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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 34"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 34

> ततः कमलपत्राक्षः श्यामो निरुपमो महान्।  
> उवाच रामस्तं सूतं पितुराख्याहि मामिति ॥ १ ॥  
> स रामप्रेषितः क्षिप्रं संतापकलुषेन्द्रियम्।  
> प्रविश्य नृपतिं सूतो निःश्वसन्तं ददर्श ह ॥ २ ॥

जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमारहित महापुरुष श्रीरामने सूत सुमन्त्रसे कहा—‘आप पिताजीको मेरे आगमनकी सूचना दे दीजिये’ तब श्रीरामकी प्रेरणासे शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्रने राजाका दर्शन किया। उनकी सारी इन्द्रियाँ संतापसे कलुषित हो रही थीं। वे लंबी साँस खींच रहे थे ॥ १-२ ॥

> उपरक्तमिवादित्यं भस्मच्छन्नमिवानलम्।  
> तटाकमिव निस्तोयमपश्यज्जगतीपतिम् ॥ ३ ॥  
> आबोध्य च महाप्राज्ञः परमाकुलचेतनम्।  
> राममेवानुशोचन्तं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ ४ ॥

सुमन्त्रने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राखसे ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाबके समान श्रीहीन हो रहे हैं। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीरामका ही चिन्तन कर रहे हैं। तब महाप्राज्ञ सूतने महाराजको सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा ॥ ३–४ ॥

> तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा।  
> भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत् ॥ ५ ॥

पहले तो सूत सुमन्त्रने विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाराजकी अभ्युदय-कामना की; फिर भयसे व्याकुल मन्द-मधुर वाणीद्वारा यह बात कही—॥ ५ ॥

> अयं स पुरुषव्याघ्रो द्वारि तिष्ठति ते सुतः।  
> ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा सर्वं चैवोपजीविनाम् ॥ ६ ॥  
> स त्वां पश्यतु भद्रं ते रामः सत्यपराक्रमः।  
> सर्वान् सुहृद आपृच्छ्य त्वां हीदानीं दिदृक्षते ॥ ७ ॥  
> गमिष्यति महारण्यं तं पश्य जगतीपते।  
> वृतं राजगुणैः सर्वैरादित्यमिव रश्मिभिः ॥ ८ ॥

‘पृथ्वीनाथ ! आपके पुत्र ये सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों तथा आश्रित सेवकोंको अपना सारा धन देकर द्वारपर खड़े हैं। आपका कल्याण हो, ये अपने सब सुहृदोंसे मिलकर—उनसे विदा लेकर इस समय आपका दर्शन करना चाहते हैं । आज्ञा हो तो यहाँ आकर आपका दर्शन करें । राजन् ! अब ये विशाल वनमें चले जायँगे, अतः किरणोंसे युक्त सूर्यकी भाँति समस्त राजोचित गुणसे सम्पन्न इन श्रीरामको आप भी जी भरकर देख लीजिये’ ॥ ६–८ ॥

> स सत्यवाक्यो धर्मात्मा गाम्भीर्यात् सागरोपमः।  
> आकाश इव निष्पङ्को नरेन्द्रः प्रत्युवाच तम् ॥ ९ ॥

यह सुनकर समुद्रके समान गम्भीर तथा आकाशकी भाँति निर्मल, सत्यवादी धर्मात्मा महाराज दशरथने उन्हें उत्तर दिया—॥ ९ ॥

> सुमन्त्रानय मे दारान् ये केचिदिह मामकाः।  
> दारैः परिवृतः सर्वैर्द्रष्टुमिच्छामि राघवम् ॥ १० ॥

‘सुमन्त्र ! यहाँ जो कोई भी मेरी स्त्रियाँ हैं, उन सबको बुलाओ । उन सबके साथ मैं श्रीरामको देखना चाहता हूँ’ ॥ १० ॥

> सोऽन्तःपुरमतीत्यैव स्त्रियस्ता वाक्यमब्रवीत् ।  
> आर्यो ह्वयति वो राजा गम्यतां तत्र मा चिरम् ॥ ११ ॥

तब सुमन्त्रने बड़े वेगसे अन्तःपुरमें जाकर सब स्त्रियोंसे कहा—‘देवियो ! आपलोगोंको महाराज बुला रहे हैं, अतः वहाँ शीघ्र चलें’ ॥ ११ ॥

> एवमुक्ताः स्त्रियः सर्वाः सुमन्त्रेण नृपाज्ञया ।  
> प्रचक्रमुस्तद् भवनं भर्तुराज्ञाय शासनम् ॥ १२ ॥

राजाकी आज्ञासे सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर वे सब रानियाँ स्वामीका आदेश समझकर उस भवनकी ओर चलीं ॥१२॥

> अर्धसप्तशतास्तत्र प्रमदास्ताम्रलोचनाः ।  
> कौसल्यां परिवार्याथ शनैर्जग्मुर्धृतव्रताः ॥ १३ ॥

कुछ-कुछ लाल नेत्रोंवाली साढ़े तीन सौ पतिव्रता युवती स्त्रियाँ महारानी कौसल्याको सब ओरसे घेरकर धीरे-धीरे उस भवनमें गयीं ॥ १३ ॥

> आगतेषु च दारेषु समवेक्ष्य महीपतिः ।  
> उवाच राजा तं सूतं सुमन्त्रानय मे सुतम् ॥ १४ ॥  
> स सूतो राममादाय लक्ष्मणं मैथिलीं तथा।  
> जगामाभिमुखस्तूर्णं सकाशं जगतीपतेः ॥ १५ ॥  
> स राजा पुत्रमायान्तं दृष्ट्वा चारात् कृताञ्जलिम् ।  
> उत्पपातासनात् तूर्णमार्तः स्त्रीजनसंवृतः ॥ १६ ॥

उन सबके आ जानेपर उन्हें देखकर पृथ्वीपति राजा दशरथने सूतसे कहा—‘सुमन्त्र ! अब मेरे पुत्रको ले आओ’ ॥ आज्ञा पाकर सुमन्त्र गये और श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीताको साथ लेकर शीघ्र ही महाराजके पास लौट आये ॥ महाराज दूरसे ही अपने पुत्रको हाथ जोड़कर आते देख सहसा अपने आसनसे उठ खड़े हुए। उस समय स्त्रियोंसे घिरे हुए वे नरेश शोकसे आर्त हो रहे थे ॥ १६ ॥

> सोऽभिदुद्राव वेगेन रामं दृष्ट्वा विशाम्पतिः ।  
> तमसम्प्राप्य दुःखार्तः पपात भुवि मूर्च्छितः ॥ १७ ॥

श्रीरामको देखते ही वे प्रजापालक महाराज बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े, किंतु उनके पास पहुँचनेके पहले ही दुःखसे व्याकुल हो पृथ्वीपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये ॥ १७ ॥

> तं रामोऽभ्यपतत् क्षिप्रं लक्ष्मणश्च महारथः ।  
> विसंज्ञमिव दुःखेन सशोकं नृपतिं तथा ॥ १८ ॥

उस समय श्रीराम और महारथी लक्ष्मण बड़ी तेजीसे चलकर दुःखके कारण अचेत-से हुए शोकमग्न महाराजके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥

> स्त्रीसहस्रनिनादश्च संजज्ञे राजवेश्मनि ।  
> हा हा रामेति सहसा भूषणध्वनिमिश्रितः ॥ १९ ॥

इतनेहीमें उस राजभवनके भीतर सहसा आभूषणोंकी ध्वनिके साथ सहस्रों स्त्रियोंका ‘हा राम ! हा राम !’ यह आर्तनाद गूँज उठा ॥ १९ ॥

> तं परिष्वज्य बाहुभ्यां तावुभौ रामलक्ष्मणौ ।  
> पर्यङ्के सीतया सार्धं रुदन्तः समवेशयन् ॥ २० ॥

श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई भी सीताके साथ रो पड़े और उन तीनोंने महाराजको दोनों भुजाओंसे उठाकर पलंगपर बिठा दिया ॥ २० ॥

> अथ रामो मुहूर्तस्य लब्धसंज्ञं महीपतिम् ।  
> उवाच प्राञ्जलिर्बाष्पशोकार्णवपरिप्लुतम् ॥ २१ ॥

शोकाश्रुके सागरमें डूबे हुए महाराज दशरथको दो घड़ीमें जब फिर चेत हुआ, तब श्रीरामने हाथ जोड़कर उनसे कहा—॥ २१ ॥

> आपृच्छे त्वां महाराज सर्वेषामीश्वरोऽसि नः ।  
> प्रस्थितं दण्डकारण्यं पश्य त्वं कुशलेन माम् ॥ २२ ॥

‘महाराज ! आप हमलोगोंके स्वामी हैं । मैं दण्डकारण्यको जा रहा हूँ और आपसे आज्ञा लेने आया हूँ । आप अपनी कल्याणमयी दृष्टिसे मेरी ओर देखिये ॥ २२ ॥

> लक्ष्मणं चानुजानीहि सीता चान्वेतु मां वनम् ।  
> कारणैर्बहुभिस्तथ्यैर्वार्यमाणौ न चेच्छतः ॥ २३ ॥  
> अनुजानीहि सर्वान् नः शोकमुत्सृज्य मानद ।  
> लक्ष्मणं मां च सीतां च प्रजापतिरिवात्मजान् ॥ २४ ॥  
> प्रतीक्षमाणमव्यग्रमनुज्ञां जगतीपतेः ।  
> उवाच राजा सम्प्रेक्ष्य वनवासाय राघवम् ॥ २५ ॥

‘मेरे साथ लक्ष्मणको भी वनमें जानेकी आज्ञा दीजिये । साथ ही यह भी स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वनको जाय । मैंने बहुत-से सच्चे कारण बताकर इन दोनोंको रोकनेकी चेष्टा की है, परंतु ये यहाँ रहना नहीं चाहते हैं; अतः दूसरोंको मान देनेवाले नरेश ! आप शोक छोड़कर हम सबको—मुझको, लक्ष्मणको और सीताको भी उसी तरह वनमें जानेकी आज्ञा दीजिये, जैसे ब्रह्माजीने अपने पुत्र सनकादिकोंको तपके लिये वनमें जानेकी अनुमति दी थी’ ॥ इस प्रकार शान्तभावसे वनवासके लिये राजाकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर महाराजने उनसे कहा—॥ २५ ॥

> अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहितः ।  
> अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्य माम् ॥ २६ ॥

‘रघुनन्दन ! मैं कैकेयीको दिये हुए वरके कारण मोहमें पड़ गया हूँ । तुम मुझे कैद करके स्वयं ही अब अयोध्याके राजा बन जाओ’ ॥ २६ ॥

> एवमुक्तो नृपतिना रामो धर्मभृतां वरः ।  
> प्रत्युवाचाञ्जलिं कृत्वा पितरं वाक्यकोविदः ॥ २७ ॥

महाराजके ऐसा कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने दोनों हाथ जोड़कर पिताको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २७ ॥

> भवान् वर्षसहस्राय पृथिव्या नृपते पतिः ।  
> अहं त्वरण्ये वत्स्यामि न मे राज्यस्य काङ्क्षिता ॥ २८ ॥

‘महाराज ! आप सहस्रों वर्षोंतक इस पृथ्वीके अधिपति बने रहें । मैं तो अब वनमें ही निवास करूँगा । मुझे राज्य लेनेकी इच्छा नहीं है ॥ २८ ॥

> नव पञ्च च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते ।  
> पुनः पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप ॥ २९ ॥

‘नरेश्वर ! चौदह वर्षोंतक वनमें घूम-फिरकर आपकी प्रतिज्ञा पूरी कर लेनेके पश्चात् मैं पुनः आपके युगल चरणोंमें मस्तक झुकाऊँगा’ ॥ २९ ॥

> रुदन्नार्तः प्रियं पुत्रं सत्यपाशेन संयुतः ।  
> कैकेय्या चोद्यमानस्तु मिथो राजा तमब्रवीत् ॥ ३० ॥

राजा दशरथ एक तो सत्यके बन्धनमें बँधे हुए थे, दूसरे एकान्तमें कैकेयी उन्हें श्रीरामको वनमें तुरंत भेजनेके लिये बाध्य कर रही थी—इस अवस्थामें वे आर्तभावसे रोते हुए वहाँ अपने प्रिय पुत्र श्रीरामसे बोले—॥ ३० ॥

> श्रेयसे वृद्धये तात पुनरागमनाय च ।  
> गच्छस्वारिष्टमव्यग्रः पन्थानमकुतोभयम् ॥ ३१ ॥

‘तात ! तुम कल्याणके लिये, वृद्धिके लिये और फिर लौट आनेके लिये शान्तभावसे जाओ । तुम्हारा मार्ग विघ्न-बाधाओंसे रहित और निर्भय हो ॥ ३१ ॥

> न हि सत्यात्मनस्तात धर्माभिमनसस्तव ।  
> संनिवर्तयितुं बुद्धिः शक्यते रघुनन्दन ॥ ३२ ॥  
> अद्य त्विदानीं रजनीं पुत्र मा गच्छ सर्वथा ।  
> एकाहं दर्शनेनापि साधु तावच्चराम्यहम् ॥ ३३ ॥

‘बेटा रघुनन्दन ! तुम सत्यस्वरूप और धर्मात्मा हो । तुम्हारे विचारको पलटना तो असम्भव है; परंतु रातभर और रह जाओ । सिर्फ एक रातके लिये सर्वथा अपनी यात्रा रोक दो । केवल एक दिन भी तो तुम्हें देखनेका सुख उठा लूँ ॥ ३२-३३ ॥

> मातरं मां च सम्पश्यन् वसेमामद्य शर्वरीम् ।  
> तर्पितः सर्वकामैस्त्वं श्वः काल्ये साधयिष्यसि ॥ ३४ ॥  
> दुष्करं क्रियते पुत्र सर्वथा राघव प्रिय ।  
> त्वया हि मत्प्रियार्थं तु वनमेवमुपाश्रितम् ॥ ३५ ॥

‘अपनी माताको और मुझको इस अवस्थामें देखकर आजकी इस रातमें यहीं रह जाओ । मेरे द्वारा सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंसे तृप्त होकर कल प्रातःकाल यहाँसे जाना ॥ ‘मेरे प्रिय पुत्र श्रीराम ! तुम सर्वथा दुष्कर कार्य कर रहे हो । मेरा प्रिय करनेके लिये ही तुमने इस प्रकार वनका आश्रय लिया है ॥ ३५ ॥

> न चैतन्मे प्रियं पुत्र शपे सत्येन राघव ।  
> छन्नया चलितस्त्वस्मि स्त्रिया भस्माग्निकल्पया ॥ ३६ ॥  
> वञ्चना या तु लब्धा मे तां त्वं निस्तर्तुमिच्छसि ।  
> अनया वृत्तसादिन्या कैकेय्याभिप्रचोदितः ॥ ३७ ॥

‘परंतु बेटा रघुनन्दन ! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुझे प्रिय नहीं है । मुझे तुम्हारा वनमें जाना अच्छा नहीं लगता । यह मेरी स्त्री कैकेयी राखमें छिपी हुई आगके समान भयंकर है । इसने अपने क्रूर अभिप्रायको छिपा रखा था । इसीने आज मुझे मेरे अभीष्ट संकल्पसे विचलित कर दिया है । कुलोचित सदाचारका विनाश करनेवाली इस कैकेयीने मुझे वरदानके लिये प्रेरित करके मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है । इसके द्वारा जो वञ्चना मुझे प्राप्त हुई है, उसीको तुम पार करना चाहते हो ॥ ३६-३७ ॥

> न चैतदाश्चर्यतमं यत् त्वं ज्येष्ठः सुतो मम ।  
> अपानृतकथं पुत्र पितरं कर्तुमिच्छसि ॥ ३८ ॥

‘पुत्र ! तुम अपने पिताको सत्यवादी बनाना चाहते हो । तुम्हारे लिये यह कोई अधिक आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि तुम गुण और अवस्था दोनों ही दृष्टियोंसे मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो’ ॥ ३८ ॥

> अथ रामस्तदा श्रुत्वा पितुरार्तस्य भाषितम् ।  
> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा दीनो वचनमब्रवीत् ॥ ३९ ॥

अपने शोकाकुल पिताका यह कथन सुनकर उस समय छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने दुखी होकर कहा—॥३९॥

> प्राप्स्यामि यानद्य गुणान् को मे श्वस्तान् प्रदास्यति ।  
> अपक्रमणमेवातः सर्वकामैरहं वृणे ॥ ४० ॥

‘महाराज ! आज यात्रा करके मैं जिन गुणों ( लाभों )-को पाऊँगा, उन्हें कल कौन मुझे देगा ?* अतः मैं सम्पूर्ण कामनाओंके बदले आज यहाँसे निकल जाना ही अच्छा समझता हूँ और इसीका वरण करता हूँ ॥ ४० ॥

> इयं सराष्ट्रा सजना धनधान्यसमाकुला ।  
> मया विसृष्टा वसुधा भरताय प्रदीयताम् ॥ ४१ ॥

‘राष्ट्र और यहाँके निवासी मनुष्योंसहित धनधान्यसे सम्पन्न यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप इसे भरतको दे दें ॥४१॥

> वनवासकृता बुद्धिर्न च मेऽद्य चलिष्यति ।  
> यस्तु युद्धे वरो दत्तः कैकेय्यै वरद त्वया ॥ ४२ ॥  
> दीयतां निखिलेनैव सत्यस्त्वं भव पार्थिव ।

‘मेरा वनवासविषयक निश्चय अब बदल नहीं सकेगा । वरदायक नरेश ! आपने देवासुर-संग्राममें कैकेयीको जो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसे पूर्णरूपसे दीजिये और सत्यवादी बनिये ॥ ४२½ ॥

> अहं निदेशं भवतो यथोक्तमनुपालयन् ॥ ४३ ॥  
> चतुर्दश समा वत्स्ये वने वनचरैः सह ।  
> मा विमर्शो वसुमती भरताय प्रदीयताम् ॥ ४४ ॥

‘मैं आपकी उक्त आज्ञाका पालन करता हुआ चौदह वर्षोंतक वनमें वनचारी प्राणियोंके साथ निवास करूँगा । आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये । आप यह सारी पृथ्वी भरतको दे दीजिये ॥ ४३-४४ ॥

> नहि मे काङ्क्षितं राज्यं सुखमात्मनि वा प्रियम् ।  
> यथानिदेशं कर्तुं वै तवैव रघुनन्दन ॥ ४५ ॥

‘रघुनन्दन ! मैंने अपने मनको सुख देने अथवा स्वजनोंका प्रिय करनेके उद्देश्यसे राज्य लेनेकी इच्छा नहीं की थी । आपकी आज्ञाका यथावत्रूपसे पालन करनेके लिये ही मैंने उसे ग्रहण करनेकी अभिलाषा की थी ॥ ४५ ॥

> अपगच्छतु ते दुःखं मा भूर्बाष्पपरिप्लुतः ।  
> नहि क्षुभ्यति दुर्धर्षः समुद्रः सरितां पतिः ॥ ४६ ॥

‘आपका दुःख दूर हो जाय, आप इस प्रकार आँसू न बहावें । सरिताओंका स्वामी दुर्धर्ष समुद्र क्षुब्ध नहीं होता है—अपनी मर्यादाका त्याग नहीं करता है ( इसी तरह आपको भी क्षुब्ध नहीं होना चाहिये ) ॥ ४६ ॥

> नैवाहं राज्यमिच्छामि न सुखं न च मेदिनीम् ।  
> नैव सर्वानिमान् कामान् न स्वर्गं न च जीवितुम् ॥

‘मुझे न तो इस राज्यकी, न सुखकी, न पृथ्वीकी, न इन सम्पूर्ण भोगोंकी, न स्वर्गकी और न जीवनकी ही इच्छा है ॥ ४७ ॥

> त्वामहं सत्यमिच्छामि नानृतं पुरुषर्षभ ।  
> प्रत्यक्षं तव सत्येन सुकृतेन च ते शपे ॥ ४८ ॥

‘पुरुषशिरोमणे ! मेरे मनमें यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी बनें । आपका वचन मिथ्या न होने पावे । यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभ कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ ॥ ४८ ॥

> न च शक्यं मया तात स्थातुं क्षणमपि प्रभो ।  
> स शोकं धारयस्वेमं नहि मेऽस्ति विपर्ययः ॥ ४९ ॥

‘तात ! प्रभो ! अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहर सकता । अतः आप इस शोकको अपने भीतर ही दबा लें । मैं अपने निश्चयके विपरीत कुछ नहीं कर सकता ॥ ४९ ॥

> अर्थितो ह्यसि कैकेय्या वनं गच्छेति राघव ।  
> मया चोक्तं व्रजामीति तत्सत्यमनुपालये ॥ ५० ॥

‘रघुनन्दन ! कैकेयीने मुझसे यह याचना की कि ‘राम ! तुम वनको चले जाओ’ मैंने वचन दिया था कि ‘अवश्य जाऊँगा’ उस सत्यका मुझे पालन करना है ॥ ५० ॥

> मा चोत्कण्ठां कृथा देव वने रंस्यामहे वयम् ।  
> प्रशान्तहरिणाकीर्णे नानाशकुनिनादिते ॥ ५१ ॥

‘देव ! बीचमें हमें देखने या हमसे मिलनेके लिये आप उत्कण्ठित न होंगे । शान्तस्वभाववाले मृगोंसे भरे हुए और भाँति-भाँतिके पक्षियोंके कलरवोंसे गूँजते हुए उस वनमें हमलोग बड़े आनन्दसे रहेंगे ॥ ५१ ॥

> पिता हि दैवतं तात देवतानामपि स्मृतम् ।  
> तस्माद् दैवतमित्येव करिष्यामि पितुर्वचः ॥ ५२ ॥

‘तात ! पिता देवताओंके भी देवता माने गये हैं । अतः मैं देवता समझकर ही पिता ( आप ) की आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ५२ ॥

> चतुर्दशसु वर्षेषु गतेषु नृपसत्तम ।  
> पुनर्द्रक्ष्यसि मां प्राप्तं संतापोऽयं विमुच्यताम् ॥ ५३ ॥

‘नृपश्रेष्ठ ! अब यह संताप छोड़िये । चौदह वर्ष बीत जानेपर आप फिर मुझे आया हुआ देखेंगे ॥ ५३ ॥

> येन संस्तम्भनीयोऽयं सर्वो बाष्पकलो जनः ।  
> स त्वं पुरुषशार्दूल किमर्थं विक्रियां गतः ॥ ५४ ॥

‘पुरुषसिंह ! यहाँ जितने लोग आँसू बहा रहे हैं, इन सबको धैर्य बँधाना आपका कर्तव्य है; फिर आप स्वयं ही इतने विकल कैसे हो रहे हैं ! ॥ ५४ ॥

> पुरं च राष्ट्रं च मही च केवला  
> मया विसृष्टा भरताय दीयताम् ।  
> अहं निदेशं भवतोऽनुपालयन्  
> वनं गमिष्यामि चिराय सेवितुम् ॥ ५५ ॥

‘यह नगर, यह राज्य और यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी । आप यह सब कुछ भरतको दे दीजिये । अब मैं आपके आदेशका पालन करता हुआ दीर्घकालतक वनमें निवास करनेके लिये यहाँसे यात्रा कर रहा हूँ ॥ ५५ ॥

> मया विसृष्टां भरतो महीमिमां  
> सशैलखण्डां सपुरोपकाननाम् ।  
> शिवासु सीमास्वनुशास्तु केवलं  
> त्वया यदुक्तं नृपते तथास्तु तत् ॥ ५६ ॥

‘मेरी छोड़ी हुई पर्वतखण्डों, नगरों और उपवनोंसहित इस सारी पृथ्वीका भरत कल्याणकारिणी मर्यादाओंमें स्थित रहकर पालन करें । नरेश्वर ! आपने जो वचन दिया है, वह पूर्ण हो ॥ ५६ ॥

> न मे तथा पार्थिव धीयते मनो  
> महत्सु कामेषु न चात्मनः प्रिये ।  
> यथा निदेशे तव शिष्टसम्मते  
> व्यपैतु दुःखं तव मत्कृतेऽनघ ॥ ५७ ॥

‘पृथ्वीनाथ ! निष्पाप महाराज ! सत्पुरुषोंद्वारा अनुमोदित आपकी आज्ञाका पालन करनेमें मेरा मन जैसा लगता है, वैसा बड़े-बड़े भोगोंमें तथा अपने किसी प्रिय पदार्थमें भी नहीं लगता; अतः मेरे लिये आपके मनमें जो दुःख है, वह दूर हो जाना चाहिये ॥ ५७ ॥

> तदद्य नैवानघ राज्यमव्ययं  
> न सर्वकामान् वसुधां न मैथिलीम् ।  
> न चिन्तितं त्वामनृतेन योजयन्  
> वृणीय सत्यं व्रतमस्तु ते तथा ॥ ५८ ॥

‘निष्पाप नरेश ! आज आपको मिथ्यावादी बनाकर मैं अक्षय राज्य, सब प्रकारके भोग, वसुधाका आधिपत्य, मिथिलेशकुमारी सीता तथा अन्य किसी अभिलषित पदार्थको भी स्वीकार नहीं कर सकता । मेरी एकमात्र इच्छा यही है कि ‘आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो’ ॥ ५८ ॥

> फलानि मूलानि च भक्षयन् वने  
> गिरींश्च पश्यन् सरितः सरांसि च ।  
> वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं  
> सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृतिः ॥ ५९ ॥

‘मैं विचित्र वृक्षोंसे युक्त वनमें प्रवेश करके फल-मूलका भोजन करता हुआ वहाँके पर्वतों, नदियों और सरोवरोंको देख-देखकर सुखी होऊँगा; इसलिये आप अपने मनको शान्त कीजिये’ ॥ ५९ ॥

> एवं स राजा व्यसनाभिपन्न-  
> स्तापेन दुःखेन च पीड्यमानः ।  
> आलिङ्ग्य पुत्रं सुविनष्टसंज्ञो  
> भूमिं गतो नैव चिचेष्ट किंचित् ॥ ६० ॥  
> देव्यः समस्ता रुरुदुः समेता-  
> स्तां वर्जयित्वा नरदेवपत्नीम् ।  
> रुदन् सुमन्त्रोऽपि जगाम मूर्च्छां  
> हाहाकृतं तत्र बभूव सर्वम् ॥ ६१ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर पुत्र-विछोहके संकटमें पड़े हुए राजा दशरथने दुःख और संतापसे पीड़ित हो उन्हें छातीसे लगाया और फिर अचेत होकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े । उस समय उनका शरीर जडकी भाँति कुछ भी चेष्टा न कर सका॥ यह देख राजरानी कैकेयीको छोड़कर वहाँ एकत्र हुई अन्य सभी रानियाँ रो पड़ीं । सुमन्त्र भी रोते-रोते मूर्च्छित हो गये तथा वहाँ सब ओर हाहाकार मच गया ॥ ६१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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