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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 76"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 76

> तमेवं शोकसंतप्तं भरतं कैकयीसुतम् ।  
> उवाच वदतां श्रेष्ठो वसिष्ठः श्रेष्ठवागृषिः ॥ १ ॥

इस प्रकार शोकसे संतप्त हुए केकयीकुमार भरतसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठने उत्तम वाणीमें कहा—॥ १ ॥

> अलं शोकेन भद्रं ते राजपुत्र महायशः ।  
> प्राप्तकालं नरपतेः कुरु संयानमुत्तमम् ॥ २ ॥

‘महायशस्वी राजकुमार ! तुम्हारा कल्याण हो । यह शोक छोड़ो, क्योंकि इससे कुछ होने-जानेवाला नहीं है । अब समयोचित कर्तव्यपर ध्यान दो । राजा दशरथके शवको दाहसंस्कारके लिये ले चलनेका उत्तम प्रबन्ध करो’ ॥ २ ॥

> वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा भरतो धरणीं गतः ।  
> प्रेतकृत्यानि सर्वाणि कारयामास धर्मवित् ॥ ३ ॥

वसिष्ठजीका वचन सुनकर धर्मज्ञ भरतने पृथ्वीपर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मन्त्रियोंद्वारा पिताके सम्पूर्ण प्रेतकर्मका प्रबन्ध करवाया ॥ ३ ॥

> उद्धृत्य तैलसंसेकात् स तु भूमौ निवेशितम् ।  
> आपीतवर्णवदनं प्रसुप्तमिव भूमिपम् ॥ ४ ॥

राजा दशरथका शव तेलके कड़ाहसे निकालकर भूमिपर रखा गया । अधिक समयतक तेलमें पड़े रहनेसे उसका मुख कुछ पीला हो गया । उसे देखनेसे ऐसा जान पड़ता था, मानो भूमिपाल दशरथ सो रहे हों ॥ ४ ॥

> संवेश्य शयने चाय्र्ये नानारत्नपरिष्कृते ।  
> ततो दशरथं पुत्रो विललाप सुदुःखितः ॥ ५ ॥

तदनन्तर मृत राजा दशरथको धो-पोंछकर नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित उत्तम शय्या ( विमान ) पर सुलाकर उनके पुत्र भरत अत्यन्त दुखी हो विलाप करने लगे—॥ ५ ॥

> किं ते व्यवसितं राजन् प्रोषिते मय्यनागते ।  
> विवास्य रामं धर्मज्ञं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥ ६ ॥

‘राजन् ! मैं परदेशमें था और आपके पास पहुँचने भी नहीं पाया था, तबतक ही धर्मज्ञ श्रीराम और महाबली लक्ष्मणको वनमें भेजकर आपने इस तरह स्वर्गमें जानेका निश्चय कैसे कर लिया ? ॥ ६ ॥

> क यास्यसि महाराज हित्वेमं दुःखितं जनम् ।  
> हीनं पुरुषसिंहेन रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ७ ॥

‘महाराज ! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामसे हीन इस दुखी सेवकको छोड़ आप कहाँ चले जायँगे ? ॥ ७ ॥

> योगक्षेमं तु तेऽव्यग्रं कोऽस्मिन् कल्पयिता पुरे ।  
> त्वयि प्रयाते स्वस्तात रामे च वनमाश्रिते ॥ ८ ॥  
> विधवा पृथिवी राजंस्त्वया हीना न राजते ।  
> हीनचन्द्रेव रजनी नगरी प्रतिभाति माम् ॥ ९ ॥

‘तात ! आप स्वर्गको चल दिये और श्रीरामने वनका आश्रय लिया—ऐसी दशामें आपके इस नगरमें निश्चिन्ततापूर्वक प्रजाके योगक्षेमकी व्यवस्था कौन करेगा ? ॥ ‘राजन् ! आपके बिना यह पृथ्वी विधवाके समान हो गयी, अतः इसकी शोभा नहीं हो रही है । यह पुरी भी मुझे चन्द्रहीन रात्रिके समान श्रीहीन प्रतीत होती है’ ॥ ९ ॥

> एवं विलपमानं तं भरतं दीनमानसम् ।  
> अब्रवीद् वचनं भूयो वसिष्ठस्तु महामुनिः ॥ १० ॥

इस प्रकार दीनचित्त होकर विलाप करते हुए भरतसे महामुनि वसिष्ठने फिर कहा—॥ १० ॥

> प्रेतकार्याणि यान्यस्य कर्तव्यानि विशाम्पतेः ।  
> तान्यव्यग्रं महाबाहो क्रियतामविचारितम् ॥ ११ ॥

‘महाबाहो ! इन महाराजके लिये जो कुछ भी प्रेतकर्म करने हैं, उन्हें बिना विचारे शान्तचित्त होकर करो’ ॥ ११ ॥

> तथेति भरतो वाक्यं वसिष्ठस्याभिपूज्य तत् ।  
> ऋत्विक्पुरोहिताचार्यांस्त्वरयामास सर्वशः ॥ १२ ॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरतने वसिष्ठजीकी आज्ञा शिरोधार्य की तथा ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य–सबको इस कार्यके लिये जल्दी करनेको कहा ॥ १२ ॥

> ये त्वग्नयो नरेन्द्रस्य अग्न्यगाराद् बहिष्कृताः ।  
> ऋत्विग्भिर्याजकैश्चैव ते हूयन्ते यथाविधि ॥ १३ ॥

राजाकी अग्निशालासे जो अग्नियाँ बाहर निकाली गयी थीं, उनमें ऋत्विजों और याजकोंद्वारा विधिपूर्वक हवन किया गया ॥ १३ ॥

> शिविकायामथारोप्य राजानं गतचेतनम् ।  
> बाष्पकण्ठा विमनसस्तमूचुः परिचारकाः ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् महाराज दशरथके प्राणहीन शरीरको पालकीमें बिठाकर परिचारकगण उन्हें श्मशानभूमिको ले चले। उस समय आँसुओंसे उनका गला रुँध गया था और मन-ही-मन उन्हें बड़ा दुःख हो रहा था ॥ १४ ॥

> हिरण्यं च सुवर्णं च वासांसि विविधानि च ।  
> प्रकिरन्तो जना मार्गे नृपतेरग्रतो ययुः ॥ १५ ॥

मार्गमें राजकीय पुरुष राजाके शवके आगे-आगे सोने, चाँदी तथा भाँति-भाँतिके वस्त्र लुटाते चलते थे ॥ १५ ॥

> चन्दनागुरुनिर्यासान् सरलं पद्मकं तथा ।  
> देवदारूणि चाहृत्य क्षेपयन्ति तथापरे ॥ १६ ॥  
> गन्धानुच्चावचांश्चान्यांस्तत्र गत्वाथ भूमिपम् ।  
> तत्र संवेशयामासुश्चितामध्ये तमृत्विजः ॥ १७ ॥

श्मशानभूमिमें पहुँचकर चिता तैयार की जाने लगी, किसीने चन्दन लाकर रखा तो किसीने अगर, कोई-कोई गुग्गुल तथा कोई सरल, पद्मक और देवदारुकी लकड़ियाँ ला-लाकर चितामें डालने लगे । कुछ लोगोंने तरह तरहके सुगन्धित पदार्थ लाकर छोड़े । इसके बाद ऋत्विजोंने राजाके शवको चितापर रखा ॥ १६-१७ ॥

> तदा हुताशनं हुत्वा जेपुस्तस्य तदृत्विजः ।  
> जगुश्च ते यथाशास्त्रं तत्र सामानि सामगाः ॥ १८ ॥

उस समय अग्निमें आहुति देकर उनके ऋत्विजोंने वेदोक्त मन्त्रोंका जप किया । सामगान करनेवाले विद्वान् शास्त्रीय पद्धतिके अनुसार साम-श्रुतियोंका गायन करने लगे ॥ १८ ॥

> शिविकाभिश्च यानैश्च यथार्हं तस्य योषितः ।  
> नगरान्निर्ययुस्तत्र वृद्धैः परिवृतास्तथा ॥ १९ ॥  
> प्रसव्यं चापि तं चक्रुर्ऋत्विजोऽग्निचितं नृपम् ।  
> स्त्रियश्च शोकसंतप्ताः कौसल्याप्रमुखास्तदा ॥ २० ॥

( इसके बाद चितामें आग लगायी गयी ) तदनन्तर राजा दशरथकी कौसल्या आदि रानियाँ बूढ़े रक्षकोंसे घिरी हुई यथायोग्य शिविकाओं तथा रथोंपर आरूढ़ होकर नगरसे निकलीं तथा शोकसे संतप्त हो श्मशानभूमिमें आकर अश्वमेधान्त यज्ञोंके अनुष्ठाता राजा दशरथके शवकी परिक्रमा करने लगीं । साथ ही ऋत्विजोंने भी उस शवकी परिक्रमा की ॥ १९-२० ॥

> क्रौञ्चीनामिव नारीणां निनादस्तत्र शुश्रुवे ।  
> आर्तानां करुणं काले क्रोशन्तीनां सहस्रशः ॥ २१ ॥

उस समय वहाँ करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों शोकार्त रानियोंका आर्तनाद कुररियोंके चीत्कारके समान सुनायी देता था ॥ २१ ॥

> ततो रुदन्त्यो विवशा विलप्य च पुनः पुनः ।  
> यानेभ्यः सरयूतीरमवतेरुर्नृपाङ्गनाः ॥ २२ ॥

दाहकर्मके पश्चात् विवश होकर रोती हुई वे राजरानियाँ बारंबार विलाप करके सवारियोंसे ही सरयूके तटपर जाकर उतरीं ॥ २२ ॥

> कृत्वोदकं ते भरतेन सार्धं  
> नृपाङ्गना मन्त्रिपुरोहिताश्च ।  
> पुरं प्रविद्याश्रुपरीतनेत्रा  
> भूमौ दशाहं व्यनयन्त दुःखम् ॥ २३ ॥

भरतके साथ रानियों, मन्त्रियों और पुरोहितोंने भी राजाके लिये जलाञ्जलि दी, फिर सब-के-सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए नगरमें आये और दस दिनोंतक भूमिपर शयन करते हुए उन्होंने बड़े दुःखसे अपना समय व्यतीत किया ॥ २३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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