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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 97"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 97

> सुसंरब्धं तु भरतं लक्ष्मणं क्रोधमूर्च्छितम् ।  
> रामस्तु परिसान्त्व्याथ वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥

लक्ष्मण भरतके प्रति रोषावेशके कारण क्रोधवश अपना विवेक खो बैठे थे, उस अवस्थामें श्रीरामने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

> किमत्र धनुषा कार्यमसिना वा सचर्मणा ।  
> महाबले महोत्साहे भरते स्वयमागते ॥ २ ॥

‘लक्ष्मण ! महाबली और महान् उत्साही भरत जब स्वयं यहाँ आ गये हैं, तब इस समय यहाँ धनुष अथवा ढाल-तलवारसे क्या काम है ? ॥ २ ॥

> पितुः सत्यं प्रतिश्रुत्य हत्वा भरतमाहवे ।  
> किं करिष्यामि राज्येन सापवादेन लक्ष्मण ॥ ३ ॥

‘लक्ष्मण ! पिताके सत्यकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा करके यदि मैं युद्धमें भरतको मारकर उनका राज्य छीन लूँ तो संसारमें मेरी कितनी निन्दा होगी, फिर उस कलंकित राज्यको लेकर मैं क्या करूँगा ? ॥ ३ ॥

> यद् द्रव्यं बान्धवानां वा मित्राणां वा क्षये भवेत् ।  
> नाहं तत् प्रतिगृह्णीयां भक्ष्यान् विषकृतानिव ॥ ४ ॥

‘अपने बन्धु-बान्धवों या मित्रोंका विनाश करके जिस धनकी प्राप्ति होती हो, वह तो विषमिश्रित भोजनके समान सर्वथा त्याग देने योग्य है; उसे मैं कदापि ग्रहण नहीं करूँगा ॥ ४ ॥

> धर्ममर्थं च कामं च पृथिवीं चापि लक्ष्मण ।  
> इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिशृणोमि ते ॥ ५ ॥

‘लक्ष्मण ! मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि—धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वीका राज्य भी मैं तुम्हीं लोगोंके लिये चाहता हूँ ॥ ५ ॥

> भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण ।  
> राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे ॥ ६ ॥

‘सुमित्राकुमार ! मैं भाइयोंके संग्रह और सुखके लिये ही राज्यकी भी इच्छा करता हूँ और इस बातकी सच्चाईके लिये मैं अपना धनुष छूकर शपथ खाता हूँ ॥ ६ ॥

> नेयं मम मही सौम्य दुर्लभा सागराम्बरा ।  
> नहीच्छेयमधर्मेण शक्रत्वमपि लक्ष्मण ॥ ७ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण ! समुद्रसे घिरी हुई यह पृथिवी मेरे लिये दुर्लभ नहीं है, परंतु मैं अधर्मसे इन्द्रका पद पानेकी भी इच्छा नहीं कर सकता ॥ ७ ॥

> यद् विना भरतं त्वां च शत्रुघ्नं वापि मानद ।  
> भवेन्मम सुखं किंचिद् भस्म तत् कुरुतां शिखी ॥ ८ ॥

‘मानद ! भरतको, तुमको और शत्रुघ्नको छोड़कर यदि मुझे कोई सुख मिलता हो तो उसे अग्निदेव जलाकर भस्म कर डालें ॥ ८ ॥

> मन्येऽहमागतोऽयोध्यां भरतो भ्रातृवत्सलः ।  
> मम प्राणैः प्रियतरः कुलधर्ममनुस्मरन् ॥ ९ ॥  
> श्रुत्वा प्रव्राजितं मां हि जटावल्कलधारिणम् ।  
> जानक्या सहितं वीर त्वया च पुरुषोत्तम ॥ १० ॥  
> स्नेहेनाक्रान्तहृदयः शोकेनाकुलितेन्द्रियः ।  
> द्रष्टुमभ्यागतो ह्येष भरतो नान्यथाऽऽगतः ॥ ११ ॥

‘वीर ! पुरुषप्रवर ! भरत बड़े भ्रातृभक्त हैं। वे मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, भरतने अयोध्यामें आनेपर जब सुना है कि मैं तुम्हारे और जानकीके साथ जटा-वल्कल धारण करके वनमें आ गया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी हैं और वे कुलधर्मका विचार करके स्नेहयुक्त हृदयसे हम लोगोंसे मिलने आये हैं। इन भरतके आगमनका इसके सिवा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं हो सकता ॥ ९–११ ॥

> अम्बां च केकयीं रुष्य भरतश्चाप्रियं वदन् ।  
> प्रसाद्य पितरं श्रीमान् राज्यं मे दातुमागतः ॥ १२ ॥

‘माता कैकेयीके प्रति कुपित हो, उन्हें कठोर वचन सुनाकर और पिताजीको प्रसन्न करके श्रीमान् भरत मुझे राज्य देनेके लिये आये हैं ॥ १२ ॥

> प्राप्तकालं यथैवोऽस्मान् भरतो द्रष्टुमर्हति ।  
> अस्मासु मनसाप्येष नाहितं किंचिदाचरेत् ॥ १३ ॥

‘भरतका हमलोगोंसे मिलनेके लिये आना सर्वथा समयोचित है। वे हमसे मिलनेके योग्य हैं। हमलोगोंका कोई अहित करनेका विचार तो वे कभी मनमें भी नहीं ला सकते ॥ १३ ॥

> विप्रियं कृतपूर्वं ते भरतेन कदा नु किम् ।  
> ईदृशं वा भयं तेऽद्य भरतं यद् विशङ्कसे ॥ १४ ॥

‘भरतने तुम्हारे प्रति पहले कब कौन-सा अप्रिय बर्ताव किया है, जिससे आज तुम्हें उनसे ऐसा भय लग रहा है और तुम उनके विषयमें इस तरहकी आशङ्का कर रहे हो ? ॥ १४ ॥

> नहि ते निष्ठुरं वाच्यो भरतो नाप्रियं वचः ।  
> अहं ह्यप्रियमुक्तः स्यां भरतस्याप्रिये कृते ॥ १५ ॥

‘भरतके आनेपर तुम उनसे कोई कठोर या अप्रिय वचन न बोलना । यदि तुमने उनसे कोई प्रतिकूल बात कही तो वह मेरे ही प्रति कही हुई समझी जायगी ॥ १५ ॥

> कथं नु पुत्राः पितरं हन्युः कस्यांचिदापदि ।  
> भ्राता वा भ्रातरं हन्यात् सौमित्रे प्राणमात्मनः ॥ १६ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! कितनी ही बड़ी आपत्ति क्यों न आ जाय, पुत्र अपने पिताको कैसे मार सकते हैं ? अथवा भाई अपने प्राणोंके समान प्रिय भाईकी हत्या कैसे कर सकता है ? ॥ १६ ॥

> यदि राज्यस्य हेतोस्त्वमिमां वाचं प्रभाषसे ।  
> वक्ष्यामि भरतं दृष्ट्वा राज्यमस्मै प्रदीयताम् ॥ १७ ॥

‘यदि तुम राज्यके लिये ऐसी कठोर बात कहते हो तो मैं भरतसे मिलनेपर उन्हें कह दूँगा कि तुम यह राज्य लक्ष्मणको दे दो ॥ १७ ॥

> उच्यमानो हि भरतो मया लक्ष्मण तद्वचः ।  
> राज्यमस्मै प्रयच्छेति बाढमित्येव मंस्यते ॥ १८ ॥

‘लक्ष्मण ! यदि मैं भरतसे यह कहूँ कि ‘तुम राज्य इन्हें दे दो’ तो वे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अवश्य मेरी बात मान लेंगे’ ॥ १८ ॥

> तथोक्तो धर्मशीलेन भ्रात्रा तस्य हिते रतः ।  
> लक्ष्मणः प्रविवेशेव स्वानि गात्राणि लज्जया ॥ १९ ॥

अपने धर्मपरायण भाईके ऐसा कहनेपर उन्हींके हितमें तत्पर रहनेवाले लक्ष्मण लज्जावश मानो अपने अङ्गोंमें ही समा गये—लाजसे गड़ गये ॥ १९ ॥

> तद्वाक्यं लक्ष्मणः श्रुत्वा व्रीडितः प्रत्युवाच ह ।  
> त्वां मन्ये द्रष्टुमायातः पिता दशरथः स्वयम् ॥ २० ॥

श्रीरामका पूर्वोक्त वचन सुनकर लज्जित हुए लक्ष्मणने कहा—‘भैया ! मैं समझता हूँ, हमारे पिता महाराज दशरथ स्वयं ही आपसे मिलने आये हैं’ ॥ २० ॥

> व्रीडितं लक्ष्मणं दृष्ट्वा राघवः प्रत्युवाच ह ।  
> एष मन्ये महाबाहुरिहास्मान् द्रष्टुमागतः ॥ २१ ॥

लक्ष्मणको लज्जित हुआ देख श्रीरामने उत्तर दिया—‘मैं भी ऐसा ही मानता हूँ कि हमारे महाबाहु पिताजी ही हमलोगोंसे मिलने आये हैं ॥ २१॥

> अथवा नौ ध्रुवं मन्ये मन्यमानः सुखोचितौ ।  
> वनवासमनुध्याय गृहाय प्रतिनेष्यति ॥ २२ ॥

‘अथवा मैं ऐसा समझता हूँ कि हमें सुख भोगनेके योग्य मानते हुए पिताजी वनवासके कष्टका विचार करके हम दोनोंको निश्चय ही घर लौटा ले जायँगे ॥ २२ ॥

> इमां चाप्येष वैदेहीमत्यन्तसुखसेविनीम् ।  
> पिता मे राघवः श्रीमान् वनादादाय यास्यति ॥ २३ ॥

‘मेरे पिता रघुकुलतिलक श्रीमान् महाराज दशरथ अत्यन्त सुखका सेवन करनेवाली इन विदेहराजनन्दिनी सीताको भी वनसे साथ लेकर ही घरको लौटेंगे ॥ २३ ॥

> एतौ तौ सम्प्रकाशेते गोत्रवन्तौ मनोरमौ ।  
> वायुवेगसमौ वीरौ जवनौ तुरगोत्तमौ ॥ २४ ॥

‘अच्छे घोड़ोंके कुलमें उत्पन्न हुए ये ही वे दोनों वायुके समान वेगशाली, शीघ्रगामी, वीर एवं मनोरम अपने उत्तम घोड़े चमक रहे हैं ॥ २४ ॥

> स एष सुमहाकायः कम्पते वाहिनीमुखे ।  
> नागः शत्रुंजयो नाम वृद्धस्तातस्य धीमतः ॥ २५ ॥

‘परम बुद्धिमान् पिताजीकी सवारीमें रहनेवाला यह वही विशालकाय शत्रुंजय नामक बूढ़ा गजराज है, जो सेनाके मुहानेपर झूमता हुआ चल रहा है ॥ २५ ॥

> न तु पश्यामि तच्छत्रं पाण्डुरं लोकविश्रुतम् ।  
> पितुर्दिव्यं महाभाग संशयो भवतीह मे ॥ २६ ॥

‘महाभाग ! परंतु इसके ऊपर पिताजीका वह विश्वविख्यात दिव्य श्वेतछत्र मुझे नहीं दिखायी देता है—इससे मेरे मनमें संशय उत्पन्न होता है ॥ २६ ॥

> वृक्षाग्रादवरोह त्वं कुरु लक्ष्मण मद्वचः ।  
> इतीव रामो धर्मात्मा सौमित्रिं तमुवाच ह ॥ २७ ॥  
> अवतीर्य तु सालाग्रात् तस्मात् स समितिंजयः ।  
> लक्ष्मणः प्राञ्जलिर्भूत्वा तस्थौ रामस्य पार्श्वतः ॥ २८ ॥

‘लक्ष्मण ! अब मेरी बात मानो और पेड़से नीचे उतर आओ।’ धर्मात्मा श्रीरामने सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे जब ऐसी बात कही, तब युद्धमें विजय पानेवाले लक्ष्मण उस शाल वृक्षके अग्रभागसे उतरे और श्रीरामके पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ २७-२८ ॥

> भरतेनाथ संदिष्टा सम्मर्दो न भवेदिति ।  
> समन्तात् तस्य शैलस्य सेना वासमकल्पयत् ॥ २९ ॥

उधर भरतने सेनाको आज्ञा दी कि ‘यहाँ किसीको हमलोगोंके द्वारा बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये।’ उनका यह आदेश पाकर समस्त सैनिक पर्वतके चारों ओर नीचे ही ठहर गये ॥ २९ ॥

> अध्यर्धमिक्ष्वाकुचमूर्योजनं पर्वतस्य ह ।  
> पार्श्वे न्यविशदावृत्य गजवाजिनराकुला ॥ ३० ॥

उस समय हाथी, घोड़े और मनुष्योंसे भरी हुई इक्ष्वाकुवंशी नरेशकी वह सेना पर्वतके आस-पासकी डेढ़ योजन (छः कोस) भूमि घेरकर पड़ाव डाले हुए थी ॥ ३० ॥

> सा चित्रकूटे भरतेन सेना  
> धर्मं पुरस्कृत्य विधूय दर्पम् ।  
> प्रसादनार्थं रघुनन्दनस्य  
> विरोचते नीतिमता प्रणीता ॥ ३१ ॥

नीतिज्ञ भरत धर्मको सामने रखते हुए गर्वको त्यागकर रघुकुलनन्दन श्रीरामको प्रसन्न करनेके लिये जिसे अपने साथ ले आये थे, वह सेना चित्रकूट पर्वतके समीप बड़ी शोभा पा रही थी ॥ ३१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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