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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 39"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 39

> रामस्य तु वचः श्रुत्वा मुनिवेषधरं च तम् ।  
> समीक्ष्य सह भार्याभी राजा विगतचेतनः ॥ १ ॥

श्रीरामकी बात सुनकर और उन्हें मुनिवेष धारण किये देख स्त्रियोंसहित राजा दशरथ शोकसे अचेत हो गये ॥ १ ॥

> नैनं दुःखेन संतप्तः प्रत्यवैक्षत राघवम् ।  
> न चैनमभिसम्प्रेक्ष्य प्रत्यभाषत दुर्मनाः ॥ २ ॥

दुःखसे संतप्त होनेके कारण वे श्रीरामकी ओर भर आँख देख भी न सके और देखकर भी मनमें दुःख होनेके कारण उन्हें कुछ उत्तर न दे सके ॥ २ ॥

> स मुहूर्तमिवासंज्ञो दुःखितश्च महीपतिः ।  
> विललाप महाबाहू राममेवानुचिन्तयन् ॥ ३ ॥

दो घड़ीतक अचेत-सा रहनेके बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे महाबाहु नरेश श्रीरामका ही चिन्तन करते हुए दुखी होकर विलाप करने लगे—॥ ३ ॥

> मन्ये खलु मया पूर्वं विवत्सा बहवः कृताः ।  
> प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम् ॥ ४ ॥

‘मालूम होता है, मैंने पूर्वजन्ममें अवश्य ही बहुत-सी गौओंका उनके बछड़ोंसे बिछोह कराया है अथवा अनेक प्राणियोंकी हिंसा की है, इसीसे आज मेरे ऊपर यह संकट आ पड़ा है ॥ ४ ॥

> न त्वेवानागते काले देहाच्च्यवति जीवितम् ।  
> कैकेय्या क्लिश्यमानस्य मृत्युर्मम न विद्यते ॥ ५ ॥

‘समय पूरा हुए बिना किसीके शरीरसे प्राण नहीं निकलते; तभी तो कैकेयीके द्वारा इतना क्लेश पानेपर भी मेरी मृत्यु नहीं हो रही है ॥ ५ ॥

> योऽहं पावकसंकाशं पश्यामि पुरतः स्थितम् ।  
> विहाय वसने सूक्ष्मे तापसाच्छादमात्मजम् ॥ ६ ॥  
> एकस्याः खलु कैकेय्याः कृतेऽयं खिद्यते जनः ।  
> स्वार्थे प्रयतमानायाः संश्रित्य निकृतिं त्विमाम् ॥ ७ ॥

‘ओह ! अपने अग्निके समान तेजस्वी पुत्रको महीन वस्त्र त्यागकर तपस्वियोंके-से वल्कल-वस्त्र धारण किये सामने खड़ा देख रहा हूँ ( फिर भी मेरे प्राण नहीं निकलते हैं ) ॥ ‘इस वरदानरूप शठताका आश्रय लेकर अपने स्वार्थ-साधनके प्रयत्नमें लगी हुई एकमात्र कैकेयीके कारण ये सब लोग महान् कष्टमें पड़ गये हैं’ ॥ ७ ॥

> एवमुक्त्वा तु वचनं बाष्पेण विहतेन्द्रियः।  
> रामेति सकृदेवोक्त्वा व्याहर्तुं न शशाक सः ॥ ८ ॥

ऐसी बात कहते-कहते राजाके नेत्रोंमें आँसू भर आये । उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं और वे एक ही बार ‘हे राम !’ कहकर मूर्च्छित हो गये । आगे कुछ न बोल सके ॥ ८ ॥

> संज्ञां तु प्रतिलभ्यैव मुहूर्तात् स महीपतिः।  
> नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥

दो घड़ी बाद होशमें आते ही वे महाराज आँसू-भरे नेत्रोंसे देखते हुए सुमन्त्रसे इस प्रकार बोले—॥ ९ ॥

> औपवाह्यं रथं युक्त्वा त्वमायाहि हयोत्तमैः।  
> प्रापयैनं महाभागमितो जनपदात् परम् ॥ १० ॥

‘तुम सवारीके योग्य एक रथको उसमें उत्तम घोड़े जोतकर यहाँ ले आओ और इन महाभाग श्रीरामको उसपर बिठाकर इस जनपदसे बाहरतक पहुँचा आओ ॥ १० ॥

> एवं मन्ये गुणवतां गुणानां फलमुच्यते।  
> पित्रा मात्रा च यत्साधुर्वीरो निर्वास्यते वनम् ॥ ११ ॥  
> राज्ञो वचनमाज्ञाय सुमन्त्रः शीघ्रविक्रमः।  
> योजयित्वा ययौ तत्र रथमश्वैरलंकृतम् ॥ १२ ॥

‘अपने श्रेष्ठ वीर पुत्रको स्वयं पिता-माता ही जब घरसे निकालकर वनमें भेज रहे हैं, तब ऐसा मालूम होता है कि शास्त्रमें गुणवान् पुरुषोंके गुणोंका यही फल बताया जाता है’ ॥ राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करके शीघ्रगामी सुमन्त्र गये और उत्तम घोड़ोंसे सुशोभित रथ जोतकर ले आये ॥ १२ ॥

> तं रथं राजपुत्राय सूतः कनकभूषितम्।  
> आचचक्षेऽञ्जलिं कृत्वा युक्तं परमवाजिभिः ॥ १३ ॥

फिर सूत सुमन्त्रने हाथ जोड़कर कहा—‘महाराज ! राजकुमार श्रीरामके लिये उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ सुवर्णभूषित रथ तैयार है’ ॥ १३ ॥

> राजा सत्वरमाहूय व्यापृतं वित्तसंचये।  
> उवाच देशकालज्ञो निश्चितं सर्वतः शुचिः ॥ १४ ॥

तब देश और कालको समझनेवाले, सब ओरसे शुद्ध ( इहलोक और परलोकसे उऋण ) राजा दशरथने तुरंत ही धन-संग्रहके व्यापारमें नियुक्त कोषाध्यक्षको बुलाकर यह निश्चित बात कही—॥ १४ ॥

> वासांसि च वरार्हाणि भूषणानि महान्ति च।  
> वर्षाण्येतानि संख्याय वैदेह्याः क्षिप्रमानय ॥ १५ ॥

‘तुम विदेहकुमारी सीताके पहननेयोग्य बहुमूल्य वस्त्र और महान् आभूषण जो चौदह वर्षोंके लिये पर्याप्त हों गिनकर शीघ्र ले आओ’ ॥ १५ ॥

> नरेन्द्रेणैवमुक्तस्तु गत्वा कोशगृहं ततः।  
> प्रायच्छत् सर्वमाहृत्य सीतायै क्षिप्रमेव तत् ॥ १६ ॥

महाराजके ऐसा कहनेपर कोषाध्यक्षने खजानेमें जा वहाँसे सब चीजें लाकर शीघ्र ही सीताको समर्पित कर दीं ॥ १६ ॥

> सा सुजाता सुजातानि वैदेही प्रस्थिता वनम्।  
> भूषयामास गात्राणि तैर्विचित्रैर्विभूषणैः ॥ १७ ॥

उत्तम कुलमें उत्पन्न अथवा अयोनिजा और वनवासके लिये प्रस्थित विदेहकुमारी सीताने सुन्दर लक्षणोंसे युक्त अपने सभी अङ्गोंको उन विचित्र आभूषणोंसे विभूषित किया ॥ १७ ॥

> व्यराजयत वैदेही वेश्म तत् सुविभूषिता।  
> उद्यतोऽंशुमतः काले खं प्रभेव विवस्वतः ॥ १८ ॥  
> तां भुजाभ्यां परिष्वज्य श्वश्रूर्वचनमब्रवीत्।  
> अनाचरन्तीं कृपणं मूर्ध्न्युपाघ्राय मैथिलीम् ॥ १९ ॥  
> असत्यः सर्वलोकेऽस्मिन् सततं सत्कृताः प्रियैः।  
> भर्तारं नानुमन्यन्ते विनिपातगतं स्त्रियः ॥ २० ॥

उन आभूषणोंसे विभूषित हुई विदेहनन्दिनी सीता उस घरको उसी प्रकार सुशोभित करने लगीं, जैसे प्रातःकाल उगते हुए अंशुमाली सूर्यकी प्रभा आकाशको प्रकाशित करती है ॥ उस समय सास कौसल्याने कभी दुःखद बर्ताव न करनेवाली मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया और उनके मस्तकको सूँघकर कहा—॥ ‘बेटी ! जो स्त्रियाँ अपने प्रियतम पतिके द्वारा सदा सम्मानित होकर भी संकटमें पड़नेपर उसका आदर नहीं करती हैं, वे इस सम्पूर्ण जगत्में ‘असती’ ( दुष्टा ) के नामसे पुकारी जाती हैं ॥ २० ॥

> एष स्वभावो नारीणामनुभूय पुरा सुखम्।  
> अल्पामप्यापदं प्राप्य दुष्यन्ति प्रजहत्यपि ॥ २१ ॥

‘दुष्टा स्त्रियोंका यह स्वभाव होता है कि पहले तो वे पतिके द्वारा यथेष्ट सुख भोगती हैं, परंतु जब वह थोड़ी-सी भी विपत्तिमें पड़ता है, तब उसपर दोषारोपण करती और उसका साथ छोड़ देती हैं ॥ २१ ॥

> असत्यशीला विकृताः दुर्गा अहृदयाः सदा।  
> असत्यः पापसंकल्पाः क्षणमात्रविरागिणः ॥ २२ ॥

‘जो झूठ बोलनेवाली, विकृत चेष्टा करनेवाली, दुष्ट पुरुषोंसे संसर्ग रखनेवाली, पतिके प्रति सदा हृदयहीनताका परिचय देनेवाली, कुलटा, पापके ही मनसूबे बाँधनेवाली और छोटी-सी बातके लिये भी क्षणमात्रमें पतिकी ओरसे विरक्त हो जानेवाली हैं, वे सब-की-सब असती या दुष्टा कही गयी हैं ॥ २२ ॥

> न कुलं न कृतं विद्या न दत्तं नापि संग्रहः ।  
> स्त्रीणां गृह्णाति हृदयमनित्यहृदया हि ताः ॥ २३ ॥

‘उत्तम कुल, किया हुआ उपकार, विद्या, भूषण आदिका दान और संग्रह ( पतिके द्वारा स्नेहपूर्वक अपनाया जाना ); यह सब कुछ दुष्टा स्त्रियोंके हृदयको नहीं वशमें कर पाता है; क्योंकि उनका चित्त अव्यवस्थित होता है ॥ २३ ॥

> साध्वीनां तु स्थितानां तु शीले सत्ये श्रुते स्थिते ।  
> स्त्रीणां पवित्रं परमं पतिरेको विशिष्यते ॥ २४ ॥

‘इसके विपरीत जो सत्य, सदाचार, शास्त्रोंकी आज्ञा और कुलोचित मर्यादाओंमें स्थित रहती हैं, उन साध्वी स्त्रियोंके लिये एकमात्र पति ही परम पवित्र एवं सर्वश्रेष्ठ देवता है ॥ २४ ॥

> स त्वया नावमन्तव्यः पुत्रः प्रव्राजितो वनम् ।  
> तव देवसमस्त्वेष निर्धनः सधनोऽपि वा ॥ २५ ॥

‘इसलिये तुम मेरे पुत्र श्रीरामका, जिन्हें वनवासकी आज्ञा मिली है, कभी अनादर न करना । ये निर्धन हों या धनी, तुम्हारे लिये देवताके तुल्य हैं’ ॥ २५ ॥

> विज्ञाय वचनं सीता तस्या धर्मार्थसंहितम् ।  
> कृत्वाञ्जलिमुवाचेदं श्वश्रूमभिमुखे स्थिता ॥ २६ ॥

सासके धर्म और अर्थयुक्त वचनोंका तात्पर्य भलीभाँति समझकर उनके सामने खड़ी हुई सीताने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा—॥ २६ ॥

> करिष्ये सर्वमेवाहमार्या यदनुशास्ति माम् ।  
> अभिज्ञास्मि यथा भर्तुर्वर्तितव्यं श्रुतं च मे ॥ २७ ॥

‘आर्ये ! आप मेरे लिये जो कुछ उपदेश दे रही हैं, मैं उसका पूर्णरूपसे पालन करूँगी । स्वामीके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, यह मुझे भलीभाँति विदित है; क्योंकि इस विषयको मैंने पहलेसे ही सुन रखा है ॥ २७ ॥

> न मामसज्जनेनार्या समानयितुमर्हति ।  
> धर्माद् विचलितुं नाहमलं चन्द्रादिव प्रभा ॥ २८ ॥

‘पूजनीया माताजी ! आपको मुझे असती स्त्रियोंके समान नहीं मानना चाहिये; क्योंकि जैसे प्रभा चन्द्रमासे दूर नहीं हो सकती, उसी प्रकार मैं पतिव्रत-धर्मसे विचलित नहीं हो सकती ॥ २८ ॥

> नातन्त्री वाद्यते वीणा नाचक्रो विद्यते रथः ।  
> नापतिः सुखमेधेन या स्यादपि शतात्मजा ॥ २९ ॥

‘जैसे बिना तारकी वीणा नहीं बज सकती और बिना पहियेका रथ नहीं चल सकता है, उसी प्रकार नारी सौ बेटोंकी माता होनेपर भी बिना पतिके सुखी नहीं हो सकती ॥ २९ ॥

> मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः ।  
> अमितस्य तु दातारं भर्तारं का न पूजयेत् ॥ ३० ॥

‘पिता, भ्राता और पुत्र—ये परिमित सुख प्रदान करते हैं, परंतु पति अपरिमित सुखका दाता है—उसकी सेवासे इहलोक और परलोक दोनोंमें कल्याण होता है; अतः ऐसी कौन स्त्री है, जो अपने पतिका सत्कार नहीं करेगी ॥ ३० ॥

> साहमेवंगता श्रेष्ठा श्रुतधर्मपरावरा ।  
> आर्ये किमवमन्येयं स्त्रिया भर्ता हि दैवतम् ॥ ३१ ॥

‘आर्ये ! मैंने श्रेष्ठ स्त्रियों—माता आदिके मुखसे नारीके सामान्य और विशेष धर्मोंका श्रवण किया है । इस प्रकार पातिव्रत्यका महत्त्व जानकर भी मैं पतिका क्यों अपमान करूँगी ? मैं जानती हूँ कि पति ही स्त्रीका देवता है’ ॥ ३१ ॥

> सीताया वचनं श्रुत्वा कौसल्या हृदयङ्गमम् ।  
> शुद्धसत्त्वा मुमोचाश्रु सहसा दुःखहर्षजम् ॥ ३२ ॥

सीताका यह मनोहर वचन सुनकर शुद्ध अन्तः-करणवाली देवी कौसल्याके नेत्रोंसे सहसा दुःख और हर्षके आँसू बहने लगे ॥ ३२ ॥

> तां प्राञ्जलिरभिप्रेक्ष्य मातृमध्येऽतिसत्कृताम् ।  
> रामः परमधर्मात्मा मातरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ३३ ॥

तब परम धर्मात्मा श्रीरामने माताओंके बीचमें अत्यन्त सम्मानित होकर खड़ी हुई माता कौसल्याकी ओर देख हाथ जोड़कर कहा—॥ ३३ ॥

> अम्ब मा दुःखिता भूत्वा पश्येस्त्वं पितरं मम ।  
> क्षयोऽपि वनवासस्य क्षिप्रमेव भविष्यति ॥ ३४ ॥

‘माँ ! ( इन्हींके कारण मेरे पुत्रका वनवास हुआ है; ऐसा समझकर ) तुम मेरे पिताजीकी ओर दुःखित होकर न देखना । वनवासकी अवधि भी शीघ्र ही समाप्त हो जायगी ॥ ३४ ॥

> सुप्तायास्ते गमिष्यन्ति नव वर्षाणि पञ्च च ।  
> समग्रमिह सम्प्राप्तं मां द्रक्ष्यसि सुहृद्वृतम् ॥ ३५ ॥

‘ये चौदह वर्ष तो तुम्हारे सोते-सोते निकल जायँगे, फिर एक दिन देखोगी कि मैं अपने सुहृदोंसे घिरा हुआ सीता और लक्ष्मणके साथ सम्पूर्णरूपसे यहाँ आ पहुँचा हूँ’ ॥ ३५ ॥

> एतावदभिनीतार्थमुक्त्वा स जननीं वचः ।  
> त्रयः शतशतार्धा हि ददर्शावेक्ष्य मातरः ॥ ३६ ॥  
> ताश्चापि स तथैवार्ता मातृर्दशरथात्मजः ।  
> धर्मयुक्तमिदं वाक्यं निजगाद कृताञ्जलिः ॥ ३७ ॥

मातासे इस प्रकार अपना निश्चित अभिप्राय बताकर दशरथनन्दन श्रीरामने अपनी अन्य साढ़े तीन सौ माताओंकी ओर दृष्टिपात किया और उनको भी कौसल्याकी ही भाँति शोकाकुल पाया । तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन सबसे यह धर्मयुक्त बात कही—॥ ३६-३७ ॥

> संवासात् परुषं किंचिदज्ञानादपि यत् कृतम् ।  
> तन्मे समुपजानीत सर्वांश्चामन्त्रयामि वः ॥ ३८ ॥

‘माताओ ! सदा एक साथ रहनेके कारण मैंने जो कुछ कठोर वचन कह दिये हों अथवा अनजानमें भी मुझसे जो अपराध बन गये हों, उनके लिये आप मुझे क्षमा कर दें । मैं आप सब माताओंसे विदा माँगता हूँ’ ॥ ३८ ॥

> वचनं राघवस्यैतद् धर्मयुक्तं समाहितम् ।  
> शुश्रुवुस्ताः स्त्रियः सर्वाः शोकोपहतचेतसः ॥ ३९ ॥

राजा दशरथकी उन सभी स्त्रियोंने श्रीरघुनाथजीका यह समाधानकारी धर्मयुक्त वचन सुना, सुनकर उन सबका चित्त शोकसे व्याकुल हो गया ॥ ३९ ॥

> जज्ञेऽथ तासां संनादः क्रौञ्चीनामिव निःस्वनः ।  
> मानवेन्द्रस्य भार्याणामेवं वदति राघवे ॥ ४० ॥

श्रीरामके ऐसी बात कहते समय महाराज दशरथकी रानियाँ कुररियोंके समान विलाप करने लगीं । उनका वह आर्तनाद उस राजभवनमें सब ओर गूँज उठा ॥ ४० ॥

> मुरजपणवमेघघोषवद्  
> दशरथवेश्म बभूव यत् पुरा ।  
> विलपितपरिदेवनाकुलं  
> व्यसनगतं तदभूत् सुदुःखितम् ॥

राजा दशरथका जो भवन पहले मुरज, पणव और मेघ आदि वाद्योंके गम्भीर घोषसे गूँजता रहता था, वही विलाप और रोदनसे व्याप्त हो संकटमें पड़कर अत्यन्त दुःखमय प्रतीत होने लगा ॥ ४१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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