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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 32"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 32

> ततः शासनमाज्ञाय भ्रातुः प्रियकरं हितम् ।  
> गत्वा स प्रविवेशाशु सुयज्ञस्य निवेशनम् ॥ १ ॥

तदनन्तर अपने भाई श्रीरामकी प्रियकारक एवं हितकर आज्ञा पाकर लक्ष्मण वहाँसे चल दिये । उन्होंने शीघ्र ही गुरुपुत्र सुयज्ञके घरमें प्रवेश किया ॥ १ ॥

> तं विप्रमग्न्यगारस्थं वन्दित्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत् ।  
> सखेऽभ्यागच्छ पश्य त्वं वेश्म दुष्करकारिणः ॥ २ ॥

उस समय विप्रवर सुयज्ञ अग्निशालामें बैठे हुए थे । लक्ष्मणने उन्हें प्रणाम करके कहा—‘सखे ! दुष्कर कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके घरपर आओ और उनका कार्य देखो’ ॥ २ ॥

> ततः संध्यामुपास्थाय गत्वा सौमित्रिणा सह ।  
> ऋद्धं स प्राविशल्लक्ष्म्या रम्यं रामनिवेशनम् ॥ ३ ॥

सुयज्ञने मध्याह्नकालकी संध्योपासना पूरी करके लक्ष्मणके साथ जाकर श्रीरामके रमणीय भवनमें प्रवेश किया, जो लक्ष्मीसे सम्पन्न था ॥ ३ ॥

> तमागतं वेदविदं प्राञ्जलिः सीतया सह ।  
> सुयज्ञमभिचक्राम राघवोऽग्निमिवार्चितम् ॥ ४ ॥

होमकालमें पूजित अग्निके समान तेजस्वी वेदवेत्ता सुयज्ञ-को आया जान सीतासहित श्रीरामने हाथ जोड़कर उनकी अगवानी की ॥ ४ ॥

> जातरूपमयैर्मुख्यैरङ्गदैः कुण्डलैः शुभैः ।  
> सहेमसूत्रैर्मणिभिः केयूरैर्वलयैरपि ॥ ५ ॥  
> अन्यैश्च रत्नैर्बहुभिः काकुत्स्थः प्रत्यपूजयत् ।

तत्पश्चात् ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने सोनेके बने हुए श्रेष्ठ अङ्गदों, सुन्दर कुण्डलों, सुवर्णमय सूत्रमें पिरोयी हुई मणियों, केयूरों, वलयों तथा अन्य बहुत-से रत्नोंद्वारा उनका पूजन किया ॥ ५½ ॥

> सुयज्ञं स तदोवाच रामः सीताप्रचोदितः ॥ ६ ॥  
> हारं च हेमसूत्रं च भार्यायै सौम्य हारय ।  
> रशनां चाथ सा सीता दातुमिच्छति ते सखी ॥ ७ ॥

इसके बाद सीताकी प्रेरणासे श्रीरामने सुयज्ञसे कहा— ‘सौम्य ! तुम्हारी पत्नीकी सखी सीता तुम्हें अपना हार, सुवर्ण-सूत्र और करधनी देना चाहती है । इन वस्तुओंको अपनी पत्नीके लिये ले जाओ ॥ ६-७ ॥

> अङ्गदानि च चित्राणि केयूराणि शुभानि च ।  
> प्रयच्छति सखी तुभ्यं भार्यायै गच्छती वनम् ॥ ८ ॥

‘वनको प्रस्थान करनेवाली तुम्हारी स्त्रीकी सखी सीता तुम्हें तुम्हारी पत्नीके लिये विचित्र अङ्गद और सुन्दर केयूर भी देना चाहती है ॥ ८ ॥

> पर्यङ्कमग्र्यास्तरणं नानारत्नविभूषितम् ।  
> तमपीच्छति वैदेही प्रतिष्ठापयितुं त्वयि ॥ ९ ॥

‘उत्तम बिछौनोंसे युक्त तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित जो पलंग है, उसे भी विदेहनन्दिनी सीता तुम्हारे ही घरमें भेज देना चाहती है ॥ ९ ॥

> नागः शत्रुंजयो नाम मातुलोऽयं ददौ मम ।  
> तं ते निष्कसहस्रेण ददामि द्विजपुङ्गव ॥ १० ॥

‘विप्रवर ! शत्रुञ्जय नामक जो हाथी है, जिसे मेरे मामाने मुझे भेंट किया था, उसे एक हजार अशर्फियोंके साथ मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ’ ॥ १० ॥

> इत्युक्तः स तु रामेण सुयज्ञः प्रतिगृह्य तत् ।  
> रामलक्ष्मणसीतानां प्रयुयोजाशिषः शिवाः ॥ ११ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुयज्ञने वे सब वस्तुएँ ग्रहण करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद प्रदान किये ॥ ११ ॥

> अथ भ्रातरमव्यग्रं प्रियं रामः प्रियंवदम् ।  
> सौमित्रिं तमुवाचेदं ब्रह्मेव त्रिदशेश्वरम् ॥ १२ ॥

तदनन्तर श्रीरामने शान्तभावसे खड़े हुए और प्रिय वचन बोलनेवाले अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे उसी तरह निम्नाङ्कित बात कही, जैसे ब्रह्मा देवराज इन्द्रसे कुछ कहते हैं ॥ १२ ॥

> अगस्त्यं कौशिकं चैव तावुभौ ब्राह्मणोत्तमौ।  
> अर्चयाहूय सौमित्रे रत्नैः सस्यमिवाम्बुभिः ॥ १३ ॥  
> तर्पयस्व महाबाहो गोसहस्रेण राघव।  
> सुवर्णरजतैश्चैव मणिभिश्च महाधनैः ॥ १४ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! अगस्त्य और विश्वामित्र दोनों उत्तम ब्राह्मणोंको बुलाकर रत्नोंद्वारा उनकी पूजा करो। महाबाहु रघुनन्दन ! जैसे मेघ जलकी वर्षाद्वारा खेतीको तृप्त करता है, उसी प्रकार तुम उन्हें सहस्रों गौओं, सुवर्णमुद्राओं, रजतद्रव्यों और बहुमूल्य मणियोंद्वारा संतुष्ट करो ॥ १३-१४ ॥

> कौसल्यां च य आशीर्भिर्भक्तः पर्युपतिष्ठति।  
> आचार्यस्तैत्तिरीयाणामभिरूपश्च वेदवित् ॥ १५ ॥  
> तस्य यानं च दासीश्च सौमित्रे सम्प्रदापय।  
> कौशेयानि च वस्त्राणि यावत् तुष्यति स द्विजः ॥ १६ ॥

‘लक्ष्मण ! यजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखाका अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणोंके जो आचार्य और सम्पूर्ण वेदोंके विद्वान् हैं, साथ ही जिनमें दानप्राप्तिकी योग्यता है तथा जो माता कौसल्याके प्रति भक्तिभाव रखकर प्रतिदिन उनके पास आकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं, उनको सवारी, दास-दासी, रेशमी वस्त्र और जितने धनसे वे ब्राह्मणदेवता संतुष्ट हों, उतना धन खजानेसे दिलवाओ ॥ १५-१६ ॥

> सूतश्चित्ररथश्चार्यः सचिवः सुचिरोषितः।  
> तोषयैनं महार्हैश्च रत्नैर्वस्त्रैर्धनैस्तथा ॥ १७ ॥  
> पशुकाभिश्च सर्वाभिर्गवां दशशतेन च।

‘चित्ररथ नामक सूत श्रेष्ठ सचिव भी हैं। वे सुदीर्घकालसे यहीं राजकुलकी सेवामें रहते हैं । इनको भी तुम बहुमूल्य रत्न, वस्त्र और धन देकर संतुष्ट करो। साथ ही, इन्हें उत्तम श्रेणीके अज आदि सभी पशु और एक सहस्र गौएँ अर्पित करके पूर्ण संतोष प्रदान करो ॥ १७½ ॥

> ये चेमे कठकालापा बहवो दण्डमाणवाः ॥ १८ ॥  
> नित्यस्वाध्यायशीलत्वान्नान्यत् कुर्वन्ति किंचन।  
> अलसाः स्वादुकामाश्च महतां चापि सम्मताः ॥ १९ ॥  
> तेषामशीतियानानि रत्नपूर्णानि दापय।  
> शालिवाहसहस्रं च द्वे शते भद्रकांस्तथा ॥ २० ॥

‘मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले जो कठशाखा और कलाप-शाखाके अध्येता बहुत-से दण्डधारी ब्रह्मचारी हैं, वे सदा स्वाध्यायमें ही संलग्न रहनेके कारण दूसरा कोई कार्य नहीं कर पाते । भिक्षा माँगनेमें आलसी हैं, परंतु स्वादिष्ट अन्न खानेकी इच्छा रखते हैं । महान् पुरुष भी उनका सम्मान करते हैं । उनके लिये रत्नोंके बोझसे लदे हुए अस्सी ऊँट, अगहनी चावलका भार ढोनेवाले एक सहस्र बैल तथा भद्रक नामक धान्यविशेष ( चने, मूँग आदि ) का भार लिये हुए दो सौ बैल और दिलवाओ ॥ १८-२० ॥

> व्यञ्जनार्थं च सौमित्रे गोसहस्रमुपाकुरु।  
> मेखलीनां महासङ्घः कौसल्यां समुपस्थितः।  
> तेषां सहस्रं सौमित्रे प्रत्येकं सम्प्रदापय ॥ २१ ॥

‘सुमित्राकुमार ! उपर्युक्त वस्तुओंके सिवा उनके लिये दही, घी आदि व्यञ्जनके निमित्त एक सहस्र गौएँ भी हँकवा दो । माता कौसल्याके पास मेखलाधारी ब्रह्मचारियोंका बहुत बड़ा समुदाय आया है । उनमेंसे प्रत्येकको एक-एक हजार स्वर्णमुद्राएँ दिलवा दो ॥ २१ ॥

> अम्बा यथा नो नन्देच्च कौसल्या मम दक्षिणाम्।  
> तथा द्विजातींस्तान् सर्वाँल्लक्ष्मणार्चय सर्वशः ॥ २२ ॥

‘लक्ष्मण ! उन समस्त ब्रह्मचारी ब्राह्मणोंको मेरेद्वारा दिलायी हुई दक्षिणा देखकर जिस प्रकार मेरी माता कौसल्या आनन्दित हो उठें, उसी प्रकार तुम उन सबकी सब प्रकारसे पूजा करो’ ॥ २२ ॥

> ततः पुरुषशार्दूलस्तद् धनं लक्ष्मणः स्वयम्।  
> यथोक्तं ब्राह्मणेन्द्राणामददाद् धनदो यथा ॥ २३ ॥

इस प्रकार आज्ञा प्राप्त होनेपर पुरुषसिंह लक्ष्मणने स्वयं ही कुबेरकी भाँति श्रीरामके कथनानुसार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उस धनका दान किया ॥ २३ ॥

> अथाब्रवीद् बाष्पगलांस्तिष्ठतश्चोपजीविनः।  
> स प्रदाय बहुद्रव्यमेकैकस्योपजीवनम् ॥ २४ ॥  
> लक्ष्मणस्य च यद् वेश्म गृहं च यदिदं मम।  
> अशून्यं कार्यमेकैकं यावदागमनं मम ॥ २५ ॥

इसके बाद वहाँ खड़े हुए अपने आश्रित सेवकोंको जिनका गला आँसुओंसे रुँधा हुआ था, बुलाकर श्रीरामने उनमेंसे एक-एकको चौदह वर्षोंतक जीविका चलानेयोग्य बहुत-सा द्रव्य प्रदान किया और उन सबसे कहा—‘जबतक मैं वनसे लौटकर न आऊँ, तबतक तुमलोग लक्ष्मणके और मेरे इस घरको कभी सूना न करना—छोड़कर अन्यत्र न जाना’ ॥ २४-२५ ॥

> इत्युक्त्वा दुःखितं सर्वं जनं तमुपजीविनम्।  
> उवाचेदं धनाध्यक्षं धनमानीयतां मम ॥ २६ ॥  
> ततोऽस्य धनमाजह्रुः सर्व एवोपजीविनः।  
> स राशिः सुमहांस्तत्र दर्शनीयो ह्यदृश्यत ॥ २७ ॥

वे सब सेवक श्रीरामके वनगमनसे बहुत दुखी थे। उनसे उपर्युक्त बात कहकर श्रीराम अपने धनाध्यक्ष (खजांची) से बोले—‘खजानेमें मेरा जितना धन है, वह सब ले आओ’॥ यह सुनकर सभी सेवक उनका धन ढो-ढोकर ले आने लगे । वहाँ उस धनकी बहुत बड़ी राशि एकत्र हुई दिखायी देने लगी, जो देखने ही योग्य थी ॥ २७ ॥

> ततः स पुरुषव्याघ्रस्तद् धनं सहलक्ष्मणः ।  
> द्विजेभ्यो बालवृद्धेभ्यः कृपणेभ्यो ह्यदापयत् ॥ २८ ॥  
> तत्रासीत् पिङ्गलो गार्ग्यस्त्रिजटो नाम वै द्विजः ।  
> क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललाङ्गली ॥ २९ ॥

तब लक्ष्मणसहित पुरुषसिंह श्रीरामने बालक और बूढ़े ब्राह्मणों तथा दीन-दुखियोंको वह सारा धन बँटवा दिया ॥ उन दिनों वहाँ अयोध्याके आस-पास वनमें त्रिजट नामवाले एक गर्गगोत्रीय ब्राह्मण रहते थे । उनके पास जीविकाका कोई साधन नहीं था, इसलिये उपवास आदिके कारण उनके शरीरका रंग पीला पड़ गया था । वे सदा फाल, कुदाल और हल लिये वनमें फल-मूलकी तलाशमें घूमा करते थे ॥ २९ ॥

> तं वृद्धं तरुणी भार्या बालानादाय दारकान् ।  
> अब्रवीद् ब्राह्मणं वाक्यं स्त्रीणां भर्ता हि देवता ॥ ३० ॥  
> अपास्य फालं कुद्दालं कुरुष्व वचनं मम ।  
> रामं दर्शय धर्मज्ञं यदि किंचिदवाप्स्यसि ॥ ३१ ॥

वे स्वयं तो बूढ़े हो चले थे, परंतु उनकी पत्नी अभी तरुणी थी । उसने छोटे बच्चोंको लेकर ब्राह्मणदेवतासे यह बात कही—‘प्राणनाथ ! ( यद्यपि ) स्त्रियोंके लिये पति ही देवता है, ( अतः मुझे आपको आदेश देनेका कोई अधिकार नहीं है, तथापि मैं आपकी भक्त हूँ; इसलिये विनयपूर्वक यह अनुरोध करती हूँ कि–) आप यह फाल और कुदाल फेंककर मेरा कहना कीजिये । धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीसे मिलिये । यदि आप ऐसा करें तो वहाँ अवश्य कुछ पा जायँगे’ ॥ ३०-३१ ॥

> स भार्याया वचः श्रुत्वा शाटीमाच्छाद्य दुश्छदाम् ।  
> स प्रातिष्ठत पन्थानं यत्र रामनिवेशनम् ॥ ३२ ॥

पत्नीकी बात सुनकर ब्राह्मण एक फटी धोती, जिससे मुश्किलसे शरीर ढक पाता था, पहनकर उस मार्गपर चल दिये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजीका महल था ॥ ३२ ॥

> भृग्वङ्गिरःसमं दीप्त्या त्रिजटं जनसंसदि ।  
> आपञ्चमायाः कक्ष्याया नैतं कश्चिदवारयत् ॥ ३३ ॥

भृगु और अङ्गिराके समान तेजस्वी त्रिजट जनसमुदायके बीचसे होकर श्रीराम-भवनकी पाँचवीं ड्योढ़ीतक चले गये, परंतु उनके लिये किसीने रोक-टोक नहीं की ॥ ३३ ॥

> स राममासाद्य तदा त्रिजटो वाक्यमब्रवीत् ।  
> निर्धनो बहुपुत्रोऽस्मि राजपुत्र महाबल ॥ ३४ ॥  
> क्षतवृत्तिर्वने नित्यं प्रत्यवेक्षस्व मामिति ।

उस समय श्रीरामके पास पहुँचकर त्रिजटने कहा— ‘महाबली राजकुमार ! मैं निर्धन हूँ, मेरे बहुत-से पुत्र हैं, जीविका नष्ट हो जानेसे सदा वनमें ही रहता हूँ, आप मुझपर कृपादृष्टि कीजिये’ ॥ ३४½ ॥

> तमुवाच ततो रामः परिहाससमन्वितम् ॥ ३५ ॥  
> गवां सहस्रमप्येकं न च विश्राणितं मया ।  
> परिक्षिपसि दण्डेन यावत्तावदवाप्स्यसे ॥ ३६ ॥  
> स शाटीं परितः कट्यां सम्भ्रान्तः परिवेष्ट्य ताम् ।  
> आविध्य दण्डं चिक्षेप सर्वप्राणेन वेगतः ॥ ३७ ॥

तब श्रीरामने विनोदपूर्वक कहा—‘ब्रह्मन् ! मेरे पास असंख्य गौएँ हैं, इनमेंसे एक सहस्रका भी मैंने अभीतक किसीको दान नहीं किया है । आप अपना डंडा जितनी दूर फेंक सकेंगे, वहाँतककी सारी गौएँ आपको मिल जायँगी’ ॥ यह सुनकर उन्होंने बड़ी तेजीके साथ धोतीके पल्लेको सब ओरसे कमरमें लपेट लिया और अपनी सारी शक्ति लगाकर डंडेको बड़े वेगसे घुमाकर फेंका ॥ ३७ ॥

> स तीर्त्वा सरयूपारं दण्डस्तस्य कराच्च्युतः ।  
> गोव्रजे बहुसाहस्रे पपातोक्षणसंनिधौ ॥ ३८ ॥

ब्राह्मणके हाथसे छूटा हुआ वह डंडा सरयूके उस पार जाकर हजारों गौओंसे भरे हुए गोष्ठमें एक साँड़के पास गिरा ॥३८॥

> तं परिष्वज्य धर्मात्मा आ तस्मात् सरयूतटात् ।  
> आनयामास ता गावस्त्रिजटस्याश्रमं प्रति ॥ ३९ ॥

धर्मात्मा श्रीरामने त्रिजटको छातीसे लगा लिया और उस सरयूतटसे लेकर उस पार गिरे हुए डंडेके स्थानतक जितनी गौएँ थीं, उन सबको मँगवाकर त्रिजटके आश्रमपर भेज दिया ॥ ३९ ॥

> उवाच च तदा रामस्तं गार्ग्यमभिसान्त्वयन् ।  
> मन्युर्न खलु कर्तव्यः परिहासो ह्ययं मम ॥ ४० ॥

उस समय श्रीरामने गर्गवंशी त्रिजटको सान्त्वना देते हुए कहा—‘ब्रह्मन् ! मैंने विनोदमें यह बात कही थी, आप इसके लिये बुरा न मानियेगा ॥ ४० ॥

> इदं हि तेजस्तव यद् दुरत्ययं  
> तदेव जिज्ञासितुमिच्छता मया ।  
> इमं भवानर्थमभिप्रचोदितो  
> वृणीष्व किंचेदपरं व्यवस्यसि ॥ ४१ ॥

‘आपका यह जो दुर्लङ्घ्य तेज है, इसीको जाननेकी इच्छासे मैंने आपको यह डंडा फेंकनेके लिये प्रेरित किया था, यदि आप और कुछ चाहते हों तो माँगिये ॥ ४१ ॥

> ब्रवीमि सत्येन न ते स्म यन्त्रणां  
> धनं हि यन्मम विप्रकारणात् ।  
> भवत्सु सम्यक्प्रतिपादनेन  
> मयार्जितं चैव यशस्करं भवेत् ॥ ४२ ॥

‘मैं सच कहता हूँ कि इसमें आपके लिये कोई संकोचकी बात नहीं है। मेरे पास जो-जो धन है, वह सब ब्राह्मणोंके लिये ही है। आप-जैसे ब्राह्मणोंको शास्त्रीय विधिके अनुसार दान देनेसे मेरे द्वारा उपार्जित किया हुआ धन मेरे यशकी वृद्धि करनेवाला होगा’ ॥ ४२ ॥

> ततः सभार्यस्त्रिजटो महामुनि-  
> र्गवामनीकं प्रतिगृह्य मोदितः ।  
> यशोबलप्रीतिसुखोपबृंहिणी-  
> स्तदाशिषः प्रत्यवदन्महात्मनः॥४३॥

गौओंके उस महान् समूहको पाकर पत्नीसहित महामुनि त्रिजटको बड़ी प्रसन्नता हुई, वे महात्मा श्रीरामको यश, बल, प्रीति तथा सुख बढ़ानेवाले आशीर्वाद देने लगे ॥ ४३ ॥

> स चापि रामः प्रतिपूर्णपौरुषो  
> महाधनं धर्मबलैरुपार्जितम् ।  
> नियोजयामास सुहृज्जने चिराद्  
> यथार्हसम्मानवचःप्रचोदितः ॥ ४४ ॥

तदनन्तर पूर्ण पराक्रमी भगवान् श्रीराम धर्मबलसे उपार्जित किये हुए उस महान् धनको लोगोंके यथायोग्य सम्मानपूर्ण वचनोंसे प्रेरित हो बहुत देरतक अपने सुहृदोंमें बाँटते रहे ॥ ४४ ॥

> द्विजः सुहृद् भृत्यजनोऽथवा तदा  
> दरिद्रभिक्षाचरणश्च यो भवेत् ।  
> न तत्र कश्चिन्न बभूव तर्पितो  
> यथार्हसम्माननदानसम्भ्रमैः ॥ ४५ ॥

उस समय वहाँ कोई भी ब्राह्मण, सुहृद्, सेवक, दरिद्र अथवा भिक्षुक ऐसा नहीं था, जो श्रीरामके यथायोग्य सम्मान, दान तथा आदर-सत्कारसे तृप्त न किया गया हो ॥ ४५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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