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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 99"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 99

> निविष्टायां तु सेनायामुत्सुको भरतस्ततः ।  
> जगाम भ्रातरं द्रष्टुं शत्रुघ्नमनुदर्शयन् ॥ १ ॥

सेनाके ठहर जानेपर भाईके दर्शनके लिये उत्कण्ठित होकर भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्नको आश्रमके चिह्न दिखाते हुए उसकी ओर चले ॥ १ ॥

> ऋषिं वसिष्ठं संदिश्य मातॄर्मे शीघ्रमानय ।  
> इति त्वरितमग्रे स जगाम गुरुवत्सलः ॥ २ ॥

गुरुभक्त भरत महर्षि वसिष्ठको यह संदेश देकर कि आप मेरी माताओंको साथ लेकर शीघ्र ही आइये, तुरंत आगे बढ़ गये ॥ २ ॥

> सुमन्त्रस्त्वपि शत्रुघ्नमदूरादन्वपद्यत ।  
> रामदर्शनजस्तर्षो भरतस्येव तस्य च ॥ ३ ॥

सुमन्त्र भी शत्रुघ्नके समीप ही पीछे-पीछे चल रहे थे । उन्हें भी भरतके समान ही श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी तीव्र अभिलाषा थी ॥ ३ ॥

> गच्छन्नेवाथ भरतस्तापसालयसंस्थिताम् ।  
> भ्रातुः पर्णकुटीं श्रीमानुटजं च ददर्श ह ॥ ४ ॥

चलते-चलते ही श्रीमान् भरतने तपस्वीजनोंके आश्रमोंके समान प्रतिष्ठित हुई भाईकी पर्णकुटी और झोंपड़ी देखी ॥ ४ ॥

> शालायास्त्वग्रतस्तस्या ददर्श भरतस्तदा ।  
> काष्ठानि चावभग्नानि पुष्पाण्यपचितानि च ॥ ५ ॥

उस पर्णशालाके सामने भरतने उस समय बहुत-से कटे हुए काष्ठके टुकड़े देखे, जो होमके लिये संगृहीत थे । साथ ही वहाँ पूजाके लिये संचित किये हुए फूल भी दृष्टिगोचर हुए ॥ ५ ॥

> स लक्ष्मणस्य रामस्य ददर्शाश्रममीयुषः ।  
> कृतं वृक्षेष्वभिज्ञानं कुशाचोरैः कचित् कचित् ॥ ६ ॥

आश्रमपर आने-जानेवाले श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा निर्मित मार्गबोधक चिह्न भी उन्हें वृक्षोंमें लगे दिखायी दिये, जो कुशों और चीरोंद्वारा तैयार करके कहीं-कहीं वृक्षोंकी शाखाओंमें लटका दिये गये थे ॥ ६ ॥

> ददर्श च वने तस्मिन् महतः संचयान् कृतान् ।  
> मृगाणां महिषाणां च करीषैः शीतकारणात् ॥ ७ ॥

उस वनमें शीत-निवारणके लिये मृगोंकी लेंडी और मैंसोंके सूखे हुए गोबरके ढेर एकत्र करके रखे गये थे, जिन्हें भरतने अपनी आँखों देखा ॥ ७ ॥

> गच्छन्नेव महाबाहुर्द्युतिमान् भरतस्तदा ।  
> शत्रुघ्नं चाब्रवीद्धृष्टस्तानमात्यांश्च सर्वशः ॥ ८ ॥

उस समय चलते-चलते ही परम कान्तिमान् महाबाहु भरतने शत्रुघ्न तथा सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—॥ ८ ॥

> मन्ये प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत् ।  
> नातिदूरे हि मन्येऽहं नदीं मन्दाकिनीमितः ॥ ९ ॥

‘जान पड़ता है कि महर्षि भरद्वाजने जिस स्थानका पता बताया था, वहाँ हमलोग आ गये हैं । मैं समझता हूँ मन्दाकिनी नदी यहाँसे अधिक दूर नहीं है ॥ ९ ॥

> उच्चैर्बद्धानि चीराणि लक्ष्मणेन भवेदयम् ।  
> अभिज्ञानकृतः पन्था विकाले गन्तुमिच्छता ॥ १० ॥

‘वृक्षोंमें ऊँचे बँधे हुए ये चीर दिखायी दे रहे हैं । अतः समय-बेसमय जल आदि लानेके निमित्त बाहर जानेकी इच्छावाले लक्ष्मणने जिसकी पहचानके लिये यह चिह्न बनाया है, वह आश्रमको जानेवाला मार्ग यही हो सकता है ॥ १० ॥

> इतश्चोदात्तदन्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम् ।  
> शैलपार्श्वे परिक्रान्तमन्योन्यमभिगर्जताम् ॥ ११ ॥

‘इधरसे बड़े-बड़े दाँतवाले वेगशाली हाथी निकलकर एक-दूसरेके प्रति गर्जना करते हुए इस पर्वतके पार्श्वभागमें चक्कर लगाते रहते हैं ( अतः उधर जानेसे रोकनेके लिये लक्ष्मणने ये चिह्न बनाये होंगे ) ॥ ११ ॥

> यमेवाधातुमिच्छन्ति तापसाः सततं वने ।  
> तस्यासौ दृश्यते धूमः संकुलः कृष्णवर्त्मनः ॥ १२ ॥

‘वनमें तपस्वी मुनि सदा जिनका आधान करना चाहते हैं, उन अग्निदेवका यह अति सघन धूम दृष्टिगोचर हो रहा है ॥ १२ ॥

> अत्राहं पुरुषव्याघ्रं गुरुसत्कारकारिणम् ।  
> आर्यं द्रक्ष्यामि संहृष्टं महर्षिमिव राघवम् ॥ १३ ॥

‘यहाँ मैं गुरुजनोंका सत्कार करनेवाले पुरुषसिंह आर्य रघुनन्दनका सदा आनन्दमग्न रहनेवाले महर्षिकी भाँति दर्शन करूँगा’ ॥ १३ ॥

> अथ गत्वा मुहूर्तं तु चित्रकूटं स राघवः ।  
> मन्दाकिनीमनु प्राप्तस्तं जनं चेदमब्रवीत् ॥ १४ ॥

तदनन्तर रघुकुलभूषण भरत दो ही घड़ीमें मन्दाकिनीके तटपर विराजमान चित्रकूटके पास जा पहुँचे और अपने साथवाले लोगोंसे इस प्रकार बोले—॥ १४ ॥

> जगत्यां पुरुषव्याघ्र आस्ते वीरासने रतः ।  
> जनेन्द्रो निर्जनं प्राप्य धिङ्मे जन्म सजीवितम् ॥ १५ ॥

‘अहो ! मेरे ही कारण पुरुषसिंह महाराज श्रीरामचन्द्र इस निर्जन वनमें आकर खुली पृथ्वीके ऊपर वीरासनसे बैठते हैं; अतः मेरे जन्म और जीवनको धिक्कार है ॥ १५ ॥

> मत्कृते व्यसनं प्राप्तो लोकनाथो महाद्युतिः ।  
> सर्वान् कामान् परित्यज्य वने वसति राघवः ॥ १६ ॥

‘मेरे ही कारण महातेजस्वी लोकनाथ रघुनाथ भारी संकटमें पड़कर समस्त कामनाओंका परित्याग करके वनमें निवास करते हैं ॥ १६ ॥

> इति लोकसमाक्रुष्टः पादेष्वद्य प्रसादयन् ।  
> रामं तस्य पतिष्यामि सीताया लक्ष्मणस्य च ॥ १७ ॥

‘इसलिये मैं सब लोगोंके द्वारा निन्दित हूँ, अतः मेरे जन्मको धिक्कार है ! आज मैं श्रीरामको प्रसन्न करनेके लिये उनके चरणोंमें गिर जाऊँगा । सीता और लक्ष्मणके भी पैरों पड़ूँगा’ ॥ १७ ॥

> एवं स विलपंस्तस्मिन् वने दशरथात्मजः ।  
> ददर्श महतीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम् ॥ १८ ॥

इस तरह विलाप करते हुए दशरथकुमार भरतने उस वनमें एक बड़ी पर्णशाला देखी, जो परम पवित्र और मनोरम थी ॥ १८ ॥

> सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम् ।  
> विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ॥ १९ ॥

वह शाल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षोंके बहुत-से पत्तोंद्वारा छायी हुई थी; अतः यज्ञशालामें जिसपर कोमल कुश बिछाये गये हों, उस लंबी-चौड़ी वेदीके समान शोभा पा रही थी ॥ १९ ॥

> शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकैर्भारसाधनैः ।  
> रुक्मपृष्ठैर्महासारैः शोभितां शत्रुबाधकैः ॥ २० ॥

वहाँ इन्द्रधनुषके समान बहुत-से धनुष रखे गये थे, जो गुरुतर कार्य-साधनमें समर्थ थे । जिनके पृष्ठभाग सोनेसे मढ़े गये थे और जो बहुत ही प्रबल तथा शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले थे । उनसे उस पर्णकुटीकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २० ॥

> अर्करश्मिप्रतीकाशैर्घोरैस्तूणगतैः शरैः ।  
> शोभितां दीप्तवदनैः सर्पैर्भोगवतीमिव ॥ २१ ॥

वहाँ तरकसोंमें बहुत-से बाण भरे थे, जो सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले और भयङ्कर थे । उन बाणोंसे वह पर्णशाला उसी प्रकार सुशोभित होती थी, जैसे दीप्तिमान् मुखवाले सर्पोंसे भोगवती पुरी शोभित होती है ॥ २१ ॥

> महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम् ।  
> रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम् ॥ २२ ॥

सोनेकी म्यानोंमें रखी हुई दो तलवारें और स्वर्णमय बिन्दुओंसे विभूषित दो विचित्र ढालें भी उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रही थीं ॥ २२ ॥

> गोधाङ्गुलित्रैरासक्तैश्चित्रकाञ्चनभूषितैः ।  
> अरिसंघैरनाधृष्यां मृगैः सिंहगुहामिव ॥ २३ ॥

वहाँ गोहके चमड़ेके बने हुए बहुत-से सुवर्णजटित दस्ताने भी टँगे हुए थे । जैसे मृग सिंहकी गुफापर आक्रमण नहीं कर सकते; उसी प्रकार वह पर्णशाला शत्रुसमूहोंके लिये अगम्य एवं अजेय थी ॥ २३ ॥

> प्रागुदक्प्रवणां वेदिं विशालां दीप्तपावकाम् ।  
> ददर्श भरतस्तत्र पुण्यां रामनिवेशने ॥ २४ ॥

श्रीरामके उस निवासस्थानमें भरतने एक पवित्र एवं विशाल वेदी भी देखी, जो ईशानकोणकी ओर कुछ नीची थी । उसपर अग्नि प्रज्वलित हो रही थी ॥ २४ ॥

> निरीक्ष्य स मुहूर्तं तु ददर्श भरतो गुरुम् ।  
> उटजे राममासीनं जटामण्डलधारिणम् ॥ २५ ॥  
> कृष्णाजिनधरं तं तु चीरवल्कलवाससम् ।  
> ददर्श राममासीनमभितः पावकोपमम् ॥ २६ ॥

पर्णशालाकी ओर थोड़ी देरतक देखकर भरतने कुटियामें बैठे हुए अपने पूजनीय भ्राता श्रीरामको देखा, जो सिरपर जटामण्डल धारण किये हुए थे । उन्होंने अपने अङ्गोंमें कृष्णमृगचर्म तथा चीर एवं वल्कल वस्त्र धारण कर रखे थे । भरतको दिखायी दिया कि श्रीराम पास ही बैठे हैं और प्रज्वलित अग्निके समान अपनी दिव्य प्रभा फैला रहे हैं ॥ २५-२६ ॥

> सिंहस्कन्धं महाबाहुं पुण्डरीकनिभेक्षणम् ।  
> पृथिव्याः सागरान्ताया भर्तारं धर्मचारिणम् ॥ २७ ॥  
> उपविष्टं महाबाहुं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ।  
> स्थण्डिले दर्भसंस्तीर्णे सीतया लक्ष्मणेन च ॥ २८ ॥

समुद्रपर्यन्त पृथ्वीके स्वामी, धर्मात्मा, महाबाहु श्रीराम सनातन ब्रह्माकी भाँति कुश बिछी हुई वेदीपर बैठे थे । उनके कंधे सिंहके समान, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान थे । उस वेदीपर वे सीता और लक्ष्मणके साथ विराजमान थे ॥ २७-२८ ॥

> तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमाञ्शोकमोहपरिप्लुतः ।  
> अभ्यधावत धर्मात्मा भरतः केकयीसुतः ॥ २९ ॥

उन्हें इस अवस्थामें देख धर्मात्मा श्रीमान् कैकेयीकुमार भरत शोक और मोहमें डूब गये तथा बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े ॥ २९ ॥

> दृष्ट्वैव विललापार्तो बाष्पसंदिग्धया गिरा ।  
> अशक्नुवन् वारयितुं धैर्याद् वचनमब्रुवन् ॥ ३० ॥

भाईकी ओर दृष्टि पड़ते ही भरत आर्तभावसे विलाप करने लगे । वे अपने शोकके आवेगको धैर्यसे रोक न सके और आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले—॥ ३० ॥

> यः संसदि प्रकृतिभिर्भवेद् युक्त उपासितुम् ।  
> वन्यैर्मृगैरुपासीनः सोऽयमास्ते ममाग्रजः ॥ ३१ ॥

‘हाय ! जो राजसभामें बैठकर प्रजा और मन्त्रिवर्गके द्वारा सेवा तथा सम्मान पानेके योग्य हैं, वे ही ये मेरे बड़े भ्राता श्रीराम यहाँ जंगली पशुओंसे घिरे हुए बैठे हैं ॥ ३१ ॥

> वासोभिर्बहुसाहस्रैर्यो महात्मा पुरोचितः ।  
> मृगाजिने सोऽयमिह प्रवस्ते धर्ममाचरन् ॥ ३२ ॥

‘जो महात्मा पहले कई सहस्र वस्त्रोंका उपयोग करते थे, वे अब धर्माचरण करते हुए यहाँ केवल दो मृगचर्म धारण करते हैं ॥ ३२ ॥

> अधारयद् यो विविधाश्चित्राः सुमनसः सदा ।  
> सोऽयं जटाभारमिमं सहते राघवः कथम् ॥ ३३ ॥

‘जो सदा नाना प्रकारके विचित्र फूलोंको अपने सिरपर धारण करते थे, वे ही ये श्रीरघुनाथजी इस समय इस जटाभारको कैसे सहन करते हैं ? ॥ ३३ ॥

> यस्य यज्ञैर्यथादिष्टैर्युक्तो धर्मस्य संचयः ।  
> शरीरक्लेशसम्भूतं स धर्मं परिमार्गते ॥ ३४ ॥

‘जिनके लिये शास्त्रोक्त यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा धर्मका संग्रह करना उचित है, वे इस समय शरीरको कष्ट देनेसे प्राप्त होनेवाले धर्मका अनुसंधान कर रहे हैं ॥ ३४ ॥

> चन्दनेन महार्हेण यस्याङ्गमुपसेवितम् ।  
> मलेन तस्याङ्गमिदं कथमार्यस्य सेव्यते ॥ ३५ ॥

‘जिनके अङ्गोंकी बहुमूल्य चन्दनसे सेवा होती थी, उन्हीं मेरे पूज्य भ्राताका यह शरीर कैसे मलसे सेवित हो रहा है ॥ ३५ ॥

> मन्निमित्तमिदं दुःखं प्राप्तो रामः सुखोचितः ।  
> धिग्जीवितं नृशंसस्य मम लोकविगर्हितम् ॥ ३६ ॥

‘हाय ! जो सर्वथा सुख भोगनेके योग्य हैं, वे श्रीराम मेरे ही कारण ऐसे दुःखमें पड़ गये हैं । ओह ! मैं कितना क्रूर हूँ ? मेरे इस लोकनिन्दित जीवनको धिक्कार है !’ ॥ ३६ ॥

> इत्येवं विलपन् दीनः प्रस्विन्नमुखपङ्कजः ।  
> पादावप्राप्य रामस्य पपात भरतो रुदन् ॥ ३७ ॥

इस प्रकार विलाप करते-करते भरत अत्यन्त दुखी हो गये । उनके मुखारविन्दपर पसीनेकी बूँदें दिखायी देने लगीं । वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंतक पहुँचनेके पहले ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३७ ॥

> दुःखाभितप्तो भरतो राजपुत्रो महाबलः ।  
> उक्त्वाऽऽर्येति सकृद् दीनं पुनर्नोवाच किंचन ॥ ३८ ॥

अत्यन्त दुःखसे संतप्त होकर महाबली राजकुमार भरतने एक बार दीनवाणीमें ‘आर्य’ कहकर पुकारा । फिर वे कुछ न बोल सके ॥ ३८ ॥

> बाष्पैः पिहितकण्ठश्च प्रेक्ष्य रामं यशस्विनम् ।  
> आर्येत्येवाभिसंकृत्य व्याहर्तुं नाशकत् ततः ॥ ३९ ॥

आँसुओंसे उनका गला रुँध गया था । यशस्वी श्रीरामकी ओर देख वे ‘हा ! आर्य’ कहकर चीख उठे । इससे आगे उनसे कुछ बोला न जा सका ॥ ३९ ॥

> शत्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदन् ।  
> तावुभौ च समालिङ्ग्य रामोऽप्यश्रूण्यवर्तयत् ॥ ४० ॥

फिर शत्रुघ्नने भी रोते-रोते श्रीरामके चरणोंमें प्रणाम किया । श्रीरामने उन दोनोंको उठाकर छातीसे लगा लिया । फिर वे भी नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाने लगे ॥ ४० ॥

> ततः सुमन्त्रेण गुहेन चैव  
> समीयतू राजसुतावरण्ये ।  
> दिवाकरश्चैव निशाकरश्च  
> यथाम्बरे शुक्रबृहस्पतिभ्याम् ॥ ४१ ॥

तत्पश्चात् राजकुमार श्रीराम तथा लक्ष्मण उस वनमें सुमन्त्र और निषादराज गुहसे मिले, मानो आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा, शुक्र और बृहस्पतिसे मिल रहे हों ॥४१॥

> तान् पार्थिवान् वारणयूथपाहान्  
> समागतांस्तत्र महत्यरण्ये ।  
> वनौकसस्तेऽभिसमीक्ष्य सर्वे  
> त्वश्रूण्यमुञ्चन् प्रविहाय हर्षम् ॥ ४२ ॥

‘यूथपति गजराजपर बैठकर यात्रा करनेयोग्य उन समस्त वनवासी हर्ष छोड़कर शोकके आँसू बहाने चारों राजकुमारोंको उस विशाल वनमें आया देख लगे ॥ ४२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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