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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 59"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 59

> मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि ।  
> उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे सम्प्रस्थिते वनम् ॥ १ ॥  
> उभाभ्यां राजपुत्राभ्यामथ कृत्वाहमञ्जलिम् ।  
> प्रस्थितो रथमास्थाय तद्दुःखमपि धारयन् ॥ २ ॥

‘सुमन्त्रने कहा--‘जब श्रीरामचन्द्रजी वनकी ओर प्रस्थित हुए, तब मैंने उन दोनों राजकुमारोंको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके वियोगके दुःखको हृदयमें धारण करके रथपर आरूढ़ हो उधरसे लौटा । लौटते समय मेरे घोड़े नेत्रोंसे गरम-गरम आँसू बहाने लगे । रास्ता चलनेमें उनका मन नहीं लगता था ॥ १-२ ॥

> गुहेन सार्धं तत्रैव स्थितोऽस्मि दिवसान् बहून् ।  
> आशया यदि मां रामः पुनः शब्दापयेदिति ॥ ३ ॥

‘मैं गुहके साथ कई दिनोंतक वहाँ इस आशासे ठहरा रहा कि सम्भव है, श्रीराम फिर मुझे बुला लें ॥ ३ ॥

> विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः ।  
> अपि वृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पाङ्कुरकोरकाः ॥ ४ ॥

‘महाराज ! आपके राज्यमें वृक्ष भी इस महान् संकटसे कृशकाय हो गये हैं, फूल, अङ्कुर और कलियोंसहित मुरझा गये हैं ॥ ४ ॥

> उपतप्तोदका नद्यः पल्वलानि सरांसि च ।  
> परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च ॥ ५ ॥

‘नदियों, छोटे जलाशयों तथा बड़े सरोवरोंके जल गरम हो गये हैं । वनों और उपवनोंके पत्ते सूख गये हैं ॥ ५ ॥

> न च सर्पन्ति सत्त्वानि व्याला न प्रचरन्ति च ।  
> रामशोकाभिभूतं तन्निष्कूजमभवद् वनम् ॥ ६ ॥

‘वनके जीव-जन्तु आहारके लिये भी कहीं नहीं जाते हैं । अजगर आदि सर्प भी जहाँ-के-तहाँ पड़े हैं, आगे नहीं बढ़ते हैं । श्रीरामके शोकसे पीड़ित हुआ वह सारा वन नीरव-सा हो गया है ॥ ६ ॥

> लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदकाः ।  
> संतप्तपद्माः पद्मिन्यो लीनमीनविहंगमाः ॥ ७ ॥

‘नदियोंके जल मलिन हो गये हैं । उनमें फैले हुए कमलोंके पत्ते गल गये हैं । सरोवरोंके कमल भी सूख गये हैं । उनमें रहनेवाले मत्स्य और पक्षी भी नष्टप्राय हो गये हैं ॥ ७ ॥

> जलजानि च पुष्पाणि माल्यानि स्थलजानि च ।  
> नातिभान्त्यल्पगन्धीनि फलानि च यथापुरम् ॥ ८ ॥

‘जलमें उत्पन्न होनेवाले पुष्प तथा स्थलसे पैदा होनेवाले फूल भी बहुत थोड़ी सुगन्धसे युक्त होनेके कारण अधिक शोभा नहीं पाते हैं तथा फल भी पूर्ववत् नहीं दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ८ ॥

> अत्रोद्यानानि शून्यानि प्रलीनविहगानि च ।  
> न चाभिरामानारामान् पश्यामि मनुजर्षभ ॥ ९ ॥

‘नरश्रेष्ठ ! अयोध्याके उद्यान भी सूने हो गये हैं, उनमें रहनेवाले पक्षी भी कहीं छिप गये हैं । यहाँके बगीचे भी मुझे पहलेकी भाँति मनोहर नहीं दिखायी देते हैं ॥ ९ ॥

> प्रविशन्तमयोध्यायां न कश्चिदभिनन्दति ।  
> नरा राममपश्यन्तो निःश्वसन्ति मुहुर्मुहुः ॥ १० ॥

‘अयोध्यामें प्रवेश करते समय मुझसे किसीने प्रसन्न होकर बात नहीं की । श्रीरामको न देखकर लोग बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे ॥ १० ॥

> देव राजरथं दृष्ट्वा विना राममिहागतम् ।  
> दूरादश्रुमुखः सर्वो राजमार्गे गतो जनः ॥ ११ ॥

‘देव ! सड़कपर आये हुए सब लोग राजाका रथ श्रीरामके बिना ही यहाँ लौट आया है, यह देखकर दूरसे ही आँसू बहाने लगे थे ॥ ११ ॥

> हर्म्यैर्विमानैः प्रासादैरवेक्ष्य रथमागतम् ।  
> हाहाकारकृता नार्यो रामादर्शनकर्शिताः ॥ १२ ॥

‘अट्टालिकाओं, विमानों और प्रासादोंपर बैठी हुई स्त्रियाँ वहाँसे रथको सूना ही लौटा देखकर श्रीरामको न देखनेके कारण व्यथित हो उठीं और हाहाकार करने लगीं ॥ १२ ॥

> आयतैर्विमलैर्नेत्रैरश्रुवेगपरिप्लुतैः ।  
> अन्योन्यमभिवीक्षन्तेऽव्यक्तमार्ततराः स्त्रियः ॥ १३ ॥

‘उनके कज्जल आदिसे रहित बड़े-बड़े नेत्र आँसुओंके वेगमें डूबे हुए थे । वे स्त्रियाँ अत्यन्त आर्त होकर अव्यक्त भावसे एक दूसरीकी ओर देख रही थीं ॥ १३ ॥

> नामित्राणां न मित्राणामुदासीनजनस्य च ।  
> अहमार्ततया कंचिद् विशेषं नोपलक्षये ॥ १४ ॥

‘शत्रुओं, मित्रों तथा उदासीन ( मध्यस्थ ) मनुष्योंको भी मैंने समानरूपसे दुखी देखा है। किसीके शोकमें मुझे कुछ अन्तर नहीं दिखायी दिया है ॥ १४॥

> अप्रहृष्टमनुष्या च दीननागतुरंगमा।  
> आर्तस्वरपरिम्लाना विनिःश्वसितनिःस्वना ॥ १५॥  
> निरानन्दा महाराज रामप्रव्राजनातुरा।  
> कौसल्या पुत्रहीनेव अयोध्या प्रतिभाति मे ॥ १६॥

‘महाराज ! अयोध्याके मनुष्योंका हर्ष छिन गया है । वहाँके घोड़े और हाथी भी बहुत दुखी हैं। सारी पुरी आर्तनादसे मलिन दिखायी देती है। लोगोंकी लंबी-लंबी साँसें ही इस नगरीका उच्छ्वास बन गयी हैं। यह अयोध्यापुरी श्रीरामके वनवाससे व्याकुल हुई पुत्रवियोगिनी कौसल्याकी भाँति मुझे आनन्दशून्य प्रतीत हो रही है’ ॥ १५-१६ ॥

> सूतस्य वचनं श्रुत्वा वाचा परमदीनया।  
> बाष्पोपहतया सूतमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १७॥

सुमन्त्रके वचन सुनकर राजाने उनसे अश्रु-गद्गद परम दीन वाणीमें कहा—॥ १७ ॥

> कैकेय्या विनियुक्तेन पापाभिजनभावया।  
> मया न मन्त्रकुशलैर्वृद्धैः सह समर्थितम् ॥ १८॥

‘सूत ! जो पापी कुल और पापपूर्ण देशमें उत्पन्न हुई है तथा जिसके विचार भी पापसे भरे हैं, उस कैकेयीके कहनेमें आकर मैंने सलाह देनेमें कुशल वृद्ध पुरुषोंके साथ बैठकर इस विषयमें कोई परामर्श भी नहीं किया ॥ १८ ॥

> न सुहृद्भिर्न चामात्यैर्मन्त्रयित्वा सनैगमैः।  
> मयायमर्थः सम्मोहात् स्त्रीहेतोः सहसा कृतः ॥ १९॥

‘सुहृदों, मन्त्रियों और वेदवेत्ताओंसे सलाह लिये बिना ही मैंने मोहवश केवल एक स्त्रीकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये सहसा यह अनर्थमय कार्य कर डाला है ॥ १९ ॥

> भवितव्यतया नूनमिदं वा व्यसनं महत्।  
> कुलस्यास्य विनाशाय प्राप्तं सूत यदृच्छया ॥ २०॥

‘सुमन्त्र ! होनहारवश यह भारी विपत्ति निश्चय ही इस कुलका विनाश करनेके लिये अकस्मात् आ पहुँची है ॥ २० ॥

> सूत यद्यस्ति ते किंचिन्मयापि सुकृतं कृतम्।  
> त्वं प्रापयाशु मां रामं प्राणाः संत्वरयन्ति माम् ॥२१॥

‘सारथे ! यदि मैंने तुम्हारा कभी कुछ थोड़ा-सा भी उपकार किया हो तो तुम मुझे शीघ्र ही श्रीरामके पास पहुँचा दो। मेरे प्राण मुझे श्रीरामके दर्शनके लिये शीघ्रता करनेकी प्रेरणा दे रहे हैं ॥ २१ ॥

> यद्यद्यापि ममैवाज्ञा निवर्तयतु राघवम्।  
> न शक्ष्यामि विना रामं मुहूर्तमपि जीवितुम् ॥ २२॥

‘यदि आज भी इस राज्यमें मेरी ही आज्ञा चलती हो तो तुम मेरे ही आदेशसे जाकर श्रीरामको वनसे लौटा ले आओ; क्योंकि अब मैं उनके बिना दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ २२ ॥

> अथवापि महाबाहुर्गतो दूरं भविष्यति।  
> मामेव रथमारोप्य शीघ्रं रामाय दर्शय ॥ २३॥

‘अथवा महाबाहु श्रीराम तो अब दूर चले गये होंगे, इसलिये मुझे ही रथपर बिठाकर ले चलो और शीघ्र ही रामका दर्शन कराओ ॥ २३ ॥

> वृत्तदंष्ट्रो महेष्वासः क्वासौ लक्ष्मणपूर्वजः।  
> यदि जीवामि साध्वेनं पश्येयं सीतया सह ॥ २४॥

‘कुन्दकलीके समान श्वेत दाँतोंवाले, लक्ष्मणके बड़े भाई महाधनुर्धर श्रीराम कहाँ हैं ? यदि सीताके साथ भलीभाँति उनका दर्शन कर लूँ, तभी मैं जीवित रह सकता हूँ ॥ २४ ॥

> लोहिताक्षं महाबाहुमामुक्तमणिकुण्डलम्।  
> रामं यदि न पश्येयं गमिष्यामि यमक्षयम् ॥ २५॥

‘जिनके लाल नेत्र और बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं तथा जो मणियोंके कुण्डल धारण करते हैं, उन श्रीरामको यदि मैं नहीं देखूँगा तो अवश्य यमलोकको चला जाऊँगा ॥ २५ ॥

> अतो नु किं दुःखतरं योऽहमिक्ष्वाकुनन्दनम्।  
> इमामवस्थामापन्नो नेह पश्यामि राघवम् ॥ २६॥

‘इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या होगी कि मैं इस मरणासन्न अवस्थामें पहुँचकर भी इक्ष्वाकुकुलनन्दन राघवेन्द्र श्रीरामको यहाँ नहीं देख रहा हूँ ॥ २६ ॥

> हा राम रामानुज हा हा वैदेहि तपस्विनि।  
> न मां जानीत दुःखेन म्रियमाणमनाथवत् ॥ २७॥

‘हा राम ! हा लक्ष्मण ! हा विदेहराजकुमारी तपस्विनी सीते ! तुम्हें पता नहीं होगा कि मैं किस प्रकार दुःखसे अनाथकी भाँति मर रहा हूँ’ ॥ २७ ॥

> स तेन राजा दुःखेन भृशमर्पितचेतनः।  
> अवगाढः सुदुष्पारं शोकसागरमब्रवीत् ॥ २८॥

राजा उस दुःखसे अत्यन्त अचेत हो रहे थे, अतः वे उस परम दुर्लङ्घ्य शोकसमुद्रमें निमग्न होकर बोले—॥ २८ ॥

> रामशोकमहावेगः सीताविरहपारगः।  
> श्वसितोर्मिमहावर्तो बाष्पवेगजलाविलः ॥ २९॥  
> बाहुविक्षेपमीनोऽसौ विक्रन्दितमहास्वनः।  
> प्रकीर्णकेशशैवालः कैकेयीवडवामुखः ॥ ३०॥  
> ममाश्रुवेगप्रभवः कुब्जावाक्यमहाग्रहः।  
> वरवेलो नृशंसाया रामप्रव्राजनायतः ॥ ३१॥  
> यस्मिन् बत निमग्नोऽहं कौसल्ये राघवं विना।  
> दुस्तरो जीवता देवि मयायं शोकसागरः ॥ ३२ ॥

‘देवि कौसल्ये ! मैं श्रीरामके बिना जिस शोक-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ, उसे जीते-जी पार करना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है । श्रीरामका शोक ही उस समुद्रका महान् वेग है । सीताका बिछोह ही उसका दूसरा छोर है । लंबी-लंबी साँसें उसकी लहरें और बड़ी-बड़ी भँवरें हैं । आँसुओंका वेगपूर्वक उमड़ा हुआ प्रवाह ही उसका मलिन जल है। मेरा हाथ पटकना ही उसमें उछलती हुई मछलियोंका विलास है । करुण-क्रन्दन ही उसकी महान् गर्जना है । ये बिखरे हुए केश ही उसमें उपलब्ध होनेवाले सेवार हैं । कैकेयी बड़वानल है । वह शोक-समुद्र मेरी वेगपूर्वक होनेवाली अश्रुवर्षाकी उत्पत्तिका मूल कारण है । मन्थराके कुटिलतापूर्ण वचन ही उस समुद्रके बड़े-बड़े ग्राह हैं । क्रूर कैकेयीके माँगे हुए दो वर ही उसके दो तट हैं तथा श्रीरामका वनवास ही उस शोकसागरका महान् विस्तार है ॥ २९—३२ ॥

> अशोभनं योऽहमिहाद्य राघवं  
> दिदृक्षमाणो न लभे सलक्ष्मणम् ।  
> इतीव राजा विलपन् महायशाः  
> पपात तूर्णं शयने स मूर्च्छितः ॥ ३३ ॥  
> इति विलपति पार्थिवे प्रणष्टे  
> करुणतरं द्विगुणं च रामहेतोः ।  
> वचनमनुनिशम्य तस्य देवी  
> भयमगमत् पुनरेव राममाता ॥ ३४ ॥

‘मैं लक्ष्मणसहित श्रीरामको देखना चाहता हूँ, परंतु इस समय उन्हें यहाँ देख नहीं पाता हूँ—यह मेरे बहुत बड़े पापका फल है ।’ इस तरह विलाप करते हुए महायशस्वी राजा दशरथ तुरंत ही मूर्च्छित होकर शय्यापर गिर पड़े ॥ श्रीरामचन्द्रजीके लिये इस प्रकार विलाप करते हुए राजा दशरथके मूर्च्छित हो जानेपर उनके उस अत्यन्त करुणाजनक वचनको सुनकर राममाता देवी कौसल्याको पुनः दुगुना भय हो गया ॥ ३४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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