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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 62"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 62

> एवं तु क्रुद्धया राजा राममात्रा सशोकया।  
> श्रावितः परुषं वाक्यं चिन्तयामास दुःखितः ॥ १ ॥

शोकमग्न हो कुपित हुई श्रीराममाता कौसल्याने जब राजा दशरथको इस प्रकार कठोर वचन सुनाया, तब वे दुःखित होकर बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥ १ ॥

> चिन्तयित्वा स च नृपो मोहव्याकुलितेन्द्रियः।  
> अथ दीर्घेण कालेन संज्ञामाप परंतपः ॥ २ ॥

चिन्तित होनेके कारण राजाकी सारी इन्द्रियाँ मोहसे आच्छन्न हो गयीं । तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा दशरथको चेत हुआ ॥ २ ॥

> स संज्ञामुपलभ्यैव दीर्घमुष्णं च निःश्वसन् ।  
> कौसल्यां पार्श्वतो दृष्ट्वा ततश्चिन्तामुपागमत् ॥ ३ ॥

होशमें आनेपर उन्होंने गरम-गरम लंबी साँस ली और कौसल्याको बगलमें बैठी हुई देख वे फिर चिन्तामें पड़ गये ॥ ३ ॥

> तस्य चिन्तयमानस्य प्रत्यभात् कर्म दुष्कृतम् ।  
> यदनेन कृतं पूर्वमज्ञानाच्छब्दवेधिना ॥ ४ ॥

चिन्तामें पड़े-पड़े ही उन्हें अपने एक दुष्कर्मका स्मरण हो आया, जो इन शब्दवेधी बाण चलानेवाले नरेशके द्वारा पहले अनजानमें बन गया था ॥ ४ ॥

> अमनास्तेन शोकेन रामशोकेन च प्रभुः ।  
> द्वाभ्यामपि महाराजः शोकाभ्यामभितप्यते ॥ ५ ॥

उस शोकसे तथा श्रीरामके शोकसे भी राजाके मनमें बड़ी वेदना हुई । उन दोनों ही शोकोंसे महाराज संतप्त होने लगे ॥ ५ ॥

> दह्यमानस्तु शोकाभ्यां कौसल्यामाह दुःखितः ।  
> वेपमानोऽञ्जलिं कृत्वा प्रसादार्थमवाङ्मुखः ॥ ६ ॥

उन दोनों शोकोंसे दग्ध होते हुए दुखी राजा दशरथ नीचे मुँह किये थर-थर काँपने लगे और कौसल्याको मनानेके लिये हाथ जोड़कर बोले—॥ ६ ॥

> प्रसादये त्वां कौसल्ये रचितोऽयं मयाञ्जलिः ।  
> वत्सला चानृशंसा च त्वं हि नित्यं परेष्वपि ॥ ७ ॥

‘कौसल्ये ! मैं तुमसे निहोरा करता हूँ, तुम प्रसन्न हो जाओ । देखो, मैंने ये दोनों हाथ जोड़ लिये हैं । तुम तो दूसरोंपर भी सदा वात्सल्य और दया दिखानेवाली हो ( फिर मेरे प्रति क्यों कठोर हो गयीं !) ॥ ७ ॥

> भर्ता तु खलु नारीणां गुणवान् निर्गुणोऽपि वा।  
> धर्मं विमृशमानानां प्रत्यक्षं देवि दैवतम् ॥ ८ ॥

‘देवि ! पति गुणवान् हो या गुणहीन, धर्मका विचार करनेवाली सती नारियोंके लिये वह प्रत्यक्ष देवता है ॥ ८ ॥

> सा त्वं धर्मपरा नित्यं दृष्टलोकपरावरा ।  
> नार्हसे विप्रियं वक्तुं दुःखितापि सुदुःखितम् ॥ ९ ॥

‘तुम तो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली और लोकमें भले-बुरेको समझनेवाली हो । यद्यपि तुम भी दुःखित हो तथापि मैं भी महान् दुःखमें पड़ा हुआ हूँ, अतः तुम्हें मुझसे कठोर वचन नहीं कहना चाहिये’ ॥ ९ ॥

> तद् वाक्यं करुणं राज्ञः श्रुत्वा दीनस्य भाषितम् ।  
> कौसल्या व्यसृजद् वाष्पं प्रणालीव नवोदकम्॥ १० ॥

दुखी हुए राजा दशरथके मुखसे कहे गये उस करुणाजनक वचनको सुनकर कौसल्या अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं, मानो छतकी नालीसे नूतन ( वर्षाका ) जल गिर रहा हो ॥ १० ॥

> सा मूर्ध्नि बद्ध्वा रुदती राज्ञः पद्ममिवाञ्जलिम् ।  
> सम्भ्रमादब्रवीत् त्रस्ता त्वरमाणाक्षरं वचः ॥ ११ ॥

वे अधर्मके भयसे रो पड़ीं और राजाके जुड़े हुए कमलसदृश हाथोंको अपने सिरसे सटाकर घबराहटके कारण शीघ्रतापूर्वक एक-एक अक्षरका उच्चारण करती हुई बोलीं—॥ ११ ॥

> प्रसीद शिरसा याचे भूमौ निपतितास्मि ते ।  
> याचितास्मि हता देव क्षन्तव्याहं नहि त्वया ॥ १२ ॥

‘देव ! मैं आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ । आपके चरणोंमें मस्तक रखकर याचना करती हूँ, आप प्रसन्न हों । यदि आपने उलटे मुझसे ही याचना की, तब तो मैं मारी गयी । मुझसे अपराध हुआ हो तो भी मैं आपसे क्षमा पानेके योग्य हूँ, प्रहार पानेके नहीं ॥ १२ ॥

> नैषा हि सा स्त्री भवति श्लाघनीयेन धीमता ।  
> उभयोर्लोकयोर्लोके पत्या या सम्प्रसाद्यते ॥ १३ ॥  
> जानामि धर्मं धर्मज्ञ त्वां जाने सत्यवादिनम् ।  
> पुत्रशोकार्तया तत्तु मया किमपि भाषितम् ॥ १४ ॥

‘पति अपनी स्त्रीके लिये इहलोक और परलोकमें भी स्पृहणीय है । इस जगत्में जो स्त्री अपने बुद्धिमान् पतिके द्वारा मनायी जाती है, वह कुल-स्त्री कहलानेके योग्य नहीं है ॥ ‘धर्मज्ञ महाराज ! मैं स्त्री-धर्मको जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि आप सत्यवादी हैं । इस समय मैंने जो कुछ भी न कहने योग्य बात कह दी है, वह पुत्रशोकसे पीड़ित होनेके कारण मेरे मुखसे निकल गयी है ॥ १४ ॥

> शोको नाशयते धैर्यं शोको नाशयते श्रुतम् ।  
> शोको नाशयते सर्वं नास्ति शोकसमो रिपुः ॥ १५ ॥

‘शोक धैर्यका नाश कर देता है । शोक शास्त्रज्ञान-को भी लुप्त कर देता है तथा शोक सब कुछ नष्ट कर देता है; अतः शोकके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है ॥ १५ ॥

> शक्यमापतितः सोढुं प्रहारो रिपुहस्ततः ।  
> सोढुमापतितः शोकः सुसूक्ष्मोऽपि न शक्यते ॥ १६ ॥

‘शत्रुके हाथसे अपने ऊपर पड़ा हुआ शस्त्रोंका प्रहार सह लिया जा सकता है; परंतु दैववश प्राप्त हुआ थोड़ा-सा भी शोक नहीं सहा जा सकता ॥ १६ ॥

> वनवासाय रामस्य पञ्चरात्रोऽत्र गण्यते ।  
> यः शोकहतहर्षायाः पञ्चवर्षोपमो मम ॥ १७ ॥

‘श्रीरामको वनमें गये आज पाँच रातें बीत गयीं । मैं यही गिनती रहती हूँ । शोकने मेरे हर्षको नष्ट कर दिया है, अतः ये पाँच रात मेरे लिये पाँच वर्षोंके समान प्रतीत हुई हैं ॥ १७ ॥

> तं हि चिन्तयमानायाः शोकोऽयं हृदि वर्धते ।  
> नदीनामिव वेगेन समुद्रसलिलं महत् ॥ १८ ॥

‘श्रीरामका ही चिन्तन करनेके कारण मेरे हृदयका यह शोक बढ़ता जा रहा है, जैसे नदियोंके वेगसे समुद्रका जल बहुत बढ़ जाता है’ ॥ १८ ॥

> एवं हि कथयन्त्यास्तु कौसल्यायाः शुभं वचः ।  
> मन्दरश्मिरभूत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत ॥ १९ ॥  
> अथ प्रह्लादितो वाक्यैर्देव्या कौसल्यया नृपः ।  
> शोकेन च समाक्रान्तो निद्राया वशमेयिवान् ॥ २० ॥

कौसल्या इस प्रकार शुभ वचन कह ही रही थीं कि सूर्यकी किरणें मन्द पड़ गयीं और रात्रिकाल आ पहुँचा । देवी कौसल्याकी इन बातोंसे राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई । साथ ही वे श्रीरामके शोकसे भी पीड़ित थे । इस हर्ष और शोककी अवस्थामें उन्हें नींद आ गयी ॥ १९-२० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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