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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 66"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 66

> तमग्निमिव संशान्तमम्बुहीनमिवार्णवम् ।  
> गतप्रभमिवादित्यं स्वर्गस्थं प्रेक्ष्य भूमिपम् ॥ १ ॥  
> कौसल्या बाष्पपूर्णाक्षी विविधं शोककर्शिता ।  
> उपगृह्य शिरो राज्ञः कैकेयीं प्रत्यभाषत ॥ २ ॥

बुझी हुई आग, जलहीन समुद्र तथा प्रभाहीन सूर्यकी भाँति शोभाहीन हुए दिवङ्गत राजाका शव देखकर कौसल्याके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे अनेक प्रकारसे शोकाकुल होकर राजाके मस्तकको गोदमें ले कैकेयीसे इस प्रकार बोलीं–॥ १-२ ॥

> सकामा भव कैकेयि भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम् ।  
> त्यक्त्वा राजानमेकाग्रा नृशंसे दुष्टचारिणि ॥ ३ ॥

‘दुराचारिणी क्रूर कैकेयी ! ले, तेरी कामना सफल हुई । अब राजाको भी त्यागकर एकाग्रचित्त हो अपना अकण्टक राज्य भोग ॥ ३ ॥

> विहाय मां गतो रामो भर्ता च स्वर्गतो मम ।  
> विपथे सार्थहीनेव नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ ४ ॥

‘राम मुझे छोड़कर वनमें चले गये और मेरे स्वामी स्वर्ग सिधारे । अब मैं दुर्गम मार्गमें साथियोंसे बिछुड़कर असहाय हुई अबलाकी भाँति जीवित नहीं रह सकती ॥ ४ ॥

> भर्तारं तु परित्यज्य का स्त्री दैवतमात्मनः ।  
> इच्छेज्जीवितुमन्यत्र कैकेय्यास्त्यक्तधर्मणः ॥ ५ ॥

‘नारीधर्मको त्याग देनेवाली कैकेयीके सिवा संसारमें दूसरी कौन ऐसी स्त्री होगी, जो अपने लिये आराध्य देवस्वरूप पतिका परित्याग करके जीना चाहेगी ? ॥ ५ ॥

> न लुब्धो बुध्यते दोषान् किंपाकमिव भक्षयन् ।  
> कुब्जानिमित्तं कैकेय्या राघवाणां कुलं हतम् ॥ ६ ॥

‘जैसे कोई धनका लोभी दूसरोंको विष खिला देता है और उससे होनेवाले हत्याके दोषोंपर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार इस कैकेयीने कुब्जाके कारण रघुवंशियोंके इस कुलका नाश कर डाला ॥ ६ ॥

> अनियोगे नियुक्तेन राज्ञा रामं विवासितम् ।  
> सभार्यं जनकः श्रुत्वा परितप्स्यत्यहं यथा ॥ ७ ॥

‘कैकेयीने महाराजको अयोग्य कार्यमें लगाकर उनके द्वारा पत्नीसहित श्रीरामको वनवास दिलवा दिया । यह समाचार जब राजा जनक सुनेंगे, तब मेरे ही समान उनको भी बड़ा कष्ट होगा ॥ ७ ॥

> स मामनाथां विधवां नाद्य जानाति धार्मिकः ।  
> रामः कमलपत्राक्षो जीवन्नाशमितो गतः ॥ ८ ॥

‘मैं अनाथ और विधवा हो गयी—यह बात मेरे धर्मात्मा पुत्र कमलनयन श्रीरामको नहीं मालूम है । वे तो यहाँसे जीते-जी अदृश्य हो गये हैं ॥ ८ ॥

> विदेहराजस्य सुता तथा चारुतपस्विनी ।  
> दुःखस्यानुचिता दुःखं वने पर्युद्विजिष्यति ॥ ९ ॥

‘पति-सेवारूप मनोहर तप करनेवाली विदेहराजकुमारी सीता दुःख भोगनेके योग्य नहीं है । वह वनमें दुःखका अनुभव करके उद्विग्न हो उठेगी ॥ ९ ॥

> नदतां भीमघोषाणां निशासु मृगपक्षिणाम् ।  
> निशम्यमाना संत्रस्ता राघवं संश्रयिष्यति ॥ १० ॥

‘रातके समय भयानक शब्द करनेवाले पशु-पक्षियोंकी बोली सुनकर भयभीत हो सीता श्रीरामकी ही शरण लेगी— उन्हींकी गोदमें जाकर छिपेगी ॥ १० ॥

> वृद्धश्चैवाल्पपुत्रश्च वैदेहीमनुचिन्तयन् ।  
> सोऽपि शोकसमाविष्टो नूनं त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ ११ ॥

‘जो बूढ़े हो गये हैं, कन्याएँमात्र ही जिनकी संतति हैं, वे राजा जनक भी सीताकी ही बारंबार चिन्ता करते हुए शोकमें डूबकर अवश्य ही अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ ११ ॥

> साहमद्यैव दिष्टान्तं गमिष्यामि पतिव्रता ।  
> इदं शरीरमालिङ्गय प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् ॥ १२ ॥

‘मैं भी आज ही मृत्युका वरण करूँगी । एक पतिव्रताकी भाँति पतिके शरीरका आलिङ्गन करके चिताकी आगमें प्रवेश कर जाऊँगी’ ॥ १२ ॥

> तां ततः सम्परिष्वज्य विलपन्तीं तपस्विनीम् ।  
> व्यपनिन्युः सुदुःखार्तां कौसल्यां व्यावहारिकाः ॥ १३ ॥

पतिके शरीरको हृदयसे लगाकर अत्यन्त दुःखसे आर्त हो करुण विलाप करती हुई तपस्विनी कौसल्याको राजकाज देखनेवाले मन्त्रियोंने दूसरी स्त्रियोंद्वारा वहाँसे हटवा दिया ॥ १३ ॥

> तैलद्रोण्यां तदामात्याः संवेश्य जगतीपतिम् ।  
> राज्ञः सर्वाण्यथादिष्ठाश्चक्रुः कर्माण्यनन्तरम् ॥ १४ ॥

फिर उन्होंने महाराजके शरीरको तेलसे भरे हुए कड़ाहमें रखकर वसिष्ठ आदिकी आज्ञाके अनुसार शवकी रक्षा आदि अन्य सब राजकीय कार्योंकी सँभाल आरम्भ कर दी ॥ १४ ॥

> न तु संकालनं राज्ञो विना पुत्रेण मन्त्रिणः ।  
> सर्वज्ञाः कर्तुमीषुस्ते ततो रक्षन्ति भूमिपम् ॥ १५ ॥

वे सर्वज्ञ मन्त्री पुत्रके बिना राजाका दाह-संस्कार न कर सके, इसलिये उनके शवकी रक्षा करने लगे ॥ १५ ॥

> तैलद्रोण्यां शायितं तं सचिवैस्तु नराधिपम् ।  
> हा मृतोऽयमिति ज्ञात्वा स्त्रियस्ताः पर्यदेवयन् ॥१६॥

जब मन्त्रियोंने राजाके शवको तैलके कड़ाहमें सुलाया, तब यह जानकर सारी रानियाँ ‘हाय ! ये महाराज परलोकवासी हो गये’ ऐसा कहती हुई पुनः विलाप करने लगीं ॥ १६ ॥

> बाहूनुच्छ्रित्य कृपणा नेत्रप्रस्रवणैर्मुखैः ।  
> रुदत्यः शोकसंतप्ताः कृपणं पर्यदेवयन् ॥ १७ ॥

उनके मुखपर नेत्रोंसे आँसुओंके झरने झर रहे थे । वे अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर दीनभावसे रोने और शोकसंतप्त हो दयनीय विलाप करने लगीं ॥ १७ ॥

> हा महाराज रामेण संततं प्रियवादिना ।  
> विहीनाः सत्यसंधेन किमर्थं विजहासि नः ॥ १८ ॥

वे बोलीं—‘हा महाराज ! हम सत्यप्रतिज्ञ एवं सदा प्रिय बोलनेवाले अपने पुत्र श्रीरामसे तो बिछुड़ी ही थीं, अब आप भी क्यों हमारा परित्याग कर रहे हैं ? ॥ १८ ॥

> कैकेय्या दुष्टभावाया राघवेण विवर्जिताः ।  
> कथं सपत्न्या वत्स्यामः समीपे विधवा वयम् ॥ १९ ॥

‘श्रीरामसे बिछुड़कर हम सब विधवाएँ इस दुष्ट विचारवाली सौत कैकेयीके समीप कैसे रहेंगी ? ॥ १९ ॥

> स हि नाथः स चास्माकं तव च प्रभुरात्मवान् ।  
> वनं रामो गतः श्रीमान् विहाय नृपतिश्रियम् ॥ २० ॥

‘जो हमारे और आपके भी रक्षक और प्रभु थे, वे मनस्वी श्रीरामचन्द्र राजलक्ष्मीको छोड़कर वन चले गये ॥२०॥

> त्वया तेन च वीरेण विना व्यसनमोहिताः ।  
> कथं वयं निवत्स्यामः कैकेय्या च विदूषिताः ॥ २१ ॥

‘वीरवर श्रीराम और आपके भी न रहनेसे हमारे ऊपर बड़ा भारी संकट आ गया, जिससे हम मोहित हो रही हैं । अब सौत कैकेयीके द्वारा तिरस्कृत हो हम यहाँ कैसे रह सकेंगी ? ॥ २१ ॥

> यया च राजा रामश्च लक्ष्मणश्च महाबलः ।  
> सीतया सह संत्यक्ताः सा कमन्यं न हास्यति ।२२।

‘जिसने राजाका तथा सीतासहित श्रीराम और महाबली लक्ष्मणका भी परित्याग कर दिया, वह दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी ?’ ॥ २२ ॥

> ता बाष्पेण च संवीताः शोकेन विपुलेन च ।  
> व्यचेष्टन्त निरानन्दा राघवस्य वरस्त्रियः ॥ २३ ॥

रघुकुलनरेश दशरथकी वे सुन्दरी रानियाँ महान् शोकसे ग्रस्त हो आँसू बहाती हुई नाना प्रकारकी चेष्टाएँ और विलाप कर रही थीं । उनका आनन्द लुट गया था ॥ २३ ॥

> निशा नक्षत्रहीनेव स्त्रीव भर्तृविवर्जिता ।  
> पुरी नाराजतायोध्या हीना राज्ञा महात्मना ॥ २४ ॥

महामना राजा दशरथसे हीन हुई वह अयोध्यापुरी नक्षत्रहीन रात्रि और पतिविहीना नारीकी भाँति श्रीहीन हो गयी थी ॥ २४ ॥

> बाष्पपर्याकुलजना हाहाभूतकुलाङ्गना ।  
> शून्यचत्वरवेश्मान्ता न बभ्राज यथापुरम् ॥ २५ ॥

नगरके सभी मनुष्य आँसू बहा रहे थे । कुलवती स्त्रियाँ हाहाकार कर रही थीं । चौराहे तथा घरोंके द्वार सूने दिखायी देते थे ( वहाँ झाड़-बुहार, लीपने-पोतने तथा बलि अर्पण करने आदिकी क्रियाएँ नहीं होती थीं ) । इस प्रकार वह पुरी पहलेकी भाँति शोभा नहीं पाती थी ॥ २५ ॥

> गते तु शोकात् त्रिदिवं नराधिपे  
> महीतलस्थासु नृपाङ्गनासु च ।  
> निवृत्तचारः सहसा गतो रविः  
> प्रवृत्तचारा रजनी ह्युपस्थिता ॥ २६ ॥

राजा दशरथ शोकवश स्वर्ग सिधारे और उनकी रानियाँ शोकसे ही भूतलपर लोटती रहीं । इस शोकमें ही सहसा सूर्यकी किरणोंका प्रचार बंद हो गया और सूर्यदेव अस्त हो गये । तत्पश्चात् अन्धकारका प्रचार करती हुई रात्रि उपस्थित हुई ॥ २६ ॥

> ऋते तु पुत्राद् दहनं महीपते-  
> र्नारोचयंस्ते सुहृदः समागताः ।  
> इतीव तस्मिञ्शयने न्यवेशयन्  
> विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम् ॥ २७ ॥

वहाँ पधारे हुए सुहृदोंने किसी भी पुत्रके बिना राजाका दाहसंस्कार होना नहीं पसंद किया । अब राजाका दर्शन अचिन्त्य हो गया, यह सोचते हुए उन सबने उस तैलपूर्ण कड़ाहमें उनके शवको सुरक्षित रख दिया ॥ २७ ॥

> गतप्रभा द्यौरिव भास्करं विना  
> व्यपेतनक्षत्रगणेव शर्वरी ।  
> पुरी बभासे रहिता महात्मना  
> कण्ठास्रकण्ठाकुलमार्गचत्वरा ॥ २८ ॥

सूर्यके बिना प्रभाहीन आकाश तथा नक्षत्रोंके बिना शोभाहीन रात्रिकी भाँति अयोध्यापुरी महात्मा राजा दशरथसे रहित हो श्रीहीन प्रतीत होती थी । उसकी सड़कों और चौराहोंपर आँसुओंसे अवरुद्ध कण्ठवाले मनुष्योंकी भीड़ एकत्र हो गयी थी ॥ २८ ॥

> नराश्च नार्यश्च समेत्य संघशो  
> विगर्हमाणा भरतस्य मातरम् ।  
> तदा नगर्यां नरदेवसंक्षये  
> बभूवुरार्ता न च शर्म लेभिरे ॥ २९ ॥

झुंड-के-झुंड स्त्री और पुरुष एक साथ खड़े होकर भरत-माता कैकेयीकी निन्दा करने लगे । उस समय महाराजकी मृत्युसे अयोध्यापुरीमें रहनेवाले सभी लोग शोकाकुल हो रहे थे । कोई भी शान्ति नहीं पाता था ॥ २९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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