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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 77"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 77

> ततो दशाहेऽतिगते कृतशौचो नृपात्मजः ।  
> द्वादशेऽहनि सम्प्राप्ते श्राद्धकर्माण्यकारयत् ॥ १ ॥

तदनन्तर दशाह व्यतीत हो जानेपर राजकुमार भरतने ग्यारहवें दिन आत्मशुद्धिके लिये स्नान और एकाद-शाह श्राद्धका अनुष्ठान किया, फिर बारहवाँ दिन आनेपर उन्होंने अन्य श्राद्ध कर्म ( मासिक और सपिण्डी-करण श्राद्ध ) किये ॥ १॥

> ब्राह्मणेभ्यो धनं रत्नं ददावन्नं च पुष्कलम् ।  
> वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च ।  
> बास्तिकं बहु शुक्लं च गाश्चापि बहुशस्तदा ॥ २ ॥

उसमें भरतने ब्राह्मणोंको धन, रत्न, प्रचुर अन्न, बहुमूल्य वस्त्र, नाना प्रकारके रत्न, बहुत-से बकरे, चाँदी और बहुतेरी गौएँ दान कीं ॥ २ ॥

> दासीर्दासांश्च यानानि वेश्मानि सुमहान्ति च ।  
> ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुत्रो राजस्तस्यौर्ध्वदेहिकम् ॥ ३ ॥

राजपुत्र भरतने राजाके पारलौकिक हितके लिये बहुत-से दास, दासियाँ, सवारियाँ तथा बड़े-बड़े घर भी ब्राह्मणोंको दिये ॥ ३ ॥

> ततः प्रभातसमये दिवसे च त्रयोदशे ।  
> विललाप महाबाहुर्भरतः शोकमूर्च्छितः ॥ ४ ॥

तदनन्तर तेरहवें दिन प्रातःकाल महाबाहु भरत शोकसे मूर्च्छित होकर विलाप करने लगे ॥ ४ ॥

> शब्दापिहितकण्ठश्च शोधनार्थमुपागतः ।  
> चितामूले पितुर्वाक्यमिदमाह सुदुःखितः ॥ ५ ॥  
> तात यस्मिन् निसृष्टोऽहं त्वया भ्रातरि राघवे ।  
> तस्मिन् वनं प्रव्रजिते शून्ये त्यक्तोऽस्म्यहं त्वया ॥

उस समय रोनेसे उनका गला भर आया था, वे पिताके चितास्थानपर अस्थिसंचयके लिये आये और अत्यन्त दुखी होकर इस प्रकार कहने लगे—‘तात ! आपने मुझे जिन ज्येष्ठ भ्राता श्रीरघुनाथजीके हाथमें सौंपा था, उनके वनमें चले जानेपर आपने मुझे सूनेमें ही छोड़ दिया ( इस समय मेरा कोई सहारा नहीं ) ॥ ५-६ ॥

> यस्या गतिरनाथायाः पुत्रः प्रव्राजितो वनम् ।  
> तामम्बां तात कौसल्यां त्यक्त्वा त्वं क गतो नृप ॥ ७ ॥

‘तात ! नरेश्वर ! जिन अनाथ हुई देवीके एकमात्र आधार पुत्रको आपने वनमें भेज दिया, उन माता कौसल्याको छोड़कर आप कहाँ चले गये ?’ ॥ ७ ॥

> दृष्ट्वा भस्मारुणं तच्च दग्धास्थि स्थानमण्डलम् ।  
> पितुः शरीरनिर्वाणं निष्टनन् विषसाद ह ॥ ८ ॥

पिताकी चिताका वह स्थानमण्डल भस्मसे भरा हुआ था, अत्यन्त दाहके कारण कुछ लाल दिखायी देता था । वहाँ पिताकी जली हुई हड्डियाँ बिखरी हुई थीं । पिताके शरीरके निर्वाणका वह स्थान देखकर भरत अत्यन्त विलाप करते हुए शोकमें डूब गये ॥ ८ ॥

> स तु दृष्ट्वा रुदन् दीनः पपात धरणीतले ।  
> उत्थाप्यमानः शक्रस्य यन्त्रध्वज इवोच्छ्रितः ॥ ९ ॥

उस स्थानको देखते ही वे दीनभावसे रोकर पृथ्वीपर गिर पड़े । जैसे इन्द्रका यन्त्रबद्ध ऊँचा ध्वज ऊपरको उठाये जाते समय खिसककर गिर पड़ा हो ॥ ९ ॥

> अभिपेतुस्ततः सर्वे तस्यामात्याः शुचिव्रतम् ।  
> अन्तकाले निपतितं ययातिमृषयो यथा ॥ १० ॥

तब उनके सारे मन्त्री उन पवित्र व्रतवाले भरतके पास आ पहुँचे, जैसे पुण्योंका अन्त होनेपर स्वर्गसे गिरे हुए राजा ययातिके पास अष्टक आदि राजर्षि आ गये थे ॥ १० ॥

> शत्रुघ्नश्चापि भरतं दृष्ट्वा शोकपरिप्लुतम् ।  
> विसंज्ञो न्यपतद् भूमौ भूमिपालमनुस्मरन् ॥ ११ ॥

भरतको शोकमें डूबा हुआ देख शत्रुघ्न भी अपने पिता महाराज दशरथका बारंबार स्मरण करते हुए अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ११ ॥

> उन्मत्त इव निश्चित्तो विललाप सुदुःखितः ।  
> स्मृत्वा पितुर्गुणाङ्गानि तानि तानि तदा तदा ॥ १२ ॥  
> मन्थराप्रभवस्तीव्रः कैकेयीग्राहसंकुलः ।  
> वरदानमयोऽक्षोभ्योऽमज्जयच्छोकसागरः ॥ १३ ॥

वे समय-समयपर अनुभवमें आये हुए पिताके लालन-पालनसम्बन्धी उन-उन गुणोंका स्मरण करके अत्यन्त दुखी हो सुध-बुध खोकर उन्मत्तके समान विलाप करने लगे—॥ ‘हाय ! मन्थरासे जिसका प्राकट्य हुआ है, कैकेयीरूपी ग्राहसे जो व्याप्त है तथा जो किसी प्रकार भी मिटाया नहीं जा सकता, उस वरदानमय शोकरूपी उग्र समुद्रने हम सब लोगोंको अपने भीतर निमग्न कर दिया है ॥ १३ ॥

> सुकुमारं च बालं च सततं लालितं त्वया ।  
> क्व तात भरतं हित्वा विलपन्तं गतो भवान् ॥ १४ ॥

‘तात ! आपने जिनका सदा लाड़-प्यार किया है तथा जो सुकुमार और बालक हैं, उन रोते-बिलखते हुए भरतको छोड़कर आप कहाँ चले गये ? ॥ १४ ॥

> ननु भोज्येषु पानेषु वस्त्रेष्वाभरणेषु च ।  
> प्रवारयति सर्वान् नस्तत्त्वः कोऽद्य करिष्यति ॥ १५ ॥

‘भोजन, पान, वस्त्र और आभूषण—इन सबको अधिक संख्यामें एकत्र करके आप हम सब लोगोंसे अपनी रुचिकी वस्तुएँ ग्रहण करनेको कहते थे । अब कौन हमारे लिये ऐसी व्यवस्था करेगा ? ॥ १५ ॥

> अवदारणकाले तु पृथिवी नावदीर्यते ।  
> विहीना या त्वया राज्ञा धर्मज्ञेन महात्मना ॥ १६ ॥

‘आप-जैसे धर्मज्ञ महात्मा राजासे रहित होनेपर पृथ्वीको फट जाना चाहिये । इस फटनेके अवसरपर भी जो यह फट नहीं रही है, यह आश्चर्यकी बात है ॥ १६ ॥

> पितरि स्वर्गमापन्ने रामे चारण्यमाश्रिते ।  
> किं मे जीवितसामर्थ्यं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ॥ १७ ॥

‘पिता स्वर्गवासी हो गये और श्रीराम वनमें चले गये । अब मुझमें जीवित रहनेकी क्या शक्ति है ? अब तो मैं अग्निमें ही प्रवेश करूँगा ॥ १७ ॥

> हीनो भ्रात्रा च पित्रा च शून्यामिक्ष्वाकुपालिताम् ।  
> अयोध्यां न प्रवेक्ष्यामि प्रवेक्ष्यामि तपोवनम् ॥ १८ ॥

‘बड़े भाई और पितासे हीन होकर इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंद्वारा पालित इस सूनी अयोध्यामें मैं प्रवेश नहीं करूँगा; तपोवनको ही चला जाऊँगा’ ॥ १८ ॥

> तयोर्विलपितं श्रुत्वा व्यसनं चाप्यवेक्ष्य तत् ।  
> भृशमार्ततरा भूयः सर्वे एवानुगामिनः ॥ १९ ॥

उन दोनोंका विलाप सुनकर और उस संकटको देखकर समस्त अनुचर-वर्गके लोग पुनः अत्यन्त शोकसे व्याकुल हो उठे ॥ १९ ॥

> ततो विषण्णौ श्रान्तौ च शत्रुघ्नभरतावुभौ ।  
> धरायां स्म व्यचेष्टेतां भग्नशृङ्गाविवर्षभौ ॥ २० ॥

उस समय भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई विषादग्रस्त और थकित होकर टूटे सींगोंवाले दो बैलोंके समान पृथ्वीपर लोट रहे थे ॥ २० ॥

> ततः प्रकृतिमान् वैद्यः पितुरेषां पुरोहितः ।  
> वसिष्ठो भरतं वाक्यमुत्थाप्य तमुवाच ह ॥ २१ ॥

तदनन्तर दैवी प्रकृतिसे युक्त और सर्वज्ञ वसिष्ठजी, जो इन श्रीराम आदिके पिताके पुरोहित थे, भरतको उठाकर उनसे इस प्रकार बोले—॥ २१ ॥

> त्रयोदशोऽयं दिवसः पितुर्वृत्तस्य ते विभो ।  
> सावशेषास्थिनिचये किमिह त्वं विलम्बसे ॥ २२ ॥

‘प्रभो ! तुम्हारे पिताके दाहसंस्कार हुए यह तेरहवाँ दिन है; अब अस्थिसंचयका जो शेष कार्य है, उसके करनेमें तुम यहाँ विलम्ब क्यों लगा रहे हो ? ॥ २२ ॥

> त्रीणि द्वन्द्वानि भूतेषु प्रवृत्तान्यविशेषतः ।  
> तेषु चापरिहार्येषु नैवं भवितुमर्हसि ॥ २३ ॥

‘भूख-प्यास, शोक-मोह तथा जरा-मृत्यु—ये तीन द्वन्द्व सभी प्राणियोंमें समानरूपसे उपलब्ध होते हैं । इन्हें रोकना सर्वथा असम्भव है—ऐसी स्थितिमें तुम्हें इस तरह शोकाकुल नहीं होना चाहिये’ ॥ २३ ॥

> सुमन्त्रश्चापि शत्रुघ्नमुत्थाप्याभिप्रसाद्य च ।  
> श्रावयामास तत्त्वज्ञः सर्वभूतभवाभवौ ॥ २४ ॥

तत्त्वज्ञ सुमन्त्रने भी शत्रुघ्नको उठाकर उनके चित्तको शान्त किया तथा समस्त प्राणियोंके जन्म और मरणकी अनिवार्यताका उपदेश सुनाया ॥ २४ ॥

> उत्थितौ तौ नरव्याघ्रौ प्रकाशेते यशस्विनौ ।  
> वर्षातपपरिग्लानौ पृथगिन्द्रध्वजाविव ॥ २५ ॥

उस समय उठे हुए वे दोनों यशस्वी नरश्रेष्ठ वर्षा और धूपसे मलिन हुए दो अलग-अलग इन्द्रध्वजोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २५ ॥

> अश्रूणि परिमृद्नन्तौ रक्ताक्षौ दीनभाषिणौ ।  
> अमात्यास्त्वरयन्ति स्म तनयौ चापराः क्रियाः ॥ २६ ॥

वे आँसू पोंछते हुए दीनतापूर्ण वाणीमें बोलते थे । उन दोनोंकी आँखें लाल हो गयीं थीं तथा मन्त्रीलोग उन दोनों राजकुमारोंको दूसरी-दूसरी क्रियाएँ शीघ्र करनेके लिये प्रेरित कर रहे थे ॥ २६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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