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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 56"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 56

> अथ रात्र्यां व्यतीतायामवसुप्तमनन्तरम् ।  
> प्रबोधयामास शनैर्लक्ष्मणं रघुपुङ्गवः ॥ १ ॥

तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर रघुकुलशिरोमणि श्रीरामने अपने जागनेके बाद वहाँ सोये हुए लक्ष्मणको धीरेसे जगाया ( और इस प्रकार कहा—) ॥ १ ॥

> सौमित्रे शृणु वन्यानां वल्गु व्याहरतां स्वनम् ।  
> सम्प्रतिष्ठामहे कालः प्रस्थानस्य परंतप ॥ २ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले सुमित्राकुमार ! मीठी बोली बोलनेवाले शुक-पिक आदि जंगली पक्षियोंका कलरव सुनो । अब हमलोग यहाँसे प्रस्थान करें; क्योंकि प्रस्थानके योग्य समय आ गया है’ ॥ २ ॥

> प्रसुप्तस्तु ततो भ्रात्रा समये प्रतिबोधितः ।  
> जहौ निद्रां च तन्द्रां च प्रसक्तं च परिश्रमम् ॥ ३ ॥

सोये हुए लक्ष्मणने अपने बड़े भाईद्वारा ठीक समयपर जगा दिये जानेपर निद्रा, आलस्य तथा राह चलनेकी थकावटको दूर कर दिया ॥ ३ ॥

> तत उत्थाय ते सर्वे स्पृष्ट्वा नद्याः शिवं जलम् ।  
> पन्थानमृषिभिर्जुष्टं चित्रकूटस्य तं ययुः ॥ ४ ॥

फिर सब लोग उठे और यमुना नदीके शीतल जलमें स्नान आदि करके ऋषि-मुनियोंद्वारा सेवित चित्रकूटके उस मार्गपर चल दिये ॥ ४ ॥

> ततः सम्प्रस्थितः काले रामः सौमित्रिणा सह ।  
> सीतां कमलपत्राक्षीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥

उस समय लक्ष्मणके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए श्रीरामने कमलनयनी सीतासे इस प्रकार कहा—॥ ५ ॥

> आदीप्तानिव वैदेहि सर्वतः पुष्पितान् नगान् ।  
> स्वैः पुष्पैः किंशुकान् पश्य मालिनः शिशिरात्यये ॥ ६ ॥

‘विदेहराजनन्दिनी ! इस वसन्त ऋतुमें सब ओरसे खिले हुए इन पलाश-वृक्षोंको तो देखो । ये अपने ही पुष्पोंसे पुष्प-मालाधारी-से प्रतीत होते हैं और उन फूलोंकी अरुण प्रभाके कारण प्रज्वलित होते-से दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥

> पश्य भल्लातकान् बिल्वान् नरैरनुपसेवितान् ।  
> फलपुष्पैरवनतान् नूनं शक्ष्याम जीवितुम् ॥ ७ ॥  
> पश्य द्रोणप्रमाणानि लम्बमानानि लक्ष्मण ।  
> मधूनि मधुकारीभिः सम्भृतानि नगे नगे ॥ ८ ॥

‘देखो, ये भिलावे और बेलके पेड़ अपने फूलों और फलोंके भारसे झुके हुए हैं । दूसरे मनुष्योंका यहाँतक आना सम्भव न होनेसे ये उनके द्वारा उपयोगमें नहीं लाये गये हैं; अतः निश्चय ही इन फलोंसे हम जीवननिर्वाह कर सकेंगे’ ॥ ( फिर लक्ष्मणसे कहा—) ‘लक्ष्मण ! देखो, यहाँके एक-एक वृक्षमें मधुमक्खियोंद्वारा लगाये और पुष्ट किये गये मधुके छत्ते कैसे लटक रहे हैं । इन सबमें एक-एक द्रोण ( लगभग सोलह सेर ) मधु भरा हुआ है ॥ ८ ॥

> एष क्रोशति नत्यूहस्तं शिखी प्रतिकूजति ।  
> रमणीये वनोद्देशे पुष्पसंस्तरसंकटे ॥ ९ ॥

‘वनका यह भाग बड़ा ही रमणीय है, यहाँ फूलोंकी वर्षा-सी हो रही है और सारी भूमि पुष्पोंसे आच्छादित दिखायी देती है । इस वनप्रान्तमें यह चातक ‘पी कहाँ’ ‘पी कहाँ’ की रट लगा रहा है । उधर वह मोर बोल रहा है, मानो पपीहेकी बातका उत्तर दे रहा हो ॥ ९ ॥

> मातङ्गयूथानुसृतं पक्षिसंघानुनादितम् ।  
> चित्रकूटमिमं पश्य प्रवृद्धशिखरं गिरिम् ॥ १० ॥

‘यह रहा चित्रकूट पर्वत—इसका शिखर बहुत ऊँचा है । झुंड-के-झुंड हाथी उसी ओर जा रहे हैं और वहाँ बहुत-से पक्षी चहक रहे हैं ॥ १० ॥

> समभूमितले रम्ये द्रुमैर्बहुभिरावृते ।  
> पुण्ये रंस्यामहे तात चित्रकूटस्य कानने ॥ ११ ॥

‘तात ! जहाँकी भूमि समतल है और जो बहुत-से वृक्षोंसे भरा हुआ है, चित्रकूटके उस पवित्र काननमें हमलोग बड़े आनन्दसे विचरेंगे’ ॥ ११ ॥

> ततस्तौ पादचारेण गच्छन्तौ सह सीतया ।  
> रम्यमासेदतुः शैलं चित्रकूटं मनोरमम् ॥ १२ ॥

सीताके साथ दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पैदल ही यात्रा करते हुए यथासमय रमणीय एवं मनोरम पर्वत चित्र-कूटपर जा पहुँचे ॥ १२ ॥

> तं तु पर्वतमासाद्य नानापक्षिगणायुतम् ।  
> बहुमूलफलं रम्यं सम्पन्नसरसोदकम् ॥ १३ ॥

वह पर्वत नाना प्रकारके पक्षियोंसे परिपूर्ण था । वहाँ फल-मूलोंकी बहुतायत थी और स्वादिष्ट जल पर्याप्त मात्रामें उपलब्ध होता था । उस रमणीय शैलके समीप जाकर श्रीरामने कहा—॥ १३ ॥

> मनोज्ञोऽयं गिरिः सौम्य नानाद्रुमलतायुतः ।  
> बहुमूलफलो रम्यः स्वाजीवः प्रतिभाति मे ॥ १४ ॥

‘सौम्य ! यह पर्वत बड़ा मनोहर है । नाना प्रकारके वृक्ष और लताएँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं । यहाँ फल-मूल भी बहुत हैं; यह रमणीय तो है ही । मुझे जान पड़ता है कि यहाँ बड़े सुखसे जीवन-निर्वाह हो सकता है ॥ १४ ॥

> मुनयश्च महात्मानो वसन्त्यस्मिन्शिलोच्चये ।  
> अयं वासो भवेत् तात वयमत्र वसेमहि ॥ १५ ॥

‘इस पर्वतपर बहुत-से महात्मा मुनि निवास करते हैं । तात ! यही हमारा वासस्थान होनेयोग्य है । हम यहीं निवास करेंगे’ ॥ १५ ॥

> इति सीता च रामश्च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः ।  
> अभिगम्याश्रमं सर्वे वाल्मीकिमभिवादयन् ॥ १६ ॥

ऐसा निश्चय करके सीता, श्रीराम और लक्ष्मणने हाथ जोड़कर महर्षि वाल्मीकिके आश्रममें प्रवेश किया और सबने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ १६ ॥

> तान् महर्षिः प्रमुदितः पूजयामास धर्मवित् ।  
> आस्यतामिति चोवाच स्वागतं तं निवेद्य च ॥ १७ ॥

धर्मको जाननेवाले महर्षि उनके आगमनसे बहुत प्रसन्न हुए और ‘आपलोगोंका स्वागत है । आइये, बैठिये ।’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका आदर-सत्कार किया ॥ १७ ॥

> ततोऽब्रवीन्महाबाहुर्लक्ष्मणं लक्ष्मणाग्रजः ।  
> संनिवेद्य यथान्यायमात्मानमृषये प्रभुः ॥ १८ ॥

तदनन्तर महाबाहु भगवान् श्रीरामने महर्षिको अपना यथोचित परिचय दिया और लक्ष्मणसे कहा—॥ १८ ॥

> लक्ष्मणानय दारूणि दृढानि च वराणि च ।  
> कुरुष्वावसथं सौम्य वासे मेऽभिरतं मनः ॥ १९ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण ! तुम जंगलसे अच्छी-अच्छी मजबूत लकड़ियाँ ले आओ और रहनेके लिये एक कुटी तैयार करो । यहीं निवास करनेको मेरा जी चाहता है’ ॥ १९ ॥

> तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सौमित्रिर्विविधान् द्रुमान् ।  
> आजहार ततश्चक्रे पर्णशालामरिंदमः ॥ २० ॥

श्रीरामकी यह बात सुनकर शत्रुदमन लक्ष्मण अनेक प्रकारके वृक्षोंकी डालियाँ काट लाये और उनके द्वारा एक पर्णशाला तैयार की ॥ २० ॥

> तां निष्ठितां बद्धकटां दृष्ट्वा रामः सुदर्शनाम् ।  
> शुश्रूषमाणमेकाग्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥

वह कुटी बाहर-भीतरसे लकड़ीकी ही दीवारसे सुस्थिर बनायी गयी थी और उसे ऊपरसे छा दिया गया था, जिससे वर्षा आदिका निवारण हो । वह देखनेमें बड़ी सुन्दर लगती थी । उसे तैयार हुई देख एकाग्रचित्त होकर अपनी बात सुननेवाले लक्ष्मणसे श्रीरामने इस प्रकार कहा—॥ २१ ॥

> ऐणेयं मांसमाहृत्य शालां यक्ष्यामहे वयम् ।  
> कर्तव्यं वास्तुशमनं सौमित्रे चिरजीविभिः ॥ २२ ॥

‘सुमित्राकुमार ! हम गजकन्दका गूदा लेकर उसीसे पर्णशालाके अधिष्ठाता देवताओंका पूजन करेंगे;※ क्योंकि दीर्घ जीवनकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंको वास्तुशान्ति अवश्य करनी चाहिये ॥ २२ ॥

> मृगं हत्वाऽऽनय क्षिप्रं लक्ष्मणेह शुभेक्षण ।  
> कर्तव्यः शास्त्रदृष्टो हि विधिर्धर्ममनुस्मर ॥ २३ ॥

‘कल्याणदर्शी लक्ष्मण ! तुम ‘गजकन्द’ नामक कन्दको† उखाड़कर या खोदकर शीघ्र यहाँ ले आओ; क्योंकि शास्त्रोक्त विधिका अनुष्ठान हमारे लिये अवश्यकर्तव्य है । तुम धर्मका ही सदा चिन्तन किया करो’ ॥ २३ ॥

> भ्रातुर्वचनमाज्ञाय लक्ष्मणः परवीरहा ।  
> चकार च यथोक्तं हि तं रामः पुनरब्रवीत् ॥ २४ ॥

भाईकी इस बातको समझकर शत्रुवीरोंका वध करनेवाले लक्ष्मणने उनके कथनानुसार कार्य किया । तब श्रीरामने पुनः उनसे कहा—॥ २४ ॥

> ऐणेयं श्रपयस्वैतच्छालां यक्ष्यामहे वयम् ।  
> त्वर सौम्यमुहूर्तोऽयं ध्रुवश्च दिवसो ह्ययम् ॥ २५ ॥

‘लक्ष्मण ! इस गजकन्दको पकाओ । हम पर्णशालाके अधिष्ठाता देवताओंका पूजन करेंगे । जल्दी करो । यह सौम्य-मुहूर्त है और यह दिन भी ‘ध्रुव’‡ संज्ञक है ( अतः इसीमें यह शुभ कार्य होना चाहिये )’ ॥ २५ ॥

> स लक्ष्मणः कृष्णमृगं हत्वा मेध्यं प्रतापवान् ।  
> अथ चिक्षेप सौमित्रिः समिद्धे जातवेदसि ॥ २६ ॥  
> तत् तु पक्वं समाज्ञाय निष्टप्तं छिन्नशोणितम् ।  
> लक्ष्मणः पुरुषव्याघ्रमथ राघवमब्रवीत् ॥ २७ ॥

प्रतापी सुमित्राकुमार लक्ष्मणने पवित्र और काले छिलके-वाले गजकंदको उखाड़कर प्रज्वलित आगमें डाल दिया ॥ रक्तविकारका नाश करनेवाले* उस गजकंदको भलीभाँति पका हुआ जानकर लक्ष्मणने पुरुषसिंह श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥ २७ ॥

> अयं सर्वः समस्ताङ्गः शृतः कृष्णमृगो मया ।  
> देवता देवसंकाश यजस्व कुशलो ह्यसि ॥ २८ ॥

‘देवोपम तेजस्वी श्रीरघुनाथजी ! यह काले छिलकेवाला गजकन्द, जो बिगड़े हुए सभी अङ्गोंको ठीक करनेवाला है,† मेरेद्वारा सम्पूर्णतः पका दिया गया है । अब आप वास्तुदेवताओंका यजन कीजिये; क्योंकि आप इस कर्ममें कुशल हैं ॥ २८ ॥

> रामः स्नात्वा तु नियतो गुणवाञ्जपकोविदः ।  
> संग्रहेणाकरोत् सर्वान् मन्त्रान् सत्रावसानिकान् ॥ २९ ॥

सद्गुणसम्पन्न तथा जपकर्मके ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके शौच-संतोषादि नियमोंके पालनपूर्वक संक्षेपसे उन सभी मन्त्रोंका पाठ एवं जप किया, जिनसे वास्तुयज्ञकी पूर्ति हो जाती है ॥ २९ ॥

> इष्ट्वा देवगणान् सर्वान् विवेशावसथं शुचिः ।  
> बभूव च मनोह्लादो रामस्यामिततेजसः ॥ ३० ॥

समस्त देवताओंका पूजन करके पवित्र भावसे श्रीरामने पर्णकुटीमें प्रवेश किया । उस समय अमिततेजस्वी श्रीरामके मनमें बड़ा आह्लाद हुआ ॥ ३० ॥

> वैश्वदेवबलिं कृत्वा रौद्रं वैष्णवमेव च ।  
> वास्तुसंशमनीयानि मङ्गलानि प्रवर्तयन् ॥ ३१ ॥

तत्पश्चात् बलिवैश्वदेव कर्म, रुद्रयाग तथा वैष्णव-याग करके श्रीरामने वास्तुदोषकी शान्तिके लिये मङ्गल-पाठ किया ॥ ३१ ॥

> जपं च न्यायतः कृत्वा स्नात्वा नद्यां यथाविधि ।  
> पापसंशमनं रामश्चकार बलिमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

नदीमें विधिपूर्वक स्नान करके न्यायतः गायत्री आदि मन्त्रोंका जप करनेके अनन्तर श्रीरामने पञ्चसूना आदि दोषोंकी शान्तिके लिये उत्तम बलिकर्म सम्पन्न किया ॥३२॥

> वेदिस्थलविधानानि चैत्यान्यायतनानि च ।  
> आश्रमस्यानुरूपाणि स्थापयामास राघवः ॥ ३३ ॥

रघुनाथजीने अपनी छोटी-सी कुटीके अनुरूप ही वेदिस्थलों ( आठ दिक्पालोंके लिये बलि-समर्पणके स्थानों ), चैत्यों ( गणेश आदिके स्थानों ) तथा आयतनों ( विष्णु आदि देवोंके स्थानों ) का निर्माण एवं स्थापना की ॥३३॥

> तां वृक्षपर्णच्छदनां मनोज्ञां  
> यथाप्रदेशं सुकृतां निवाताम् ।  
> वासाय सर्वे विविशुः समेताः  
> सभां यथा देवगणाः सुधर्माम् ॥ ३४ ॥

वह मनोहर कुटी उपयुक्त स्थानपर बनी थी । उसे वृक्षोंके पत्तोंसे छाया गया था और उसके भीतर प्रचण्ड वायुसे बचनेका पूरा प्रबन्ध था । सीता, लक्ष्मण और श्रीराम सबने एक साथ उसमें निवासके लिये प्रवेश किया । ठीक वैसे ही, जैसे देवतालोग सुधर्मा सभामें प्रवेश करते हैं ॥ ३४ ॥

> सुरम्यमासाद्य तु चित्रकूटं  
> नदीं च तां माल्यवतीं सुतीर्थाम् ।  
> ननन्द हृष्टो मृगपक्षिजुष्टां  
> जहौ च दुःखं पुरविप्रवासात् ॥ ३५ ॥

चित्रकूट पर्वत बड़ा ही रमणीय था । वहाँ उत्तम तीर्थों ( तीर्थस्थान, सीढ़ी और घाटों ) से सुशोभित माल्यवती ( मन्दाकिनी ) नदी बह रही थी, जिसका बहुत-से पशु-पक्षी सेवन करते थे । उस पर्वत और नदीका सांनिध्य पाकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा हर्ष और आनन्द हुआ । वे नगरसे दूर वनमें आनेके कारण होनेवाले कष्टको भूल गये ॥ ३५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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