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title: "बालकाण्ड, Sarga 68"
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# बालकाण्ड, Sarga 68

> जनकेन समादिष्टा दूतास्ते क्लान्तवाहनाः ।  
> त्रिरात्रमुषिता मार्गे तेऽयोध्यां प्राविशन् पुरीम् ॥१॥

राजा जनककी आज्ञा पाकर उनके दूत अयोध्याके लिये प्रस्थित हुए । रास्तेमें वाहनोंके थक जानेके कारण तीन रात विश्राम करके चौथे दिन वे अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे ॥ १ ॥

> ते राजवचनाद् गत्वा राजवेश्म प्रवेशिताः ।  
> ददृशुर्देवसंकाशं वृद्धं दशरथं नृपम् ॥ २ ॥

राजाकी आज्ञासे उनका राजमहलमें प्रवेश हुआ । वहाँ जाकर उन्होंने देवतुल्य तेजस्वी बूढ़े महाराज दशरथका दर्शन किया ॥ २ ॥

> बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे दूता विगतसाध्वसाः ।  
> राजानं प्रश्रितं वाक्यमब्रुवन् मधुराक्षरम् ॥ ३ ॥  
> मैथिलो जनको राजा साग्निहोत्रपुरस्कृतः ।  
> मुहुर्मुहुर्मधुरया स्नेहसंरक्तया गिरा ॥ ४ ॥  
> कुशलं चाव्ययं चैव सोपाध्यायपुरोहितम् ।  
> जनकस्त्वां महाराज पृच्छते सपुरःसरम् ॥ ५ ॥

उन सभी दूतोंने दोनों हाथ जोड़ निर्भय हो राजासे मधुर वाणीमें यह विनययुक्त बात कही—‘महाराज ! मिथिलापति राजा जनकने अग्निहोत्रकी अग्निको सामने रखकर स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें सेवकोंसहित आपका तथा आपके उपाध्याय और पुरोहितोंका बारंबार कुशल-मङ्गल पूछा है ॥ ३–५ ॥

> पृष्ट्वा कुशलमव्यग्रं वैदेहो मिथिलाधिपः ।  
> कौशिकानुमते वाक्यं भवन्तमिदमब्रवीत् ॥ ६ ॥

‘इस प्रकार व्यग्रतारहित कुशल पूछकर मिथिलापति विदेहराजने महर्षि विश्वामित्रकी आज्ञासे आपको यह संदेश दिया है ॥ ६ ॥

> पूर्वं प्रतिज्ञा विदिता वीर्यशुल्का ममात्मजा ।  
> राजानश्च कृतामर्षा निर्वीर्या विमुखीकृताः ॥ ७ ॥

‘राजन् ! आपको मेरी पहले की हुई प्रतिज्ञाका हाल मालूम होगा । मैंने अपनी पुत्रीके विवाहके लिये पराक्रमका ही शुल्क नियत किया था । उसे सुनकर कितने ही राजा अमर्षमें भरे हुए आये; किंतु यहाँ पराक्रमहीन सिद्ध हुए और विमुख होकर घर लौट गये ॥ ७ ॥

> सेयं मम सुता राजन् विश्वामित्रपुरस्कृतैः ।  
> यदृच्छयागतै राजन् निर्जिता तव पुत्रकैः ॥ ८ ॥

‘नरेश्वर ! मेरी इस कन्याको विश्वामित्रजीके साथ अकस्मात् घूमते-फिरते आये हुए आपके पुत्र श्रीरामने अपने पराक्रमसे जीत लिया है ॥ ८ ॥

> तच्च रत्नं धनुर्दिव्यं मध्ये भग्नं महात्मना ।  
> रामेण हि महाबाहो महत्यां जनसंसदि ॥ ९ ॥

‘महाबाहो ! महात्मा श्रीरामने महान् जनसमुदायके मध्य मेरे यहाँ रक्खे हुए रत्नस्वरूप दिव्य धनुषको बीचसे तोड़ डाला है ॥ ९ ॥

> अस्मै देया मया सीता वीर्यशुल्का महात्मने ।  
> प्रतिज्ञां तर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ १० ॥

‘अतः मैं इन महात्मा श्रीरामचन्द्रजीको अपनी वीर्य-शुल्का कन्या सीता प्रदान करूँगा । ऐसा करके मैं अपनी प्रतिज्ञासे पार होना चाहता हूँ । आप इसके लिये मुझे आज्ञा देनेकी कृपा करें ॥ १० ॥

> सोपाध्यायो महाराज पुरोहितपुरस्कृतः ।  
> शीघ्रमागच्छ भद्रं ते द्रष्टुमर्हसि राघवौ ॥ ११ ॥

‘महाराज ! आप अपने गुरु एवं पुरोहितके साथ यहाँ शीघ्र पधारें और अपने दोनों पुत्र रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मणको देखें । आपका भला हो ॥ ११ ॥

> प्रतिज्ञां मम राजेन्द्र निर्वर्तयितुमर्हसि ।  
> पुत्रयोरुभयोरेव प्रीतिं त्वमुपलप्स्यसे ॥ १२ ॥

‘राजेन्द्र ! यहाँ पधारकर आप मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण करें । यहाँ आनेसे आपको अपने दोनों पुत्रोंके विवाहजनित आनन्द-की प्राप्ति होगी ॥ १२ ॥

> एवं विदेहाधिपतिर्मधुरं वाक्यमब्रवीत् ।  
> विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः शतानन्दमते स्थितः ॥ १३ ॥

‘राजन् ! इस तरह विदेहराजने आपके पास यह मधुर संदेश भेजा था । इसके लिये उन्हें विश्वामित्रजीकी आज्ञा और शतानन्दजीकी सम्मति भी प्राप्त हुई थी’ ॥ १३ ॥

> दूतवाक्यं तु तच्छ्रुत्वा राजा परमहर्षितः ।  
> वसिष्ठं वामदेवं च मन्त्रिणश्चैवमब्रवीत् ॥ १४ ॥

संदेशवाहक मन्त्रियोंका यह वचन सुनकर राजा दशरथ बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने महर्षि वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्य मन्त्रियोंसे कहा—॥ १४ ॥

> गुप्तः कुशिकपुत्रेण कौसल्यानन्दवर्धनः ।  
> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विदेहेषु वसत्यसौ ॥ १५ ॥

‘कुशिकनन्दन विश्वामित्रसे सुरक्षित हो कौसल्याका आनन्दवर्धन करनेवाले श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मणके साथ विदेहदेशमें निवास करते हैं ॥ १५ ॥

> दृष्टवीर्यस्तु काकुत्स्थो जनकेन महात्मना ।  
> सम्प्रदानं सुतायास्तु राघवे कर्तुमिच्छति ॥ १६ ॥

‘वहाँ महात्मा राजा जनकने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके पराक्रमको प्रत्यक्ष देखा है । इसलिये वे अपनी पुत्री सीताका विवाह रघुकुलरत्न रामके साथ करना चाहते हैं ॥ १६ ॥

> यदि वो रोचते वृत्तं जनकस्य महात्मनः ।  
> पुरीं गच्छामहे शीघ्रं मा भूत् कालस्य पर्ययः ॥ १७ ॥

‘यदि आपलोगोंकी रुचि एवं सम्मति हो तो हमलोग शीघ्र ही महात्मा जनककी मिथिलापुरीको चलें । इसमें विलम्ब न हो’ ॥ १७ ॥

> मन्त्रिणो बाढमित्याहुः सह सर्वैर्महर्षिभिः ।  
> सुप्रीतश्चाब्रवीद् राजा श्वो यात्रेति च मन्त्रिणः ॥ १८ ॥

यह सुनकर समस्त महर्षियोंसहित मन्त्रियोंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर एक स्वरसे चलनेकी सम्मति दी । राजा बड़े प्रसन्न हुए और मन्त्रियोंसे बोले—‘कल सवेरे ही यात्रा कर देनी चाहिये’ ॥ १८ ॥

> मन्त्रिणस्तु नरेन्द्रस्य रात्रिं परमसत्कृताः ।  
> ऊषुः प्रमुदिताः सर्वे गुणैः सर्वैः समन्विताः ॥ १९ ॥

महाराज दशरथके सभी मन्त्री समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे । राजाने उनका बड़ा सत्कार किया । अतः बारात चलनेकी बात सुनकर उन्होंने बड़े आनन्दसे वह रात्रि व्यतीत की ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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