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title: "बालकाण्ड, Sarga 59"
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# बालकाण्ड, Sarga 59

> उक्तवाक्यं तु राजानं कृपया कुशिकात्मजः।  
> अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साक्षाच्चण्डालतां गतम् ॥ १ ॥

[शतानन्दजी कहते हैं—श्रीराम !] साक्षात् चाण्डालके स्वरूपको प्राप्त हुए राजा त्रिशङ्कुके पूर्वोक्त वचनको सुनकर कुशिकनन्दन विश्वामित्रजीने दयासे द्रवित होकर उनसे मधुर वाणीमें कहा—॥ १ ॥

> इक्ष्वाको स्वागतं वत्स जानामि त्वां सुधार्मिकम्।  
> शरणं ते प्रदास्यामि मा भैषीर्नृपपुङ्गव ॥ २ ॥

‘वत्स ! इक्ष्वाकुकुलनन्दन ! तुम्हारा स्वागत है। मैं जानता हूँ, तुम बड़े धर्मात्मा हो। नृपप्रवर ! डरो मत, मैं तुम्हें शरण दूँगा ॥ २ ॥

> अहमामन्त्रये सर्वान् महर्षीन् पुण्यकर्मणः।  
> यज्ञसाह्यकरान् राजंस्ततो यक्ष्यसि निर्वृतः ॥ ३ ॥

‘राजन् ! तुम्हारे यज्ञमें सहायता करनेवाले समस्त पुण्यकर्मा महर्षियोंको मैं आमन्त्रित करता हूँ। फिर तुम आनन्दपूर्वक यज्ञ करना ॥ ३ ॥

> गुरुशापकृतं रूपं यदिदं त्वयि वर्तते।  
> अनेन सह रूपेण सशरीरो गमिष्यसि ॥ ४ ॥  
> हस्तप्राप्तमहं मन्ये स्वर्गं तव नराधिप।  
> यस्त्वं कौशिकमागम्य शरण्यं शरणागतः ॥ ५ ॥

‘गुरुके शापसे तुम्हें जो यह नवीन रूप प्राप्त हुआ है इसके साथ ही तुम सदेह स्वर्गलोकको जाओगे। नरेश्वर ! तुम जो शरणागतवत्सल विश्वामित्रकी शरणमें आ गये, इससे मैं यह समझता हूँ कि स्वर्गलोक तुम्हारे हाथमें आ गया है’ ॥ ४-५ ॥

> एवमुक्त्वा महातेजाः पुत्रान् परमधार्मिकान्।  
> व्यादिदेश महाप्राज्ञान् यज्ञसम्भारकारणात् ॥ ६ ॥  
> सर्वाञ्शिष्यान् समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह।  
> सर्वानृषीन् सवासिष्ठानानयध्वं ममाज्ञया ॥ ७ ॥  
> सशिष्यान् सुहृदश्चैव सर्त्विजः सुबहुश्रुतान्।

ऐसा कहकर महातेजस्वी विश्वामित्रने अपने परम धर्मपरायण महाज्ञानी पुत्रोंको यज्ञकी सामग्री जुटानेकी आज्ञा दी ॥ तत्पश्चात् समस्त शिष्योंको बुलाकर उनसे यह बात कही—‘तुमलोग मेरी आज्ञासे अनेक विषयोंके ज्ञाता समस्त ऋषि-मुनियोंको, जिनमें वसिष्ठके पुत्र भी सम्मिलित हैं, उनके शिष्यों, सुहृदों तथा ऋत्विजोंसहित बुला लाओ ॥ ७½ ॥

> यदन्यो वचनं ब्रूयान्मद्वाक्यबलचोदितः ॥ ८ ॥  
> तत् सर्वमखिलेनोक्तं ममाख्येयमनादृतम्।

‘जिसे मेरा संदेश देकर बुलाया गया हो वह अथवा दूसरा कोई यदि इस यज्ञके विषयमें कोई अवहेलनापूर्ण बात कहे तो तुमलोग वह सब पूरा-पूरा मुझसे आकर कहना’ ॥ ८½ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दिशो जग्मुस्तदाज्ञया ॥ ९ ॥  
> आजग्मुरथ देशेभ्यः सर्वेभ्यो ब्रह्मवादिनः।  
> ते च शिष्याः समागम्य मुनिं ज्वलिततेजसम्॥ १० ॥  
> ऊचुश्च वचनं सर्वं सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्।

उनकी आज्ञा मानकर सभी शिष्य चारों दिशाओंमें चले गये। फिर तो सब देशोंसे ब्रह्मवादी मुनि आने लगे। विश्वामित्रके वे शिष्य उन प्रज्वलित तेजवाले महर्षिके पास सबसे पहले लौट आये और समस्त ब्रह्मवादियोंने जो बातें कही थीं, उन्हें सबने विश्वामित्रजीसे कह सुनाया ॥ ९-१०½ ॥

> श्रुत्वा ते वचनं सर्वे समायान्ति द्विजातयः ॥ ११ ॥  
> सर्वदेशेषु चागच्छन् वर्जयित्वा महोदयम्।

वे बोले—‘गुरुदेव ! आपका आदेश या संदेश सुनकर प्रायः सम्पूर्ण देशोंमें रहनेवाले सभी ब्राह्मण आ रहे हैं। केवल महोदय नामक ऋषि तथा वसिष्ठ-पुत्रोंको छोड़कर सभी महर्षि यहाँ आनेके लिये प्रस्थान कर चुके हैं ॥ ११½ ॥

> वासिष्ठं यच्छतं सर्वं क्रोधपर्याकुलाक्षरम् ॥ १२ ॥  
> यथाह वचनं सर्वं शृणु त्वं मुनिपुङ्गव।

‘मुनिश्रेष्ठ ! वसिष्ठके जो सौ पुत्र हैं, उन सबने क्रोधभरी वाणीमें जो कुछ कहा है, वह सब आप सुनिये ॥१२½॥

> क्षत्रियो याजको यस्य चण्डालस्य विशेषतः ॥ १३ ॥  
> कथं सदसि भोक्तारो हविस्तस्य सुरर्षयः।  
> ब्राह्मणा वा महात्मानो भुक्त्वा चाण्डालभोजनम्॥ १४ ॥  
> कथं स्वर्गं गमिष्यन्ति विश्वामित्रेण पालिताः।

‘वे कहते हैं—जो विशेषतः चण्डाल है और जिसका यज्ञ करानेवाला आचार्य क्षत्रिय है, उसके यज्ञमें देवर्षि अथवा महात्मा ब्राह्मण हविष्यका भोजन कैसे कर सकते हैं ! अथवा चण्डालका अन्न खाकर विश्वामित्रसे पालित हुए ब्राह्मण स्वर्गमें कैसे जा सकेंगे ?’ ॥ १३-१४½ ॥

> एतद् वचननैष्ठुर्यमूचुः संरक्तलोचनाः ॥ १५ ॥  
> वासिष्ठा मुनिशार्दूल सर्वे सहमहोदयाः।

‘मुनिप्रवर ! महोदयके साथ वसिष्ठके सभी पुत्रोंने क्रोधसे लाल आँखें करके ये उपर्युक्त निष्ठुरतापूर्ण बातें कही थीं’ ॥ १५½ ॥

> तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सर्वेषां मुनिपुङ्गवः ॥ १६ ॥  
> क्रोधसंरक्तनयनः सरोषमिदमब्रवीत् ।

उन सबकी वह बात सुनकर मुनिवर विश्वामित्रके दोनों नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे रोषपूर्वक इस प्रकार बोले—॥ १६½ ॥

> यद् दूषयन्त्यदुष्टं मां तप उग्रं समास्थितम् ॥ १७ ॥  
> भस्मीभूता दुरात्मानो भविष्यन्ति न संशयः ।

‘मैं उग्र तपस्यामें लगा हूँ और दोष या दुर्भावनासे रहित हूँ तो भी जो मुझपर दोषारोपण करते हैं, वे दुरात्मा भस्मीभूत हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १७½ ॥

> अद्य ते कालपाशेन नीता वैवस्वतक्षयम् ॥ १८ ॥  
> सप्तजातिशतान्येव मृतपाः सम्भवन्तु ते ।  
> श्वमांसनियताहारा मुष्टिका नाम निर्घृणाः ॥ १९ ॥

‘आज कालपाशसे बँधकर वे यमलोकमें पहुँचा दिये गये । अब ये सात सौ जन्मोंतक मुर्दोंकी रखवाली करनेवाली, निश्चितरूपसे कुत्तेका मांस खानेवाली मुष्टिक नामक प्रसिद्ध निर्दय चण्डाल-जातिमें जन्म ग्रहण करें ॥ १८-१९ ॥

> विकृताश्च विरूपाश्च लोकाननुचरन्त्विमान् ।  
> महोदयश्च दुर्बुद्धिर्मामदूष्यं ह्यदूषयत् ॥ २० ॥  
> दूषितः सर्वलोकेषु निषादत्वं गमिष्यति ।  
> प्राणातिपातनिरतो निरनुक्रोशतां गतः ॥ २१ ॥  
> दीर्घकालं मम क्रोधाद् दुर्गतिं वर्तयिष्यति ।

‘वे लोग विकृत एवं विरूप होकर इन लोकोंमें विचरें । साथ ही दुर्बुद्धि महोदय भी, जिसने मुझ दोषहीनको भी दूषित किया है, मेरे क्रोधसे दीर्घकालतक सब लोगोंमें निन्दित, दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर और दयाशून्य निषादयोनिको प्राप्त करके दुर्गति भोगेगा’ ॥ २०-२१½ ॥

> एतावदुक्त्वा वचनं विश्वामित्रो महातपाः ।  
> विरराम महातेजा ऋषिमध्ये महामुनिः ॥ २२ ॥

ऋषियोंके बीचमें ऐसा कहकर महातपस्वी, महातेजस्वी एवं महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये ॥ २२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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