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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 40"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 40

> अथ रामश्च सीता च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः ।  
> उपसंगृह्य राजानं चक्रुर्दीनाः प्रदक्षिणम् ॥ १ ॥

तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीताने हाथ जोड़कर दीनभावसे राजा दशरथके चरणोंका स्पर्श करके उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की ॥ १ ॥

> तं चापि समनुज्ञाप्य धर्मज्ञः सह सीतया ।  
> राघवः शोकसम्मूढो जननीमभ्यवादयत् ॥ २ ॥

उनसे विदा लेकर सीतासहित धर्मज्ञ रघुनाथजीने माताका कष्ट देखकर शोकसे व्याकुल हो उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ २ ॥

> अन्वक्षं लक्ष्मणो भ्रातुः कौसल्यामभ्यवादयत् ।  
> अपि मातुः सुमित्राया जग्राह चरणौ पुनः ॥ ३ ॥

श्रीरामके बाद लक्ष्मणने भी पहले माता कौसल्याको प्रणाम किया, फिर अपनी माता सुमित्राके भी दोनों पैर पकड़े ॥ ३ ॥

> तं वन्दमानं रुदती माता सौमित्रिमब्रवीत् ।  
> हितकामा महाबाहुं मूर्ध्न्युपाघ्राय लक्ष्मणम् ॥ ४ ॥

अपने पुत्र महाबाहु लक्ष्मणको प्रणाम करते देख उनका हित चाहनेवाली माता सुमित्राने बेटेका मस्तक सूँघकर कहा—॥ ४ ॥

> सृष्टस्त्वं वनवासाय स्वनुरक्तः सुहृज्जने ।  
> रामे प्रमादं मा कार्षीः पुत्र भ्रातरि गच्छति ॥ ५ ॥

‘वत्स ! तुम अपने सुहृद् श्रीरामके परम अनुरागी हो, इसलिये मैं तुम्हें वनवासके लिये विदा करती हूँ । अपने बड़े भाईके वनमें इधर-उधर जाते समय तुम उनकी सेवामें कभी प्रमाद न करना ॥ ५ ॥

> व्यसनी वा समृद्धो वा गतिरेष तवानघ ।  
> एष लोके सतां धर्मो यज्ज्येष्ठवशगो भवेत् ॥ ६ ॥

‘ये संकटमें हों या समृद्धिमें, ये ही तुम्हारी परम गति हैं । निष्पाप लक्ष्मण ! संसारमें सत्पुरुषोंका यही धर्म है कि सर्वदा अपने बड़े भाईकी आज्ञाके अधीन रहें ॥ ६ ॥

> इदं हि वृत्तमुचितं कुलस्यास्य सनातनम् ।  
> दानं दीक्षा च यज्ञेषु तनुत्यागो मृधेषु हि ॥ ७ ॥

‘दान देना, यज्ञमें दीक्षा ग्रहण करना और युद्धमें शरीर त्यागना—यही इस कुलका उचित एवं सनातन आचार है’ ॥ ७ ॥

> लक्ष्मणं त्वेवमुक्त्वासौ संसिद्धं प्रियराघवम् ।  
> सुमित्रा गच्छ गच्छेति पुनः पुनरुवाच तम् ॥ ८ ॥

अपने पुत्र लक्ष्मणसे ऐसा कहकर सुमित्राने वनवासके लिये निश्चित विचार रखनेवाले सर्वप्रिय श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘बेटा ! जाओ, जाओ ( तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो ) ।’ इसके बाद वे लक्ष्मणसे फिर बोलीं—॥ ८ ॥

> रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् ।  
> अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम् ॥ ९ ॥

‘बेटा ! तुम श्रीरामको ही अपने पिता महाराज दशरथ समझो, जनकनन्दिनी सीताको ही अपनी माता सुमित्रा मानो और वनको ही अयोध्या जानो । अब सुखपूर्वक यहाँसे प्रस्थान करो’ ॥ ९ ॥

> ततः सुमन्त्रः काकुत्स्थं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।  
> विनीतो विनयज्ञश्च मातलिर्वासवं यथा ॥ १० ॥

इसके बाद जैसे मातलि इन्द्रसे कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार विनयके ज्ञाता सुमन्त्रने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामसे विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा—॥ १० ॥

> रथमारोह भद्रं ते राजपुत्र महायशः ।  
> क्षिप्रं त्वां प्रापयिष्यामि यत्र मां राम वक्ष्यसे ॥ ११ ॥

‘महायशस्वी राजकुमार श्रीराम ! आपका कल्याण हो । आप इस रथपर बैठिये । आप मुझसे जहाँ कहेंगे, वहीं मैं शीघ्र आपको पहुँचा दूँगा ॥ ११ ॥

> चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यानि वने त्वया ।  
> तान्युपक्रमितव्यानि यानि देव्या प्रचोदितः ॥ १२ ॥  
> तं रथं सूर्यसंकाशं सीता हृष्टेन चेतसा ।  
> आरुरोह वरारोहा कृत्वालंकारमात्मनः ॥ १३ ॥

‘आपको जिन चौदह वर्षोंतक वनमें रहना है, उनकी गणना आजसे ही आरम्भ हो जानी चाहिये; क्योंकि देवी कैकेयीने आज ही आपको वनमें जानेके लिये प्रेरित किया है’॥ तब सुन्दरी सीता अपने अङ्गोंमें उत्तम अलंकार धारण करके प्रसन्न चित्तसे उस सूर्यके समान तेजस्वी रथपर आरूढ़ हुईं ॥ १३ ॥

> वनवासं हि संख्याय वासांस्याभरणानि च ।  
> भर्तारमनुगच्छन्त्यै सीतायै श्वशुरो ददौ ॥ १४ ॥

पतिके साथ जानेवाली सीताके लिये उनके श्वशुरने वनवासकी वर्षसंख्या गिनकर उसके अनुसार ही वस्त्र और आभूषण दिये थे ॥ १४ ॥

> तथैवायुधजातानि भ्रातृभ्यां कवचानि च ।  
> रथोपस्थे प्रविन्यस्य सचर्म कठिनं च यत् ॥ १५ ॥

इसी प्रकार महाराजने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणके लिये जो बहुत-से अस्त्र-शस्त्र और कवच प्रदान किये थे, उन्हें रथके पिछले भागमें रखकर उन्होंने चमड़ेसे मढ़ी हुई पिटारी और खन्ती या कुदारी भी उसीपर रख दी ॥ १५ ॥

> अथो ज्वलनसंकाशं चामीकरविभूषितम् ।  
> तमारुरुहतुस्तूर्णं भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १६ ॥  
> सीतातृतीयानारूढान् दृष्ट्वा रथमचोदयत् ।  
> सुमन्त्रः सम्मतानश्वान् वायुवेगसमाञ्जवे ॥ १७ ॥

इसके बाद दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस अग्निके समान दीप्तिमान् सुवर्णभूषित रथपर शीघ्र ही आरूढ़ हो गये॥ जिनमें सीताकी संख्या तीसरी थी, उन श्रीराम आदिको रथपर आरूढ़ हुआ देख सारथि सुमन्त्रने रथको आगे बढ़ाया । उसमें जुते हुए वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंको हाँका ॥ १७ ॥

> प्रयाते तु महारण्यं चिररात्राय राघवे ।  
> बभूव नगरे मूर्च्छा बलमूर्च्छा जनस्य च ॥ १८ ॥  
> तत् समाकुलसम्भ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम् ।  
> हयसिञ्जितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम् ॥ १९ ॥

जब श्रीरामचन्द्रजी सुदीर्घकालके लिये महान् वनकी ओर जाने लगे, उस समय समस्त पुरवासियों, सैनिकों तथा दर्शकरूपमें आये हुए बाहरी लोगोंको भी मूर्च्छा आ गयी ॥ उस समय सारी अयोध्यामें महान् कोलाहल मच गया । सब लोग व्याकुल होकर घबरा उठे । मतवाले हाथी श्रीरामके वियोगसे कुपित हो उठे और इधर-उधर भागते हुए घोड़ोंके हिनहिनाने एवं उनके आभूषणोंके खनखनानेकी आवाज सब ओर गूँजने लगी ॥ १९ ॥

> ततः सबालवृद्धा सा पुरी परमपीडिता ।  
> राममेवाभिदुद्राव घर्मार्तः सलिलं यथा ॥ २० ॥

अयोध्यापुरीके आबाल वृद्ध सब लोग अत्यन्त पीड़ित होकर श्रीरामके ही पीछे दौड़े, मानो धूपसे पीड़ित हुए प्राणी पानीकी ओर भागे जाते हों ॥ २० ॥

> पार्श्वतः पृष्ठतश्चापि लम्बमानास्तदुन्मुखाः ।  
> बाष्पपूर्णमुखाः सर्वे तमूचुर्भृशनिःस्वनाः ॥ २१ ॥

उनमेंसे कुछ लोग रथके पीछे और अगल-बगलमें लटक गये । सभी श्रीरामके लिये उत्कण्ठित थे और सबके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । वे सब-के-सब उच्चस्वरसे कहने लगे—॥ २१ ॥

> संयच्छ वाजिनां रश्मीन् सूत याहि शनैः शनैः ।  
> मुखं द्रक्ष्याम रामस्य दुर्दर्शो नो भविष्यति ॥ २२ ॥

‘सूत ! घोड़ोंकी लगाम खींचो । रथको धीरे-धीरे ले चलो । हम श्रीरामका मुख देखेंगे; क्योंकि अब इस मुखका दर्शन हमलोगोंके लिये दुर्लभ हो जायगा ॥ २२ ॥

> आयसं हृदयं नूनं राममातुरसंशयम् ।  
> यद् देवगर्भप्रतिमे वनं याति न भिद्यते ॥ २३ ॥

‘निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीकी माताका हृदय लोहेका बना हुआ है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । तभी तो देवकुमारके समान तेजस्वी पुत्रके वनकी ओर जाते समय फट नहीं जाता है ॥ २३ ॥

> कृतकृत्या हि वैदेही छायेवानुगता पतिम् ।  
> न जहाति रता धर्मे मेरुमर्कप्रभा यथा ॥ २४ ॥

‘विदेहनन्दिनी सीता कृतार्थ हो गयीं; क्योंकि वे पतिव्रत-धर्ममें तत्पर रहकर छायाकी भाँति पतिके पीछे-पीछे चली जा रही हैं । वे श्रीरामका साथ उसी प्रकार नहीं छोड़ती हैं, जैसे सूर्यकी प्रभा मेरुपर्वतका त्याग नहीं करती है ॥ २४ ॥

> अहो लक्ष्मण सिद्धार्थः सततं प्रियवादिनम् ।  
> भ्रातरं देवसंकाशं यस्त्वं परिचरिष्यसि ॥ २५ ॥

‘अहो लक्ष्मण ! तुम भी कृतार्थ हो गये; क्योंकि तुम सदा प्रिय वचन बोलनेवाले अपने देवतुल्य भाईकी वनमें सेवा करोगे ॥ २५ ॥

> महत्येषा हि ते बुद्धिरेष चाभ्युदयो महान् ।  
> एष स्वर्गस्य मार्गश्च यदेनमनुगच्छसि ॥ २६ ॥

‘तुम्हारी यह बुद्धि विशाल है । तुम्हारा यह महान् अभ्युदय है और तुम्हारे लिये यह स्वर्गका मार्ग मिल गया है; क्योंकि तुम श्रीरामका अनुसरण कर रहे हो’ ॥ २६ ॥

> एवं वदन्तस्ते सोढुं न शेकुर्बाष्पमागतम् ।  
> नरास्तमनुगच्छन्ति प्रियमिक्ष्वाकुनन्दनम् ॥ २७ ॥

ऐसी बातें कहते हुए वे पुरवासी मनुष्य उमड़े हुए आँसुओंका वेग न सह सके । वे लोग सबके प्रेमपात्र इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे चले जा रहे थे ॥२७॥

> अथ राजा वृतः स्त्रीभिर्दीनाभिर्दीनचेतनः ।  
> निर्जगाम प्रियं पुत्रं द्रक्ष्यामीति ब्रुवन् गृहात् ॥ २८ ॥

उसी समय दयनीय दशाको प्राप्त हुई अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए राजा दशरथ अत्यन्त दीन होकर ‘मैं अपने प्यारे पुत्र श्रीरामको देखूँगा’ ऐसा कहते हुए महलसे बाहर निकल आये ॥ २८ ॥

> शुश्रुवे चाग्रतः स्त्रीणां रुदतीनां महास्वनः ।  
> यथा नादः करेणूनां बद्धे महति कुञ्जरे ॥ २९ ॥  
> पिता हि राजा काकुत्स्थः श्रीमान् सन्नस्तदा बभौ ।  
> परिपूर्णः शशी काले ग्रहेणोपप्लुतो यथा ॥ ३० ॥  
> स च श्रीमानचिन्त्यात्मा रामो दशरथात्मजः ।  
> सूतं संचोदयामास त्वरितं वाह्यतामिति ॥ ३१ ॥

उन्होंने अपने आगे रोती हुई स्त्रियोंका महान् आर्तनाद सुना । वह वैसा ही जान पड़ता था, जैसे बड़े हाथी यूथपतिके बाँध लिये जानेपर हथिनियोंका चीत्कार सुनायी देता है ॥ उस समय श्रीरामके पिता ककुत्स्थवंशी श्रीमान् राजा दशरथ उसी तरह खिन्न जान पड़ते थे, जैसे पर्वके समय राहुसे ग्रस्त होनेपर पूर्ण चन्द्रमा श्रीहीन प्रतीत होते हैं ॥ यह देख अचिन्त्यस्वरूप दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् रामने सुमन्त्रको प्रेरित करते हुए कहा--‘आप रथको तेजीसे चलाइये’ ॥ ३१ ॥

> रामो याहीति तं सूतं तिष्ठेति च जनस्तथा ।  
> उभयं नाशकत् सूतः कर्तुमध्वनि चोदितः ॥ ३२ ॥

एक ओर श्रीरामचन्द्रजी सारथिसे रथ हाँकनेके लिये कहते थे और दूसरी ओर सारा जनसमुदाय उन्हें ठहर जानेके लिये कहता था । इस प्रकार दुविधामें पड़कर सारथि सुमन्त्र उस मार्गपर दोनोंमेंसे कुछ न कर सके—न तो रथको आगे बढ़ा सके और न सर्वथा रोक ही सके ॥ ३२ ॥

> निर्गच्छति महाबाहौ रामे पौरजनाश्रुभिः ।  
> पतितैरभ्यवहितं प्रणनाश महीरजः ॥ ३३ ॥

महाबाहु श्रीरामके नगरसे निकलते समय पुरवासियोंके नेत्रोंसे गिरे हुए आँसुओंद्वारा भीगकर धरतीकी उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी ॥ ३३ ॥

> रुदिताश्रुपरिद्यूनं हाहाकृतमचेतनम् ।  
> प्रयाणे राघवस्यासीत् पुरं परमपीडितम् ॥ ३४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके प्रस्थान करते समय सारा नगर अत्यन्त पीड़ित हो गया । सब रोने और आँसू बहाने लगे तथा सभी हाहाकार करते-करते अचेत-से हो गये ॥ ३४ ॥

> सुस्राव नयनैः स्त्रीणामस्रमायाससम्भवम् ।  
> मीनसंक्षोभचलितैः सलिलं पङ्कजैरिव ॥ ३५ ॥

नारियोंके नेत्रोंसे उसी तरह खेदजनित अश्रु झर रहे थे, जैसे मछलियोंके उछलनेसे हिले हुए कमलोंद्वारा जलकणोंकी वर्षा होने लगती है ॥ ३५ ॥

> दृष्ट्वा तु नृपतिः श्रीमानेकचित्तगतं पुरम् ।  
> निपपातैव दुःखेन कृत्तमूल इव द्रुमः ॥ ३६ ॥

श्रीमान् राजा दशरथ सारी अयोध्यापुरीके लोगोंको एक-सा व्याकुलचित्त देखकर अत्यन्त दुःखके कारण जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति भूमिपर गिर पड़े ॥ ३६ ॥

> ततो हलहलाशब्दो जज्ञे रामस्य पृष्ठतः ।  
> नराणां प्रेक्ष्य राजानं सीदन्तं भृशदुःखितम् ॥ ३७ ॥

उस समय राजाको अत्यन्त दुःखमें मग्न हो कष्ट पाते देख श्रीरामके पीछे जाते हुए मनुष्योंका पुनः महान् कोलाहल प्रकट हुआ ॥ ३७ ॥

> हा रामेति जनाः केचिद् राममातेति चापरे ।  
> अन्तःपुरसमृद्धं च क्रोशन्तं पर्यदेवयन् ॥ ३८ ॥  
> अन्वीक्षमाणो रामस्तु विषण्णं भ्रान्तचेतसम् ।  
> राजानं मातरं चैव ददर्शानुगतौ पथि ॥ ३९ ॥

अन्तःपुरकी रानियोंके सहित राजा दशरथको उच्चस्वरसे विलाप करते देख कोई ‘हा राम !’ कहकर और कोई ‘हा राममाता !’ की पुकार मचाकर करुणक्रन्दन करने लगे ॥ उस समय श्रीरामचन्द्रजीने पीछे घूमकर देखा तो उन्हें विषादग्रस्त तथा भ्रान्तचित्त पिता राजा दशरथ और दुःखमें डूबी हुई माता कौसल्या दोनों ही मार्गपर अपने पीछे आते हुए दिखायी दिये ॥ ३९ ॥

> स बद्ध इव पाशेन किशोरो मातरं यथा ।  
> धर्मपाशेन संयुक्तः प्रकाशं नाभ्युदैक्षत ॥ ४० ॥

जैसे रस्सीमें बँधा हुआ घोड़ेका बच्चा अपनी माको नहीं देख पाता, उसी प्रकार धर्मके बन्धनमें बँधे हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी माताकी ओर स्पष्टरूपसे न देख सके ॥ ४० ॥

> पदातिनौ च यानार्हावदुःखार्हौ सुखोचितौ ।  
> दृष्ट्वा संचोदयामास शीघ्रं याहीति सारथिम् ॥ ४१ ॥

जो सवारीपर चलने योग्य, दुःख भोगनेके अयोग्य और सुख भोगनेके ही योग्य थे, उन माता-पिताको पैदल ही अपने पीछे-पीछे आते देख श्रीरामचन्द्रजीने सारथिको शीघ्र रथ हाँकनेके लिये प्रेरित किया ॥ ४१ ॥

> नहि तत् पुरुषव्याघ्रो दुःखजं दर्शनं पितुः ।  
> मातुश्च सहितुं शक्तस्तोत्त्रैर्नुन्न इव द्विपः ॥ ४२ ॥  
> प्रत्यगारमिवायान्ती सवत्सा वत्सकारणात् ।  
> बद्धवत्सा यथा धेनू राममाताभ्यधावत ॥ ४३ ॥  
> तथा रुदन्तीं कौसल्यां रथं तमनुधावतीम् ।  
> क्रोशन्तीं राम रामेति हा सीते लक्ष्मणेति च ॥ ४४ ॥  
> रामलक्ष्मणसीतार्थं स्रवन्तीं वारि नेत्रजम् ।  
> असकृत् प्रैक्षत स तां नृत्यन्तीमिव मातरम् ॥ ४५ ॥

जैसे अङ्कुशसे पीड़ित किया हुआ गजराज उस कष्टको नहीं सहन कर पाता है, उसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीरामके लिये माता-पिताको इस दुःखद अवस्थामें देखना असह्य हो गया ॥ जैसे बँधे हुए बछड़ेवाली सवत्सा गौ शामको घरकी ओर लौटते समय बछड़ेके स्नेहसे दौड़ी चली आती है, उसी प्रकार श्रीरामकी माता कौसल्या उनकी ओर दौड़ी आ रही थीं ॥ ‘हा राम ! हा राम ! हा सीते ! हा लक्ष्मण !’ की रट लगाती और रोती हुई कौसल्या उस रथके पीछे दौड़ रही थीं । वे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके लिये नेत्रोंसे आँसू बहा रही थीं एवं इधर-उधर नाचती—चक्कर लगाती-सी डोल रही थीं । इस अवस्थामें माता कौसल्याको श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार देखा ॥ ४४-४५ ॥

> तिष्ठेति राजा चुक्रोश याहि याहीति राघवः ।  
> सुमन्त्रस्य बभूवात्मा चक्रयोरिव चान्तरा ॥ ४६ ॥

राजा दशरथ चिल्लाकर कहते थे—‘सुमन्त्र ! ठहरो ।’ किंतु श्रीरामचन्द्रजी कहते थे—‘आगे बढ़िये, शीघ्र आगे बढ़िये ।’ उन दो प्रकारके आदेशोंमें पड़े हुए बेचारे सुमन्त्रका मन उस समय दो पहियोंके बीचमें फँसे हुए मनुष्यका-सा हो रहा था ॥ ४६ ॥

> नाश्रौषमिति राजानमुपालब्धोऽपि वक्ष्यसि ।  
> चिरं दुःखस्य पापिष्ठमिति रामस्तमब्रवीत् ॥ ४७ ॥

उस समय श्रीरामने सुमन्त्रसे कहा—‘यहाँ अधिक विलम्ब करना मेरे और पिताजीके लिये दुःख ही नहीं, महान् दुःखका कारण होगा; इसलिये रथ आगे बढ़ाइये । लौटनेपर महाराज उलाहना दें तो कह दीजियेगा, मैंने आपकी बात नहीं सुनी’ ॥ ४७ ॥

> स रामस्य वचः कुर्वन्ननुज्ञाप्य च तं जनम् ।  
> व्रजतोऽपि हयाञ्शीघ्रं चोदयामास सारथिः ॥ ४८ ॥

अन्तमें श्रीरामके ही आदेशका पालन करते हुए सारथिने पीछेसे आनेवाले लोगोंसे जानेकी आज्ञा ली और स्वतः चलते हुए घोड़ोंको भी तीव्रगतिसे चलनेके लिये हाँका ॥ ४८ ॥

> न्यवर्तत जनो राज्ञो रामं कृत्वा प्रदक्षिणम् ।  
> मनसाप्याशुवेगेन न न्यवर्तत मानुषम् ॥ ४९ ॥  
> यमिच्छेत् पुनरायातं नैनं दूरमनुव्रजेत् ।  
> इत्यमात्या महाराजमूचुर्दशरथं वचः ॥ ५० ॥

राजा दशरथके साथ आनेवाले लोग मन-ही-मन श्रीरामकी परिक्रमा करके शरीरमात्रसे लौटे ( मनसे नहीं लौटे ); क्योंकि वह उनके रथकी अपेक्षा भी तीव्रगामी था । दूसरे मनुष्योंका समुदाय शीघ्रगामी मन और शरीर दोनोंसे ही नहीं लौटा (वे सब लोग श्रीरामके पीछे-पीछे दौड़े चले गये) ॥ इधर मन्त्रियोंने महाराज दशरथसे कहा—‘राजन् ! जिसके लिये यह इच्छा की जाय कि वह पुनः शीघ्र लौट आये, उसके पीछे दूरतक नहीं जाना चाहिये’ ॥ ५० ॥

> तेषां वचः सर्वगुणोपपन्नः  
> प्रखिन्नगात्रः प्रविषण्णरूपः ।  
> निशम्य राजा कृपणः सभार्यो  
> व्यवस्थितस्तं सुतमीक्षमाणः ॥ ५१ ॥

सर्वगुणसम्पन्न राजा दशरथका शरीर पसीनेसे भीग रहा था । वे विषादके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते थे । अपने मन्त्रियोंकी उपर्युक्त बात सुनकर वे वहीं खड़े हो गये और रानियोंसहित अत्यन्त दीनभावसे पुत्रकी ओर देखने लगे ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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