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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 41"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 41

> तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ ।  
> आर्तशब्दो हि संजज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे महान् ॥ १ ॥

पुरुषसिंह श्रीरामने माताओंसहित पिताके लिये दूरसे ही हाथ जोड़ रखे थे, उसी अवस्थामें जब वे रथद्वारा नगरसे बाहर निकलने लगे, उस समय रनवासकी रानियोंमें बड़ा हाहाकार मच गया ॥ १ ॥

> अनाथस्य जनस्यास्य दुर्बलस्य तपस्विनः ।  
> यो गतिः शरणं चासीत् स नाथः क नु गच्छति ॥ २ ॥

वे रोती हुई कहने लगीं—‘हाय ! जो हम अनाथ, दुर्बल और शोचनीय जनोंकी गति ( सब सुखोंकी प्राप्ति करानेवाले ) और शरण ( समस्त आपत्तियोंसे रक्षा करने वाले ) थे, वे हमारे नाथ ( मनोरथ पूर्ण करनेवाले ) श्रीराम कहाँ चले जा रहे हैं ? ॥ २ ॥

> न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् ।  
> क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क गच्छति ॥ ३ ॥

‘जो किसीके द्वारा झूठा कलंक लगाये जानेपर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध दिलानेवाली बातें नहीं कहते थे और रूठे हुए सभी लोगोंको मनाकर प्रसन्न कर लेते थे, वे दूसरोंके दुःखमें समवेदना प्रकट करनेवाले राम कहाँ जा रहे हैं ! ॥ ३ ॥

> कौसल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते ।  
> तथा यो वर्ततेऽस्मासु महात्मा क नु गच्छति ॥ ४ ॥

‘जो महातेजस्वी महात्मा श्रीराम अपनी माता कौसल्याके साथ जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही बर्ताव हमारे साथ भी करते थे, वे कहाँ चले जा रहे हैं ! ॥ ४ ॥

> कैकेय्या क्लिश्यमानेन राज्ञा संचोदितो वनम् ।  
> परित्राता जनस्यास्य जगतः क्व नु गच्छति ॥ ५ ॥

‘कैकेयीके द्वारा क्लेशमें डाले गये महाराजके वन जानेके लिये कहनेपर हमलोगोंकी अथवा समस्त जगत्की रक्षा करनेवाले श्रीरघुवीर कहाँ चले जा रहे हैं ! ॥ ५ ॥

> अहो निश्चेतनो राजा जीवलोकस्य संक्षयम् ।  
> धर्म्यं सत्यव्रतं रामं वनवासे प्रवत्स्यति ॥ ६ ॥

‘अहो ! ये राजा बड़े बुद्धिहीन हैं, जो कि जीव-जगत्के आश्रयभूत, धर्मपरायण, सत्यव्रती श्रीरामको वनवासके लिये देशनिकाला दे रहे हैं’ ॥ ६ ॥

> इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः ।  
> रुरुदुश्चैव दुःखार्ताः सस्वरं च विचुक्रुशुः ॥ ७ ॥

इस प्रकार वे सब-की-सब रानियाँ बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई गौओंकी तरह दुःखसे आर्त होकर रोने और उच्चस्वरसे क्रन्दन करने लगीं ॥ ७ ॥

> स तमन्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः ।  
> पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा चासीत् सुदुःखितः ॥ ८ ॥

अन्तःपुरमें वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्रशोकसे संतप्त हुए महाराज दशरथ बहुत दुखी हो गये ॥ ८ ॥

> नाग्निहोत्राण्यहूयन्त नापचन् गृहमेधिनः ।  
> अकुर्वन् न प्रजाः कार्यं सूर्यश्चान्तरधीयत ॥  
> व्यसृजन् कवलान् नागा गावो वत्सान् न पाययन् ।  
> पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाभ्यनन्दत ॥ १० ॥

उस दिन अग्निहोत्र बंद हो गया, गृहस्थोंके घर भोजन नहीं बना, प्रजाओंने कोई काम नहीं किया, सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, हाथियोंने मुँहमें लिया हुआ चारा छोड़ दिया, गौओंने बछड़ोंको दूध नहीं पिलाया और पहले-पहल पुत्रको जन्म देकर भी कोई माता प्रसन्न नहीं हुई ॥ ९-१० ॥

> त्रिशङ्कुर्लोहिताङ्गश्च बृहस्पतिबुधावपि ।  
> दारुणाः सोममभ्येत्य ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः ॥ ११ ॥

त्रिशंकु, मङ्गल, गुरु, बुध तथा अन्य समस्त ग्रह शुक्र, शनि आदि रातमें वक्रगतिसे चन्द्रमाके पास पहुँचकर दारुण ( क्रूरकान्तियुक्त ) होकर स्थित हो गये ॥ ११ ॥

> नक्षत्राणि गतार्चींषि ग्रहाश्च गततेजसः ।  
> विशाखाश्च सधूमाश्च नभसि प्रचकाशिरे ॥ १२ ॥

नक्षत्रोंकी कान्ति फीकी पड़ गयी और ग्रह निस्तेज हो गये । वे सब-के-सब आकाशमें विपरीत मार्गपर स्थित हो धूमाच्छन्न प्रतीत हो रहे थे ॥ १२ ॥

> कालिकानिलवेगेन महोदधिरिवोत्थितः ।  
> रामे वनं प्रव्रजिते नगरं प्रचचाल तत् ॥ १३ ॥

आकाशमें छायी हुई मेघमाला वायुके वेगसे उमड़े हुए समुद्रके समान प्रतीत होती थी । श्रीरामके वनको जाते समय वह सारा नगर जोर-जोरसे हिलने लगा ( वहाँ भूकम्प आ गया) ॥ १३ ॥

> दिशः पर्याकुलाः सर्वास्तिमिरेणेव संवृताः ।  
> न ग्रहो नापि नक्षत्रं प्रचकाशे न किंचन ॥ १४ ॥

समस्त दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, उनमें अन्धकार-सा छा गया । न कोई ग्रह प्रकाशित होता था, न नक्षत्र ॥ १४ ॥

> अकस्मान्नागरः सर्वो जनो दैन्यमुपागमत् ।  
> आहारे वा विहारे वा न कश्चिदकरोन्मनः ॥ १५ ॥

सहसा सारे नागरिक दीन दशाको प्राप्त हो गये। किसीने भी आहार या विहारमें मन नहीं लगाया ॥ १५ ॥

> शोकपर्यायसंतप्तः सततं दीर्घमुच्छ्वसन् ।  
> अयोध्यायां जनः सर्वश्चुकोश जगतीपतिम् ॥ १६ ॥

अयोध्यावासी सब लोग शोकपरम्परासे संतप्त हो निरन्तर लंबी साँस खींचते हुए राजा दशरथको कोसने लगे ॥ १६ ॥

> बाष्पपर्याकुलमुखो राजमार्गगतो जनः ।  
> न हृष्टो लभ्यते कश्चित् सर्वः शोकपरायणः ॥ १७ ॥

सड़कपर निकला हुआ कोई भी मनुष्य प्रसन्न नहीं दिखायी देता था । सबका मुख आँसुओंसे भीगा हुआ था और सभी शोकमग्न हो रहे थे ॥ १७ ॥

> न वाति पवनः शीतो न शशी सौम्यदर्शनः ।  
> न सूर्यस्तपते लोकं सर्वं पर्याकुलं जगत् ॥ १८ ॥

शीतल वायु नहीं चलती थी । चन्द्रमा सौम्य नहीं दिखायी देता था । सूर्य भी जगत्को उचित मात्रामें ताप या प्रकाश नहीं दे रहा था । सारा संसार ही व्याकुल हो उठा था ॥ १८ ॥

> अनर्थिनः सुताः स्त्रीणां भर्तारो भ्रातरस्तथा ।  
> सर्वे सर्वं परित्यज्य राममेवान्वचिन्तयन् ॥ १९ ॥

बालक माँ-बापको भूल गये । पतियोंको स्त्रियोंकी याद नहीं आती थी और भाई भाईका स्मरण नहीं करते थे—सभी सब कुछ छोड़कर केवल श्रीरामका ही चिन्तन करने लगे ॥ १९ ॥

> ये तु रामस्य सुहृदः सर्वे ते मूढचेतसः ।  
> शोकभारेण चाक्रान्ताः शयनं नैव भेजिरे ॥ २० ॥

जो श्रीरामके मित्र थे, वे सब तो और भी अपनी सुध-बुध खो बैठे थे । शोकके भारसे आक्रान्त होनेके कारण वे रातमें सोयेतक नहीं ॥ २० ॥

> ततस्त्वयोध्या रहिता महात्मना  
> पुरंदरेणेव मही सपर्वता ।  
> चचाल घोरं भयशोकदीपिता  
> सनागयोधाश्वगणा ननाद च ॥ २१ ॥

इस प्रकार सारी अयोध्यापुरी श्रीरामसे रहित होकर भय और शोकसे प्रज्वलित-सी होकर उसी प्रकार घोर हलचलमें पड़ गयी, जैसे देवराज इन्द्रसे रहित हुई मेरुपर्वत सहित यह पृथ्वी डगमगाने लगती है । हाथी, घोड़े और सैनिकोंसहित उस नगरीमें भयंकर आर्तनाद होने लगा ॥ २१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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