---
title: "किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 15"
canonical: "https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana/kishkindha-kanda/sarga-15"
lang: "hi"
---

# किष्किन्धाकाण्ड, Sarga 15

> अथ तस्य निनादं तं सुग्रीवस्य महात्मनः ।  
> शुश्रावान्तःपुरगतो वाली भ्रातुरमर्षणः ॥ १ ॥

उस समय अमर्षशील वाली अपने अन्तःपुरमें था। उसने अपने भाई महामना सुग्रीवका वह सिंहनाद वहींसे सुना ॥ १ ॥

> श्रुत्वा तु तस्य निनदं सर्वभूतप्रकम्पनम् ।  
> मदश्चैकपदे नष्टः क्रोधश्चापादितो महान् ॥ २ ॥

समस्त प्राणियोंको कम्पित कर देनेवाली उनकी वह गर्जना सुनकर उसका सारा मद सहसा उतर गया और उसे महान् क्रोध उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥

> ततो रोषपरीताङ्गो वाली स कनकप्रभः ।  
> उपरक्त इवादित्यः सद्यो निष्प्रभतां गतः ॥ ३ ॥

फिर तो सुवर्णके समान पीले रंगवाले वालीका सारा शरीर क्रोधसे तमतमा उठा । वह राहुग्रस्त सूर्यके समान तत्काल श्रीहीन दिखायी देने लगा ॥ ३ ॥

> वाली दंष्ट्राकरालस्तु क्रोधाद् दीप्ताग्निलोचनः।  
> भात्युत्पतितपद्माभः समृणाल इव ह्रदः ॥ ४ ॥

वालीकी दाढ़ें विकराल थीं, नेत्र क्रोधके कारण प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे । वह उस तालाबके समान श्रीहीन दिखायी देता था, जिसमें कमलपुष्पोंकी शोभा तो नष्ट हो गयी हो और केवल मृणाल रह गये हों ॥ ४ ॥

> शब्दं दुर्मर्षणं श्रुत्वा निष्पपात ततो हरिः ।  
> वेगेन च पदन्यासैर्दारयन्निव मेदिनीम् ॥ ५ ॥

वह दुःसह शब्द सुनकर वाली अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको विदीर्ण-सी करता हुआ बड़े वेगसे निकला ॥ ५ ॥

> तं तु तारा परिष्वज्य स्नेहाद् दर्शितसौहृदा।  
> उवाच त्रस्तसम्भ्रान्ता हितोदर्कमिदं वचः ॥ ६ ॥

उस समय वालीकी पत्नी तारा भयभीत हो घबरा उठी । उसने वालीको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लिया और स्नेहसे सौहार्दका परिचय देते हुए परिणाममें हित करनेवाली यह बात कही—॥ ६ ॥

> साधुः क्रोधमिमं वीर नदीवेगमिवागतम् ।  
> शयनादुत्थितः काल्यं त्यज भुक्तामिव स्रजम् ॥ ७ ॥

‘वीर ! मेरी अच्छी बात सुनिये और सहसा आये हुए नदीके वेगकी भाँति इस बढ़े हुए क्रोधको त्याग दीजिये । जैसे प्रातःकाल शय्यासे उठा हुआ पुरुष रातको उपभोगमें लायी गयी पुष्पमालाका त्याग कर देता है; उसी प्रकार इस क्रोधका परित्याग कीजिये ॥ ७ ॥

> काल्यमेतेन संग्रामं करिष्यसि च वानर ।  
> वीर ते शत्रुबाहुल्यं फल्गुता वा न विद्यते ॥ ८ ॥  
> सहसा तव निष्कामो मम तावन्न रोचते ।  
> श्रूयतामभिधास्यामि यन्निमित्तं निवार्यते ॥ ९ ॥

‘वानरवीर ! कल प्रातःकाल सुग्रीवके साथ युद्ध कीजियेगा ( इस समय रुक जाइये )। यद्यपि युद्धमें कोई शत्रु आपसे बढ़कर नहीं है और आप किसीसे छोटे नहीं हैं । तथापि इस समय सहसा आपका घरसे बाहर निकलना मुझे अच्छा नहीं लगता है, आपको रोकनेका एक विशेष कारण भी है । उसे बताती हूँ, सुनिये ॥ ८-९ ॥

> पूर्वमापतितः क्रोधात् स त्वामाह्वयते युधि ।  
> निष्पत्य च निरस्तस्ते हन्यमानो दिशो गतः ॥ १० ॥

‘सुग्रीव पहले भी यहाँ आये थे और क्रोधपूर्वक उन्होंने आपको युद्धके लिये ललकारा था । उस समय आपने नगरसे निकलकर उन्हें परास्त किया और वे आपकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागते हुए मतङ्ग वनमें चले गये थे ॥ १० ॥

> त्वया तस्य निरस्तस्य पीडितस्य विशेषतः ।  
> इहैत्य पुनराह्वानं शङ्कां जनयतीव मे ॥ ११ ॥

‘इस प्रकार आपके द्वारा पराजित और विशेष पीड़ित होनेपर भी वे पुनः यहाँ आकर आपको युद्धके लिये ललकार रहे हैं । उनका यह पुनरागमन मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है ॥ ११ ॥

> दर्पश्च व्यवसायश्च यादृशस्तस्य नर्दतः ।  
> निनादस्य च संरम्भो नैतदल्पं हि कारणम् ॥ १२ ॥

‘इस समय गर्जते हुए सुग्रीवका दर्प और उद्योग जैसा दिखायी देता है तथा उनकी गर्जनामें जो उत्तेजना जान पड़ती है, इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं होना चाहिये ॥ १२ ॥

> नासहायमहं मन्ये सुग्रीवं तमिहागतम् ।  
> अवष्टब्धसहायश्च यमाश्रित्यैष गर्जति ॥ १३ ॥

‘मैं समझती हूँ सुग्रीव किसी प्रबल सहायकके बिना अबकी बार यहाँ नहीं आये हैं । किसी सबल सहायकको साथ लेकर ही आये हैं, जिसके बलपर ये इस तरह गरज रहे हैं ॥ १३ ॥

> प्रकृत्या निपुणश्चैव बुद्धिमांश्चैव वानरः ।  
> नापरीक्षितवीर्येण सुग्रीवः सख्यमेष्यति ॥ १४ ॥

‘वानर सुग्रीव स्वभावसे ही कार्यकुशल और बुद्धिमान् हैं । वे किसी ऐसे पुरुषके साथ मैत्री नहीं करेंगे, जिसके बल और पराक्रमको अच्छी तरह परख न लिया हो ॥ १४ ॥

> पूर्वमेव मया वीर श्रुतं कथयतो वचः ।  
> अङ्गदस्य कुमारस्य वक्ष्याम्यद्य हितं वचः ॥ १५ ॥

‘वीर ! मैंने पहले ही कुमार अङ्गदके मुँहसे यह बात सुन ली है । इसलिये आज मैं आपके हितकी बात बताती हूँ ॥ १५ ॥

> अङ्गदस्तु कुमारोऽयं वनान्तमुपनिर्गतः ।  
> प्रवृत्तिस्तेन कथिता चारैरासीन्निवेदिता ॥ १६ ॥

‘एक दिन कुमार अङ्गद वनमें गये थे । वहाँ गुप्तचरोंने उन्हें एक समाचार बताया, जो उन्होंने यहाँ आकर मुझसे भी कहा था ॥ १६ ॥

> अयोध्याधिपतेः पुत्रौ शूरौ समरदुर्जयौ ।  
> इक्ष्वाकूणां कुले जातौ प्रथितौ रामलक्ष्मणौ ॥ १७ ॥

‘वह समाचार इस प्रकार है—अयोध्यानरेशके दो शूरवीर पुत्र, जिन्हें युद्धमें जीतना अत्यन्त कठिन है, जिनका जन्म इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है तथा जो श्रीराम और लक्ष्मणके नामसे प्रसिद्ध हैं, यहाँ वनमें आये हुए हैं ॥ १७ ॥

> सुग्रीवप्रियकामार्थं प्राप्तौ तत्र दुरासदौ ।  
> स ते भ्रातुर्हि विख्यातः सहायो रणकर्मणि ॥ १८ ॥  
> रामः परबलामर्दी युगान्ताग्निरिवोत्थितः ।  
> निवासवृक्षः साधूनामापन्नानां परा गतिः ॥ १९ ॥

‘वे दोनों दुर्जय वीर सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये उनके पास पहुँच गये हैं । उन दोनोंमेंसे जो आपके भाईके युद्धकर्ममें सहायक बताये गये हैं, वे श्रीराम शत्रुसेनाका संहार करनेवाले तथा प्रलयकालमें प्रज्वलित हुई अग्निके समान तेजस्वी हैं । वे साधु पुरुषोंके आश्रयदाता कल्पवृक्ष हैं और संकटमें पड़े हुए प्राणियोंके लिये सबसे बड़ा सहारा हैं ॥ १८-१९ ॥

> आर्तानां संश्रयश्चैव यशसश्चैकभाजनम् ।  
> ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो निदेशे निरतः पितुः ॥ २० ॥

‘आर्त पुरुषोंके आश्रय, यशके एकमात्र भाजन, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा पिताकी आज्ञामें स्थित रहनेवाले हैं ॥ २० ॥

> धातूनामिव शैलेन्द्रो गुणानामाकरो महान् ।  
> तत् क्षमो न विरोधस्ते सह तेन महात्मना ॥ २१ ॥  
> दुर्जयेनाप्रमेयेण रामेण रणकर्मसु ।

‘जैसे गिरिराज हिमालय नाना धातुओंकी खान है, उसी प्रकार श्रीराम उत्तम गुणोंके बहुत बड़े भंडार हैं । अतः उन महात्मा रामके साथ आपका विरोध करना कदापि उचित नहीं है । क्योंकि वे युद्धकी कलामें अपना सानी नहीं रखते हैं । उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है ॥ २१½ ॥

> शूर वक्ष्यामि ते किंचिन्न चेच्छाम्यभ्यसूयितुम् ॥ २२ ॥  
> श्रूयतां क्रियतां चैव तव वक्ष्यामि यद्धितम् ।

‘शूरवीर ! मैं आपके गुणोंमें दोष देखना नहीं चाहती । अतः आपसे कुछ कहती हूँ । आपके लिये जो हितकर है, वही बता रही हूँ । आप उसे सुनिये और वैसा ही कीजिये ॥ २२½ ॥

> यौवराज्येन सुग्रीवं तूर्णं साध्वभिषेचय ॥ २३ ॥  
> विग्रहं मा कृथा वीर भ्रात्रा राजन् यवीयसा ।

‘अच्छा यही होगा कि आप सुग्रीवका शीघ्र ही युवराजके पदपर अभिषेक कर दीजिये । वीर वानरराज ! सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं, उनके साथ युद्ध न कीजिये ॥ २३½ ॥

> अहं हि ते क्षमं मन्ये तेन रामेण सौहृदम् ॥ २४ ॥  
> सुग्रीवेण च सम्प्रीतिं वैरमुत्सृज्य दूरतः ।

‘मैं आपके लिये यही उचित समझती हूँ कि आप वैरभावको दूर हटाकर श्रीरामके साथ सौहार्द और सुग्रीवके साथ प्रेमका सम्बन्ध स्थापित कीजिये ॥ २४½ ॥

> लालनीयो हि ते भ्राता यवीयानेष वानरः ॥ २५ ॥  
> तत्र वा सन्निहस्थो वा सर्वथा बन्धुरेव ते ।  
> नहि तेन समं बन्धुं भुवि पश्यामि कंचन ॥ २६ ॥

‘वानर सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं । अतः आपका लाड़-प्यार पानेके योग्य हैं । वे ऋष्यमूकपर रहें या किष्किन्धामें— सर्वथा आपके बन्धु ही हैं । मैं इस भूतलपर उनके समान बन्धु और किसीको नहीं देखती हूँ ॥ २५-२६ ॥

> दानमानादिसत्कारैः कुरुष्व प्रत्यनन्तरम् ।  
> वैरमेतत् समुत्सृज्य तव पार्श्वे स तिष्ठतु ॥ २७ ॥

‘आप दान-मान आदि सत्कारोंके द्वारा उन्हें अपना अत्यन्त अन्तरङ्ग बना लीजिये, जिससे वे इस वैरभावको छोड़कर आपके पास रह सकें ॥ २७ ॥

> सुग्रीवो विपुलग्रीवो महाबन्धुर्मतस्तव ।  
> भ्रातृसौहृदमालम्ब्य नान्या गतिरिहास्ति ते ॥ २८ ॥

‘पुष्ट ग्रीवावाले सुग्रीव आपके अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं, ऐसा मेरा मत है । इस समय भ्रातृप्रेमका सहारा लेनेके सिवा आपके लिये यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है ॥ २८ ॥

> यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि चावैषि मां हिताम् ।  
> याच्यमानः प्रियत्वेन साधु वाक्यं कुरुष्व मे ॥ २९ ॥

‘यदि आपको मेरा प्रिय करना हो तथा आप मुझे अपनी हितकारिणी समझते हों तो मैं प्रेमपूर्वक याचना करती हूँ, आप मेरी यह नेक सलाह मान लीजिये ॥ २९ ॥

> प्रसीद पथ्यं शृणु जल्पितं हि मे  
> न रोषमेवानुविधातुमर्हसि ।  
> क्षमो हि ते कोशलराजसूनुना  
> न विग्रहः शक्रसमानतेजसा ॥ ३० ॥

‘स्वामिन् ! आप प्रसन्न होइये । मैं आपके हितकी बात कहती हूँ । आप इसे ध्यान देकर सुनिये । केवल रोषका ही अनुसरण न कीजिये । कोसलराजकुमार श्रीराम इन्द्रके समान तेजस्वी हैं । उनके साथ वैर बाँधना या युद्ध छेड़ना आपके लिये कदापि उचित नहीं है’ ॥ ३० ॥

> तदा हि तारा हितमेव वाक्यं  
> तं वालिनं पथ्यमिदं बभाषे ।  
> न रोचते तद् वचनं हि तस्य  
> कालाभिपन्नस्य विनाशकाले ॥ ३१ ॥

उस समय ताराने वालीसे उसके हितकी ही बात कही थी और यह लाभदायक भी थी । किंतु उसकी बात उसे नहीं रुची । क्योंकि उसके विनाशका समय निकट था और वह कालके पाशमें बँध चुका था ॥ ३१ ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
