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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 87"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 87

> गुहस्य वचनं श्रुत्वा भरतो भृशमप्रियम् ।  
> ध्यानं जगाम तत्रैव यत्र तच्छ्रुतमप्रियम् ॥ १ ॥

गुहका श्रीरामके जटाधारण आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये । जिन श्रीरामके विषयमें उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हींका वे चिन्तन करने लगे ( उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा । श्रीरामने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें ) ॥ १ ॥

> सुकुमारो महासत्त्वः सिंहस्कन्धो महाभुजः ।  
> पुण्डरीकविशालाक्षस्तरुणः प्रियदर्शनः ॥ २ ॥  
> प्रत्याश्वस्य मुहूर्तं तु कालं परमदुर्मनाः ।  
> ससाद सहसा तोत्रैर्हृदि विद्ध इव द्विपः ॥ ३ ॥

भरत सुकुमार होनेके साथ ही महान् बलशाली थे, उनके कंधे सिंहके समान थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे । उनकी अवस्था तरुण थी और वे देखनेमें बड़े मनोरम थे । उन्होंने गुहकी बात सुनकर दो घड़ीतक किसी प्रकार धैर्य धारण किया, फिर उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ । वे अंकुशसे विद्ध हुए हाथीके समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दुःखसे शिथिल एवं मूर्च्छित हो गये ॥ २-३ ॥

> भरतं मूर्च्छितं दृष्ट्वा विवर्णवदनो गुहः ।  
> बभूव व्यथितस्तत्र भूमिकम्पे यथा द्रुमः ॥ ४ ॥

भरतको मूर्च्छित हुआ देख गुहके चेहरेका रंग उड़ गया । वह भूकम्पके समय मथित हुए वृक्षकी भाँति वहाँ व्यथित हो उठा ॥ ४ ॥

> तदवस्थं तु भरतं शत्रुघ्नोऽनन्तरस्थितः ।  
> परिष्वज्य रुरोदोच्चैर्विसंज्ञः शोककर्शितः ॥ ५ ॥

शत्रुघ्न भरतके पास ही बैठे थे । वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदयसे लगाकर जोर-जोरसे रोने लगे और शोकसे पीड़ित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे ॥ ५ ॥

> ततः सर्वाः समापेतुर्मातरो भरतस्य ताः ।  
> उपवासकृशा दीना भर्तृव्यसनकर्शिताः ॥ ६ ॥

तदनन्तर भरतकी सभी माताएँ वहाँ आ पहुँचीं । वे पतिवियोगके दुःखसे दुखी, उपवास करनेके कारण दुर्बल और दीन हो रही थीं ॥ ६ ॥

> ताश्च तं पतितं भूमौ रुदत्यः पर्यवारयन् ।  
> कौसल्या त्वनुसृत्यैनं दुर्मनाः परिषस्वजे ॥ ७ ॥

भूमिपर पड़े हुए भरतको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया और सब-की-सब रोने लगीं । कौसल्याका हृदय तो दुःखसे और भी कातर हो उठा । उन्होंने भरतके पास जाकर उन्हें अपनी गोदमें चिपका लिया ॥ ७ ॥

> वत्सला स्वं यथा वत्समुपगुह्य तपस्विनी ।  
> परिपप्रच्छ भरतं रुदती शोकलालसा ॥ ८ ॥

जैसे वत्सला गौ अपने बछड़ेको गलेसे लगाकर चाटती है, उसी तरह शोकसे व्याकुल हुई तपस्विनी कौसल्याने भरतको गोदमें लेकर रोते-रोते पूछा—॥ ८ ॥

> पुत्र व्याधिर्न ते कच्चिच्छरीरं प्रति बाधते ।  
> अस्य राजकुलस्याद्य त्वदधीनं हि जीवितम् ॥ ९ ॥  
> त्वां दृष्ट्वा पुत्र जीवामि रामे सभ्रातृके गते ।  
> वृत्ते दशरथे राज्ञि नाथ एकस्त्वमद्य नः ॥ १० ॥

‘बेटा ! तुम्हारे शरीरको कोई रोग तो कष्ट नहीं पहुँचा रहा है ? अब इस राजवंशका जीवन तुम्हारे ही अधीन है ॥ ‘वत्स ! मैं तुम्हींको देखकर जी रही हूँ । श्रीराम लक्ष्मणके साथ वनमें चले गये और महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गये; अब एकमात्र तुम्हीं हमलोगोंके रक्षक हो ॥ १० ॥

> कच्चिन्न लक्ष्मणे पुत्र श्रुतं ते किंचिदप्रियम् ।  
> पुत्रे वा शोकपुत्रायाः सहभार्ये वनं गते ॥ ११ ॥

‘बेटा ! सच बताओ, तुमने लक्ष्मणके सम्बन्धमें अथवा मुझ एक ही पुत्रवाली माके बेटे वनमें सीतासहित गये हुए श्रीरामके विषयमें कोई अप्रिय बात तो नहीं सुनी है ?’ ॥ ११ ॥

> स मुहूर्तं समाश्वस्य रुदन्नेव महायशाः ।  
> कौसल्यां परिसान्त्व्येदं गुहं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥

दो ही घड़ीमें जब महायशस्वी भरतका चित्त स्वस्थ हुआ, तब उन्होंने रोते-रोते ही कौसल्याको सान्त्वना दी ( और कहा— ‘मा ! घबराओ मत, मैंने कोई अप्रिय बात नहीं सुनी है ) । फिर निषादराज गुहसे इस प्रकार पूछा—॥ १२ ॥

> भ्राता मे क्वावसद् रात्रौ क्व सीता क्व च लक्ष्मणः ।  
> अस्वपच्छयने कस्मिन् किं भुक्त्वा गुह शंस मे ॥ १३ ॥

‘गुह ! उस दिन रातमें मेरे भाई श्रीराम कहाँ ठहरे थे ? सीता कहाँ थीं ? और लक्ष्मण कहाँ रहे ? उन्होंने क्या भोजन करके कैसे बिछौनेपर शयन किया था ? ये सब बातें मुझे बताओ’ ॥ १३ ॥

> सोऽब्रवीद् भरतं हृष्टो निषादाधिपतिर्गुहः ।  
> यद्विधं प्रतिपेदे च रामे प्रियहितेऽतिथौ ॥ १४ ॥

ये प्रश्न सुनकर निषादराज गुह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपने प्रिय एवं हितकारी अतिथि श्रीरामके आनेपर उनके प्रति जैसा बर्ताव किया था, वह सब बताते हुए भरतसे कहा—॥ १४ ॥

> अन्नमुच्चावचं भक्ष्याः फलानि विविधानि च ।  
> रामायाभ्यवहारार्थं बहुशोऽपहृतं मया ॥ १५ ॥

‘मैंने भाँति-भाँतिके अन्न, अनेक प्रकारके खाद्य-पदार्थ और कई तरहके फल श्रीरामचन्द्रजीके पास भोजनके लिये प्रचुर मात्रामें पहुँचाये ॥ १५ ॥

> तत् सर्वं प्रत्यनुज्ञासीद् रामः सत्यपराक्रमः ।  
> न हि तत् प्रत्यगृह्णात् स क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ १६ ॥

‘सत्यपराक्रमी श्रीरामने मेरी दी हुई सब वस्तुएँ स्वीकार तो कीं; किंतु क्षत्रियधर्मका स्मरण करते हुए उनको ग्रहण नहीं किया—मुझे आदरपूर्वक लौटा दिया ॥ १६ ॥

> नह्यस्माभिः प्रतिग्राह्यं सखे देयं तु सर्वदा।  
> इति तेन वयं सर्वे अनुनीता महात्मना ॥ १७ ॥

‘फिर उन महात्माने हम सब लोगोंको समझाते हुए कहा—‘सखे ! हम-जैसे क्षत्रियोंको किसीसे कुछ लेना नहीं चाहिये; अपितु सदा देना ही चाहिये’ ॥ १७ ॥

> लक्ष्मणेन यदानीतं पीतं वारि महात्मना।  
> औपवास्यं तदाकार्षीद् राघवः सह सीतया ॥१८॥

‘सीतासहित श्रीरामने उस रातमें उपवास ही किया। लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उसीको उन महात्माने पीया ॥ १८ ॥

> ततस्तु जलशेषेण लक्ष्मणोऽप्यकरोत् तदा।  
> वाग्यतास्ते त्रयः संध्यां समुपासन्त संहिताः ॥ १९ ॥

‘उनके पीनेसे बचा हुआ जल लक्ष्मणने ग्रहण किया। ( जलपानके पहले ) उन तीनोंने मौन एवं एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना की थी ॥ १९ ॥

> सौमित्रिस्तु ततः पश्चादकरोत् स्वास्तरं शुभम्।  
> स्वयमानीय बर्हींषि क्षिप्रं राघवकारणात् ॥ २० ॥

‘तदनन्तर लक्ष्मणने स्वयं कुश लाकर श्रीरामचन्द्रजीके लिये शीघ्र ही सुन्दर बिछौना बिछाया ॥ २० ॥

> तस्मिन् समाविशद् रामः स्वास्तरे सह सीतया।  
> प्रक्षाल्य च तयोः पादौ व्यपाक्रामत् सलक्ष्मणः ॥ २१ ॥

‘उस सुन्दर बिस्तरपर जब सीताके साथ श्रीराम विराजमान हुए, तब लक्ष्मण उन दोनोंके चरण पखारकर वहाँसे दूर हट आये ॥ २१ ॥

> एतत् तदिङ्गुदीमूलमिदमेव च तत् तृणम्।  
> यस्मिन् रामश्च सीता च रात्रिं तां शयितावुभौ ॥ २२ ॥  
> नियम्य पृष्ठे तु तलाङ्गुलित्रवाञ्-  
> शरैः सुपूर्णाविषुधी परंतपः।  
> महद्धनुः सज्जमुपोह्य लक्ष्मणो  
> निशामतिष्ठत् परितोऽस्य केवलम् ॥२३॥

‘यही वह इङ्गुदी वृक्षकी जड़ है और यही वह तृण है, जहाँ श्रीराम और सीता—दोनोंने रात्रिमें शयन किया था ॥ ‘शत्रुसंतापी लक्ष्मण अपनी पीठपर बाणोंसे भरे दो तरकस बाँधे, दोनों हाथोंकी अंगुलियोंमें दस्ताने पहने और महान् धनुष चढ़ाये श्रीरामके चारों ओर घूमकर केवल पहरा देते हुए रातभर खड़े रहे ॥ २३ ॥

> ततस्त्वहं चोत्तमबाणचापभृत्  
> स्थितोऽभवं तत्र स यत्र लक्ष्मणः।  
> अतन्द्रितैर्ज्ञातिभिरात्तकार्मुकै-  
> र्महेन्द्रकल्पं परिपालयंस्तदा ॥ २४ ॥

‘तदनन्तर मैं भी उत्तम बाण और धनुष लेकर वहीं आ खड़ा हुआ, जहाँ लक्ष्मण थे। उस समय अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ, जो निद्रा और आलस्यका त्याग करके धनुष-बाण लिये सदा सावधान रहे, मैं देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी श्रीरामकी रक्षा करता रहा’ ॥ २४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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