १८ ॥

‘पालकीको उठाकर ले चलनेके योग्य जो बलवान् एवं समर्थ वानर हों, वे तैयार हो जायँ । वे ही वालीको यहाँसे श्मशानभूमिमें ले चलेंगे’ ॥१८॥

> एवमुक्त्वा तु सुग्रीवं सुमित्रानन्दवर्धनः ।  
> तस्थौ भ्रातृसमीपस्थो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ १९ ॥

सुग्रीवसे ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण अपने भाईके पास जाकर खड़े हो गये ॥१९॥

> लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा तारः सम्भ्रान्तमानसः ।  
> प्रविवेश गुहां शीघ्रं शिबिकासक्तमानसः ॥ २० ॥

लक्ष्मणकी बात सुनकर तारके मनमें हड़बड़ी मच गयी । वह शिबिका ले आनेके लिये शीघ्रतापूर्वक किष्किन्धा नामक गुफामें गया ॥ २० ॥

> आदाय शिबिकां तारः स तु पर्यापतत् पुनः ।  
> वानरैरुह्यमानां तां शूरैरुद्वहनोचितैः ॥ २१ ॥

वहाँसे शिबिका ढोनेके योग्य शूरवीर वानरोंद्वारा कंधोंपर उठायी हुई उस शिबिकाको साथ लेकर तार फिर तुरंत ही लौट आया ॥ २१ ॥

> दिव्यां भद्रासनयुतां शिबिकां स्यन्दनोपमाम् ।  
> पक्षिकर्मभिराचित्रां द्रुमकर्मविभूषिताम् ॥ २२ ॥

वह दिव्य पालकी रथके समान बनी हुई थी । उसके बीचमें राजाके बैठने योग्य उत्तम आसन था । उसमें शिल्पियोंद्वारा कृत्रिम पक्षी और वृक्ष बनाये गये थे, जो उस पालकीको विचित्र शोभासे सम्पन्न बना रहे थे ॥ २२ ॥

> आचितां चित्रपत्तीभिः सुनिविष्टां समन्ततः ।  
> विमानमिव सिद्धानां जालवातायनायुताम् ॥ २३ ॥

वह शिबिका चित्रके रूपमें बने हुए पैदल सिपाहियोंसे भरी प्रतीत होती थी । उसकी निर्माणकला सब ओरसे बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी । देखनेमें वह सिद्धोंके विमान-सी प्रतीत होती थी । उसमें कई खिड़कियाँ बनी थीं, जिनमें जालियाँ लगी हुई थीं ॥ २३ ॥

> सुनियुक्तां विशालां च सुकृतां शिल्पिभिः कृताम् ।  
> दारुपर्वतकोपेतां चारुकर्मपरिष्कृताम् ॥ २४ ॥

कारीगरोंने उस पालकीको बहुत सुन्दर बनानेका प्रयत्न किया था । उसका एक-एक भाग बड़ा सुघड़ बनाया गया था । आकारमें वह बहुत बड़ी थी । उसमें लकड़ियोंके क्रीडा-पर्वत बने हुए थे । वह मनोहर शिल्प-कर्मसे सुशोभित थी ॥२४॥

> वराभरणहारैश्च चित्रमाल्योपशोभिताम् ।  
> गुहागहनसंछन्नां रक्तचन्दनभूषिताम् ॥ २५ ॥

सुन्दर आभूषण और हारोंसे उसको सजाया गया था । विचित्र फूलोंसे उसकी शोभा बढ़ायी गयी थी । शिल्पियोंद्वारा निर्मित गुफा और वनसे वह संयुक्त थी तथा लाल चन्दनद्वारा उसे विभूषित किया गया था ॥ २५ ॥

> पुष्पौघैः समभिच्छन्नां पद्ममालाभिरेव च ।  
> तरुणादित्यवर्णाभिर्भ्राजमानाभिरावृताम् ॥ २६ ॥

नाना प्रकारके पुष्पसमूहोंद्वारा वह सब ओरसे आच्छादित थी तथा प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाली दीप्तिमती पद्ममालाओंसे अलंकृत थी ॥ २६ ॥

> ईदृशीं शिबिकां दृष्ट्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।  
> क्षिप्रं विनीयतां वाली प्रेतकार्यं विधीयताम् ॥ २७ ॥

ऐसी पालकीका अवलोकन करके श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणकी ओर देखते हुए कहा—‘अब वालीको शीघ्र ही यहाँसे श्मशानभूमिमें ले जाया जाय और उनका प्रेतकार्य किया जाय’ ॥ २७ ॥

> ततो वालिनमुद्यम्य सुग्रीवः शिबिकां तदा ।  
> आरोपयत विक्रोशन्नङ्गदेन सहैव तु ॥ २८ ॥

तब अङ्गदके साथ करुण-क्रन्दन करते हुए सुग्रीवने वालीके शवको उठाकर उस शिबिकामें रक्खा ॥ २८ ॥

> आरोप्य शिबिकां चैव वालिनं गतजीवितम् ।  
> अलंकारैश्च विविधैर्माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषितम् ॥ २९ ॥

मृत वालीको शिबिकामें चढ़ाकर उन्हें नाना प्रकारके अलंकारों, फूलोंके गजरों और भाँति-भाँतिके वस्त्रोंसे विभूषित किया ॥ २९ ॥

> आज्ञापयत् तदा राजा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।  
> और्ध्वदेहिकमार्यस्य क्रियतामनुकूलतः ॥ ३० ॥

तदनन्तर वानरोंके स्वामी राजा सुग्रीवने आज्ञा दी कि ‘मेरे बड़े भाईका और्ध्वदेहिक संस्कार शास्त्रानुकूल विधिसे सम्पन्न किया जाय ॥ ३० ॥

> विश्राणयन्तो रत्नानि विविधानि बहूनि च ।  
> अग्रतः प्लवगा यान्तु शिबिका तदनन्तरम् ॥ ३१ ॥

‘आगे-आगे बहुत-से वानर नाना प्रकारके बहुसंख्यक रत्न लुटाते हुए चलें । उनके पीछे शिबिका चले ॥ ३१ ॥

> राज्ञामृद्धिविशेषा हि दृश्यन्ते भुवि यादृशाः ।  
> तादृशैरिह कुर्वन्तु वानरा भर्तृसत्क्रियाम् ॥ ३२ ॥

‘इस भूतलपर राजाओंके और्ध्वदेहिक संस्कार उनकी बढ़ी हुई समृद्धिके अनुसार जैसे धूमधामसे होते देखे जाते हैं, उसी प्रकार अधिक धन लगाकर सब वानर अपने स्वामी महाराज वालीका अन्त्येष्टि-संस्कार करें’ ॥ ३२ ॥

> तादृशं वालिनः क्षिप्रं प्राकुर्वन्नौर्ध्वदेहिकम् ।  
> अङ्गदं परिरभ्याशु तारप्रभृतयस्तथा ॥ ३३ ॥  
> क्रोशन्तः प्रययुः सर्वे वानरा हतबान्धवाः ।

तब तार आदि वानरोंने वालीके और्ध्वदेहिक संस्कार-का शीघ्र वैसा ही आयोजन किया । जिनके बान्धव वाली मारे गये थे, वे सब-के-सब वानर अङ्गदको हृदयसे लगाकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे रोते हुए शवके साथ चले ॥ ३३½ ॥

> ततः प्रणिहिताः सर्वा वानर्योऽस्य वशानुगाः ॥ ३४ ॥  
> चुक्रुशुर्वीरवीरेति भूयः क्रोशन्ति ताः प्रियम् ।

उनके पीछे वालीके अधीन रहनेवाली सभी वानर-पत्नियाँ समीप आकर ‘हा वीर, हा वीर’ कहती हुई अपने प्रियतमको पुकार-पुकारकर बारंबार रोने-चिल्लाने लगीं ॥ ३४½ ॥

> ताराप्रभृतयः सर्वा वानर्यो हतबान्धवाः ॥ ३५ ॥  
> अनुजग्मुश्च भर्तारं क्रोशन्त्यः करुणस्वनाः ।

जिनके जीवन-धनका वध किया गया था, वे तारा आदि सब वानरियाँ करुणस्वरसे विलाप करती हुई अपने स्वामीके पीछे-पीछे चलने लगीं ॥ ३५½ ॥

> तासां रुदितशब्देन वानरीणां वनान्तरे ॥ ३६ ॥  
> वनानि गिरयश्चैव विक्रोशन्तीव सर्वतः ।

वनके भीतर रोती हुई उन वानर-वधुओंके रोदन-शब्दसे गूँजते हुए वन और पर्वत भी सब ओर रोते हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ३६½ ॥

> पुलिने गिरिनद्यास्तु विविक्ते जलसंवृते ॥ ३७ ॥  
> चितां चक्रुः सुबहवो वानरा वनचारिणः ।

पहाड़ी¹ नदी तुङ्गभद्राके एकान्त तटपर जो जलसे घिरा था, पहुँचकर बहुत-से वनचारी वानरोंने एक चिता तैयार की ॥ ३७½ ॥

> अवरोप्य ततः स्कन्धाच्छिबिकां वानरोत्तमाः ॥ ३८ ॥  
> तस्थुरेकान्तमाश्रित्य सर्वे शोकपरायणाः ।

तदनन्तर पालकी ढोनेवाले श्रेष्ठ वानरोंने उसे अपने कंधेसे उतारा और वे सब शोकमग्न हो एकान्त स्थानमें जा बैठे ॥ ३८½ ॥

> ततस्तारा पतिं दृष्ट्वा शिबिकातलशायिनम् ॥ ३९ ॥  
> आरोप्याङ्के शिरस्तस्य विललाप सुदुःखिता ।

तत्पश्चात् ताराने शिबिकामें सुलाये हुए अपने पतिके शवको देखकर उनके मस्तकको अपनी गोदमें ले लिया और अत्यन्त दुखी होकर वह विलाप करने लगी—॥ ३९½ ॥

> हा वानरमहाराज हा नाथ मम वत्सल ॥ ४० ॥  
> हा महार्ह महाबाहो हा मम प्रिय पश्य माम् ।  
> जनं न पश्यसीमं त्वं कस्माच्छोकाभिपीडितम् ॥ ४१ ॥

‘हा वानरोंके महाराज ! हा मेरे दयालु प्राणनाथ ! हा परम पूजनीय महाबाहु वीर ! हा मेरे प्रियतम ! एक बार मेरी ओर देखो तो सही । इस शोकपीड़ित दासीकी ओर तुम दृष्टिपात क्यों नहीं करते हो ? ॥ ४०-४१ ॥

> प्रहृष्टमिह ते वक्त्रं गतासोरपि मानद ।  
> अस्तार्कसमवर्णं च दृश्यते जीवतो यथा ॥ ४२ ॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले प्राणवल्लभ ! प्राणोंके निकल जानेपर भी तुम्हारा मुख जीवित अवस्थाकी भाँति अस्ताचल-वर्ती सूर्यके समान अरुण प्रभासे युक्त एवं प्रसन्न ही दिखायी देता है ॥ ४२ ॥

> एष त्वां रामरूपेण कालः कर्षति वानर ।  
> येन स्म विधवाः सर्वाः कृता एकेषुणा रणे ॥ ४३ ॥

‘वानरराज ! श्रीरामके रूपमें यह काल ही तुम्हें खींचकर लिये जा रहा है, जिसने युद्धके मैदानमें एक ही बाण मारकर हम सबको विधवा बना दिया ॥ ४३ ॥

> इमास्तास्तव राजेन्द्र वानर्योऽप्लवगास्तव ।  
> पादैर्विकृष्टमध्वानमागताः किं न बुध्यसे ॥ ४४ ॥

‘महाराज ! ये तुम्हारी प्यारी वानरियाँ, जो वानरोंकी भाँति उछलकर चलना नहीं जानती हैं, तुम्हारे पीछे-पीछे बहुत दूरके मार्गपर पैदल ही चली आयी हैं । इस बातको क्या तुम नहीं जानते ? ॥ ४४ ॥

> तवेष्टा ननु चैवेमा भार्याश्चन्द्रनिभाननाः ।  
> इदानीं नेक्षसे कस्मात् सुग्रीवं प्लवगेश्वर ॥ ४५ ॥

‘वानरराज ! जो तुम्हें परम प्रिय थीं, वे तुम्हारी सभी चन्द्रमुखी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं । तुम इन सबको तथा अपने भाई सुग्रीवको भी इस समय क्यों नहीं देख रहे हो ? ॥ ४५ ॥

> एते हि सचिवा राजंस्तारप्रभृतयस्तव ।  
> पुरवासिजनश्चायं परिवार्य विषीदति ॥ ४६ ॥

‘राजन् ! ये तार आदि तुम्हारे सचिव तथा ये पुरवासी-जन तुम्हें चारों ओरसे घेरकर दुखी हो रहे हैं ॥ ४६ ॥

> विसर्जयैनान् सचिवान् यथापुरमरिंदम ।  
> ततः क्रीडामहे सर्वा वनेषु मदनोत्कटाः ॥ ४७ ॥

‘शत्रुदमन ! आप पहलेकी भाँति इन मन्त्रियोंको विदा कर दीजिये । फिर हम सब प्रेमोन्मत्त होकर इन वनोंमें आपके साथ क्रीडा करेंगी’ ॥ ४७ ॥

> एवं विलपतीं तारां पतिशोकपरिप्लुताम् ।  
> उत्थापयन्ति स्म तदा वानर्यः शोककर्शिताः ॥ ४८ ॥

पतिके शोकमें डूबी हुई ताराको इस प्रकार विलाप करती देख उस समय शोकसे दुर्बल हुई अन्य वानरियोंने उसे उठाया ॥ ४८ ॥

> सुग्रीवेण ततः सार्धं सोऽङ्गदः पितरं रुदन् ।  
> चितामारोपयामास शोकेनाभिप्लुतेन्द्रियः ॥ ४९ ॥

इसके बाद संतापपीड़ित इन्द्रियोंवाले अङ्गदने रोते-रोते सुग्रीवकी सहायतासे पिताको चितापर रक्खा ॥ ४९ ॥

> ततोऽग्निं विधिवद् दत्त्वा सोऽपसव्यं चकार ह ।  
> पितरं दीर्घमध्वानं प्रस्थितं व्याकुलेन्द्रियः ॥ ५० ॥

फिर शास्त्रीय विधिके अनुसार उसमें आग लगाकर उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की । इसके बाद यह सोचकर कि ‘मेरे पिता लंबी यात्राके लिये प्रस्थित हुए हैं’ अङ्गदकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठीं ॥ ५० ॥

> संस्कृत्य वालिनं तं तु विधिवत् प्लवगर्षभाः ।  
> आजग्मुरुदकं कर्तुं नदीं शुभजलां शिवाम् ॥ ५१ ॥

इस प्रकार विधिवत् वालीका दाह-संस्कार करके सभी वानर जलाञ्जलि देनेके लिये पवित्र जलसे भरी हुई कल्याणमयी तुङ्गभद्रा नदीके तटपर आये ॥ ५१ ॥

> ततस्ते सहितास्तत्र ह्यङ्गदं स्थाप्य चाग्रतः ।  
> सुग्रीवतारासहिताः सिषिचुर्वानरा जलम् ॥ ५२ ॥

वहाँ अङ्गदको आगे रखकर सुग्रीव और तारासहित सभी वानरोंने वालीके लिये एक साथ जलाञ्जलि दी ॥ ५२ ॥

> सुग्रीवेणैव दीनेन दीनो भूत्वा महाबलः ।  
> समानशोकः काकुत्स्थः प्रेतकार्याण्यकारयत् ॥ ५३ ॥

दुखी हुए सुग्रीवके साथ ही उन्हींके समान शोकग्रस्त एवं दुखी हो महाबली श्रीरामने वालीके समस्त प्रेतकार्य करवाये ॥ ५३ ॥

> ततोऽथ तं वालिनमग्र्यपौरुषं  
> प्रकाशमिक्ष्वाकुवरेषुणा हतम् ।  
> प्रदीप्य दीप्ताग्निसमौजसं तदा  
> सलक्ष्मणं राममुपेयिवान् हरिः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामके बाणसे मारे गये श्रेष्ठ पराक्रमी और प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी सुविख्यात वालीका दाह-संस्कार करके सुग्रीव उस समय लक्ष्मणसहित श्रीरामके पास आये ॥ ५४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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