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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 81"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 81

> ततो नान्दीमुखीं रात्रि भरतं सूतमागधाः ।  
> तुष्टुवुः सविशेषज्ञाः स्तवैर्मङ्गलसंस्तवैः ॥ १ ॥  
> सुवर्णकोणाभिहतः प्राणदद्यामदुन्दुभिः ।  
> दध्मुः शङ्खांश्च शतशो वाद्यांश्चोच्चावचस्वरान् ॥ २ ॥

इधर अयोध्यामें उस अभ्युदयसूचक रात्रिका थोड़ा-सा ही भाग अवशिष्ट देख स्तुति-कलाके विशेषज्ञ सूत और मागधोंने मङ्गलमयी स्तुतियोंद्वारा भरतका स्तवन आरम्भ किया ॥ प्रहरकी समाप्तिको सूचित करनेवाली दुन्दुभि सोनेके डंडेसे आहत होकर बज उठी। बाजे बजानेवालोंने शङ्ख तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकारके सैकड़ों बाजे बजाये ॥ २ ॥

> स तूर्यघोषः सुमहान् दिवमापूरयन्निव ।  
> भरतं शोकसंतप्तं भूयः शोकैररन्धयत् ॥ ३ ॥

वाद्योंका वह महान् तुमुल घोष समस्त आकाशको व्याप्त करता हुआ-सा गूँज उठा और शोकसंतप्त भरतको पुनः शोकाग्निकी आँचसे राँधने लगा ॥ ३ ॥

> ततः प्रबुद्धो भरतस्तं घोषं संनिवर्त्य च ।  
> नाहं राजेति चोक्त्वा तं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत् ॥ ४ ॥  
> पश्य शत्रुघ्न कैकेय्या लोकस्यापकृतं महत् ।  
> विसृज्य मयि दुःखानि राजा दशरथो गतः ॥ ५ ॥

वाद्योंकी उस ध्वनिसे भरतकी नींद खुल गयी; वे जाग उठे और ‘मैं राजा नहीं हूँ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन बाजों-का बजना बंद करा दिया ! तत्पश्चात् वे शत्रुघ्नसे बोले—॥ ‘शत्रुघ्न ! देखो तो सही, कैकेयीने जगत्का कितना महान् अपकार किया है । महाराज दशरथ मुझपर बहुत-से दुःखोंका बोझ डालकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ५ ॥

> तस्यैषा धर्मराजस्य धर्ममूला महात्मनः ।  
> परिभ्रमति राजश्रीनौरिवाकर्णिका जले ॥ ६ ॥

‘आज उन धर्मराज महामना नरेशकी यह धर्ममूला राजलक्ष्मी जलमें पड़ी हुई बिना नाविककी नौकाके समान इधर-उधर डगमगा रही है ॥ ६ ॥

> यो हि नः सुमहान् नाथः सोऽपि प्रव्राजितो वने ।  
> अनया धर्ममुत्सृज्य मात्रा मे राघवः स्वयम् ॥ ७ ॥

‘जो हमलोगोंके सबसे बड़े स्वामी और संरक्षक हैं, उन श्रीरघुनाथजीको भी स्वयं मेरी इस माताने धर्मको तिलाञ्जलि देकर वनमें भेज दिया’ ॥ ७ ॥

> इत्येवं भरतं वीक्ष्य विलपन्तमचेतनम् ।  
> कृपणा रुरुदुः सर्वाः सुस्वरं योषितस्तदा ॥ ८ ॥

उस समय भरतको इस प्रकार अचेत हो-होकर विलाप करते देख रनिवासकी सारी स्त्रियाँ दीनभावसे फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ ८ ॥

> तथा तस्मिन् विलपति वसिष्ठो राजधर्मवित् ।  
> सभामिक्ष्वाकुनाथस्य प्रविवेश महायशाः ॥ ९ ॥

जब भरत इस प्रकार विलाप कर रहे थे, उसी समय राजधर्मके ज्ञाता महायशस्वी महर्षि वसिष्ठने इक्ष्वाकुनाथ राजा दशरथके सभाभवनमें प्रवेश किया ॥ ९ ॥

> शातकुम्भमयीं रम्यां मणिहेमसमाकुलाम् ।  
> सुधर्मामिव धर्मात्मा सगणः प्रत्यपद्यत ॥ १० ॥  
> स काञ्चनमयं पीठं स्वस्त्यास्तरणसंवृतम् ।  
> अध्यास्त सर्ववेदज्ञो दूताननुशशास च ॥ ११ ॥

वह सभाभवन अधिकांश सुवर्णका बना हुआ था । उसमें सोनेके खम्भे लगे थे । वह रमणीय सभा देवताओंकी सुधर्मा सभाके समान शोभा पाती थी । सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता धर्मात्मा वसिष्ठने अपने शिष्यगणके साथ उस सभामें पदार्पण किया और सुवर्णमय पीठपर जो स्वस्तिकाकार बिछौनेसे ढका हुआ था, वे विराजमान हुए । आसन ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने दूतोंको आज्ञा दी—॥ १०-११ ॥

> ब्राह्मणान् क्षत्रियान् योधानमात्यान् गणवल्लभान् ।  
> क्षिप्रमानयताव्यग्राः कृत्यमात्ययिकं हि नः ॥ १२ ॥  
> सराजपुत्रं शत्रुघ्नं भरतं च यशस्विनम् ।  
> युधाजितं सुमन्त्रं च ये च तत्र हिता जनाः ॥ १३ ॥  
> ततो हलहलाशब्दो महान् समुदपद्यत ।  
> रथैरश्वैर्गजैश्चापि जनानामुपगच्छताम् ॥ १४ ॥

‘तुमलोग शान्तभावसे जाकर ब्राह्मणों, क्षत्रियों, योद्धाओं, अमात्यों और सेनापतियोंको शीघ्र बुला लाओ । अन्य राजकुमारोंके साथ यशस्वी भरत और शत्रुघ्नको, मन्त्री युधाजित् और सुमन्त्रको तथा और भी जो हितैषी पुरुष वहाँ हों उन सबको शीघ्र बुलाओ। हमें उनसे बहुत ही आवश्यक कार्य है’॥ तदनन्तर घोड़े, हाथी और रथोंसे आनेवाले लोगोंका महान् कोलाहल आरम्भ हुआ ॥ १४ ॥

> ततो भरतमायान्तं शतक्रतुमिवामराः ।  
> प्रत्यनन्दन् प्रकृतयो यथा दशरथं तथा ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् जैसे देवता इन्द्रका अभिनन्दन करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रकृतियों ( मन्त्री-प्रजा आदि ) ने आते हुए भरतका राजा दशरथकी ही भाँति अभिनन्दन किया ॥१५॥

> ह्रद इव तिमिनागसंवृतः  
> स्तिमितजलो मणिशङ्खशर्करः ।  
> दशरथसुतशोभिता सभा  
> सदशरथेव बभूव सा पुरा ॥ १६ ॥

तिमिनामक महान् मत्स्य और जलहस्तीसे युक्त, स्थिर जलवाले तथा मुक्ता आदि मणियोंसे युक्त शङ्ख और बालुका-वाले समुद्रके जलाशयकी भाँति वह सभा दशरथपुत्र भरतसे सुशोभित होकर वैसी ही शोभा पाने लगी, जैसे पूर्वकालमें राजा दशरथकी उपस्थितिसे शोभा पाती थी* ॥ १६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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