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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 72"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 72

> अपश्यंस्तु ततस्तत्र पितरं पितुरालये ।  
> जगाम भरतो द्रष्टुं मातरं मातुरालये ॥ १ ॥

तदनन्तर पिताके घरमें पिताको न देखकर भरत माताका दर्शन करनेके लिये अपनी माताके महलमें गये ॥ १ ॥

> अनुप्राप्तं तु तं दृष्ट्वा कैकेयी प्रोषितं सुतम् ।  
> उत्पपात तदा हृष्टा त्यक्त्वा सौवर्णमासनम् ॥ २ ॥

अपने परदेश गये हुए पुत्रको घर आया देख उस समय कैकेयी हर्षसे भर गयी और अपने सुवर्णमय आसनको छोड़ उछलकर खड़ी हो गयी ॥ २ ॥

> स प्रविश्यैव धर्मात्मा स्वगृहं श्रीविवर्जितम् ।  
> भरतः प्रेक्ष्य जग्राह जनन्याश्चरणौ शुभौ ॥ ३ ॥

धर्मात्मा भरतने अपने उस घरमें प्रवेश करके देखा कि सारा घर श्रीहीन हो रहा है, फिर उन्होंने माताके शुभ चरणोंका स्पर्श किया ॥ ३ ॥

> तं मूर्ध्नि समुपाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनम् ।  
> अङ्के भरतमारोप्य प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ ४ ॥

अपने यशस्वी पुत्र भरतको छातीसे लगाकर कैकेयीने उनका मस्तक सूँघा और उन्हें गोदमें बिठाकर पूछना आरम्भ किया—॥ ४ ॥

> अद्य ते कतिचिद् रात्र्यश्च्युतस्यार्यकवेश्मनः ।  
> अपि नाध्वश्रमः शीघ्रं रथेनापततस्तव ॥ ५ ॥

‘बेटा ! तुम्हें अपने नानाके घरसे चले आज कितनी रातें व्यतीत हो गयीं ? तुम रथके द्वारा बड़ी शीघ्रताके साथ आये हो । रास्तेमें तुम्हें अधिक थकावट तो नहीं हुई ? ॥ ५ ॥

> आर्यकस्ते सुकुशली युधाजिन्मातुलस्तव ।  
> प्रवासाच्च सुखं पुत्र सर्वं मे वक्तुमर्हसि ॥ ६ ॥

‘तुम्हारे नाना सकुशल तो हैं न ? तुम्हारे मामा युधाजित् तो कुशलसे हैं ? बेटा ! जब तुम यहाँसे गये थे, तबसे लेकर अबतक सुखसे रहे हो न ? ये सारी बातें मुझे बताओ’ ॥ ६ ॥

> एवं पृष्टस्तु कैकेय्या प्रियं पार्थिवनन्दनः ।  
> आचष्ट भरतः सर्वं मात्रे राजीवलोचनः ॥ ७ ॥

कैकेयीके इस प्रकार प्रिय वाणीमें पूछनेपर दशरथनन्दन कमलनयन भरतने माताको सब बातें बतायीं ॥ ७ ॥

> अद्य मे सप्तमी रात्रिश्च्युतस्यार्यकवेश्मनः ।  
> अम्बायाः कुशली तातो युधाजिन्मातुलश्च मे ॥ ८ ॥

( वे बोले—) ‘माँ ! नानाके घरसे चले मेरी यह सातवीं रात बीती है । मेरे नानाजी और मामा युधाजित् भी कुशलसे हैं ॥ ८ ॥

> यन्मे धनं च रत्नं च ददौ राजा परंतपः ।  
> परिश्रान्तं पथ्यभवत् ततोऽहं पूर्वमागतः ॥ ९ ॥  
> राजवाक्यहरैर्दूतैस्त्वर्यमाणोऽहमागतः ।  
> यदहं प्रष्टुमिच्छामि तदम्बा वक्तुमर्हति ॥ १० ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले केकयनरेशने मुझे जो धन-रत्न प्रदान किये हैं, उनके भारसे मार्गमें सब वाहन थक गये थे, इसलिये मैं राजकीय संदेश लेकर गये हुए दूतोंके जल्दी मचानेसे यहाँ पहले ही चला आया हूँ । अच्छा माँ, अब मैं जो कुछ पूछता हूँ, उसे तुम बताओ ॥ ९-१० ॥

> शून्योऽयं शयनीयस्ते पर्यङ्को हेमभूषितः ।  
> न चायमिक्ष्वाकुजनः प्रहृष्टः प्रतिभाति मे ॥ ११ ॥

‘यह तुम्हारी शय्या सुवर्णभूषित पलंग इस समय सूना है, इसका क्या कारण है ( आज यहाँ महाराज उपस्थित क्यों नहीं हैं ) ? ये महाराजके परिजन आज प्रसन्न क्यों नहीं जान पड़ते हैं ? ॥ ११ ॥

> राजा भवति भूयिष्ठमिहाम्बाया निवेशने ।  
> तमहं नाद्य पश्यामि द्रष्टुमिच्छन्निहागतः ॥ १२ ॥

‘महाराज ( पिताजी ) प्रायः माताजीके ही महलमें रहा करते थे, किंतु आज मैं उन्हें यहाँ नहीं देख रहा हूँ । मैं उन्हींका दर्शन करनेकी इच्छासे यहाँ आया हूँ ॥ १२ ॥

> पितुर्ग्रहीष्ये पादौ च तं ममाख्याहि पृच्छतः ।  
> आहोस्विदम्बाज्येष्ठायाः कौसल्यायां निवेशने ॥ १३ ॥

‘मैं पूछता हूँ, बताओ, पिताजी कहाँ हैं ? मैं उनके पैर पकड़ूँगा । अथवा बड़ी माता कौसल्याके घरमें तो वे नहीं हैं ?’ ॥ १३ ॥

> तं प्रत्युवाच कैकेयी प्रियवद् घोरमप्रियम् ।  
> अजानन्तं प्रजानन्ती राज्यलोभेन मोहिता ॥ १४ ॥

कैकेयी राज्यके लोभसे मोहित हो रही थी । वह राजाका वृत्तान्त न जाननेवाले भरतसे उस घोर अप्रिय समाचारको प्रिय-सा समझती हुई इस प्रकार बताने लगी—॥ १४ ॥

> या गतिः सर्वभूतानां तां गतिं ते पिता गतः ।  
> राजा महात्मा तेजस्वी यायजूकः सतां गतिः ॥ १५ ॥

‘बेटा ! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ बड़े महात्मा, तेजस्वी, यज्ञशील और सत्पुरुषोंके आश्रयदाता थे । एक दिन समस्त प्राणियोंकी जो गति होती है, उसी गतिको वे भी प्राप्त हुए हैं’ ॥ १५ ॥

> तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं धर्माभिजनवाञ्छुचिः ।  
> पपात सहसा भूमौ पितृशोकबलार्दितः ॥ १६ ॥  
> हा हतोऽस्मीति कृपणां दीनां वाचमुदीरयन् ।  
> निपपात महाबाहुर्बाहू विक्षिप्य वीर्यवान् ॥ १७ ॥

भरत धार्मिक कुलमें उत्पन्न हुए थे और उनका हृदय शुद्ध था । माताकी बात सुनकर वे पितृशोकसे अत्यन्त पीड़ित हो सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े और ‘हाय, मैं मारा गया !’ इस प्रकार अत्यन्त दीन और दुःखमय वचन कहकर रोने लगे । पराक्रमी महाबाहु भरत अपनी भुजाओंको बारंबार पृथ्वीपर पटककर गिरने और लोटने लगे ॥ १६-१७ ॥

> ततः शोकेन संवीतः पितुर्मरणदुःखितः ।  
> विललाप महातेजा भ्रान्ताकुलितचेतनः ॥ १८ ॥

उन महातेजस्वी राजकुमारकी चेतना भ्रान्त और व्याकुल हो गयी । वे पिताकी मृत्युसे दुखी और शोकसे व्याकुलचित्त होकर विलाप करने लगे—॥ १८ ॥

> एतत् सुरुचिरं भाति पितुर्मे शयनं पुरा ।  
> शशिनेवामलं रात्रौ गगनं तोयदात्यये ॥ १९ ॥  
> तदिदं न विभात्यद्य विहीनं तेन धीमता ।  
> व्योमेव शशिना हीनमश्लुष्क इव सागरः ॥ २० ॥

‘हाय ! मेरे पिताजीकी जो यह अत्यन्त सुन्दर शय्या पहले शरत्कालकी रातमें चन्द्रमासे सुशोभित होनेवाले निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी, वही यह आज उन्हीं बुद्धिमान् महाराजसे रहित होकर चन्द्रमासे हीन आकाश और सूखे हुए समुद्रके समान श्रीहीन प्रतीत होती है’ ॥ १९-२० ॥

> वाष्पमुत्सृज्य कण्ठेन स्वात्मना परिपीडितः।  
> प्रच्छाद्य वदनं श्रीमद् वस्त्रेण जयतां वरः ॥ २१ ॥

विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ भरत अपने सुन्दर मुख वस्त्रसे ढक            कर अपने कण्ठस्वरके साथ आँसू गिराकर मन-ही-मन अत्यन्त पीड़ित हो पृथ्वीपर पड़कर विलाप करने लगे ॥ २१ ॥

> तमार्तं देवसंकाशं समीक्ष्य पतितं भुवि।  
> निकृत्तमिव सालस्य स्कन्धं परशुना वने ॥ २२ ॥  
> माता मातङ्गसंकाशं चन्द्रार्कसदृशं सुतम्।  
> उत्थापयित्वा शोकार्तं वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २३ ॥

देवतुल्य भरत शोकसे व्याकुल हो वनमें फरसेसे काटे गये साखूके तनेकी भाँति पृथ्वीपर पड़े थे, मतवाले हाथीके समान पुष्ट तथा चन्द्रमा या सूर्यके समान तेजस्वी अपने शोकाकुल पुत्रको इस तरह भूमिपर पड़ा देख माता कैकेयीने उन्हें उठाया और इस प्रकार कहा—॥ २२-२३ ॥

> उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे राजन्नत्र महायशः।  
> त्वद्विधा नहि शोचन्ति सन्तः सदसि सम्मताः ॥ २४ ॥

‘राजन् ! उठो ! उठो ! महायशस्वी कुमार ! तुम इस तरह यहाँ धरतीपर क्यों पड़े हो ? तुम्हारे-जैसे सभाओंमें सम्मानित होनेवाले सत्पुरुष शोक नहीं किया करते हैं ॥ २४ ॥

> दानयज्ञाधिकारा हि शीलश्रुतितपोनुगा।  
> बुद्धिस्ते बुद्धिसम्पन्न प्रभेवार्कस्य मन्दिरे ॥ २५ ॥

‘बुद्धिसम्पन्न पुत्र ! जैसे सूर्यमण्डलमें प्रभा निश्चल रूपसे रहती है, उसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि सुस्थिर है । वह दान और यज्ञमें लगनेकी अधिकारिणी है; क्योंकि सदाचार और वेदवाक्योंका अनुसरण करनेवाली है’ ॥ २५ ॥

> स रुदित्वा चिरं कालं भूमौ परिविवृत्य च।  
> जननीं प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृतः ॥ २६ ॥

भरत पृथ्वीपर लोटते-पोटते बहुत देरतक रोते रहे । तत्पश्चात् अधिकाधिक शोकसे आकुल होकर वे मातासे इस प्रकार बोले—॥ २६ ॥

> अभिषेक्ष्यति रामं तु राजा यज्ञं नु यक्ष्यते।  
> इत्यहं कृतसंकल्पो हृष्टो यात्रामयासिषम् ॥ २७ ॥

‘मैंने तो यह सोचा था कि महाराज श्रीरामका राज्याभिषेक करेंगे और स्वयं यज्ञका अनुष्ठान करेंगे—यही सोचकर मैंने बड़े हर्षके साथ वहाँसे यात्रा की थी ॥ २७ ॥

> तदिदं ह्यन्यथाभूतं व्यवदीर्णं मनो मम।  
> पितरं यो न पश्यामि नित्यं प्रियहिते रतम् ॥ २८ ॥

‘किंतु यहाँ आनेपर सारी बातें मेरी आशाके विपरीत हो गयीं। मेरा हृदय फटा जा रहा है; क्योंकि सदा अपने प्रिय और हितमें लगे रहनेवाले पिताजीको मैं नहीं देख रहा हूँ ॥ २८ ॥

> अम्ब केनात्यगाद् राजा व्याधिना मय्यनागते।  
> धन्या रामादयः सर्वे यैः पिता संस्कृतः स्वयम् ॥ २९ ॥

‘मा ! महाराजको ऐसा कौन-सा रोग हो गया था, जिससे वे मेरे आनेके पहले ही चल बसे ? श्रीराम आदि सब भाई धन्य हैं, जिन्होंने स्वयं उपस्थित रहकर पिताजीका अन्त्येष्टि-संस्कार किया ॥ २९ ॥

> न नूनं मां महाराजः प्राप्तं जानाति कीर्तिमान्।  
> उपजिघ्रेत् तु मां मूर्ध्नि तातः संनाम्य सत्वरम् ॥ ३० ॥

‘निश्चय ही मेरे पूज्य पिता यशस्वी महाराजको मेरे यहाँ आनेका कुछ पता नहीं है, अन्यथा वे शीघ्र ही मेरे मस्तकको झुकाकर उसे प्यारसे सूँघते ॥ ३० ॥

> क्व स पाणिः सुखस्पर्शस्तातस्याक्लिष्टकर्मणः।  
> यो हि मां रजसा ध्वस्तमभीक्ष्णं परिमार्जति ॥ ३१ ॥

‘हाय ! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे पिताका वह कोमल हाथ कहाँ है, जिसका स्पर्श मेरे लिये बहुत ही सुखदायक था ? वे उसी हाथसे मेरे धूलिधूसर शरीरको बारंबार पोंछा करते थे ॥३१॥

> यो मे भ्राता पिता बन्धुर्यस्य दासोऽस्मि सम्मतः।  
> तस्य मां शीघ्रमाख्याहि रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ३२ ॥

‘अब जो मेरे भाई, पिता और बन्धु हैं तथा जिनका मैं परम प्रिय दास हूँ, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले उन श्रीरामचन्द्रजीको तुम शीघ्र ही मेरे आनेकी सूचना दो ॥ ३२ ॥

> पिता हि भवति ज्येष्ठो धर्ममार्यस्य जानतः।  
> तस्य पादौ ग्रहीष्यामि स हीदानीं गतिर्मम ॥ ३३ ॥

‘धर्मके ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुषके लिये बड़ा भाई पिताके समान होता है। मैं उनके चरणोंमें प्रणाम करूँगा। अब वे ही मेरे आश्रय हैं ॥ ३३ ॥

> धर्मविद् धर्मशीलश्च महाभागो दृढव्रतः।  
> आर्यं किमब्रवीद् राजा पिता मे सत्यविक्रमः ॥ ३४ ॥  
> पश्चिमं साधुसंदेशमिच्छामि श्रोतुमात्मनः।

‘आर्ये ! धर्मका आचरण जिनका स्वभाव बन गया था तथा जो बड़ी दृढ़ताके साथ उत्तम व्रतका पालन करते थे, वे मेरे सत्यपराक्रमी और धर्मज्ञ पिता महाराज दशरथ अन्तिम समयमें क्या कह गये थे ? मेरे लिये जो उनका उत्तम अन्तिम संदेश हो उसे मैं सुनना चाहता हूँ’ ॥ ३४½ ॥

> इति पृष्ट्वा यथातत्त्वं कैकेयी वाक्यमब्रवीत् ॥ ३५ ॥  
> रामेति राजा विलपन् हा सीते लक्ष्मणेति च ।  
> स महात्मा परं लोकं गतो मतिमतां वरः ॥ ३६ ॥

भरतके इस प्रकार पूछनेपर कैकेयीने सब बात ठीक-ठीक बता दी । वह कहने लगी—‘बेटा ! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे महात्मा पिता महाराजने ‘हा राम ! हा सीते ! हा लक्ष्मण !‘ इस प्रकार विलाप करते हुए परलोककी यात्रा की थी ॥ ३५-३६ ॥

> इतीमां पश्चिमां वाचं व्याजहार पिता तव ।  
> कालधर्मं परिक्षिप्तः पाशैरिव महागजः ॥३७॥

‘जैसे पाशोंसे बँधा हुआ महान् गज विवश हो जाता है, उसी प्रकार कालधर्मके वशीभूत हुए तुम्हारे पिताने अन्तिम वचन इस प्रकार कहा था–॥ ३७ ॥

> सिद्धार्थास्तु नरा राममागतं सह सीतया ।  
> लक्ष्मणं च महाबाहुं द्रक्ष्यन्ति पुनरागतम् ॥ ३८॥

‘जो लोग सीताके साथ पुनः लौटकर आये हुए श्रीराम और महाबाहु लक्ष्मणको देखेंगे, वे ही कृतार्थ होंगे‘ ॥ ३८ ॥

> तच्छ्रुत्वा विषसादैव द्वितीयाप्रियशंसनात् ।  
> विषण्णवदनो भूत्वा भूयः पप्रच्छ मातरम् ॥ ३९ ॥

माताके द्वारा यह दूसरी अप्रिय बात कही जानेपर भरत और भी दुखी ही हुए । उनके मुखपर विषाद छा गया और उन्होंने पुनः मातासे पूछा—॥ ३९ ॥

> क्व चेदानीं स धर्मात्मा कौसल्यानन्दवर्धनः ।  
> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया च समागतः ॥ ४०॥

‘मा ! माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी इस अवसरपर भाई लक्ष्मण और सीताके साथ कहाँ चले गये हैं ?‘ ॥ ४० ॥

> तथा पृष्टा यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे ।  
> मातास्य युगपद्वाक्यं विप्रियं प्रियशंसया ॥ ४१ ॥

इस प्रकार पूछनेपर उनकी माता कैकेयीने एक साथ ही प्रिय बुद्धिसे वह अप्रिय संवाद यथोचित रीतिसे सुनाना आरम्भ किया—॥ ४१ ॥

> स हि राजसुतः पुत्र चीरवासा महावनम् ।  
> दण्डकान् सह वैदेह्या लक्ष्मणानुचरो गतः ॥४२॥

‘बेटा ! राजकुमार श्रीराम वल्कल वस्त्र धारण करके सीताके साथ दण्डकवनमें चले गये हैं। लक्ष्मणने भी उन्हींका अनुसरण किया है‘ ॥ ४२ ॥

> तच्छ्रुत्वा भरतस्त्रस्तो भ्रातुश्चारित्रशङ्कया ।  
> स्वस्य वंशस्य माहात्म्यात् प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥४३॥

यह सुनकर भरत डर गये, उन्हें अपने भाईके चरित्रपर शङ्का हो आयी। (वे सोचने लगे—श्रीराम कहीं धर्मसे गिर तो नहीं गये ? ) अपने वंशकी महत्ता ( धर्मपरायणता ) का स्मरण करके वे कैकेयीसे इस प्रकार पूछने लगे—॥ ४३ ॥

> कच्चिन्न ब्राह्मणधनं हृतं रामेण कस्यचित् ।  
> कच्चिन्नाढ्यो दरिद्रो वा तेनापापो विहिंसितः ॥ ४४ ॥

‘मा ! श्रीरामने किसी कारणवश ब्राह्मणका धन तो नहीं हर लिया था ? किसी निष्पाप धनी या दरिद्रकी हत्या तो नहीं कर डाली थी ? ॥ ४४ ॥

> कच्चिन्न परदारान् वा राजपुत्रोऽभिमन्यते ।  
> कस्मात् स दण्डकारण्ये भ्राता रामो विवासितः ॥४५॥

‘राजकुमार श्रीरामका मन किसी परायी स्त्रीकी ओर तो नहीं चला गया ? किस अपराधके कारण भैया श्रीरामको दण्डकारण्यमें जानेके लिये निर्वासित कर दिया गया है ?‘ ॥ ४५ ॥

> अथास्य चपला माता तत् स्वकर्म यथातथम् ।  
> तेनैव स्त्रीस्वभावेन व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ ४६ ॥

तब चपल स्वभाववाली भरतकी माता कैकेयीने उस विवेकशून्य चञ्चल नारीस्वभावके कारण ही अपनी करतूतको ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया ॥ ४६ ॥

> एवमुक्ता तु कैकेयी भरतेन महात्मना ।  
> उवाच वचनं हृष्टा वृथापण्डितमानिनी ॥ ४७ ॥

महात्मा भरतके पूर्वोक्त रूपसे पूछनेपर व्यर्थ ही अपनेको बड़ी विदुषी माननेवाली कैकेयीने बड़े हर्षमें भरकर कहा—॥ ४७ ॥

> न ब्राह्मणधनं किंचिद्धृतं रामेण कस्यचित् ।  
> कश्चिन्नाढ्यो दरिद्रो वा तेनापापो विहिंसितः।  
> न रामः परदारान् स चक्षुर्भ्यामपि पश्यति ॥ ४८ ॥

‘बेटा ! श्रीरामने किसी कारणवश किञ्चिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं किया है। किसी निरपराध धनी या दरिद्रकी हत्या भी उन्होंने नहीं की है। श्रीराम कभी किसी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डालते हैं ॥ ४८ ॥

> मया तु पुत्र श्रुत्वैव रामस्येहाभिषेचनम् ।  
> याचितस्ते पिता राज्यं रामस्य च विवासनम्॥ ४९ ॥

‘बेटा ! ( उनके वनमें जानेका कारण इस प्रकार है–) मैंने सुना था कि अयोध्यामें श्रीरामका राज्याभिषेक होने जा रहा है, तब मैंने तुम्हारे पितासे तुम्हारे लिये राज्य और श्रीरामके लिये वनवासकी प्रार्थना की ॥ ४९ ॥

> स स्ववृत्तिं समास्थाय पिता ते तत् तथाकरोत्।  
> रामस्तु सहसौमित्रिः प्रेषितः सह सीतया ॥ ५० ॥  
> तमपश्यन् प्रियं पुत्रं महीपालो महायशाः ।  
> पुत्रशोकपरिद्यूनः पञ्चत्वमुपपेदिवान् ॥ ५१ ॥

‘उन्होंने अपने सत्यप्रतिज्ञ स्वभावके अनुसार मेरी माँग पूरी की। श्रीराम लक्ष्मण और सीताके साथ वनको भेज दिये गये, फिर अपने प्रिय पुत्र श्रीरामको न देखकर वे महायशस्वी महाराज पुत्रशोकसे पीड़ित हो परलोकवासी हो गये ॥ ५०-५१॥

> त्वया त्विदानीं धर्मज्ञ राजत्वमवलम्ब्यताम् ।  
> त्वत्कृते हि मया सर्वमिदमेवंविधं कृतम् ॥५२॥

‘धर्मज्ञ ! अब तुम राजपद स्वीकार करो। तुम्हारे लिये ही मैंने इस प्रकारसे यह सब कुछ किया है ॥ ५२॥

> मा शोकं मा च संतापं धैर्यमाश्रय पुत्रक ।  
> त्वदधीना हि नगरी राज्यं चैतदनामयम् ॥ ५३ ॥

‘बेटा ! शोक और संताप न करो, धैर्यका आश्रय लो। अब यह नगर और निष्कण्टक राज्य तुम्हारे ही अधीन है ॥ ५३ ॥

> तत् पुत्र शीघ्रं विधिना विधिज्ञै-  
> र्वसिष्ठमुख्यैः सहितो द्विजेन्द्रैः ।  
> संकाल्य राजानमदीनसत्त्व-  
> मात्मानमुर्व्यामभिषेचयस्व ॥ ५४ ॥

‘अतः वत्स ! अब विधि-विधानके ज्ञाता वसिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणोंके साथ तुम उदार हृदयवाले महाराजका अन्त्येष्टि-संस्कार करके इस पृथ्वीके राज्यपर अपना अभिषेक कराओ’ ॥ ५४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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