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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 31"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 31

> एवं श्रुत्वा स संवादं लक्ष्मणः पूर्वमागतः ।  
> बाष्पपर्याकुलमुखः शोकं सोढुमशक्नुवन् ॥ १ ॥

जिस समय श्रीराम और सीतामें बातचीत हो रही थी, लक्ष्मण वहाँ पहलेसे ही आ गये थे । उन दोनोंका ऐसा संवाद सुनकर उनका मुखमण्डल आँसुओंसे भींग गया । भाईके विरहका शोक अब उनके लिये भी असह्य हो उठा ॥ १ ॥

> स भ्रातुश्चरणौ गाढं निपीड्य रघुनन्दनः ।  
> सीतामुवाचातियशां राघवं च महाव्रतम् ॥ २ ॥

रघुकुलको आनन्दित करनेवाले लक्ष्मणने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजीके दोनों पैर जोरसे पकड़ लिये और अत्यन्त यशस्विनी सीता तथा महान् व्रतधारी श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥२॥

> यदि गन्तुं कृता बुद्धिर्वनं मृगगजायुतम् ।  
> अहं त्वानुगमिष्यामि वनमग्रे धनुर्धरः ॥ ३ ॥

‘आर्य ! यदि आपने सहस्रों वन्य पशुओं तथा हाथियोंसे भरे हुए वनमें जानेका निश्चय कर ही लिया है तो मैं भी आपका अनुसरण करूँगा । धनुष हाथमें लेकर आगे-आगे चलूँगा ॥ ३ ॥

> मया समेतोऽरण्यानि रम्याणि विचरिष्यसि ।  
> पक्षिभिर्मृगयूथैश्च संघुष्टानि समन्ततः ॥ ४ ॥

‘आप मेरे साथ पक्षियोंके कलरव और भ्रमरसमूहोंके गुञ्जारवसे गूँजते हुए रमणीय वनोंमें सब ओर विचरण कीजियेगा ॥ ४ ॥

> न देवलोकाक्रमणं नामरत्वमहं वृणे।  
> ऐश्वर्यं चापि लोकानां कामये न त्वया विना ॥ ५ ॥

‘मैं आपके बिना स्वर्गमें जाने, अमर होने तथा सम्पूर्ण लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी भी इच्छा नहीं रखता’ ॥ ५ ॥

> एवं ब्रुवाणः सौमित्रिर्वनवासाय निश्चितः।  
> रामेण बहुभिः सान्त्वैर्निषिद्धः पुनरब्रवीत् ॥ ६ ॥

वनवासके लिये निश्चित विचार करके ऐसी बात कहनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको श्रीरामचन्द्रजीने बहुत-से सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा समझाकर जब वनमें चलनेसे मना किया, तब वे फिर बोले–॥ ६ ॥

> अनुज्ञातस्तु भवता पूर्वमेव यदस्म्यहम् ।  
> किमिदानीं पुनरपि क्रियते मे निवारणम् ॥ ७ ॥  
> यदर्थं प्रतिषेधो मे क्रियते गन्तुमिच्छतः ।  
> एतदिच्छामि विज्ञातुं संशयो हि ममानघ ॥ ८ ॥

‘भैया ! आपने तो पहलेसे ही मुझे अपने साथ रहनेकी आज्ञा दे रखी है, फिर इस समय आप मुझे क्यों रोकते हैं ? ॥ ‘निष्पाप रघुनन्दन ! जिस कारणसे आपके साथ चलनेकी इच्छावाले मुझको आप मना करते हैं, उस कारणको मैं जानना चाहता हूँ । मेरे हृदयमें इसके लिये बड़ा संशय हो रहा है’ ॥ ८ ॥

> ततोऽब्रवीन्महातेजा रामो लक्ष्मणमग्रतः ।  
> स्थितं प्रागामिनं धीरं याचमानं कृताञ्जलिम् ॥ ९ ॥

ऐसा कहकर धीर-वीर लक्ष्मण आगे जानेके लिये तैयार हो भगवान् श्रीरामके सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़कर याचना करने लगे । तब महातेजस्वी श्रीरामने उनसे कहा–॥ ९ ॥

> स्निग्धो धर्मरतो धीरः सततं सत्पथे स्थितः ।  
> प्रियः प्राणसमो वश्यो विजेयश्च सखा च मे ॥ १० ॥  
> मयाद्य सह सौमित्रे त्वयि गच्छति तद्वनम् ।  
> को भजिष्यति कौसल्यां सुमित्रां वा यशस्विनीम् ॥ ११ ॥

‘लक्ष्मण ! तुम मेरे स्नेही, धर्मपरायण, धीर-वीर तथा सदा सन्मार्गमें स्थित रहनेवाले हो । मुझे प्राणोंके समान प्रिय हो तथा मेरे वशमें रहनेवाले आज्ञापालक और सखा हो ॥ ‘सुमित्रानन्दन ! यदि आज मेरे साथ तुम भी वनको चल दोगे तो परमयशस्विनी माता कौसल्या और सुमित्राकी सेवा कौन करेगा ? ॥ ११ ॥

> अभिवर्षति कामैर्यः पर्जन्यः पृथिवीमिव ।  
> स कामपाशपर्यस्तो महातेजा महीपतिः ॥ १२ ॥

‘जैसे मेघ पृथ्वीपर जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते थे, वे महातेजस्वी महाराज दशरथ अब कैकेयीके प्रेमपाशमें बँध गये हैं ॥ १२ ॥

> सा हि राज्यमिदं प्राप्य नृपस्याश्वपतेः सुता ।  
> दुःखितानां सपत्नीनां न करिष्यति शोभनम् ॥ १३ ॥

‘केकयराज अश्वपतिकी पुत्री कैकेयी महाराजके इस राज्यको पाकर मेरे वियोगके दुःखमें डूबी हुई अपनी सौतोंके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेगी ॥ १३ ॥

> न भरिष्यति कौसल्यां सुमित्रां च सुदुःखिताम् ।  
> भरतो राज्यमासाद्य कैकेय्यां पर्यवस्थितः ॥ १४ ॥  
> तामार्यां स्वयमेवेह राजानुग्रहणेन वा ।  
> सौमित्रे भर कौसल्यामुक्तमर्थमिमं चर ॥ १५ ॥

‘भरत भी राज्य पाकर कैकेयीके अधीन रहनेके कारण दुखिया कौसल्या और सुमित्राका भरण-पोषण नहीं करेंगे ॥ ‘अतः सुमित्राकुमार ! तुम यहीं रहकर अपने प्रयत्नसे अथवा राजाकी कृपा प्राप्त करके माता कौसल्याका पालन करो । मेरे बताये हुए इस प्रयोजनको ही सिद्ध करो ॥ १५ ॥

> एवं मयि च ते भक्तिर्भविष्यति सुदर्शिता ।  
> धर्मज्ञगुरुपूजायां धर्मश्चाप्यतुलो महान् ॥ १६ ॥

‘ऐसा करनेसे मेरे प्रति जो तुम्हारी भक्ति है, वह भी भलीभाँति प्रकट हो जायगी तथा धर्मज्ञ गुरुजनोंकी पूजा करनेसे जो अनुपम एवं महान् धर्म होता है, वह भी तुम्हें प्राप्त हो जायगा ॥ १६ ॥

> एवं कुरुष्व सौमित्रे मत्कृते रघुनन्दन ।  
> अस्माभिर्विप्रहीणाया मातुर्नो न भवेत् सुखम् ॥ १७ ॥

‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार ! तुम मेरे लिये ऐसा ही करो; क्योंकि हमलोगोंसे बिछुड़ी हुई हमारी माको कभी सुख नहीं होगा ( वह सदा हमारी ही चिन्तामें डूबी रहेगी )’ ॥ १७ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः श्लक्ष्णया गिरा ।  
> प्रत्युवाच तदा रामं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ॥ १८ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर बातचीतके मर्मको समझनेवाले लक्ष्मणने उस समय बातका तात्पर्य समझनेवाले श्रीरामको मधुर वाणीमें उत्तर दिया–॥ १८ ॥

> तवैव तेजसा वीर भरतः पूजयिष्यति ।  
> कौसल्यां च सुमित्रां च प्रयतो नास्ति संशयः ॥ १९ ॥

‘वीर ! आपके ही तेज ( प्रभाव ) से भरत माता कौसल्या और सुमित्रा दोनोंका पवित्र भावसे पूजन करेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १९ ॥

> यदि दुःस्थो न रक्षेत भरतो राज्यमुत्तमम् ।  
> प्राप्य दुर्मनसा वीर गर्वेण च विशेषतः ॥ २० ॥  
> तमहं दुर्मतिं क्रूरं वधिष्यामि न संशयः ।  
> तत्पक्षानपि तान् सर्वांस्त्रैलोक्यमपि किं तु सा ॥ २१ ॥  
> कौसल्या बिभृयादार्या सहस्रं मद्विधानपि ।  
> यस्याः सहस्रं ग्रामाणां सम्प्राप्तमुपजीविनाम् ॥ २२ ॥

‘वीरवर ! इस उत्तम राज्यको पाकर यदि भरत बुरे रास्तेपर चलेंगे और दूषित हृदय एवं विशेषतः धमंडके कारण माताओंकी रक्षा नहीं करेंगे तो मैं उन दुर्बुद्धि और क्रूर भरतका तथा उनके पक्षका समर्थन करनेवाले उन सब लोगोंका वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है । यदि सारी त्रिलोकी उनका पक्ष करने लगे तो उसे भी अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा, परंतु बड़ी माता कौसल्या तो स्वयं ही मेरे-जैसे सहस्रों मनुष्योंका भी भरण कर सकती हैं; क्योंकि उन्हें अपने आश्रितोंका पालन करनेके लिये एक सहस्र गाँव मिले हुए हैं ॥ २०-२२ ॥

> तदात्मभरणे चैव मम मातुस्तथैव च ।  
> पर्याप्ता मद्विधानां च भरणाय मनस्विनी ॥ २३ ॥

‘इसलिये वे मनस्विनी कौसल्या स्वयं ही अपना, मेरी माताका तथा मेरे-जैसे और भी बहुत-से मनुष्योंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ हैं ॥ २३ ॥

> कुरुष्व मामनुचरं वैधर्म्यं नेह विद्यते ।  
> कृतार्थोऽहं भविष्यामि तव चार्थः प्रकल्प्यते ॥ २४ ॥

‘अतः आप मुझको अपना अनुगामी बना लीजिये । इसमें कोई धर्मकी हानि नहीं होगी । मैं कृतार्थ हो जाऊँगा तथा आपका भी प्रयोजन मेरे द्वारा सिद्ध हुआ करेगा ॥२४॥

> धनुरादाय सगुणं खनित्रपिटकाधरः ।  
> अग्रतस्ते गमिष्यामि पन्थानं तव दर्शयन् ॥ २५ ॥  
> आहरिष्यामि ते नित्यं मूलानि च फलानि च ।  
> वन्यानि च तथान्यानि स्वाहार्हाणि तपस्विनाम् ॥ २६ ॥

‘प्रत्यञ्चासहित धनुष लेकर खंती और पिटारी लिये आपको रास्ता दिखाता हुआ मैं आपके आगे-आगे चलूँगा ॥ ‘प्रतिदिन आपके लिये फल-मूल लाऊँगा तथा तपस्वीजनोंके लिये वनमें मिलनेवाली तथा अन्यान्य हवन-सामग्री जुटाता रहूँगा ॥ २६ ॥

> भवांस्तु सह वैदेह्या गिरिसानुषु रंस्यसे ।  
> अहं सर्वं करिष्यामि जाग्रतः स्वपतश्च ते ॥ २७ ॥

‘आप विदेहकुमारीके साथ पर्वतशिखरोंपर भ्रमण करेंगे । वहाँ आप जागते हों या सोते, मैं हर समय आपके सभी आवश्यक कार्य पूर्ण करूँगा’ ॥ २७ ॥

> रामस्त्वनेन वाक्येन सुप्रीतः प्रत्युवाच तम् ।  
> व्रजापृच्छस्व सौमित्रे सर्वमेव सुहृज्जनम् ॥ २८ ॥

लक्ष्मणकी इस बातसे श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनसे कहा—‘सुमित्रानन्दन ! जाओ, माता आदि सभी सुहृदोंसे मिलकर अपनी वनयात्राके विषयमें पूछ लो—उनकी आज्ञा एवं अनुमति ले लो ॥ २८ ॥

> ये च राज्ञो ददौ दिव्ये महात्मा वरुणः स्वयम् ।  
> जनकस्य महायज्ञे धनुषी रौद्रदर्शने ॥ २९ ॥  
> अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणी चाक्षय्यसायकौ ।  
> आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ ॥ ३० ॥  
> सत्कृत्य निहितं सर्वमेतदाचार्यसद्मनि ।  
> सर्वमायुधमादाय क्षिप्रमावज लक्ष्मण ॥ ३१ ॥

‘लक्ष्मण ! राजा जनकके महान् यज्ञमें स्वयं महात्मा वरुणने उन्हें जो देखनेमें भयंकर दो दिव्य धनुष दिये थे, साथ ही, जो दो दिव्य अभेद्य कवच, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस तथा सूर्यकी भाँति निर्मल दीप्तिसे दमकते हुए जो दो सुवर्णभूषित खड्ग प्रदान किये थे ( वे सभी दिव्यास्त्र मिथिलानरेशने मुझे दहेजमें दे दिये थे ), उन सबको आचार्यदेवके घरमें सत्कारपूर्वक रक्खा गया है । तुम उन सारे आयुधोंको लेकर शीघ्र लौट आओ’ ॥ २९-३१ ॥

> स सुहृज्जनमामन्त्र्य वनवासाय निश्चितः ।  
> इक्ष्वाकुगुरुमागम्य जग्राहायुधमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी गये और सुहृज्जनोंकी अनुमति लेकर वनवासके लिये निश्चितरूपसे तैयार हो इक्ष्वाकुकुलके गुरु वसिष्ठजीके यहाँ गये । वहाँसे उन्होंने उन उत्तम आयुधोंको ले लिया ॥ ३२ ॥

> तद् दिव्यं राजशार्दूलः सत्कृतं माल्यभूषितम् ।  
> रामाय दर्शयामास सौमित्रिः सर्वमायुधम् ॥ ३३ ॥

क्षत्रियशिरोमणि सुमित्राकुमार लक्ष्मणने सत्कारपूर्वक रखे हुए उन माल्यविभूषित समस्त दिव्य आयुधोंको लाकर उन्हें श्रीरामको दिखाया ॥ ३३ ॥

> तमुवाचात्मवान् रामः प्रीत्या लक्ष्मणमागतम् ।  
> काले त्वमागतः सौम्य काङ्क्षिते मम लक्ष्मण ॥ ३४ ॥

तब मनस्वी श्रीरामने वहाँ आये हुए लक्ष्मणसे प्रसन्न होकर कहा—‘सौम्य ! लक्ष्मण ! तुम ठीक समयपर आ गये । इसी समय तुम्हारा आना मुझे अभीष्ट था ॥ ३४ ॥

> अहं प्रदातुमिच्छामि यदिदं मामकं धनम् ।  
> ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यस्त्वया सह परंतप ॥ ३५ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर ! मेरा जो यह धन है, इसे मैं तुम्हारे साथ रहकर तपस्वी ब्राह्मणोंको बाँटना चाहता हूँ ॥ ३५ ॥

> वसन्तीह दृढं भक्त्या गुरुषु द्विजसत्तमाः ।  
> तेषामपि च मे भूयः सर्वेषां चोपजीविनाम् ॥ ३६ ॥

‘गुरुजनोंके प्रति सुदृढ़ भक्तिभावसे युक्त जो श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ मेरे पास रहते हैं, उनको तथा समस्त आश्रितजनोंको भी मुझे अपना यह धन बाँटना है ॥ ३६ ॥

> वसिष्ठपुत्रं तु सुयज्ञमार्य  
> त्वमानयाशु प्रवरं द्विजानाम् ।  
> अपि प्रयास्यामि वनं समस्ता-  
> नभ्यर्च्य शिष्टानपरान् द्विजातीन् ॥ ३७ ॥

‘वसिष्ठजीके पुत्र जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ आर्य सुयज्ञ हैं, उन्हें तुम शीघ्र यहाँ बुला लाओ । मैं इन सबका तथा और जो ब्राह्मण शेष रह गये हों, उनका भी सत्कार करके वनको जाऊँगा’ ॥ ३७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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