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title: "बालकाण्ड, Sarga 58"
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# बालकाण्ड, Sarga 58

> ततस्त्रिशङ्कोर्वचनं श्रुत्वा क्रोधसमन्वितम् ।  
> ऋषिपुत्रशतं राम राजानमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥  
> प्रत्याख्यातोऽसि दुर्मेधो गुरुणा सत्यवादिना ।  
> तं कथं समतिक्रम्य शाखान्तरमुपेयिवान् ॥ २ ॥

रघुनन्दन ! राजा त्रिशङ्कुका यह वचन सुनकर वसिष्ठ मुनिके वे सौ पुत्र कुपित हो उनसे इस प्रकार बोले—‘दुर्बुद्धे ! तुम्हारे सत्यवादी गुरुने जब तुम्हें मना कर दिया है, तब तुमने उनका उल्लङ्घन करके दूसरी शाखाका आश्रय कैसे लिया ? ॥१-२॥

> इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः ।  
> न चातिक्रमितुं शक्यं वचनं सत्यवादिनः ॥ ३ ॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंके लिये पुरोहित वसिष्ठजी ही परमगति हैं । उन सत्यवादी महात्माकी बातको कोई अन्यथा नहीं कर सकता ॥ ३ ॥

> अशक्यमिति सोवाच वसिष्ठो भगवानृषिः ।  
> तं वयं वै समाहर्तुं क्रतुं शक्ताः कथंचन ॥ ४ ॥

‘जिस यज्ञकर्मको उन भगवान् वसिष्ठमुनिने असम्भव बताया है, उसे हमलोग कैसे कर सकते हैं ॥ ४ ॥

> बालिशस्त्वं नरश्रेष्ठ गम्यतां स्वपुरं पुनः ।  
> याजने भगवाञ्शक्तस्त्रैलोक्यस्यापि पार्थिव ॥ ५ ॥  
> अवमानं कथं कर्तुं तस्य शक्ष्यामहे वयम् ।

‘नरश्रेष्ठ ! तुम अभी नादान हो, अपने नगरको लौट जाओ । पृथ्वीनाथ ! भगवान् वसिष्ठ तीनों लोकोंका यज्ञ करानेमें समर्थ हैं, हमलोग उनका अपमान कैसे कर सकेंगे’ ॥ ५½ ॥

> तेषां तद् वचनं श्रुत्वा क्रोधपर्याकुलाक्षरम् ॥ ६ ॥  
> स राजा पुनरेवैतानिदं वचनमब्रवीत् ।  
> प्रत्याख्यातो भगवता गुरुपुत्रैस्तथैव हि ॥ ७ ॥  
> अन्यां गतिं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु तपोधनाः ।

गुरुपुत्रोंका वह क्रोधयुक्त वचन सुनकर राजा त्रिशङ्कुने पुनः उनसे इस प्रकार कहा—‘तपोधनो ! भगवान् वसिष्ठने तो मुझे ठुकरा ही दिया था, आप गुरुपुत्रगण भी मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार कर रहे हैं; अतः आपका कल्याण हो, अब मैं दूसरे किसीकी शरणमें जाऊँगा’ ॥ ६-७½ ॥

> ऋषिपुत्रास्तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं घोराभिसंहितम् ॥ ८ ॥  
> शेपुः परमसंक्रुद्धाश्चण्डालत्वं गमिष्यसि ।  
> इत्युक्त्वा ते महात्मानो विविशुः स्वं स्वमाश्रमम् ।९।

त्रिशङ्कुका यह घोर अभिसंधिपूर्ण वचन सुनकर महर्षिके पुत्रोंने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप दे दिया—‘अरे ! जा तू चाण्डाल हो जायगा ।’ ऐसा कहकर वे महात्मा अपने-अपने आश्रममें प्रविष्ट हो गये ॥ ८-९ ॥

> अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चण्डालतां गतः ।  
> नीलवस्त्रधरो नीलः पुरुषो ध्वस्तमूर्धजः ॥ १० ॥  
> चित्यमाल्याङ्गरागश्च आयसाभरणोऽभवत् ।

तदनन्तर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशङ्कु चाण्डाल हो गये । उनके शरीरका रङ्ग नीला हो गया । कपड़े भी नीले हो गये। प्रत्येक अङ्गमें रूक्षता आ गयी । सिरके बाल छोटे-छोटे हो गये । सारे शरीरमें चिताकी राख-सी लिपट गयी। विभिन्न अङ्गोंमें यथास्थान लोहेके गहने पड़ गये ॥१०½॥

> तं दृष्ट्वा मन्त्रिणः सर्वे त्यज्य चण्डालरूपिणम् ॥ ११ ॥  
> प्राद्रवन् सहिता राम पौरा येऽस्यानुगामिनः ।  
> एको हि राजा काकुत्स्थ जगाम परमात्मवान् ॥ १२ ॥  
> दह्यमानो दिवारात्रं विश्वामित्रं तपोधनम् ।

श्रीराम ! अपने राजाको चाण्डालके रूपमें देखकर सब मन्त्री और पुरवासी जो उनके साथ आये थे, उन्हें छोड़कर भाग गये । ककुत्स्थनन्दन ! वे धीरस्वभाव नरेश दिन-रात चिन्ताकी आगमें जलने लगे और अकेले ही तपोधन विश्वामित्रकी शरणमें गये॥ ११-१२½॥

> विश्वामित्रस्तु तं दृष्ट्वा राजानं विफलीकृतम् ॥ १३ ॥  
> चण्डालरूपिणं राम मुनिः कारुण्यमागतः ।  
> कारुण्यात् स महातेजा वाक्यं परमधार्मिकः ॥ १४ ॥  
> इदं जगाद भद्रं ते राजानं घोरदर्शनम् ।  
> किमागमनकार्यं ते राजपुत्र महाबल ॥ १५ ॥  
> अयोध्याधिपते वीर शापाच्चण्डालतां गतः ।

श्रीराम ! विश्वामित्रने देखा राजाका जीवन निष्फल हो गया है। उन्हें चाण्डालके रूपमें देखकर उन महातेजस्वी परम धर्मात्मा मुनिके हृदयमें करुणा भर आयी। वे दयासे द्रवित होकर भयंकर दिखायी देनेवाले राजा त्रिशङ्कुसे इस प्रकार बोले—‘महाबली राजकुमार! तुम्हारा भला हो, यहाँ किस कामसे तुम्हारा आना हुआ है । वीर अयोध्यानरेश ! जान पड़ता है तुम शापसे चाण्डालभावको प्राप्त हुए हो’ ॥ १३–१५½॥

> अथ तद्वाक्यमाकर्ण्य राजा चण्डालतां गतः ॥१६॥  
> अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ।  
> प्रत्याख्यातोऽस्मि गुरुणा गुरुपुत्रैस्तथैव च ॥ १७ ॥  
> अनवाप्यैव तं कामं मया प्राप्तो विपर्ययः ।

विश्वामित्रकी बात सुनकर चाण्डालभावको प्राप्त हुए और वाणीके तात्पर्यको समझनेवाले राजा त्रिशङ्कुने हाथ जोड़कर वाक्यार्थकोविद विश्वामित्र मुनिसे इस प्रकार कहा—॥ ‘महर्षे ! मुझे गुरु तथा गुरुपुत्रोंने ठुकरा दिया। मैं जिस मनोऽभीष्ट वस्तुको पाना चाहता था, उसे न पाकर इच्छाके विपरीत अनर्थका भागी हो गया ॥१७½॥

> सशरीरो दिवं यायामिति मे सौम्यदर्शन ॥ १८ ॥  
> मया चेष्टं क्रतुशतं तच्च नावाप्यते फलम् ।  
> अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन ॥ १९ ॥  
> कृच्छ्रेष्वपि गतः सौम्य क्षत्रधर्मेण ते शपे ।

‘सौम्यदर्शन मुनीश्वर ! मैं चाहता था कि इसी शरीरसे स्वर्गको जाऊँ, परंतु यह इच्छा पूर्ण न हो सकी । मैंने सैकड़ों यज्ञ किये हैं; किंतु उनका भी कोई फल नहीं मिल रहा है॥ ‘सौम्य ! मैं क्षत्रियधर्मकी शपथ खाकर आपसे कहता हूँ कि बड़े-से-बड़े सङ्कटमें पड़नेपर भी न तो पहले कभी मैंने मिथ्या भाषण किया है और न भविष्यमें ही कभी करूँगा १९½

> यज्ञैर्बहुविधैरिष्टं प्रजा धर्मेण पालिताः ॥ २० ॥  
> गुरवश्च महात्मानः शीलवृत्तेन तोषिताः ।  
> धर्मे प्रयतमानस्य यज्ञं चाहर्तुमिच्छतः ॥ २१ ॥  
> परितोषं न गच्छन्ति गुरवो मुनिपुङ्गव ।  
> दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् ॥ २२ ॥

‘मैंने नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया, प्रजाजनोंकी धर्मपूर्वक रक्षा की और शील एवं सदाचारके द्वारा महात्माओं तथा गुरुजनोंको संतुष्ट रखनेका प्रयास किया । इस समय भी मैं यज्ञ करना चाहता था; अतः मेरा यह प्रयत्न धर्मके लिये ही था । मुनिप्रवर ! तो भी मेरे गुरुजन मुझपर संतुष्ट न हो सके । यह देखकर मैं दैवको ही बड़ा मानता हूँ । पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है ॥ २०–२२ ॥

> दैवेनाक्रम्यते सर्वं दैवं हि परमा गतिः ।  
> तस्य मे परमार्तस्य प्रसादमभिकाङ्क्षतः ।  
> कर्तुमर्हसि भद्रं ते दैवोपहतकर्मणः ॥ २३ ॥

‘दैव सबपर आक्रमण करता है । दैव ही सबकी परमगति है । मुने ! मैं अत्यन्त आर्त होकर आपकी कृपा चाहता हूँ। दैवने मेरे पुरुषार्थको दबा दिया है । आपका भला हो । आप मुझपर अवश्य कृपा करें ॥ २३ ॥

> नान्यां गतिं गमिष्यामि नान्यच्छरणमस्ति मे ।  
> दैवं पुरुषकारेण निवर्तयितुमर्हसि ॥ २४ ॥

‘अब मैं आपके सिवा दूसरे किसीकी शरणमें नहीं जाऊँगा । दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला है भी नहीं । आप ही अपने पुरुषार्थसे मेरे दुर्दैवको पलट सकते हैं’ ॥ २४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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