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title: "बालकाण्ड, Sarga 15"
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# बालकाण्ड, Sarga 15

> मेधावी तु ततो ध्यात्वा स किञ्चिदिदमुत्तरम् ।  
> लब्धसंज्ञस्ततस्तं तु वेदज्ञो नृपमब्रवीत् ॥ १ ॥

महात्मा ऋष्यशृङ्ग बड़े मेधावी और वेदोंके ज्ञाता थे । उन्होंने थोड़ी देरतक ध्यान लगाकर अपने भावी कर्तव्यका निश्चय किया । फिर ध्यानसे विरत हो वे राजासे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

> इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात् ।  
> अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रैः सिद्धां विधानतः ॥ २ ॥

‘महाराज ! मैं आपको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये अथर्ववेदके मन्त्रोंसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा । वेदोक्त विधिके अनुसार अनुष्ठान करनेपर वह यज्ञ अवश्य सफल होगा’ ॥ २ ॥

> ततः प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात् ।  
> जुहावाग्नौ च तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ३ ॥

यह कहकर उन तेजस्वी ऋषिने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौतविधिके अनुसार अग्निमें आहुति डाली ॥ ३ ॥

> ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।  
> भागप्रतिग्रहार्थं वै समवेता यथाविधि ॥ ४ ॥

तब देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण विधिके अनुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करनेके लिये उस यज्ञमें एकत्र हुए ॥ ४ ॥

> ताः समेत्य यथान्यायं तस्मिन् सदसि देवताः ।  
> अब्रुवँल्लोककर्तारं ब्रह्माणं वचनं ततः ॥ ५ ॥

उस यज्ञ-सभामें क्रमशः एकत्र होकर ( दूसरोंकी दृष्टिसे अदृश्य रहते हुए ) सब देवता लोककर्ता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले—॥ ५ ॥

> भगवंस्त्वत्प्रसादेन रावणो नाम राक्षसः ।  
> सर्वान् नो बाधते वीर्याच्छासितुं तं न शक्नुमः ॥ ६ ॥

‘भगवन् ! रावण नामक राक्षस आपका कृपाप्रसाद पाकर अपने बलसे हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। हममें इतनी शक्ति नहीं है कि अपने पराक्रमसे उसको दबा सकें ॥ ६ ॥

> त्वया तस्मै वरो दत्तः प्रीतेन भगवंस्तदा ।  
> मानयन्तश्च तं नित्यं सर्वं तस्य क्षमामहे ॥ ७ ॥

‘प्रभो ! आपने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया है । तबसे हमलोग उस वरका सदा समादर करते हुए उसके सारे अपराधोंको सहते चले आ रहे हैं ॥ ७ ॥

> उद्वेजयति लोकांस्त्रीनुच्छ्रितान् द्वेष्टि दुर्मतिः ।  
> शक्रं त्रिदशराजानं प्रधर्षयितुमिच्छति ॥ ८ ॥

‘उसने तीनों लोकोंके प्राणियोंका नाकों दम कर रखा है । वह दुष्टात्मा जिनको कुछ ऊँची स्थितिमें देखता है, उन्हींके साथ द्वेष करने लगता है । देवराज इन्द्रको परास्त करनेकी अभिलाषा रखता है ॥ ८ ॥

> ऋषीन् यक्षान् सगन्धर्वान् ब्राह्मणानसुरांस्तदा ।  
> अतिक्रामति दुर्धर्षो वरदानेन मोहितः ॥९॥

‘आपके वरदानसे मोहित होकर वह इतना उद्दण्ड हो गया है कि ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, असुरों तथा ब्राह्मणोंको पीड़ा देता और उनका अपमान करता फिरता है ॥ ९ ॥

> नैनं सूर्यः प्रतपति पार्श्वे वाति न मारुतः ।  
> चलोर्मिमाली तं दृष्ट्वा समुद्रोऽपि न कम्पते ॥ १० ॥

‘सूर्य उसको ताप नहीं पहुँचा सकते । वायु उसके पास जोरसे नहीं चलती तथा जिसकी उत्ताल तरङ्गें सदा ऊपर-नीचे होती रहती हैं, वह समुद्र भी रावणको देखकर भयके मारे स्तब्ध-सा हो जाता है—उसमें कम्पन नहीं होता ॥ १० ॥

> तन्महन्नो भयं तस्माद् राक्षसाद् घोरदर्शनात् ।  
> वधार्थं तस्य भगवन्नुपायं कर्तुमर्हसि ॥ ११ ॥

‘वह राक्षस देखनेमें भी बड़ा भयंकर है । उससे हमें महान् भय प्राप्त हो रहा है; अतः भगवन् ! उसके वधके लिये आपको कोई-न-कोई उपाय अवश्य करना चाहिये’ ॥११॥

> एवमुक्तः सुरैः सर्वैश्चिन्तयित्वा ततोऽब्रवीत् ।  
> हन्तायं विदितस्तस्य वधोपायो दुरात्मनः ॥ १२ ॥  
> तेन गन्धर्वयक्षाणां देवतानां च रक्षसाम् ।  
> अवध्योऽस्मीति वागुक्ता तथेत्युक्तं च तन्मया ॥ १३ ॥

समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले—‘देवताओ ! लो, उस दुरात्माके वधका उपाय मेरी समझमें आ गया । उसने वर माँगते समय यह बात कही थी कि मैं गन्धर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसोंके हाथसे न मारा जाऊँ । मैंने भी ‘तथास्तु’ कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ १२-१३ ॥

> नाकीर्तयदवज्ञानात् तद् रक्षो मानुषांस्तदा ।  
> तस्मात् स मानुषाद् वध्यो मृत्युर्नान्योऽस्य विद्यते१४

‘मनुष्योंको तो वह तुच्छ समझता था, इसलिये उनके प्रति अवहेलना होनेके कारण उनसे अवध्य होनेका वरदान नहीं माँगा । इसलिये अब मनुष्यके हाथसे ही उसका वध होगा । मनुष्यके सिवा दूसरा कोई उसकी मृत्युका कारण नहीं है’ ॥ १४ ॥

> एतच्छ्रुत्वा प्रियं वाक्यं ब्रह्मणा समुदाहृतम् ।  
> देवा महर्षयः सर्वे प्रहृष्टास्तेऽभवंस्तदा ॥ १५ ॥

ब्रह्माजीकी कही हुई यह प्रिय बात सुनकर उस समय समस्त देवता और महर्षि बड़े प्रसन्न हुए ॥ १५ ॥

> एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युतिः ।  
> शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासा जगत्पतिः ॥ १६ ॥  
> वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदं यथा ।  
> तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः ॥ १७ ॥  
> ब्रह्मणा च समागत्य तत्र तस्थौ समाहितः ।

इसी समय महान् तेजस्वी जगत्पति भगवान् विष्णु भी मेघके ऊपर स्थित हुए सूर्यकी भाँति गरुड़पर सवार हो वहाँ आ पहुँचे । उनके शरीरपर पीताम्बर और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे । उनकी दोनों भुजाओंमें तपाये हुए सुवर्णके बने केयूर प्रकाशित हो रहे थे । उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उनकी वन्दना की और वे ब्रह्माजीसे मिलकर सावधानीके साथ सभामें विराजमान हो गये ॥ १६-१७½ ॥

> तमब्रुवन् सुराः सर्वे समभिष्टूय संनताः ॥ १८ ॥  
> त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया ।  
> राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो ॥ १९ ॥  
> धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः ।  
> अस्य भार्यासु तिसृषु ह्रीश्रीकीर्त्युपमासु च ॥ २० ॥  
> विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम् ।  
> तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम् ॥ २१ ॥  
> अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम् ।

तब समस्त देवताओंने विनीत भावसे उनकी स्तुति करके कहा—‘सर्वव्यापी परमेश्वर ! हम तीनों लोकोंके हितकी कामनासे आपके ऊपर एक महान् कार्यका भार दे रहे हैं ॥ ‘प्रभो ! अयोध्याके राजा दशरथ धर्मज्ञ, उदार तथा महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं । उनके तीन रानियाँ हैं, जो ह्री, श्री और कीर्ति—इन तीन देवियोंके समान हैं । विष्णुदेव ! आप अपने चार स्वरूप बनाकर राजाकी उन तीनों रानियोंके गर्भसे पुत्ररूपमें अवतार ग्रहण कीजिये । इस प्रकार मनुष्यरूपमें प्रकट होकर आप संसारके लिये प्रबल कण्टकरूप रावणको, जो देवताओंके लिये अवध्य है, समरभूमिमें मार डालिये ॥ १९-२१½ ॥

> स हि देवान् सगन्धर्वान् सिद्धांश्च ऋषिसत्तमान् ॥ २२ ॥  
> राक्षसो रावणो मूर्खो वीर्योद्रेकेण बाधते ।  
> ऋषयश्च ततस्तेन गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ २३ ॥  
> क्रीडन्तो नन्दनवने रौद्रेण विनिपातिताः ।

‘वह मूर्ख राक्षस रावण अपने बढ़े हुए पराक्रमसे देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा श्रेष्ठ महर्षियोंको बहुत कष्ट दे रहा है ॥ ‘उस रौद्र निशाचरने ऋषियोंको तथा नन्दनवनमें क्रीड़ा करनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंको भी स्वर्गसे भूमिपर गिरा दिया है ॥ २३½ ॥

> वधार्थं वयमायातास्तस्य वै मुनिभिः सह ॥ २४ ॥  
> सिद्धगन्धर्वयक्षाश्च ततस्त्वां शरणं गताः ।

‘इसलिये मुनियोंसहित हम सब सिद्ध, गन्धर्व यक्ष, तथा देवता उसके वधके लिये आपकी शरणमें आये हैं ॥ २४½ ॥

> त्वं गतिः परमा देव सर्वेषां नः परंतप ॥ २५ ॥  
> वधाय देवशत्रूणां नृणां लोके मनः कुरु ।  
> एवं स्तुतस्तु देवेशो विष्णुस्त्रिदशपुंगवः ॥ २६ ॥  
> पितामहपुरोगांस्तान् सर्वलोकनमस्कृतः ।  
> अब्रवीत् त्रिदशान् सर्वान् समेतान् धर्मसंहितान् ॥ २७ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव ! आप ही हम सब लोगोंकी परमगति हैं, अतः इन देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये आप मनुष्यलोकमें अवतार लेनेका निश्चय कीजिये’ ॥ उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वलोकवन्दित देवप्रवर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने वहाँ एकत्र हुए उन समस्त ब्रह्मा आदि धर्मपरायण देवताओंसे कहा—॥ २६-२७ ॥

> भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थं युधि रावणम् ।  
> सपुत्रपौत्रं सामात्यं समन्त्रिज्ञातिबान्धवम् ॥ २८ ॥  
> हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम् ।  
> दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥ २९ ॥  
> वत्स्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिवीमिमाम् ।

‘देवगण ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम भयको त्याग दो । मैं तुम्हारा हित करनेके लिये रावणको पुत्र, पौत्र, अमात्य, मन्त्री और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्धमें मार डालूँगा । देवताओं तथा ऋषियोंको भय देनेवाले उस क्रूर एवं दुर्धर्ष राक्षसका नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन करता हुआ मनुष्यलोकमें निवास करूँगा’ ॥२८-२९½॥

> एवं दत्त्वा वरं देवो देवानां विष्णुरात्मवान् ॥ ३० ॥  
> मानुष्ये चिन्तयामास जन्मभूमिमथात्मनः ।  
> ततः पद्मपलाशाक्षः कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम् ॥ ३१ ॥  
> पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम् ।

देवताओंको ऐसा वर देकर मनस्वी भगवान् विष्णुने मनुष्यलोकमें पहले अपनी जन्मभूमिके सम्बन्धमें विचार किया ॥ इसके बाद कमलनयन श्रीहरिने अपनेको चार स्वरूपोंमें प्रकट करके राजा दशरथको पिता बनानेका निश्चय किया ॥३१½॥

> ततो देवर्षिगन्धर्वाः सरुद्राः साप्सरोगणाः ।  
> स्तुतिभिर्दिव्यरूपाभिस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३२ ॥

तब देवता, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र तथा अप्सराओंने दिव्य स्तुतियोंके द्वारा भगवान् मधुसूदनका स्तवन किया ॥ ३२ ॥

> तमुद्धतं रावणमुग्रतेजसं  
> प्रवृद्धदर्पं त्रिदशेश्वरद्विषम् ।  
> विरावणं साधुतपस्विकण्टकं  
> तपस्विनामुद्धर तं भयावहम् ॥ ३३ ॥

वे कहने लगे—‘प्रभो ! रावण बड़ा उद्दण्ड है । उसका तेज अत्यन्त उग्र और घमंड बहुत बढ़ा-चढ़ा है । वह देवराज इन्द्रसे सदा द्वेष रखता है । तीनों लोकोंको रुलाता है , साधुओं और तपस्वी जनोंके लिये तो वह बहुत बड़ा कण्टक है; अतः तापसोंको भय देनेवाले उस भयानक राक्षसकी आप जड़ उखाड़ डालिये ॥ ३३ ॥

> तमेव हत्वा सबलं सबान्धवं  
> विरावणं रावणमुग्रपौरुषम् ।  
> स्वर्लोकमागच्छ गतज्वरश्चिरं  
> सुरेन्द्रगुप्तं गतदोषकल्मषम् ॥ ३४ ॥

‘उपेन्द्र ! सारे जगत्को रुलानेवाले उस उग्र पराक्रमी रावणको सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट करके अपनी स्वाभाविक निश्चिन्तताके साथ अपने ही द्वारा सुरक्षित उस चिरन्तन वैकुण्ठधाममें आ जाइये; जिसे राग-द्वेष आदि दोषोंका कलुष कभी छू नहीं पाता है’ ॥ ३४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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